पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३४ पृथ्वीराजरासो । [ दसवां समय १० सुलतान का बढ़कर लड़ना, दो घड़ी घोर युद्ध होना ॥ कवित्त ॥ रूप्यौ सेन सुरतान । राज चढि नंषि सुरगं ॥ कै तिमर अग्ग तपभांन । सिंघ चकौ कि कुरंगं ॥ तब * रुप्यौ राव सिंघारय । लाज सुविधान घटकिय ॥ सस्त्र तेज बल बंधि । सेन चहुआन छटकिय ॥ दै घरिय टोप उप्पर बह्यो । सार तिनंगा तारयौ ॥ जानें कि तिंदु दारुन जरै । जैत षंभ पर झारयो ॥ छं० ॥ ३२ ॥ रू० ॥ २७ ॥ दूहा ॥ अथ मुक्कौ सिरदार दुहु । देखि भयौ नृप चूक्क ॥ घरी एक झरि सार बहु । ज्यौं अगि संजुत्ता जक्क ॥ छं० ॥ ३३ ॥ रू० ॥ २८ ॥ यवन सरदारों का माराजाना, पृथ्वीराज की विजय ॥ कवित्त ॥ जुद्ध जुरे सिरदार । राव रंगच बाजी दह ॥ घालि बध्य गज हत्थ । हड्ड संजिय रग गूद्द ॥ ज्यौ मुष्टिक चानूर । कन्ह भंजिय अब्भारह ॥ उत्तभंग लै हूर । सूर अपछर उप्पारह ॥ वाजीद षान ओरी धरिय । धाड पंच रंगर नृपति ॥ रष्यै जु खाँडू मिट्टै कवन । निमष मांहि उतपति षपति ॥ छं० ॥ ३४ ॥ रू० ॥ २९ ॥ हारकर शहाबुद्दीन का ग़ज़नी की ओर लौट जाना ॥ दूहा ॥ चूक चूक भय असुर सुर । फिरि गज्जन दिसि धांन ॥ हारि जुआरी ज्यौं चलै । कर घटै कर जान ॥ छं० ॥ ३५ ॥ रू० ॥ ३० ॥ २७ पाठान्तर-सुरतांन । बाजि चढि । भांन । हक्कै । * अधिक पाठ है। रिधिरिय। विहांन । चहुआनं । हटकिय । घरीय । जानें ॥ २८ पाठान्तर-दुहुं । अगनि । उक्क ॥ २९ पाठान्तर-युद्ध । झुरै । सिरहार । रांव । बाजीदह । बध । गर । हथ । रंग । अपारह । उपारह । वर्जीद । घांड । घाव । यु । सांरं ॥ ३० पाठान्तर-गजन । धांन । युवारी । चले । घठे । जांन ॥