भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 96

आटि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ८५ ॥ सब का आपस में सलाह करके बीसलदेवजी को राजधर्म अरज करना ॥ कवित्त ॥ तिन मति तिहिं पुर होइ । लोइ मति समय समंडव ॥ बहुत भूमि भूमियां । चढवि तिन धर पुर पंडव ॥ इह सु भ्रम्स राजेन्द्र । दुष्ट कंटक सिर कहै ॥ अनड अनड संचरै । धरा रष्पन धर अहै ॥ इह करग्रौ संत तिन संचियन । अह सब सहर सु पंच जन ॥ इच्छकथिय वृत्त न्रिप सम तिनह । दवरि विखेपक भूमि यन ॥ छं० ॥ ४१५ ॥ रु० ॥ २०६ ॥ ॥ बीसलदेवजी ने उत्तर दे कहा कि यह सब मैं जानता हूं पर काम ज्वाला के बढ़ने से मैं लाचार हूं अब तुम जो कहोगे वह करूंगा ॥ कवित्त ॥ दुज्जर काय सु कहत । राज मन मांहि समझौँ ॥ काम ज्वाल मो बढिय । तुम छि निन कै दुप दख्खौँ ॥ छहूँ इह जानाँ सबै । पै मुचि मन वसि न होई ॥ सढ़ा पहर जिम छह । रहै कूंई की कूंई ॥ तुम कहौ सु हौं करि छौं अवसि । बोल्हि लेचि किरपाल हैं ॥ जहां जहां दिसा तुम संचरौ । तहँ तहँ आजं चढ़ि हैं ॥ छं० ॥ ४१६ ॥ रु० ॥ २०७ ॥ ॥ इस पर बीसलदेवजी का किरपाल को बुलाना और उस का आना ॥ दूहा ॥ दै फुरमान * प्रधान तब । बुल्लाये किरपाल ॥ २०६ पाठान्तरः- मत्तिह । समथ्य । संहव । भूमीयां । धुंम । कहे । आनड आनड । रप्पन । कहिय । तिनहि । विशेषक । भुंमियन ॥ २०७ पाठान्तरः- दुज्जर । केत । समझौ । काम । वढीय । कै । दम्भौ । हों । जांनों । सबैं । मैं । मोहि । छांह । हों । कू । तहां २ । चढ़ि । हूं ॥

  • यह हिन्दी शब्द संस्कृत स्फुर + मान से है जैसे कि स्फूर्तिमान्, स्फूर्त्तिमती और स्फूर्ति- मत इत्यादि । इस फुरमान अथवा फुरमाना आदि शब्दों का प्रचार राजस्थानों अथवा बड़े प्रति- ष्ठित लोगों की मंडली में आज भी बहुत है । वास्तविक यह उस कहने अथवा आज्ञा के अर्थ में