भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 470 में से

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पृष्ठ 134

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १२३ बर वीर धीर धारच्च धनी । संभरि वैरिन भंजयौ ॥ इक दौरि गौर राजौर वह । पां वड गुज्जर गंजयौ ॥ छं० ॥ ६१६ ॥ रु० ॥ ३२० ॥ ॥ दिल्ली के राजा अनंगपाल जी पर कमधज्ज का चढना ॥ कवित्त ॥ ढिल्लिवै आनंग । राज राजंग अभंगं ॥ ता उप्पर कमधज्ज । सेन सज्जी चतुरंगं ॥ अग्र आस अभूत । पुट्टि बंधे गज पत्तं ॥ ता पुठ्ठै विजपाल * । सुभर सज्जै रन मत्तं ॥ धजनेज मोज नीसान ढल । मनु बसंत रंज्जय विपन ॥ करि कूच कूच उप्पर धरा । आय वेध अंतर सपन ॥ छं० ॥ ६१७ ॥ रु० ॥ ३२१ ॥ ॥ कमधज्ज की चढाई सुन अनंग का कालिंद्री उतर मुकाम करना ॥ कवित्त ॥ सुनी बत्त आनंग । अंग लग्गो रस वीरच्च ॥ भ्रकुटि वक्र रत द्विग । चित्त जुध रत्त सरीरच्च ॥ बोलि मित्त अप्पान । । कहिय सू बान मंत गुन ॥ चढत राइ दिल्लेस । करिय नीसान वीर धुन ॥ गज वाजि रथ्थ पद भर गद्दर । सजिय सेन सनमुष चलियं ॥ उत्तरि कालिंद्द्रि मुक्काम किय । दस दिसान वत्ती चलिय ॥ छं० ॥ ६१८ ॥ रु० ॥ ३२२ ॥

  • स्मरण में रखने की बात है कि संप्रत शोधों के अनुसार भी कनौज़ के राजा विजयपाल जी, दिल्ली के राजा अनंगपालजी और अजमेर के राजा सोमेश्वर जी परस्पर समकालीन थे ॥ ३२१ पाठान्तर :-ढिली । ढिल्लावै । राजग । अभंगम । कनवज । सजी । चतुरंगम । अंग । अग्र । पुठिं । पुढ़ि । बँधे । पंतं । प्रंत । पुठे । पुठिं । विजेपाल । सजे । मंतं । मंत । नीसांन । ढल्ल । मनों । बसंत । रञ्जय । विपण । कूच २ । उपरि । धरहि । धरहिं । आइ । वेद्ध । संपन ॥ ३२२ पाठान्तर :-सुनिग । सूनिग । वत । लगौ । लगे । दश । भृगुटि । चक्र । द्विग रत । चिंत । भृत । अप्पांन । शषांन । स बांन । दिलेश । निसांन । धूंनि । रथ । पथ । मन मुष । संमुख । उतरि । कलिद्रि । मुकांम । दश । दशांन । वती । हलीय ॥
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