भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 135

१२४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ कमधज्ज की चढाई सुन सोमेस का अनंग की सहायता को दिल्ली जाना और वहां पहुँच अनंगपालजी से एकान्त में मंत्रणा करना ॥ पद्धरी ॥ संभरिय बत्त संभरि नरेस । आभासि खित्त अप्पां असेख ॥ कमधज्ज राज तंवर नरिंद । मत्तौ सु दुनै आवद्ध दंड ॥ छं० ॥ ६१८ ॥ अप्पन सहाय सज्जों सपूर । बैठन्न ग्रेह नह अम्भ सूर ॥ करिकैं सु जीति आवैं अपान । कै सजै वास कैलास थान ॥ छं० ॥ ६२० ॥ मन्नेव सूर भर मंत वाम । घुम्मरे नद्द नीसान ताम ॥ चढि चल्या सेन सजि चाहुवान । उप्पटे जानि सत सिंधु पान ॥ छं० ॥ ६२१ ॥ अग्गे सु सोम दिल्ली सहाय । अग्गेव विष्व हर कंठ लाय ॥ अग्गेव मनी लख्खी फणिंद । अग्गेव सरद निसि उगिग चंद ॥ छं० ॥ ६२२ ॥ अग्गे सु चक्र खिन्ना गुविंद । अग्गै सु वज्र कर चक्की इंद ॥ बिहु बाह सूर सज्जे समंत । बेनै विरद्द बंधे अनंत ॥ छं० ॥ ६२३ ॥ *

  • यह छंद सं० १६४७ । १७७० । और १८४५ की पुस्तकों में नहीं है किन्तु सं० १८५९ की लिखी में है ॥ इस छंद की अंत की तुक में “बेनै विरद्द बंधे अनंत” है कि जिसका अर्थ यह होता है कि वेन ने अनेक बिरद बांधे अर्थात् कहे । यह वेन कवि इस महाकाव्य के रचनेवाले चंद का पिता था और वह सोमेश्वर जी के इस समय साथ था । अब तक चंद से पहिले का कोई काव्य किसी भी कवि का किसी के जानने में नहीं है किन्तु हमने जो एक छंद छंद वर्णन की महिमा नामक पुस्तक सं० १६२९ की लिखी शोध कियी है उस के पीछे मेवाड राज के महाराणा जी श्री उदयसिंहजी के महाराज कुमार श्रीसगतसिंहजी के पंडित विष्णुदासजी ने अकबर बादशाह के भाट गंगजी से अजमेर में पटोलावाय के मुकाम पर चंद के बाप कवि राव वेन का नीचे लिखा छप्पय अर्थात् कवित्त लिखा था वह हम प्रकाश करते हैं। इस छप्पय से वेन ने पृथ्वीराजजी के पिता सोमेश्वरजी को आसीस दियी थी :- छप्पय ॥ अटल ठाट महि पाट । अटल तारागढ थानं ॥ अटल नग अजमेर । अटल हिंदव अस्थानं ॥ अटल तेज परताप । अटल लंका गढ डंडिव ॥ अटल आप चहुवान । अटल भूमी जस मंडिव ॥ संभरी भूप सोमेस नृप । अटल छत्र आपै सु सर ॥ कवि राव वेन आसीस दै । अटल जुगां राजेसं कर ॥ १ ॥