पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२८ पृथ्वीराजरासो । [ दसवां समय ४ प्रबल तेज अस तेज । जुद्ध दैवान देव गति ॥ एक लष लेषिये । एक लषिये लषन भति इच जानि चूक चिंत्यौ नृपति । इच्छे बत्त सुविद्दान कौं ॥ तत्तार पांन निसुरत्त षां । पूकि पांन षुरसान कौं ॥ छं० ॥ १० ॥ रू० ॥ १० ॥ कवित्त ॥ षां षुरसान ततार । षान अरदास समर्पिय ॥ चूक मंडि सुरतान । थान चहुआन सुथप्पिय ॥ हाजी षां गाजी सु । बंध निज बंधी गब्भर ॥ सुब्बिद्दान साहाब । साचि स्वारं दल पष्षर ॥ निज पान षान षुरसान पति । इष्ध साचि बत्त बधियै ॥ मिलि मीर मसूरति ततं किय । चूक साचि अरि संधियै ॥ छं० ॥ ११ ॥ रू० ॥ ११ ॥ पृथ्वीराज का बेखटके आनन्द से आखेट खेलना ॥ दूह ॥ रंग रमै रजान बन । नहीं संक मन मांहि ॥ तरु बेली घन गच बरिय । सुभि जल निरमल छांह ॥ छं० ॥ १२ ॥ रू० ॥ १२ ॥ पृथ्वीराज के आखेट का वर्णन ॥ कवित्त ॥ सतह पंच दीपीय । एण फंदैत पंच सौ ॥ सहस स्वान दस डोरि । ग्रहै पंचान पंच सौ ॥ पंच अग्ग पंचास । करु चाव दिसि सज्जे ॥ कुही बाज उत्तंग । पंष आघात सुबज्जे ॥ १० पाठान्तर-चाहुआन । जमवांन । सुकतैं । नह । लष । लेषीयै । एक लेषियै । जांनि । चिंत्यौ । इच्छैं । बिद्दानं । ततार । निसुरत । पुच्छि । पुरसांन । कों ॥ ११ पाठान्तर-पुरसांन । सुरतांन । यांन । चहुवांन । संबंध । सबंध । मिबंधी । गबर । सुबिद्दानं । बिद्दानं । पषर । पांन । प्रांन । पुरसांन । बंधीये । अर । संधीये ॥ १२ पाठान्तर-राजांन । लर । बरीय । निर्मल ॥