पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 95, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व दूहा ॥ पहन धनकनि हेच दुष । ग्रेच कटन गृह हथ्थ ॥ धरै धन्न निज कोस मधि । इहै वानि समरथ्थ ॥ छं० ॥ ४१२ ॥ रू० ॥ २०३ ॥ कवित्त ॥ जिते जाइ इह मान । काम कामना सु वद्धिय ॥ अदर ताहि उप्परह । बयन न्नरष पर चद्धिय ॥ तिन दिषत बर बरूत्त । मंगि अप्पन मुष अष्पहि ॥ अवळा सँग उल्हास । काहु की कानि न रष्पहि ॥ दुज षंचि बैस सूद्रह बरन । तजै न किह तक्कंत नयन ॥ बीसल नरिंद इह भय अकलि । लहै न कहुँ निस दिन चयन ॥ छं० ॥ ४१३ ॥ रू० ॥ २०४ ॥ ॥ बीसलदेवजी के दुराचरणों से दुःखी होकर नगर के लोगों का प्रधान के पास पुकारने जाना ॥ दूहा ॥ दीरघ जन मिल नयर के । गए द्वार परधान ॥ बढ़ि अचैन नर नारि सब । नहीं रहै रजधान ॥ छं० ॥ ४१४ ॥ रू० ॥ २०५ ॥
२०३ पाठान्तर :-धनकन । मुष । यिह । कट्टन । हथ । निसि । वांनि । समरथ । २०४ पाठान्तर :-मांन । कांम । कांमनां । बढ़य । उपहर । चढिय । दिषत । मुप्प । संग । काऊ कांणि । रपहि । औय । वईस । किहि । इहै । लहैं । निसि ॥ हमारे पाठकों में से जो ऐसे हैं कि वे Political officers रहे हैं अथवा जिनों ने बीसल- देवजी जैसी अनीतियों के वृत्त गोप्य Political Reports में पढ़े हैं अथवा जो Mysteries of the Native Courts के ज्ञाता हैं अथवा जिनों ने वाजिदअली शाह की सायबी का पूरा ज्ञान उपार्जन किया है; वह चन्द के लिखे बीसलदेवजी के वृत्तान्त पर अविश्वास नहीं करेंगे और न उसे अत्यन्ताभाव का समझेंगे किन्तु कवि के स्पष्ट-वक्तृत्व की प्रशंसा करेंगे। इतिहास लिखने वाले का यह मुख्य काम है कि वह चाल चलन, के विषय में स्पष्ट वृत्त लिखे कि जिस से उस के भावी संतान शिक्षा ग्रहण करें। हमारे इस देश में हम लोग इस बात को फांसी लगने जैसा अपराध समझते हैं और रात्रि दिन ऐसी ही अनीतियों में लगे रहते हैं अतएव पुरुषार्थ का बड़ा टोटा हमारे यहां आ गया है ! ! ! २०५ पाठान्तर :-मिलि । कै । परधांन । वठि । अचंन । नही । रहसि । रजधांन । दिसांन ॥