भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 97

८६ पृथ्वीराजरासौ। [आदि पर्व संभरि सौं आयौ सचर । लियै अनूप रसाल ॥ छं० ॥ ४१७ ॥ रु० ॥ २०८ ॥ ॥ बीसलदेवजी का किरपाल को कहना कि तरवारि की पृथ्वी है सो हम नव खंड की खड्ग खोसने को खड्ग बांधते हैं तुम खजाना संग ले बीसल सरवर पर डेरा करो ॥ कवित्त ॥ आय तबै किरपाल । पाइ राजन कै लग्गौ ॥ मुख अग्गें दुय्य खग्ग । धरै नग जरित उनग्गौ ॥ बंधिय तेग विचार । सु गुन राजन इह कत्थिय ॥ जिम जिम विद्या दान । तिमच्च तिम खगकी प्रथ्थिय ॥ इहै सगुन हम कौं भयौ । खग खोसैं नव खंड धर ॥ ब्रह्मांड मंड सब बसि करौं । मंडौं मेर सुमेर घर ॥ छं ॥ ४१८ ॥ रु० ॥ २०९ ॥ दूहा ॥ सुनि क्रिपाल मो मुख वचन । कढि खजीन * सँग लेहु ॥ बीसल सरवर ऊपरैं । ध्रुव दिसि डेरा देहु ॥ छं० ॥ ४१९ ॥ रु० ॥ २१० ॥ प्रयोग होता है कि जो किसी के द्वारा कहा जाय अथवा आज्ञा किया जाय । जैसे हमारे रज- वाड़ों में जहां अभी प्राचीन देशी रीति प्रचलित है वहां जिस से राजा स्वयम् नहीं बोलते । तब राजा जी तो किसी अन्य पुरुष को कहते जाते हैं और वह पुरुष उस इष्ट मनुष्य को कहता जाता है । तथा किसी अपने से छोटे अथवा आधीन को कागद पत्र के द्वारा कहा अथवा आज्ञा किया जाय उस को फुरमान वा फुरमाना कहते हैं ॥ २०८ पाठान्तरः- फुरमांन । प्रधानं । बिल्लाये । बुलाए । सौ । अनूप ॥ २०९ पाठान्तरः- पाय । आगे । दुय । धरे । उनगौ । सगुन । कथिय । दानं । तेम पग की इह पृथ्बीय । इह सगुन अच्छै हमकों भए । सो । ब्रह्म मंड मंड । ब्रह्म मंड मंड । कस्यो । दंडों ॥

  • हिन्दी में खजाना और उस से बने शब्द आते हैं उस का वाचक यह प्राचीन हिन्दी शब्द सब के ध्यान में रहने योग्य है । यह संस्कृत खर्जूर=रौप्ये silver का अपभ्रंश है । इन शब्दों को अरबी और फारसी के अपभ्रंश अनुमान करना व्यर्थ है । देखो, सं० खज शब्द भी युद्ध और स्वार्थ के अर्थों में प्रयोग होता है । और वह भी इतने प्राचीन समय से कि ऋग्वेद ८ । १ । ७ में "अतार्थे युध्म खजकृत पुरन्दर०" कहा है ॥ २१० पाठान्तरः- किपाल । संग । उपरें । ऊपरैं । दू । दिशि ॥