पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा समय १३] पृथ्वीराजरासो । =६७ जमद्दर पानान यस्त, वढत दानन दिन ही दिनं । छह संस तरवारि, वढत सस्त्रन्न पिन छि पिन ॥ वढंत कित्ति दिन दिन अमन्द, प्रथीराज सोमेस सुत्र । दस दिसा जोति दिन दिन वढत, महा निसा पछ जानि धुअ ॥ छं० ॥ ५४ ॥ रु० ॥ ३७ ॥ पृथ्वीराज का अजित अवतार होना ॥ कवित्त ॥ सहरि गईमछ सूर, नूर नवलून नवछा मुप । चार वरन चिर आव, गेह विलसंत महा सुप ॥ पदत मैवासन घाउ, दाध दिज्जन दुज्जन घर । अडटनि उटत सुटंड, थप्पि थिर करत अप्प घर ॥ चिंधु चक्क छक्क घर थर धरत, पिसुन पिंजि किज्जय नरम । अवतार अजित दानव मनुष, उपजि सूर सोमच करम ॥ छं० ॥ ५५ ॥ रू० ॥ ३८ ॥ लोहाना का गैरव में से कूदना और अजानवाह नाम और जागीर पाना ॥ कवित्त ॥ षोडस गज उरह, राज जमै गवप्प तस । संझ समय चीतार, पच कीनो पेसकस ॥ देषत संभीरनाथ, हथ्थ कूटन हथ सारदा । तीर कि गोरि बिछुदि, तुहि असमान की तारदा ॥ अधवीच नीच परतें पछिल, लोहाने लीनो झरपि । नट कळा खेलि जनु फेरि उठि, आनि हथ्थ पिथ्थउ अरपि ॥ छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३९ ॥ * ३७ पाठान्तर-भंडारन १ दांम । तरवार । वढंत ॥ ३८ पाठान्तर-सहरि । च्यारि । दुजन । अरटन । दटत । थपि । अप । चिंडु । चक । हक । किजय ॥ ३८ पाठान्तर-गंवध । चित्रकार । हथ । आसमान । आनि ॥
- ये ३९ । ४० दो रूपक सं० १६४७ की पुरानी पुस्तक में नहीं हैं और इधर की सं० १८५९ में हैं ॥