पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 443, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसवां समय ६] पृथ्वीराजरासो । ४३३ 'छंडि थान पच्छिवान । हंकि सैंधव झुकि घाय्य ॥ रह्यो सेन सुरतान । नेज बाजी जस धाय्य ॥ विस्साय धाय तन झंफरिय । त्रुटि पंजर वर धुक्किधर ॥ कटि घाइ ल्षप पंथा प्रगट । उड़ि हंसव संमान सर ॥ छंदं ॥ २८ ॥ रू० ॥ २४ ॥ कवित्त ॥ सोलंकी सिर मौर । रेह अनछत्त पुर रष्या ॥ दोऊ दीन पष्पर प्रमान * । कित्ति दुग्ग पप्पच भंपी ॥ धूप दीप माषा * सुगंध । रंभ रानी मिलि गावै ॥ नाग पत्नी सुर वधू । केलि करि कनस वंदावै ॥ लग्यौ भरम द्रिगपाल धर । जम भरम जग्गे सुभर ॥ कविचंद मरन चालुक कै । मच्यौ न को रषि चक्रतर ॥ छंदं ॥ ३० ॥ रू० ॥ २५ ॥ क्रोध करके पृथ्वीराज का तलवार से युद्ध करना, पृथ्वीराज की सब सेना का इकट्ठा हो जाना ॥ कवित्त ॥ सुधर जुद्ध अवसह । जुद्ध कटि सिद्ध समानं ॥ मार मार उच्चार । तेग कट्टी चहुआनं ॥ त्रुटि सिषर उर फुट्टि । वीर अद्धो अध झुल्लै ॥ मानुं तुल्ला की डंडि । वीर बानावली तुल्लै ॥ आखेट भग्गि एकट्ठ हुश्र । सवै सेन प्रथिराज जुरि ॥ बाजिद पान गब्बर गद्दर । वांम कोह उम्भै उसरि ॥ छंदं ॥ ३१ ॥ रू० ॥ २६ ॥ २४ पाठान्तर-जूहं मत । चालुक । दिसि । यांन । पच्छित्रांन । सैंधव । धाईय । सुरतांन । धाईय । घाइ । झंभरिय । लप । उड़ि । समानं ॥ २५ पाठान्तर-रख्यिय । दोंउ । पषर । * अधिक पाठ है ॥ किर्ति दुग्ग दीनह भपिय ।
- अधिक पाठ है ॥ बंदावै । भरंम । दिगपाल । चालुक । रथतर ॥ २६ पाठान्तर-युद्ध । युध । उच्चार । चहुवांनं । त्रुटि । सिप्पर । धर झुलै । मनौं । दंड । बांमावली । तुलै । एकत्र । प्रथीयराजं । बाजिद यांन गपर । बांम । उभै । उचरि ॥ ६