पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 136, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें[आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १२५ अग्गैं सुदंति पंतिय विद्दूर । पन्तंत चंदु सद फान्न भूर ॥ धजनेज चमर वंवर विनान । मन हू कि पब्ब पह्नाव किसान ॥ कं० ॥ ६२४ ॥ धमकंत धरनि अच्छि सिर निहाय । चल चलिय द्विग उद्विग्ग थाय ॥ पुर धूरि पूरि मुद्दित भमित्ति । दिसि व दिसि राज पसरंत कित्ति ॥ कं० ॥ ६२५ ॥ रह पग्ट्ठि सोम पर चाड कज्जि । मन हू कि दुनह वर व्याघ्र रज्जि ॥ संपत्त जाय दिल्लिय पुरेस । आनंग राज मिळे असे स ॥ कं० ॥ ६२६ ॥ ग्रह वत्त कुसल पूंछिय असेत । रस हास पेम वढे सु छेत ॥ विधि विड्डि भोज भोजंत राय । सचि सु चित्त चित्त पट रस्स भाइ ॥ कं० ॥ ६२७ ॥ [L10: आहार पान घन सार पूर । बैठे सु आइ एकांत सूर ॥ सब कहिग विड्ड कमधज दिसान । सुद्धरै वत्त सो करहु पान ॥ कं० ॥ ६२८ ॥ रू० ॥ ३२३ ॥ ॥ अनंग की बात सुन सोमेस का रोस में आय लड़ने को तयार होना॥ कवित्त ॥ सुनिय वत्त जपि सोम । रोस उब्भार झार असि ॥ रसन दसन दब्बंत । रक्त द्रिग मुच्छ हथ्थ कसि ॥ इसी के साथ उसी पुस्तक में चंद के नागापन्नकरणा का कहा हुआ यह नीचे लिखा दोहा भी लिखा है:- दोहा ॥ ले कूंजा नृप पीयुला, सांमत चमूं समंद ॥ वेन नंदन कनवज गमन, चंद करन फइ दंड ॥ ३२३ पाठान्तर :- संभरीय । नरेवा । अभासि चित आपां । अपा । अग्रेश । कमधज । राव । तूंवर । नरिंद । दुन्हैं । आबद्ध । दुंद । सञ्जौ । वैवच । गेह । धम । कैकरैं जीत आना नारंद । आनिग । अपांन । यांन । कें सजे यांन कैलास इंद । मनेव । मंच्नैवं मंत भर सूर ठाम । घुमरेट्ट नीसांन तांम । मनेव । घुमरे । चाहुवांन । उपटे । जांनि । सिंधू । पांनि । पानि । अग्गै । अग्गें । अग्रैं । अगैंव । अंगेव । अग्रैंव । विप । लाइ । अगैंव । अग्रेत्र । अग्रैंव । मंति । मचि । लभी । फूंनिंद । अग्रैंव । अगैंव । रत अग्गें । अगैं । वेन । बानैं । अग्रैं । सदंत । पंभूर । पंडूर । भरन । बनांन । मत हूं । पब । फसांन । सर । हलीय । दुग । अट्ठगु । दूग । अद्रूग । पुरि धूरि रिपुरि सुदिन भमित्त । पुररि पूरि धूरि मुदिन तगित्त । वि । पसरंति । पडड् । पडह । कज । मांन हूं । मानहु । रज । संपत । दिल्लियपुरेश । राय । मिले । गृह । कुशल । पुछिय । अशेष । रश हाश । बढे । विधि विधि । चित । रेश । पांन । आय । सब्ब । विधि । कमढुंज । दिसांन । सुट्ठरंहि । बत । हूं । पांन ॥ ३२४ पाठान्तर :-घत । चत्तं । जपं । रोश । उभार । भारि । दुतिवंत । मुछ । हथ । विचा- रिय । अप्पांन । अपनीय । अचि । भारीय । चाहुआन । चंडुवान । झंपौ । दलां । मांनहुं ॥