पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदसवां समय ३ ] पृथ्वीराजरासो । ४२० हाजी खां आदि का तयारी करना ॥ चौपाई ॥ काषेटक बहू चहुवानं । कहैं पूत से मुप सुविधानं ॥ हाज़ी षां गप्पर सुकनाजी । मंझौ चूक महमद गाजी ॥ छं० ॥ ७ ॥ रु० ॥ ७ ॥ शहाबुद्दीन का आज्ञा देना कि इस बात का भेद लो कि कितनी सेना चौहान के साथ है क्योंकि बिना भेद कुछ काम नहीं बनता ॥ कवित्त ॥ सें बुझै सुरत्तान । दूत पच्छिम सुविधानं ॥ काषेटक प्रथिराज । सथ कित्तक चहुआनं ॥ तुम राजन निमांन । राज विवेक परषौ ॥ तुम * स्वामी भ्रम दृग स्वामि । स्वामि द्रोही तन जष्यौ ॥ जंगली नृपत्ति जंपहु चरित । छल बल मंत सु किज्जियै ॥ ततार षांन षुरसान षां ॥ हिंदू भेद सुविज्जियै ॥ छं० ॥ ८ ॥ रु० ॥ ८ ॥ कवित्त ॥ भेदं दुग्ग भंजियै । भेद दुज्जन दल भंजै ॥ राजभेद बंधियै । भेद देवन ग्रह रंजे ॥ मंच सोइ जिन भेद । भेद बिन मतौ न होई ॥ भेद बंध वन सोइ । सेद देषै सब कोई ॥ संग्रहौ भेद चहुआन कौ । मुष उच्चार जो जंपियै ॥ तत्तारषांन षुरसान षां । बज्चन दुज्जन चंपियै ॥ छं०॥ ९ ॥ रु०॥ ९ ॥ सब सरदारों का मत होना कि बिना धोखा दिए चौहानों को जीतना कठिन हैं ॥ कवित्त ॥ चहुआन जम वान । गेनं सुक्कंतें सुकुहै ॥ कुटिल दिष्ट जिहिं फिरै । तेज अरियन दल षुहै ॥ ८ पाठान्तर-बुझैं । सुरतांन । सें बुझै साहाब । साह पच्छिम सुरतांनं ॥ प्रथौराज । सथ क्रितक । केतक । चहुवांनं । विवेक । परखौ । * अधिक पाठ है ॥ स्वामि । द्रूग । स्वामि । सामि । जह । लषौ । ततार । षुरसांन ॥ ९ पाठान्तर-दुगं । भांजीयै । दुजन । बंधीयै । गृह । सोई । सोय । देखे । चहुवांन । जंपीयै । ततार । पुरसांन । दुजन । चंपीयै ।