पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
४२० पृथ्वीराजरासो। [ नवां समय ३६ सुलतान का पकड़ा जाना, उसकी सेना का भागना, और पृथ्वीराज की विजय ॥ कवित्त ॥ गह्यो पंचि सुरतान । डारि अड्डौ है चामंड ॥ भगी सेन बेचाल । परे घन थान थान थड ॥ गहन अग्र सुरतान । परे षां न्याजी गाजी ॥ मीर मान कम्मांन । पर्यो आरब अरि भाजी ॥ को गनै षान मीर रु अंबर । सहस सत्त तुहे सुधर ॥ नच्चै कमंध च्यालीस रस । जै लब्भी चहुआन भर ॥ छं० ॥ २०४ ॥ रु० ॥ ८८ ॥ दूहा ॥ मंडलीक पीछी पर्यौ । तीकम त्यार सुबंध ॥ राम वाम पंमार परि । नचि सामंत कमंध ॥ छं० ॥ २०५ ॥ रु० ॥ ८९ ॥ सूर्योदय से एक घड़ी पांच पल पर लड़ाई आरम्भ हुई और चार घड़ी दिन रहे सुलतान पकड़ा गया, बीस हज़ार मीर और सात हज़ार हाथी घोड़े मारे गए, हिन्दू तेरह सौ मरे, तीन कोस में लड़ाई हुई, सुलतान को अपने डेरे में लाए ॥ कवित्त ॥ घरी एक पल पंच । सूर उगत सज्ज्यो जुध ॥ घरी च्यारि दिन षेष । ग्रह्यो सुरतान पान उध ॥ सहस बीस इक्क अन्न । परे रनमीर समत्थं ॥ सहस्स सत्त हैगे । समुह षंडे धर तत्थं ॥ सय तेर परे हिंदू सयन । कोस तीन रन अङ्ग परि ॥ सुरतान गहिय चहुआन पहु । आयौ बज्जत बज्ज घर ॥ छं० ॥ २०६ ॥ रु० ॥ ९० ॥ ८८ पाठान्तरः-सुरतांन । अड्डो । हैं । चामंडं । यांन यांन । सुरतांन । मांन । कमान । भागी । पांन । सु । तुट्टैं । सधर । नंचं । लभी । चहुवांन ॥ ८९ पाठान्तर-दोहरा । रांम । बाम ॥ ९० पाठान्तर-उगात । गह्यौ । सुरतांन । पांनि । पांनं । वृच । समर्थ । सहस । समूह । षंडै । तथं । परें । सुरतान । चहुवांन ॥
नवां समय ३७ ] पृथ्वीराजरासो । ४२१ रणक्षेत्र में ढूंढकर पृथ्वीराज का मीरहुसैन की लाश निकलवाना ॥ दूहा ॥ खेत ढूंढि प्रथिराज नृप । बजे जीत रन तूर ॥ षां हुसेन घन घाय घट । उप्पारिग वर सूर ॥ छंद० ॥ २०७ ॥ रु० ॥ ९१ पातुरि का जीतेजी हुसैन के साथ क़ब्र में गड़जाना दूहा ॥ पयौ हुसेन सुपात्र सुनि । चिंतित्य चित्त इमांन ॥ सजौं घोर हुस्सेन सथ । करौं प्रवेस अपांन ॥ छंद० ॥ २०८ ॥ रु० ॥ ९२ ॥ पृथ्वीराज का शहाबुद्दीन को पांच दिन आदर के साथ रख- कर, तीन बेर सलाम कराके मीरहुसैन के बेटे ग़ाज़ी को उसको सौंपकर यह प्रण कराके कि अब हिन्दुओं पर न चढूंगा, छोड़ना, शाह का ग़ाज़ी को लेकर कुशल से ग़ज़नी पहुंचना ॥ कवित्त ॥ रषि पंच दिन साहि । अदब आदर बहु किन्नौ ॥ सुत्र हुसेन गाजी सुपूत्त हथ्थैं ग्रहि दिन्नौ ॥ किय सलांम तिय वार । जाहु अप्पने सुथांनह ॥ मति हिंदू पर साहि । सञ्जि आऔ स्वथानह ॥ बैठाइ साह सुष्वासनह । लाय अप्प गाजी सुसथ ॥ संपत्त जाइ गञ्जन पुरह । करी षैर उद्धार अथ ॥ छंद ॥ २०९ ॥ रु० ॥ ९३ ॥ ९१ पाठान्तर-प्रथीराज । उपारिग ॥ ९२ पाठान्तर-इमांन । सजं । हुसेन । करों । अपान ॥ ९३ पाठान्तर-सपुत्त । हथैं । दिंन्नौ । सलांम । बेर । सजि । आयौ । सथांनह । बैठाय ।
४२२ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय ३८ अमीरों का सुलतान के जीते जगते लौटने पर बधाई देना और कुशल पूछना ॥ दूहा ॥ और बधाई जुंनरा । करी आइ सुरतांन ॥ अंत्य सबन कीनी घयर । पुजिय पीर ठटांन ॥ छं० ॥ २१० ॥ रु० ॥ ९४ ॥ इति श्री कविचंद विरचिते प्रथ्रिराज रासके हुसेन षां चित्ररेखा पात्र अधिकारे पातिसाह ग्रहन नाम नवम प्रस्ताव सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥ सुषासनहि । लीय । मथ । जाय । गजनपुरह ॥ ९४ पाठान्तर-उमरनि । उमरनि । आय । सुरतांन । अंत्य । पुजोय ॥
उपसंहारकी टिप्पणी । यह पर्व्व वा समय हिन्दुस्थान के इतिहास में हिन्दुओं की वादशाहत के तो नाश होने और मुसलमानी के स्थापित होने के सत्य मूल कारण को ज्ञात करानेवाला है तथा यह वह कारण है कि जिसको सब मुसलमानी तारीखों ने जान बूझकर छिपाया है। इस ही से इस में लिखे वृत्तादि का मुसलमानी तारीखों में मिलना कठिन हो रहा है। चंद कवि यह न लिख गया होता तो हमको इस समय वह ही ज्ञात होता कि जो मुसलमानी तारीखों में लिखा मिलता है। यद्यपि चंद पृथ्वीराज और हिन्दुओं का पक्षपाती कहा जा सकता है तथापि उसने मुसलमानों की भांति विपक्ष के वृत्तों को बिल्कुल छिपाया नहीं है किन्तु उनकी अपेक्षा उसने कुछ सविस्तर लिखा है कि जिनमें से अन्य बातों को छोड़कर ऐतिहासिक अंश हम पृथक् कर सकते हैं। जिस हुसैन की कथा का यह समय है वह कौन था ? इस का स्पष्ट पता मुसलमानी तारीखवाले नहीं देते हैं, किन्तु यूरोपियन विद्वानों ने उसका पता लगाने में बड़ा परिश्रम किया है। जब कि मुख्य पुरुष का पता लगाने में इतनी कठिनता है तब अन्य योद्धादि के जो नामादि इसमें आये हैं उनका पता लगना कितना कठिन है। इस विषय में बहुत कुछ लिखने की अपेक्षा हम डाकुर होर्नली साहब की एक ऐसा नोट नीचे प्रकाशित करते हैं कि जिस से इस हुसैन का पता और चंद का उसको शाहाबुद्दीन का बांधव बताना सत्य ज्ञात हो जाय। उक्त डाकुर साहब का लिखना यह है
- Hussena Khána (Husain Khán) appears to have been a son of the Mir Husain, who as related in Canto 8, was the primary cause of the invasions of India by Shahab-ud- din. Mir Husain or, as he is variously called Sháh Hussain or Husain Khán is there said to have been a cousin (bandhava) of Shahab-ud-din, a distinguished warrior, living at the Sháh's Court at Ghazni. The Sháh had a beautiful mistress, named Chitrarekha, to the story of whom the 10th Canto is devoted. She was fifteen years old and very skilful in music, and was greatly beloved by the Sháh. Husin fell in love with her and she with him. One morning the Sháh sent for him and upbraided him on his conduct. But Husain continued to intrigue with Chitrarekha, and was forced to leave the city. He carried off his family and property and Chitrarekha, and fled to Prithiraj to Nagor. Prithiraj, after some hesitation, welcomed him and gave him asylum. Hearing of this, Shahab-ud-din was furious and sent messengers to demand Chitrarekha from Husain; failing in which, they were to demand the expulsion of Husain from Prithiraj. Husain refused to send the woman back, and Prithiraj replied, he could not give up the man who came to him for refuge. Shahab-ud-din receiving this answer, at once prepared to invade India; Prithiraj, on his part also prepared for war. In the battle that ensued, Husain distinguished himself greatly, but lost his life Chamand Rae succeeded in capturing the Sháh, and thus the battle was decided in favor of Prithiraj After five days the Sháh was released and allowed to return to Ghazni taking Ghazi, Husa- in's son, with him, and pledging himself no more to make war upon the Hindus. The pledge, it need hardly be said, was not kept by the Sháh, and the implacable hatred, which these events had created in his mind was never appeased till it was slacked in the blood of Pri- thiraj and the destruction of his Empire. The capture of the Sháh, here related, is the first of the seven times, he is said to have become the captive of Prithiraj. The next occasion of his capture is referred to in note 187; once more he is made captive as related in the present Canto. Chitrarekha is said to have buried herself with the corpse of Husain. If the Husain Khán mentioned here, is the son of the elder Husain, who was taken to Ghazni by
३ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय ४० Shahab-ud-din, he must have made his escape afterwards and returned to Prithiraj. The elder Husain is undoubtedly the same as Nasir-ud-din Husain, who is repeatedly mentioned in the Tabaqat-i-Nasiri (Major Raverty's translation, pp. 344, 361, 364, 365). He was the older of the two sons of Malik Shihab-ud-din, Muhammad, a younger brother of Sultán Bahá-ud-din Sām, the father of Sultán Shahab-ud-din. The elder Husain, therefore, was as Chand correctly states, a cousin (bandhava) of the latter. In the Tabaqat, it is true, it is said that Nasir-ud-din Hussain usurped the throne of his uncle Ala-ud-din during the latter's temporary captivity at the Court of Sultán Sanjar of Khorasan, and that he was murdered by his uncle's partisans on the latter's return from captivity (p. 364). But firstly, this story is contradicted by all other Muhammadan historians, who pass at once from Ala-ud-din to his son (see Major Raverty's foot-note, p. 364). Secondly, it is more probable that if there was any usurpation at all, it was made by Nasir-ud-din's father Muhammad, the younger brother of Ala-ud-din. The three brothers Saif-ud-din Súri, Baha-ud-din Sām, and Ala-ud-din Husain, succeeded each other on the throne of Ghor; it is natural, therefore, that during Ala-ud-din's captivity, the fourth brother Shiháb- ud-din Muhammad, should have occupied or attempted to occupy the throne. The writer of the Tabaqat must have confused father and son, as he has done also on other occasions (e. g., with regard to Ziya-ud-din Muhammad). Thirdly the description of Nasir-ud-din Husain's character: "he had a great passion for women and virgins, and had taken a number of the handmaids and slave girls of the Sultán's harem" (Tabaqat p. 364), agrees with Chand's story about his intrigue with Chitrarekha and has evidently a confused re- collection of it. There can, therefore, be little doubt, that Chand gives substantially the true account of Husain's fortunes. It may be added, that both the Tabaqat and other Muhammadan histories give a rather confused relation of an ancestor of this Husain (and of the Ghori royal family generally) who also bore the name of Husain or Hasan, having fled to India, and having lived some time at Delhi (see Tabaqat pp. 322, 323, 332). There is perhaps in this a confused recollection of the flight of Husain to Prithiraj, related by Chand." अभी हमने इस कथा के नायक हुसैन का ही पता अपने पाठकों को बतलाया है किन्तु अन्य जितने योद्धाओं के नाम इस में आये हैं उनका हम पता मुसलमानी तारीखों में लगा रहे हैं और अन्य विद्वानों से भी उनके विषय में निश्चय कर रहे हैं, अतएव उनके विषय में फिर निवेदन करेंगे । अभी तो हमारा इतना ही काम है कि इस महाकाव्य को इतना शोध कर प्रकाशित करादें कि विद्वान इतिहास वेत्ता उसे अवलोकन कर सकें, इत्यलम् ॥
अथ आखेटक चूक वर्णनं लिख्यते ॥ ————✤———— ( दसवां समय ) ————❖———— एक वर्ष बीत गया, परन्तु शहाबुद्दीन के हृदय में पृथ्वीराज का बैर सालता रहा ॥ दोहा ॥ वरष एक बीते कत्तच । रीस रखि सुरतान ॥ उर अंतर अग्गी जलै । चित सल्लै चहुवान ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥ एक महीना पांच दिन गज़नी में रह कर फिर हुसैन का पृथ्वीराज के पास आप जाना ॥ दूहा ॥ मास एक दिन पंच रचि । बद्धि धाइ हुसैन * ॥ पग लग्यौ चौहान कै । राज प्रसन्निय वैन ॥ छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥ फिर पृथ्वीराज का आखेटक माड़ना और शहाबु- द्दीन का चूक करने को आना ॥ दूहा ॥ फिरि आखेटक मंडि नृप । पहू वन घन तास ॥ दूत साधि साहाबदीं । आइ संपत्ते पास ॥ छं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥ १ पाठान्तर-बीतै । सकल । रपि । सुरतांन । अंदर । अग्री । सालै । चहुवांन ॥ २ पाठान्तर-बधि । बंधि । धाय । घाइ । घाव । हुसेन । लाग्यो । चौहांन । बैन ॥
- यहां "हुसेन" से कवि का अभिप्राय हुसेन कथा नामक समय के चित्ररेखा को लानेवाले हुसेन के बेटे ग़ाज़ी हुसेन से है कि जिसको पृथ्वीराज ने शहाबुद्दीन को हाथ पकड़ाकर गज़नी भेज दिया था (हुसेन कथा रूपक ९३) परंतु शाह ने गज़नी पहुंचकर उसे भी क़ैद कर दिया था सो वह जेल में कत्ल करके पीछे फिर १ महिने और ५ दिन वहां रह कर पृथ्वीराज की शरण में आ गया ॥ ३ पाठान्तर-पहू । रुत । द्री । आय । संपत्ते ॥
४२६ पृथ्वीराजरासो। [ दसवां समय २ मोतिराव क्षत्रिय का शहाबुद्धी को पृथ्वीराज के आखेट का समाचार देना ॥ कवित्त ॥ नीतिराव षत्रीय† । चरित ग्रेहं चहुआनं ॥ दिल्ली को वर भेद । लिखे कग्गद सुविच्चानं ॥ बरष उभै षट मास । करै सुबिचान पलान्यो ॥ षहू बन घन राज । बीर आखेटक जान्यौ ॥ सामंत सूर स्थंथंन कै । बर वीरं तन षेलद्धय ॥ दैवान जुद्ध चहुआन भर । भिरि दुरजन भर ठिल्लइय ॥ कं० ॥ ४ ॥ रु० ॥ ४ ॥ आखेट का अच्छा अवसर पा कर शहाबुद्दीन का भेद लेने को दूत भेजना, दूत का समाचार देना, शाह का सरदारों को आज्ञा देना कि छिप कर पृथ्वीराज पर चढाई करो ॥ दूहा ॥ इक तप पंग नरिंद कौ । अरु * सुनि अवाज सुरतान ॥ आखेटक प्रथिराज गय । षटवन चहुवान ॥ कूं० ॥ ५ ॥ रु० ॥ ५ ॥ कवित्त ॥ आखेटक बन तक्कि । दूत गज्जनैं सपत्ते ॥ साह जे,र साहाब । दिए पुरमान निरत्ते ॥ चसम छय गय मुक्कि । राज षटू बन छिल्लै ॥ सासं ब कैः सध्य । भुक्त गुज्जर दिसि मिल्ल ॥ निक्कस्यौ द्रव्य साहाब दिय । बर नागौरं ग्रेह धन ॥ ढूढ घात साचि गोरी सुबर । करौ चूक वै सज्ज रन ॥ कं० ॥ ६ ॥ रु० ॥ ६ ॥ ४ पाठान्तर-ग्रेहं । चहुवांनं । कग्गर । कोपि सु । बिहांत । पलांत्यो । षटू । जांत्यौ । सथहं । संयं। कौं । कौ । बेलर्दय । दैवांन । दैवानं । चहुत्रांन । दुजन । ठिल्लइय । ठिल्लर्दय ॥ † नीतिराव षत्रिय नामक मुख़बिर था कि जो पृथ्वीराज के यहां की खबरें शहाबुद्दीन को दिया करता था । वाह यह कैसा देशहितैषी पुरुष था ! ! ! ५ पाठान्तर-कों * अधिक पाठ है ॥ सुरतांन । पृथ्वीराज । षटू । चहुवांनं ॥ † यह रूपक सं० १६४७ की प्रति में नहीं है ॥ ६ पाठान्तर- गजनै । संपत्ते । दीए । फुरमांन । षटू । बिल्लै । सथ । भुझ । गुजर । मिल्लै । दूध । दी । नागौर । सजि ॥
दसवां समय ३ ] पृथ्वीराजरासो । ४२० हाजी खां आदि का तयारी करना ॥ चौपाई ॥ काषेटक बहू चहुवानं । कहैं पूत से मुप सुविधानं ॥ हाज़ी षां गप्पर सुकनाजी । मंझौ चूक महमद गाजी ॥ छं० ॥ ७ ॥ रु० ॥ ७ ॥ शहाबुद्दीन का आज्ञा देना कि इस बात का भेद लो कि कितनी सेना चौहान के साथ है क्योंकि बिना भेद कुछ काम नहीं बनता ॥ कवित्त ॥ सें बुझै सुरत्तान । दूत पच्छिम सुविधानं ॥ काषेटक प्रथिराज । सथ कित्तक चहुआनं ॥ तुम राजन निमांन । राज विवेक परषौ ॥ तुम * स्वामी भ्रम दृग स्वामि । स्वामि द्रोही तन जष्यौ ॥ जंगली नृपत्ति जंपहु चरित । छल बल मंत सु किज्जियै ॥ ततार षांन षुरसान षां ॥ हिंदू भेद सुविज्जियै ॥ छं० ॥ ८ ॥ रु० ॥ ८ ॥ कवित्त ॥ भेदं दुग्ग भंजियै । भेद दुज्जन दल भंजै ॥ राजभेद बंधियै । भेद देवन ग्रह रंजे ॥ मंच सोइ जिन भेद । भेद बिन मतौ न होई ॥ भेद बंध वन सोइ । सेद देषै सब कोई ॥ संग्रहौ भेद चहुआन कौ । मुष उच्चार जो जंपियै ॥ तत्तारषांन षुरसान षां । बज्चन दुज्जन चंपियै ॥ छं०॥ ९ ॥ रु०॥ ९ ॥ सब सरदारों का मत होना कि बिना धोखा दिए चौहानों को जीतना कठिन हैं ॥ कवित्त ॥ चहुआन जम वान । गेनं सुक्कंतें सुकुहै ॥ कुटिल दिष्ट जिहिं फिरै । तेज अरियन दल षुहै ॥ ८ पाठान्तर-बुझैं । सुरतांन । सें बुझै साहाब । साह पच्छिम सुरतांनं ॥ प्रथौराज । सथ क्रितक । केतक । चहुवांनं । विवेक । परखौ । * अधिक पाठ है ॥ स्वामि । द्रूग । स्वामि । सामि । जह । लषौ । ततार । षुरसांन ॥ ९ पाठान्तर-दुगं । भांजीयै । दुजन । बंधीयै । गृह । सोई । सोय । देखे । चहुवांन । जंपीयै । ततार । पुरसांन । दुजन । चंपीयै ।
४२८ पृथ्वीराजरासो । [ दसवां समय ४ प्रबल तेज अस तेज । जुद्ध दैवान देव गति ॥ एक लष लेषिये । एक लषिये लषन भति इच जानि चूक चिंत्यौ नृपति । इच्छे बत्त सुविद्दान कौं ॥ तत्तार पांन निसुरत्त षां । पूकि पांन षुरसान कौं ॥ छं० ॥ १० ॥ रू० ॥ १० ॥ कवित्त ॥ षां षुरसान ततार । षान अरदास समर्पिय ॥ चूक मंडि सुरतान । थान चहुआन सुथप्पिय ॥ हाजी षां गाजी सु । बंध निज बंधी गब्भर ॥ सुब्बिद्दान साहाब । साचि स्वारं दल पष्षर ॥ निज पान षान षुरसान पति । इष्ध साचि बत्त बधियै ॥ मिलि मीर मसूरति ततं किय । चूक साचि अरि संधियै ॥ छं० ॥ ११ ॥ रू० ॥ ११ ॥ पृथ्वीराज का बेखटके आनन्द से आखेट खेलना ॥ दूह ॥ रंग रमै रजान बन । नहीं संक मन मांहि ॥ तरु बेली घन गच बरिय । सुभि जल निरमल छांह ॥ छं० ॥ १२ ॥ रू० ॥ १२ ॥ पृथ्वीराज के आखेट का वर्णन ॥ कवित्त ॥ सतह पंच दीपीय । एण फंदैत पंच सौ ॥ सहस स्वान दस डोरि । ग्रहै पंचान पंच सौ ॥ पंच अग्ग पंचास । करु चाव दिसि सज्जे ॥ कुही बाज उत्तंग । पंष आघात सुबज्जे ॥ १० पाठान्तर-चाहुआन । जमवांन । सुकतैं । नह । लष । लेषीयै । एक लेषियै । जांनि । चिंत्यौ । इच्छैं । बिद्दानं । ततार । निसुरत । पुच्छि । पुरसांन । कों ॥ ११ पाठान्तर-पुरसांन । सुरतांन । यांन । चहुवांन । संबंध । सबंध । मिबंधी । गबर । सुबिद्दानं । बिद्दानं । पषर । पांन । प्रांन । पुरसांन । बंधीये । अर । संधीये ॥ १२ पाठान्तर-राजांन । लर । बरीय । निर्मल ॥
दसवां समय ५ ] पृथ्वीराजरासो । ४२६ परगोस् सिंह पंजर गुहा । धनुष धनंजय शंर घन ॥ पृथिराज राज मंडै रवनि । आखेटक पहू सु वन ॥ छं० ॥ १३ ॥ रु० ॥ १३ ॥ आठ हजार सेना और सरदारों के साथ शहाबुद्दीन का पहूबन में छिपकर पहुंचना ॥ कवित्त ॥ पां ततार पुरसांन । पांन हाजी पां गाजी ॥ गप्पर पप्पर साह । मीर महमद पां घाजी ॥ अष्ट सहस असवार । तुंग तिय अग्ग बनाइय ॥ पेसकासी पतिसाह । कूर पर पंचन आइय ॥ सेनाह सज्जि अंदर सिखह । नह पिछै जाझें रँचह ॥ करि चूक आइ पहू वनह । प्रथीराज चहुआन जहँ ॥ छं० ॥ १४ ॥ रु० ॥ १४ ॥ सबेरे के समय चढ़ाई करने का विचार करना ॥ कवित्त ॥ दस अराक ताजीय । पंच पुरसान कमानं ॥ तक्कौ साचि गज्जनै । चिंति पहू चहुवानं ॥ छल सज्जौ बल धारि । घात नर घात निधानं ॥ लग्ग्यौ चंपि सुरतान । वैर हुस्सेनह पानं ॥ सुविद्दान आन चहुआन सौं । लै फुरमान समान धरि ॥ सुविद्वांन हिंदु पुज्जै नहीं । जमन जोर बल बहुत करि ॥ छं० ॥ १५ ॥ रु० ॥ १५ ॥ १३ पाठान्तर-तहांस । रण । एन । श्रंच । कह । धावदिसि । सजे । उत्तंग । वने । सीह । प्रथीराज । मंडे । वरन । पहू । स ॥ १४ पाठान्तर-पुरसांन । पांन । गयर । पपर । गाजी । सन्यह । सजि । नहिं । पिछै । रचह । चहुन्र्आन । जह ॥ १५ पाठान्तर-अैराक । पुरसांन । कमांनं । पहू । चहुआनं । निन्नानं । सुरतांन । हुसेन सु पांनं । विहांन । आंन । चंडुवांन । सों । फुरमांन । विहांन । पुज्जे । नही । जवन । जोर ॥
४३० पृथ्वीराजरासो । [ दसवां समय ६ पांच सरदारों को साथ लेकर आखेट को पृथ्वीराज का निकलना ॥ कवित्त ॥ आखेटक संभरिय । राज मेलान न आइय ॥ हस्सम हय गय मुक्कि । तक्कि षटू बन धाइय ॥ के हंका के छक्कि । तथ्थ पछिवानह लग्गा ॥ सथ्थ पंच सामंत । जूझ चहुआन विलग्गा ॥ पंमार सलष अलषह बलिय । चाहुआन रघुवंस हिम ॥ रुंध्यौ नरिंद चालुक्क सम । सिंघ विंटि वागह जिम ॥ छं० ॥ १६ ॥ रू० ॥ १६ ॥ कवि चन्द का कहना कि हमें शहाबुद्दीन के आने का सन्देह है और खोज करने पर चारों ओर यवनों को पाना ॥ कवित्त ॥ करि बिंटिय चहुआन । बिप्र सब सस्त्र समाधिय ॥ सुब्बिचान फुरमान । बंचि कविचंद सुनाइय ॥ सुबर जोर साहाब । साह से देस सुरंगा ॥ तोन कमान प्रमान । दए दस हत्थ तुरंगा ॥ किन एक खिमा किम रषकैं । चावद्दिसि नृप विंटयौ ॥ तन तोन झारि संमुह भए । राज अदब्ब सुमिरियौ ॥ छं० ॥ १७ ॥ रू० ॥ १७ ॥ शाह की ओर से आक्रमण आरम्भ होना ॥ कवित्त ॥ चंपि लहहिय हत्थ । जमन ठट्ठे चउद्दिसि ॥ चूक चिंत चहुवान । कन्द कड्डी सु बंक असि ॥ हाजी षान गष्षर नरिंद * । षंति षग षाजि विदत्थं ॥ तेग झार विम्भार । सलष घल्ली गज्ज बत्थं ॥ १६ पाठान्तर—आईय । हसम । तकि । षटू । धाईय । तथ । पछिवानह । लगा । सथ । चहुवांन । बिलगा । चाहुवांन । चाहुअनि । रुध्यौ । चालुक । वाँटि ॥ १७ पाठान्तर—वंटिय । चहुआंन । सु विहांन । फुरमांन । बिंचि । साह संदेस सुरंगा । तोन । कमांन । प्रमान । हथ । छिमाक्किम पकरिकें । चाषदिसि । वीटयौ । अदब । मिटयौ ॥
दमवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो । ४३१ धरि अह अह बीसच्छ भय । जरिंग भयानक वीर सम ॥ दुहुकोह कट्ठि परि यार तें । खुद चिंति कुक्कौ विभम ॥ छं० ॥ १८ ॥ रु० ॥ १८ ॥ युद्धारस युद्ध वर्णन ॥ छंद विराज ॥ धरं धार कट्टी । घनं बीज वट्ठी ॥ रसं रोस थट्टी । सुषं मुंक भ्रट्ठी ॥ छं०॥१८॥ परै चह पही । मनौ मद जहीं ॥ उनं तेग कट्टी । जनैं वज्र टट्टी ॥ छं० ॥ २०॥ जसं दढ्ढ दही । मनौ नैन भ्रष्टी ॥ उछहे ऊछट्टी । घनं घट घट्टी ॥ छं०॥ २१ ॥ कुनालं उलट्टी । उतारंत मट्टी ॥ रटें मार मारं । सुरं आसुरारं ॥ छं० ॥ २२ ॥ परं ते पधारं । कुठारं करारं ॥ वले घाव तारं । किनारं उघारं ॥ छं० ॥ २३ ॥ इसी जुद्ध भारं । मची कूह कारं ॥ पर्यो पंच भारं । ....................... छं० ॥ २४ ॥ रु० ॥ १८ ॥ पांच सरदारों का पृथ्वीराज की रक्षा में चारों ओर हो जाना और इन सभों का यवनों के बीच में घिर कर युद्ध करना ॥ कवित्त ॥ पंचानन भँपंच । स्वामि ओडन थट्ट रप्पे ॥ इक्क स्वामि रन अग्ग । इक्क उभ्भे दस पिप्पे ॥ सार धार प्राछार । बीय शिय उप्पर बाहै ॥ मनौ तत्त घरियार । मेघ जल वुट्ठ प्रबाहै ॥ दनु देन जप्य गंधव्व जय । गन घथ गय उच्चार धुअ ॥ सुरतान सेन झुकि मांचि परि । धनि नरिंदं सोमेस सुअ ॥ छं० ॥ २५ ॥ रु० ॥ २० ॥ १८ पाठान्तर-हथ । यवन । ठठे । चारुदिसि । चिति चहुवांन । यां । गपर । * अधिक पाठ है ॥ विहयं । विभ्रार । घटा । बघं । वीभक्त । भयानक । दुहुल्लाह । कठि । ते ॥ १६ पाठान्तर-छंद रसावला । घर धारं कटी । बटी । घटी । मुक्क । भ्रटी ॥ १८ ॥ परें चटपटी । मद जटी । कली । तटीं ॥ २० ॥ दढ दढी । लैन भ्रटी । उछटी । घट घटी ॥ २१ ॥ ऊतालं । उलटी । मटी । आतुरारं ॥ २२ ॥ धाव ॥ २३ ॥ पर्यो । युद्ध ॥ २४ ॥ २० पाठान्तर- भौं । उंडन । रपं । एक । रिन । एक उभे । पपं । तीय । उपर । तत । बुद्धि । जरक । गंध्रव । गांन । उच्चार । सुरतांन ॥
४३२ पृथ्वीराजरासो । [ दसवां समय ८ पृथ्वीराज का कमान सँभाल कर यवन सरदारों को गिराना ॥ कवित्त ॥ चहुआन कमान । पंच लीने सुपंच सर ॥ बष्पर पष्पर सै पन्नान । असु ढयौ मीर धर ॥ दूजै बान तकंत । तक्कि भंज्यौ षां गोरी ॥ तीजै बान तकंत । साधि भंजी विय जोरी ॥ कंमान बान चवछय्य भिरि । षिजि किरवान विरान कढि ॥ कटि बीर अंग फरकं पष्हर । रह्यौ नट्ट कुट वसं चढि ॥ छं० ॥ २६ ॥ रू० ॥ २१ ॥ पृथ्वीराज का तलवार लेकर यवनों का विनाश करना ॥ कवित्त ॥ षां गाजी चहुआन । दिष्ट मरदां दो उट्ठी ॥ दंग लग्गि जनु अग्ग । घृत्त घाग घर बुट्ठी ॥ दूनों छय्य उतंग । तेग कढी दुहु बंकी ॥ मनु घन घटा मकार । बीज कुंडली झलंकी ॥ चहुआन तुच्छ ढवुर बधिय । दुरिग मीर विय सिरढल्यौ ॥ जानेकि वज्र वञ्जी सुपति । गिरनि छेद छय्यह धय्यो ॥ छं० ॥ २७ ॥ रू० ॥ २२ ॥ सुलतानी की १५५ सेना का कट कर आगे गिरना ॥ अरिल्ल ॥ सुबर स्खेन संमुख सुरतानं । धेन वच्छ परि जनु करि जानं ॥ सत्त पंच परि उप्पर पंचं । तुम्यौ सार धार करि रंचं ॥ छं० ॥ २८ ॥ रू० २३ ॥ चालुका का घोर युद्ध करके वीरता के साथ मारा जाना ॥ कवित्त ॥ जूझ मंत संभ्रूच । कूच आखेटक बज्जिय ॥ बर चालुक्क नरिंगे । चंपि चवद्दिस गज्जिय ॥ २१ पाठान्तर कमान । पंचि । सपंच । बषर पषर । पलंान । धयौ । बांन । तकि । बांन । कंमांन । बांन । हथ । किरवांन । विरांन । झुटि । फरकुप्प रह । नट ॥ २२ पाठान्तर-चहुआन । दिष्टि । दां । उठिय । अगि । घृत । बुठिय । हथ । दुहुं बंकिय । मनां । झलकिय । चहुआन । तुझ । ढठ । ढरिग । गमीर बीय शिर । सिरट्ठु । ढल्यौ जाने । हथह ॥ २३ पाठान्तर-बच्छ । ज्यनं । सत । उपर । फारि ॥
दसवां समय ६] पृथ्वीराजरासो । ४३३ 'छंडि थान पच्छिवान । हंकि सैंधव झुकि घाय्य ॥ रह्यो सेन सुरतान । नेज बाजी जस धाय्य ॥ विस्साय धाय तन झंफरिय । त्रुटि पंजर वर धुक्किधर ॥ कटि घाइ ल्षप पंथा प्रगट । उड़ि हंसव संमान सर ॥ छंदं ॥ २८ ॥ रू० ॥ २४ ॥ कवित्त ॥ सोलंकी सिर मौर । रेह अनछत्त पुर रष्या ॥ दोऊ दीन पष्पर प्रमान * । कित्ति दुग्ग पप्पच भंपी ॥ धूप दीप माषा * सुगंध । रंभ रानी मिलि गावै ॥ नाग पत्नी सुर वधू । केलि करि कनस वंदावै ॥ लग्यौ भरम द्रिगपाल धर । जम भरम जग्गे सुभर ॥ कविचंद मरन चालुक कै । मच्यौ न को रषि चक्रतर ॥ छंदं ॥ ३० ॥ रू० ॥ २५ ॥ क्रोध करके पृथ्वीराज का तलवार से युद्ध करना, पृथ्वीराज की सब सेना का इकट्ठा हो जाना ॥ कवित्त ॥ सुधर जुद्ध अवसह । जुद्ध कटि सिद्ध समानं ॥ मार मार उच्चार । तेग कट्टी चहुआनं ॥ त्रुटि सिषर उर फुट्टि । वीर अद्धो अध झुल्लै ॥ मानुं तुल्ला की डंडि । वीर बानावली तुल्लै ॥ आखेट भग्गि एकट्ठ हुश्र । सवै सेन प्रथिराज जुरि ॥ बाजिद पान गब्बर गद्दर । वांम कोह उम्भै उसरि ॥ छंदं ॥ ३१ ॥ रू० ॥ २६ ॥ २४ पाठान्तर-जूहं मत । चालुक । दिसि । यांन । पच्छित्रांन । सैंधव । धाईय । सुरतांन । धाईय । घाइ । झंभरिय । लप । उड़ि । समानं ॥ २५ पाठान्तर-रख्यिय । दोंउ । पषर । * अधिक पाठ है ॥ किर्ति दुग्ग दीनह भपिय ।
- अधिक पाठ है ॥ बंदावै । भरंम । दिगपाल । चालुक । रथतर ॥ २६ पाठान्तर-युद्ध । युध । उच्चार । चहुवांनं । त्रुटि । सिप्पर । धर झुलै । मनौं । दंड । बांमावली । तुलै । एकत्र । प्रथीयराजं । बाजिद यांन गपर । बांम । उभै । उचरि ॥ ६
४३४ पृथ्वीराजरासो । [ दसवां समय १० सुलतान का बढ़कर लड़ना, दो घड़ी घोर युद्ध होना ॥ कवित्त ॥ रूप्यौ सेन सुरतान । राज चढि नंषि सुरगं ॥ कै तिमर अग्ग तपभांन । सिंघ चकौ कि कुरंगं ॥ तब * रुप्यौ राव सिंघारय । लाज सुविधान घटकिय ॥ सस्त्र तेज बल बंधि । सेन चहुआन छटकिय ॥ दै घरिय टोप उप्पर बह्यो । सार तिनंगा तारयौ ॥ जानें कि तिंदु दारुन जरै । जैत षंभ पर झारयो ॥ छं० ॥ ३२ ॥ रू० ॥ २७ ॥ दूहा ॥ अथ मुक्कौ सिरदार दुहु । देखि भयौ नृप चूक्क ॥ घरी एक झरि सार बहु । ज्यौं अगि संजुत्ता जक्क ॥ छं० ॥ ३३ ॥ रू० ॥ २८ ॥ यवन सरदारों का माराजाना, पृथ्वीराज की विजय ॥ कवित्त ॥ जुद्ध जुरे सिरदार । राव रंगच बाजी दह ॥ घालि बध्य गज हत्थ । हड्ड संजिय रग गूद्द ॥ ज्यौ मुष्टिक चानूर । कन्ह भंजिय अब्भारह ॥ उत्तभंग लै हूर । सूर अपछर उप्पारह ॥ वाजीद षान ओरी धरिय । धाड पंच रंगर नृपति ॥ रष्यै जु खाँडू मिट्टै कवन । निमष मांहि उतपति षपति ॥ छं० ॥ ३४ ॥ रू० ॥ २९ ॥ हारकर शहाबुद्दीन का ग़ज़नी की ओर लौट जाना ॥ दूहा ॥ चूक चूक भय असुर सुर । फिरि गज्जन दिसि धांन ॥ हारि जुआरी ज्यौं चलै । कर घटै कर जान ॥ छं० ॥ ३५ ॥ रू० ॥ ३० ॥ २७ पाठान्तर-सुरतांन । बाजि चढि । भांन । हक्कै । * अधिक पाठ है। रिधिरिय। विहांन । चहुआनं । हटकिय । घरीय । जानें ॥ २८ पाठान्तर-दुहुं । अगनि । उक्क ॥ २९ पाठान्तर-युद्ध । झुरै । सिरहार । रांव । बाजीदह । बध । गर । हथ । रंग । अपारह । उपारह । वर्जीद । घांड । घाव । यु । सांरं ॥ ३० पाठान्तर-गजन । धांन । युवारी । चले । घठे । जांन ॥
दसवां समय ११ ] पृथ्वीराजरासो । ४३५ चौह्मान की विजय पर चन्द कवि का जै जै कार करना ॥ दूहा ॥ जीति राज चहुवांन बन । आपेटक असुरान ॥ जै जै जै कविचंद कहि । चंद सूर वप्पान ॥ छं० ॥ ३६ ॥ रु० ॥ ३१ ॥ इति श्री कविचंद विरचिते प्रथिराजरासके राजा चहूवन आपेटक रन सुरतांन चूक करनं नाम दसम प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ १० ॥ ३१ पाठान्तर-चहुवांन । असुरांन । घपांन ॥
उपसंहारकी टिप्पणी । ————— यह समय भी हमारे स्वदेशी इतिहास के लिये बहुत उपयोगी है। क्योंकि एक लड़ाई तो “हुसैन कथा” नामक समय में रासो के अनन्द संवत् अर्थात्, पृथ्वीराज के तृतीय साक ११३५ माघ शुक्ला १३=११३५+९० । ९१=१२२५ । २६ वर्त्तमान विक्रमी में आगे हो चुकी थी और दूसरी उसके एक बरस पीछे यह “आखेड़क चूक” नामक हुई है। इस लड़ाई के होने का समय कवि ने स्पष्ट न बताकर प्रथम रूपक में—बरष एक बीते कलह—से पहिली के एक वर्ष पीछे इसका होना वर्णन किया है अर्थात् पहिली के सं० ११३५+९०।९१=१२२५।२६ में एक जोड़ने से ११३५+१=११३६+९० । ९१= १२२६ । २७ वर्त्तमान विक्रमी होता है। वैसे ही “आखेड़क” शब्द के नियत समय के अर्थ से “फाल्गुण” मास का होना भी प्रकाश किया है। प्राचीन समय में हमारे देशी राज्यों में वर्ष भर के अनेक त्यौहारों में फाल्गुण मास में जिस दिन ज्योतिषी आखेट का महूर्त्त देते थे उस दिन एक बड़ा त्यौहार मनाया जाता था। इसीसे यहां कवि ने “आखेड़क” शब्द से फाल्गुन का संकेत अर्थ में माना है। अब यह त्यौहार लुप्त सा होता चला जाता है, तथापि वह प्राचीन राज्य उदयपुर में इस समय तक भी माना जाता है और उसको वहां “अहेरिया” वा “महूरत का शिकार” करके कहते हैं। और उसका सविस्तर वृत्तान्त कर्नल टॉड साहब ने अपने परम प्रसिद्ध ग्रंथ “राज स्थान” में यह लिखा है ॥ “The merry month of Phalgun is ushered in with the Ahaireä, or spring-hunt. The preceeding day the Rana distributes to all his chiefs and servants either a dress of green, or some portion thereof, in which all appear habited on the morrow, whenever the astrologer has fixed the hour for sallying forth to slay the boar to Gouri, the Ceres of the Rajpoots: the Ahairea is therefore called the Máhoorut ca sikar or the chase fixed astrolo- gically. As their success on this occasion is ominous of future good, no means are neglected to secure it, either by scouts previously discovering the lair, or the desperate efforts of the hunters to slay the boar when roused. With the sovereign and his sons all the chiefs sally forth, each on his best steed, and all animated by the desire to surpass each other in acts of prowess and dexterity. It is very rare that in some one of the passes or recesses of the valley the hog is not found; the spot is then surrounded by the hunters, whose vociferations soon start the dhokra and frequently a drove of hogs. Then each cavalier impels his steed, and with lance or sword, regardless of rock, ravine, or tree, presses on the bristly foe, whose knowledge of the country is of no avail when thus circumvented, and the ground soon reeks with gore, in which not unfrequently is mixed that of horse or rider. On the past occasion, there occurred fewer casualties than usual, though the Chandawut Ham ira, whom we nicknamed the “Red Riever,” had his leg broken, and the second son of Sheodan Singh, a near relation of the Rana, had his neighbour’s lance driven through his arm. The young chief of Saloombara was amongst the distinguished of this day’s sport. It would appal even an English fox-hunter to see the Rajpoots driving their steeds at full speed, bounding like the antelope over every barrier, the thick jungle covert, or rocky steep bare of soil or vegetation.” with their lances balanced in the air, or leaning on the saddle bow slashing at the boar”. TOD’S RAJASTHAN, VOL. I, PAGE 435.
दसवां समय १३ ] पृथ्थीराजरासो । ४३० और उन्होंने इस वृत्तान्त में के "अहेरिया" शब्द पर जो टिप्पण दी है उसमें पृथ्वीराज जी के इस आखेटक के विषय में यह कहा है- "In his delight for this diversion, the Rajpoot evinces his Scythic propensity: The grand hunts of the last Chohan emperor often led him into warfare, for Prithiraj was a poacher of the first magnitude, and one of his battles with the Tartars was while engaged in field sports on the Ravi." TOD'S RAJASTHAN, VOL. I, PAGE 485. यद्यपि रूपक ४ के वाक्य-बरष रभै षटमास-का अर्थ दो वर्ष और छ महीनों का भी हो सकता है, परन्तु प्रथम रूपक के वाक्य-वरप एक बीते कलह-की उस के साथ संगति मिलाने से उस का अर्थ एक वर्ष का ही होता है अर्थात्, वर्ष अर्थात् दो छमाही। सो पाठक विचार देखें ॥ जैसे "हुसैन कथा" वाली रासो की संवत् ११३५ की लड़ाई का कारण हुसैन और चित्ररेखा का पृथ्वीराज के शरण आना था; वैसेही इस आखेटक चूक की लड़ाई का कारण उनके बेटे ग़ाज़ी हुसैन का रूपक २ के अनुसार एक महिने और पांच दिन पीछे फिर पृथ्वीराज जी के पास चला आना है ॥ तथा रूपक ४ एक अपूर्व वृत्त प्रकाशित करता है कि हमारे एक हिन्दू-निसिराव पत्रीय- दिल्ली में बिराजे हुए हिन्दुओं की बादशाहत नाश करवाने को पृथ्वीराज जी के यहां की मुख़बरी शहाबुद्दीन को लिखा पढ़ा करते थे । ऐसे जीव भी धन्य हैं !!!
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अथ चित्ररेषा समयौ लिख्यते ॥ —❁— ( ग्यारहवां समय । ) चित्ररेखा की उत्पत्ति पूछना ॥ दूहा ॥ पुच्छि चंद वरदाइ नैं । चित्ररेष उतपत्ति ॥ षां हुसेन पावास कचि । जिम लीनी असपति ॥ कूं० ॥ १ ॥ छ० ॥ १ ॥ * शहाबुद्दीन के विक्रम का वर्णन ॥ कवित्त ॥ गज्जनेस अवदेस । साचि पल्हांन कुसावं ॥ बदक खामि मेछरां । कुंडि गष्पर क्षिति आवं ॥ जल जोवन साचाव । दीन दुरँगे करि गिन्निय ॥ हिंदवान मेक्कान । थान थानह करि लिन्निय बजि विषम बाइ सुरतान प्पन । साचि बदौं सब दीन पति ॥ अनसंक कंक मनु लंकपति । जनु जोवन तन रवित पति ॥ छं० ॥ २ ॥ छ० ॥ २ ॥ शहाबुद्दीन का अरब ख़ां पर चढ़ाई करने की इच्छा कर सरदारों से पूछना ॥ कवित्त ॥ दिसि अरब सुरतांन । दिष्टि आलोकि वंक सुश्र ॥ आकंपै दिसि डुक्खि । ऊचल चालंत चित्त दुश्र ॥ सज्जि सेन चतुरंग । जंग अनभंग विचारिय ॥ बोलि षान घुरसान । पान जित्ते अधिकारिय ॥
१ पाठान्तर—पुछि । बरदाईनैं । उतपति । लीनिय । अमपति ॥ * इस समय में कवि ने हुसेन षां के कहे अनुसार जैसे शहाबुद्दीन ने चित्ररेखा को प्राप्त किया था सो वर्णन किया है ॥ २ पाठान्तर—पल्लांणि । पलांन । कसंवि । बदकर । सांमि । दुरंगे । गिनीय । गिनिय । हिंदवांन । मेक्षांन । यांन । लिंनीय । सुरतांन । सहाबदी । मनौ । जुन । जर ॥