पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२० पृथ्वीराजरासो। [ नवां समय ३६ सुलतान का पकड़ा जाना, उसकी सेना का भागना, और पृथ्वीराज की विजय ॥ कवित्त ॥ गह्यो पंचि सुरतान । डारि अड्डौ है चामंड ॥ भगी सेन बेचाल । परे घन थान थान थड ॥ गहन अग्र सुरतान । परे षां न्याजी गाजी ॥ मीर मान कम्मांन । पर्यो आरब अरि भाजी ॥ को गनै षान मीर रु अंबर । सहस सत्त तुहे सुधर ॥ नच्चै कमंध च्यालीस रस । जै लब्भी चहुआन भर ॥ छं० ॥ २०४ ॥ रु० ॥ ८८ ॥ दूहा ॥ मंडलीक पीछी पर्यौ । तीकम त्यार सुबंध ॥ राम वाम पंमार परि । नचि सामंत कमंध ॥ छं० ॥ २०५ ॥ रु० ॥ ८९ ॥ सूर्योदय से एक घड़ी पांच पल पर लड़ाई आरम्भ हुई और चार घड़ी दिन रहे सुलतान पकड़ा गया, बीस हज़ार मीर और सात हज़ार हाथी घोड़े मारे गए, हिन्दू तेरह सौ मरे, तीन कोस में लड़ाई हुई, सुलतान को अपने डेरे में लाए ॥ कवित्त ॥ घरी एक पल पंच । सूर उगत सज्ज्यो जुध ॥ घरी च्यारि दिन षेष । ग्रह्यो सुरतान पान उध ॥ सहस बीस इक्क अन्न । परे रनमीर समत्थं ॥ सहस्स सत्त हैगे । समुह षंडे धर तत्थं ॥ सय तेर परे हिंदू सयन । कोस तीन रन अङ्ग परि ॥ सुरतान गहिय चहुआन पहु । आयौ बज्जत बज्ज घर ॥ छं० ॥ २०६ ॥ रु० ॥ ९० ॥ ८८ पाठान्तरः-सुरतांन । अड्डो । हैं । चामंडं । यांन यांन । सुरतांन । मांन । कमान । भागी । पांन । सु । तुट्टैं । सधर । नंचं । लभी । चहुवांन ॥ ८९ पाठान्तर-दोहरा । रांम । बाम ॥ ९० पाठान्तर-उगात । गह्यौ । सुरतांन । पांनि । पांनं । वृच । समर्थ । सहस । समूह । षंडै । तथं । परें । सुरतान । चहुवांन ॥