पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 98, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ८० ॥ बीसल सरवर पर बीसलदेवजी के आधीन तथा सहायक इष्ट मित्र राजाओं का उन के दिग्विजयर्थ अटन के लिये एकत्र होना और गुजरात के चालुक राजा का वहां न आना अतएव बीसलदेवजी का उस पर चढाई करना और वालुका राय का यह सुनकर सामना करने को आना ॥ धद्धरी ॥ अरि चन्दे सुतर * रथ ण्क गद्द । बीसन्न तडाग दिय वारि गाद्द ॥ फुरमान दृण लिपि दस दिसान । सव आय मिले अजमेर थान ॥ छं० ॥ ४२० ॥ परिहार सहणसी मिल्यौ आय । मंडोवर के नर लगे पाय ॥ गहिलोत मिले सब सभा मौर । पावासर तंवर राम गौर ॥ छं० ॥ ४२१ ॥ सेवत धनी आण सहेस । कोचिछ दुनांपुर दिए पेस ॥ वल्लोच मिले सब पाइ वंधि । बांमन्या नृपति तजि गए संधि ॥ छं० ॥ ४२२ ॥ भटनेर राय की आइ भेट । सुलतान नाख वँध थटा येट ॥ फुरमान गए जैसन्नलमेर । ओस्या सब भाटी भये जेर * ॥ छं० ॥ ४२३ ॥ जादौँ रु वघेल्ला सल्लहवास । मोरी वड गूजर आइ पास ॥ अंतरहवेध कूरंभ आइ । सब मेर जेर होय लगे पाइ ॥ छं० ॥ ४२४ ॥ आए सपाद् चढि जैतसीह । तच्छितपुर के नर संग खीह ॥ आये सु चढ़ि उदया पवार । निरवान डाड चढि चले खार ॥ छं० ॥ ४२५ ॥ चंदेल दाछिमा चरन लग्गि । वसि किये भूसिया धूनि पग्ग ॥ चालुक्क कोइ आयौ न पाइ । रहे मुकरि जोर * तरवार * साचि ॥ छं०॥ ४२६ ॥ सुनि बोल जैतसी गोलवाल । घर बार नगर को रष्षपाल ॥ सैं पौं सु तुमहि अजमेर थान । बालुक्क कितक्क पावै न जान ॥ छं० ॥ ४२७ ॥ दर * कूच कूच * चढि चल्यौ वीर । गिरि मग्ग छोड़ सर सुक्कि नीर ॥
- इस रूपक में के कई एक शब्द भाषा के शोधक विद्वानों के ध्यान में लेने योग्य हैं जैसे :- हि० सुतर ( SK. सु + तर or तरि or तरु ), जेर ( SK. जूर or जूरी to reduce, to injure, to hurt, to decay, to grow old, to wound or kill ) जोर ( SK. जुड़ to bind, to join, as in making or mend- ing, to direct, to grind or pound &c., or जुर् speed velocity, motion in general ). तरवार ( SK. तरवारि ) दर ( SK. दृ to divide, cut or break, to preserve, &c., and aff अप् ) कूँच or कूच ( SK. कुञ्च to go, to go to or towards. ) इस के अतिरिक्त यह भी पाठकों को ज्ञात हो कि इस प्रसंग में कहीं चालुक और कहीं बालुक पाठ है सो जहां जैसा पुस्तकों में मिला वैसा रक्खा गया है किन्तु जितनी पुस्तक जतियों