भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 216

साटक ॥ नारहं कहि जाय विष्ण पुरयं, स्यामं कले वायकं । जग्यं फज उतपन्न दीन वरयं पाताल हरनं सदा ॥ वंभावलि बलि चीय पास लषमी, पारषिआने घरी । चौकी बंधि चौमास पास सरितं, पद्दारनं सत्तलं ॥ छं० ॥ २३० ॥ रू० ॥ ४७ ॥ * ॥ परशुरामावतार की कथा ॥ दूह्वा ॥ क्षिति खिची अति प्रबल हुअ, महामत्त अस्रार ॥ ताचि हतनं क्षिति दुज दियन, परसराम अवतार ॥ छं० ॥ २३१ ॥ रू० ॥ ४८ ॥ दुय पुचिय राजन सुपति, व्याही खिची दान ॥ जमदग्निच रिषरेनिका परिनट्ठिय अरि पान ॥ छं० ॥ २३२ ॥ रू० ॥ ४८ ॥ कवित्त ॥ अनुकंपा श्रुत सुवर । दिद्ध खिचीय अरज्जन ॥ रेणुक रिष जमदग्न । खिचि सहसार्जुन षप्पन ॥ सहस भुजा सिर इक्कं । सरित मन घध्य सुबाहै ॥ नव षंडन उग्रच्चै । लोग सहसं तन दाहै ॥ जमदगनि सुतन दुज धर दियन । फरसराम अवतार धर ॥ खिचियन मारि छंदच्च वरिय । करी ट्रूक अज सहस कर ॥ छं० ॥ २३३ ॥ रू० ॥ ५० ॥ छंद भुजंगी ॥ पुची दोइ राजं सुराजं बिचारी । इक्कं रूप सारं वियं चचुनारी ॥ दई सैस भुज्जं अनुक्कंप ताहं । बियं जम्मदग्नं सुरेनक्क व्याहं ॥ २३४ ॥ ४७ पाठान्तर :-वरयं । लखिमी ॥

  • यह रूप हमारे पास की सं० १८५६ की लिखी पुस्तक के सिवाय और किसी में नहीं है ॥ ४८-४६ पाठान्तर :-क्षिति । प्रवलं । हुश्रं । हुय । हुवं । महामत्त । हनन । क्षिति । परसरा॑म । परसिराम ॥ ४८ ॥ दोय पुत्रि । पुत्री । पत्री । दांन । जमदग्नह । रेणका । परिनहिय । परनठय । अरिप्रांन ॥ ५० पाठान्तर :-अनुकंपा । सब्रर । पित्रि । पिन्नी । अरयुन । अरजुन । रैनक । रेणुक । यम- दग्न । पित्रो । सहस्रार्जुन । सहसारजुन । षपन । इक । छथ । सुवा है । लोग । नन । यमदगनि । जिमदगनि । दीयन । फरसरांम । अवतारि । धरि । करि । टुक्क । अञ्जसकर ॥ ५१ पाठान्तर :-दोई । दोइ । राज । सु राज । इक । सरसं । बीयं । चतुरनारी । चतुर- नारी । दद्द । सहस । भुजं । सु अनुकंप । सु. अनंकंप । बीयं. । जमदग्नं । सुरेनक । सुरैनक ।