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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

८६ पृथ्वीराजरासौ। [आदि पर्व संभरि सौं आयौ सचर । लियै अनूप रसाल ॥ छं० ॥ ४१७ ॥ रु० ॥ २०८ ॥ ॥ बीसलदेवजी का किरपाल को कहना कि तरवारि की पृथ्वी है सो हम नव खंड की खड्ग खोसने को खड्ग बांधते हैं तुम खजाना संग ले बीसल सरवर पर डेरा करो ॥ कवित्त ॥ आय तबै किरपाल । पाइ राजन कै लग्गौ ॥ मुख अग्गें दुय्य खग्ग । धरै नग जरित उनग्गौ ॥ बंधिय तेग विचार । सु गुन राजन इह कत्थिय ॥ जिम जिम विद्या दान । तिमच्च तिम खगकी प्रथ्थिय ॥ इहै सगुन हम कौं भयौ । खग खोसैं नव खंड धर ॥ ब्रह्मांड मंड सब बसि करौं । मंडौं मेर सुमेर घर ॥ छं ॥ ४१८ ॥ रु० ॥ २०९ ॥ दूहा ॥ सुनि क्रिपाल मो मुख वचन । कढि खजीन * सँग लेहु ॥ बीसल सरवर ऊपरैं । ध्रुव दिसि डेरा देहु ॥ छं० ॥ ४१९ ॥ रु० ॥ २१० ॥ प्रयोग होता है कि जो किसी के द्वारा कहा जाय अथवा आज्ञा किया जाय । जैसे हमारे रज- वाड़ों में जहां अभी प्राचीन देशी रीति प्रचलित है वहां जिस से राजा स्वयम् नहीं बोलते । तब राजा जी तो किसी अन्य पुरुष को कहते जाते हैं और वह पुरुष उस इष्ट मनुष्य को कहता जाता है । तथा किसी अपने से छोटे अथवा आधीन को कागद पत्र के द्वारा कहा अथवा आज्ञा किया जाय उस को फुरमान वा फुरमाना कहते हैं ॥ २०८ पाठान्तरः- फुरमांन । प्रधानं । बिल्लाये । बुलाए । सौ । अनूप ॥ २०९ पाठान्तरः- पाय । आगे । दुय । धरे । उनगौ । सगुन । कथिय । दानं । तेम पग की इह पृथ्बीय । इह सगुन अच्छै हमकों भए । सो । ब्रह्म मंड मंड । ब्रह्म मंड मंड । कस्यो । दंडों ॥

  • हिन्दी में खजाना और उस से बने शब्द आते हैं उस का वाचक यह प्राचीन हिन्दी शब्द सब के ध्यान में रहने योग्य है । यह संस्कृत खर्जूर=रौप्ये silver का अपभ्रंश है । इन शब्दों को अरबी और फारसी के अपभ्रंश अनुमान करना व्यर्थ है । देखो, सं० खज शब्द भी युद्ध और स्वार्थ के अर्थों में प्रयोग होता है । और वह भी इतने प्राचीन समय से कि ऋग्वेद ८ । १ । ७ में "अतार्थे युध्म खजकृत पुरन्दर०" कहा है ॥ २१० पाठान्तरः- किपाल । संग । उपरें । ऊपरैं । दू । दिशि ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ८० ॥ बीसल सरवर पर बीसलदेवजी के आधीन तथा सहायक इष्ट मित्र राजाओं का उन के दिग्विजयर्थ अटन के लिये एकत्र होना और गुजरात के चालुक राजा का वहां न आना अतएव बीसलदेवजी का उस पर चढाई करना और वालुका राय का यह सुनकर सामना करने को आना ॥ धद्धरी ॥ अरि चन्दे सुतर * रथ ण्क गद्द । बीसन्न तडाग दिय वारि गाद्द ॥ फुरमान दृण लिपि दस दिसान । सव आय मिले अजमेर थान ॥ छं० ॥ ४२० ॥ परिहार सहणसी मिल्यौ आय । मंडोवर के नर लगे पाय ॥ गहिलोत मिले सब सभा मौर । पावासर तंवर राम गौर ॥ छं० ॥ ४२१ ॥ सेवत धनी आण सहेस । कोचिछ दुनांपुर दिए पेस ॥ वल्लोच मिले सब पाइ वंधि । बांमन्या नृपति तजि गए संधि ॥ छं० ॥ ४२२ ॥ भटनेर राय की आइ भेट । सुलतान नाख वँध थटा येट ॥ फुरमान गए जैसन्नलमेर । ओस्या सब भाटी भये जेर * ॥ छं० ॥ ४२३ ॥ जादौँ रु वघेल्ला सल्लहवास । मोरी वड गूजर आइ पास ॥ अंतरहवेध कूरंभ आइ । सब मेर जेर होय लगे पाइ ॥ छं० ॥ ४२४ ॥ आए सपाद् चढि जैतसीह । तच्छितपुर के नर संग खीह ॥ आये सु चढ़ि उदया पवार । निरवान डाड चढि चले खार ॥ छं० ॥ ४२५ ॥ चंदेल दाछिमा चरन लग्गि । वसि किये भूसिया धूनि पग्ग ॥ चालुक्क कोइ आयौ न पाइ । रहे मुकरि जोर * तरवार * साचि ॥ छं०॥ ४२६ ॥ सुनि बोल जैतसी गोलवाल । घर बार नगर को रष्षपाल ॥ सैं पौं सु तुमहि अजमेर थान । बालुक्क कितक्क पावै न जान ॥ छं० ॥ ४२७ ॥ दर * कूच कूच * चढि चल्यौ वीर । गिरि मग्ग छोड़ सर सुक्कि नीर ॥

  • इस रूपक में के कई एक शब्द भाषा के शोधक विद्वानों के ध्यान में लेने योग्य हैं जैसे :- हि० सुतर ( SK. सु + तर or तरि or तरु ), जेर ( SK. जूर or जूरी to reduce, to injure, to hurt, to decay, to grow old, to wound or kill ) जोर ( SK. जुड़ to bind, to join, as in making or mend- ing, to direct, to grind or pound &c., or जुर् speed velocity, motion in general ). तरवार ( SK. तरवारि ) दर ( SK. दृ to divide, cut or break, to preserve, &c., and aff अप् ) कूँच or कूच ( SK. कुञ्च to go, to go to or towards. ) इस के अतिरिक्त यह भी पाठकों को ज्ञात हो कि इस प्रसंग में कहीं चालुक और कहीं बालुक पाठ है सो जहां जैसा पुस्तकों में मिला वैसा रक्खा गया है किन्तु जितनी पुस्तक जतियों

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८८ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व सोभ्रत्ति सोलंकी पच्छि चोट । सै लोट किये घर परि कोट ॥ छं० ॥ ४२८ ॥ जालौर संजि गढ रौर पार । अरि आजि गए गिर बन मझार ॥ आबू चढि भेयो अच्कलेस । तत्काल लियौ गिरनारि देस ॥ छं० ॥ ४२८ ॥ वागरि सोरठ छपन्न सुद्ध । दंड मानि मिले नह मिले जुद्ध ॥ गुजरात देस सित्तर हजार । बालुका राइ चालुक झुझार ॥ छं० ॥ ४३० ॥ सुनि बत्त चक्यो अहंकार बंध । शिव सक्रति पूजि धरि कुन्त कंध ॥ असवार बार हज्जार तीस । मद झरंत नाग पचास वीस ॥ छं० ॥ ४३१ ॥ जोजनह एक पर करि म्लान । आवाज सुनिय तब चाहुवान ॥ छं० ॥ ४३२ ॥ रु० ॥ २११ ॥ ॥ बालुकराव का आना सुनकर बीसलदेवजी का सेना लेचढ़ना ॥ दूहा ॥ सुनि अवाज बीसल नृपति । आयौ बालुक राव ॥ राज मंगि है वर चह्यौ । दियौ निसान * निघाव ॥ छं० ॥ ४३३ ॥ रु० ॥ २१२ ॥ पद्धरी ॥ दल चह्यौ साजि बीसल सु राज । बढ्ढिय सु जानि अरि पुर अवाज ॥ सित्तर हजार सेना सु बाज । सिंगरि सल्लूर पावस निगाज ॥ छं० ॥ ४३४ ॥ को लिखी हुई हैं उन में च और ब में बहुत ही कम फरक देखने में आया है कि जिस से मैं अनुमान करता हूं कि लेखकों ने धोखा खाकर चालुक का बालुक पाठ न लिख दिया हो ॥

  • हिं० निशान अथवा निसान (SK. नि + शाण i. e. नि before and शाण coarse cloth, sack cloth, Canvas. A mall tent or screen used especially as a retiring room for actors and tumblers, &c.) Hence a standard, an ensign, flag, banner & colours, &c. इस निशान शब्द का प्राचीन देशी राज्यों में अभी तक प्रचार है और troop और Company के अर्थ में भी प्रयोग होता है जैसे अमुक राजा ने अपने अमुक सरदार पर दो निशान चढ़ा दिये । अमुक २ निशानों में झगड़ा वा लड़ाई हो गई । मैं अमुक निशान का हूं और वह अमुक का ॥ २११ पाठान्तर :-दीय । फुरमान । द्विसान । यांन । आई । गहिलोत । प्रावांसर । तूमर । मोहिल । वलोच । वंभन्या । सिंध । आय । बंध । फुरमान । जेसलहमेर । जद्रों । मल्हनवास । आय । अंतरहबंध । आय । पाय । सणाय । जैतसिंह । तछितपु । साथ । सथ । सय्य । लीय । चढि । पवांर । निरवांन । भूमियां । मुसकरि । रषबाल । सोपोंस । यांन । कहांक । कितहु । जांन । कूच कुच्च । मंगि । सोभत्ति । सोकत्ति । सोलंकि । सें । । जालोर । पारि । मझारि । लीयौ । छपंत । इंड । सतरि । राय । कुंत । पचास । झोजन । मिलान । चाहुवांन ॥ २१२ पाठान्तर - आवाज । मंग । हैवर । चढ्यौ । दीयौ । निसांन । न । घाव ॥ २१३ पाठान्तर :- जांन । सत्तरि । बाजि । सिंगार । कि गाज । ढलकंति । कुंत । जुंत । जुंतु । सिप । पथ्यर । बधि । भूमिया । मंडि । सं० १६४७ और १७७० में "करि अगम गम्य दल अल्ल रक" है । जब । उजलौ । उज्जलै। पढक्क । मुकाम । मुक्काम । गांम ।

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ८६ ढनकत ढोल, झलकत कुंत । विकसंत सूर सकसंत जंत ॥ छल छलत सिंधु वर चल अनूप । झल मल्लत सिप्प पप्पर सन्नूप ॥ छं० ॥ ४३५ ॥ वर विजय वड्डि चालुक्क देश । बहु मिलत भूमियां ज्ञेय पेस * ॥ अरि गवत्त गाढ तिन धरनि षंड । इहि रीत राज वसु विजय मंड ॥ छं० ४३६ ॥ करि अग्ग मह गल्ल सहस ड्रप्प । वर माघ मास उज्जलौ पप्प ॥ दस कोस जाय सुक्काम † कीन । विच गाम नगर पुर लूट लीन ॥ छं० ॥ ४३७ ॥ रु० ॥ २१३ ॥ ॥ बीसलदेवजी की खबर सुन वालुका राव का जलभुन जाना ॥ दूहा ॥ सुनिय षवरि ‡ वालुक तवै । तमकि सु उठ्यौ ताम ॥ मानों प्राजारिय अगिन । नर निरधूम विराम ॥ छं० ॥ ४३८ ॥ रु० ॥ २१४ ॥ ॥ वालुका राव का नित्य नैम करके लड़ने को तयार होना ॥ पद्धरी ॥ वालुका राइ चालुक्क वीर । मंगाइ नीर मंज्यौ सरीर ॥ धरि चरन अंब अंजुली कीन । धरि कंठ विष्प धारिय कुलीन ॥ छं० ॥ ४३९ ॥ जुध आज करौं कहि कहा कालि । जो जाउँ भज्जि तौ गोत गालि ॥ इतनी भूमि पिचो न कोह । अड्डौ न फिरैगा मिलि लेय लोह ॥ छं० ॥ ४४० ॥ पषरैत तुरिय पषरैत गज्ज । नर कस्से बगतर् सिन्नह सज्जि ॥ असवार भये तब प्रवरि दीय । वालुका राइ आयौ अबीच ॥ छं ॥ ४४१ ॥

  • हिं० पेस (SK. प्रेष्य m. A servant, a slave. n. Service, servitude. Hence a tribute or present such as is only presented to conquerors, princes, great men & superiors. हिं० पेश अथवा पेस + कशी अथवा कसी (SK. प्रेष्य and कृष् = to draw, to draw out or off, to attract, to raise, to draw up, &c.) † हिं० मुक्काम or मुकाम (SK. मुक्त + काम = परिश्रम labour). Hence a halt, a stop in a march, &c. Some think it from the SK. मकुष्ट mfn. going lazily, slowly, &c. or SK. म्रक or म्रकि or मुक्क to go, to move, &c, & अमनि a road or SK. मुक्त + आम to go. ‡ हिं० खबरि or खबर (SK. ख्या to relate, to recount, to say or tell, to celebrate, to make known, &c.) २१४ पाठान्तरः—पब्बहि । जमि । तांम । सं० १८५६ की में “मनों प्रजारिय अगनि बन” ॥ विराम ॥

६० पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व ॥ बालुका राव का बीसलदेवजी के पास श्रीकंठ भट्ट को भेज संदेसा कहाना ॥ श्रीकंठ भट चहुवान पास। तुम जाय कहौ इचि विधि प्रकास ॥ श्री कंठ भट गय अरि सु थान। बीसलदे भेष्यौ चाहुवान ॥ कूं० ॥ ४४२ ॥ आसीस दई उच्चारि हथ्य । बालुका राइ की कत्ती कथ्य ॥ जितनैं नृपति सौं रुदै काम । तितनैं रयति सौं कौन काम ॥ कूं० ॥ ४४३ ॥ तुम बुरी करी करि रयति बंदि । ऐसी न करें हिंदू नरिंद ॥ अब कुंडि रयति फिरि जाहु धाम। अजमेर सहर मंडौ विश्राम ॥ कूं० ॥ ४४४ ॥ हैं। वल्ल राय जुध करन जोग । जुध आजि जाउं तो परै सोग ॥ हम मरन दिवस है संगनीक । ओ पास जिते नृप सुद्ध लीक ॥ कूं० ॥ ४४५ ॥ हम तुस्म नहीं कबहू विरुद्ध। इह जानि जाहु फिरि तजौ जुद्ध ॥ हम तुस्म काम इचि खेत आजं । को रहै खेत को जाइ भाजि ॥ कूं० ॥ ४४६ ॥ ॥ यह सुनते ही बीसलदेवजी का लड़ने को आज्ञा देना ॥ इतनी जु सुनत ही चाहुवान । तिचि वार हुकम करि द्यौ निसान ॥ पषरेत किये है वर मतंग । संनाह पचरि सब नरनि अंग ॥ कूं० ॥ ४४७ ॥ दोउ फौज निजर दिठाल मिक्षि । उपहै सिंधु जनु लहरि जह्नि ॥ कूं० ॥ ४४८ ॥ रु० ॥ २१५ ॥ ॥ बीसलदेवजी का चक्रव्यूह और बालुकराय का अहिव्यूह रचना ॥ दूहा ॥ चक्रव्यूह चहुवान क्रिय। अधि मन बालुक राइ । कै भेदै कै मधि रहै । दई करय निरवाह ॥ कूं० ॥ ४४६ ॥ रु० ॥ २१६ ॥ २१५ पाठान्तरः-राव । चालुक । मंगाय । भव्यौ । अंजुलि । विप्र । धारीय । जुहु । करों । काल्हि । काल । जौ । जाउं । जाऊं । भजि । गोतमालि । काय । अडो । फिर । षषरै । पषरेंत । गज । कसे । सजि । भए । जाहुं । कहो । यांन । सं० १७१० में 'भेट्यो वीसलदे चाहुवान" । दीन । दइ । उभारि । हथ । राय । कथ । जितनैं । सों । कांम । तितनैं । सों । कौम । कांम । बुरीय । करी । करै । हिंदू । धांम । विश्रांम । हो । ब्रह्म वंस । भागि । झाऊं । पासि । शुद्ध । तुम । तुंम । नही । विरुध । तुंम । कांम । जाय । चाहुवांन । निसांन । हैंवर । हैं वर । दोऊ । २१६ पाठान्तर :-चाहुवांन । वालुका । राय । दइ ।

आदि पर्व ] 'पृथ्वीराजरासौ । ६१ ॥ बीसलदेवजी और बालुकराय की फौजों का परस्पर युद्ध करना ॥ भुजंगी ॥ मिले प्रात कालं दुअं दिष्ट फौजं । मनो देखियै जानि सामुद्र मैजं ॥ गजं आय झूमे भले साव रोटं । पई षंड सुंडं करे अप्प चोटं ॥ छं० ॥ ४५० ॥ भई तीरकारी फुटे नाल वानं । परी खार की धुंध सुझसै न भानं ॥ भले सूर बीरं धरै कुंत कंधं । उपारें तुरी दो दिसा फौज मद्धं ॥ छं० ॥ ४५१ ॥ निसंकं तुरी थप्पि पषरेत नष्यै । मनौ बूंद सिंधं परै कांन दिष्यै ॥ भए एक्कमेकं परे भार भारे । तनं तेग तुहै वहै फूल धारै ॥ छं० ॥ ४५२ ॥ भई फौज चालुक्क की पच्छ पायं । तबै बालुका राइ कीनी सहायं ॥ जपै भाय भायं करै मार मारं । जरै दोय जोधा कटैं सार सारं ॥ छं० ॥ ४५३ ॥ उपहै घरैं गावरं तुंड तुहै । यहै संग कुही फिरी चंग फुहै ॥ चपे चक्रव्यहं नृपं अप्प चल्लै । फिरै मुप्प परिचार गच्छिन्नौत मिल्लै ॥ छं० ॥ ४५४ ॥ चल्यौ भज्जि गच्छिलोत तूंवर दिसानं । फटे चक्रव्यूहं भए एक थानं ॥ तिनं वार स्यावासि पावासु रानं । सनं मुष्य धाए मनौ सिंघ जानं ॥ छं० ॥ ४५५ ॥ परी भूमि लोथं मिले हत्थ वत्थ्यं । करैं जोर जोधा अकथ्यं सु कथ्यं ॥ तिनं वार पंधार पेले बलोचं । जुरे आय संमुष्य कीयौ न सोचं ॥ छं० ॥ ४५६ ॥ भभक्कं भकं हस्ति बोले भसुंडं । परे पंड षंडं रनं रुंड मुंडं ॥ वने खाल वाजे भिते लोछ मिल्लै । दुहू ओर जोधा मनौ फाग षिल्लै ॥ छं० ॥ ४५७ ॥ गजं श्रोन चल्लै रजं आस पासं । मनौ माधुरी मास फूले पलासं ॥ मिची दिष्ट बालुक्क बीसल नरिंदं । मनो सूर ईषे भये चंद्र मंदं ॥ छं० ॥ ४५८ ॥ तुरी चढ़ि चालुक्क हस्ती चुहानं । भयौ राज सौं जुद्ध भारी भयानं ॥ उनें वाजि नंष्यौ इनें गज्ज पेल्यौ । दिए दंत पायं दुअं लोच मिल्यौ ॥ छं० ॥ ४५९ ॥ फिस्यौ गज्जराजं उनें बाजि फेच्यौ । दुअं वीर बाचा भई खेत हेच्यौ ॥ छं० ॥ ४६० ॥ रू० ॥ २१७ ॥ २१७ पाठान्तर :- दुयं । दिठ । देखियैं । औन । जांनि । भूमे । रोहं । रोहं । सपै । सौटं । साट्टं । धुंधु । सुझै । भांन । शूर । धरें । कंधे । उपारैं । मंधं । थप्परे । कंध नये । नयै । परैं । कांन । भइ । पक्क पाई । पक्क । राय । सहाई । जपे । भाई भाई । जोद्धा । कटै । घटं । तुंब । करी । चंपे । अप । चलं । फिरैं । मुदव । मिलं । भजि । तौंवर । फटै । मुप । पुहवि । पहुंमि । हथ बथ्थं । करे । अकथं । कथं । पेल्यो । सनमुप । भभकंत हस्ती, सु बोलै भसुंड । रुड । मुंडं । मिले । दुहं । मनो । पिले । चल्ले । रजे । मनौ । वालुक । मनो । इषे । हुवं । चंद । चढि । चालुकं । करी । चाहुवानं । चौहानं । सों । नय्यौ । गज । दए । दुवं । गजराजं । दुहूं । भयं ॥

६२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ चालुक का कहना कि रात सें युद्ध नहीं करना प्रात भये युद्ध करेंगे ॥ दूहा ॥ राज सुनौ चालुक कहै । है थप्पंरि इक्क कंध ॥ राति परी जुध नहि करै । प्रात करैं फिर जुद्ध ॥ छं० ॥ ४६१ ॥ रु० २१८ ॥ ॥ दोनों योद्धाओं का अपने २ डेरों पर आना और चालुक के मंत्रियों का एक झूठी पत्री बनाना ॥ अरिल्ल ॥ अपने अपने डेरा आए । सब घायल के घाव बँधाए ॥ मिले सकल चालुक के मंचिय । झूठी एक बनाई पत्रिय ॥ छं० ॥ ४६२ ॥ रु० ॥ २१८ ॥ ॥ चालुक के मंत्रियों का उसे एक झूठी पत्री देकर घर भेज दैना ॥ अरिल्ल ॥ सो कर जाइ राज कै दिन्निय । तुम घर जाहु कहा वक थन्निय ॥ डोली करि चालुक्क चलाए । सब मंची मिलबे कौं आए ॥ छं० ॥ ४६३ ॥ रु० ॥ २२० ॥ ॥ चालुक के मंत्रियों का बीसलदेवजी के मंत्रियों से मिल संधि कर लैना ॥ अरिल्ल ॥ सब मंची परधान थान पर । बोलि लए पावासर तोंअर ॥* हम सु तुम्हारै पाइन आए । कपट निपट करि राव चलाए ॥ छं० ॥ ४६४ ॥ रु० ॥ २२१ ॥ इक्क सु बोल गज तोल चलावै । राज कहै सो मान्न मँगावैं ॥ छं० ॥ ४६५ ॥ रु० ॥ २२२ ॥ २१८ पाठान्तर :- करें । कहै । भये । करै ॥ २१८-२२ पाठान्तर :- अपनें २ । घाउं । बंधाए । मंत्री । पत्री ॥ २१९ ॥ जायं । दीनीय । थंनिय । चालुकं । करी । कों । कूं । आये ॥ २२० ॥ परधांन । यांनं । तुम्हारे । पायन ॥ २२१ ॥ इहां । सोल । चलायौ । मंगायौ । तहं ॥ २२२ ॥ * यह तुक सं० १६४३ और १७७० की पुस्तकों में नहीं है ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ६३ ॥ पावासुर का बीसलदेवजी को संधि कर लेने के समाचार कहना ॥ अरिल्ल ॥ राजन पास गए पावासुर । तहां बोलि किरपान्न नृप नर ॥ चालुक के संदी आये मिल । संगो मान धरै प्रभु पग तत्त ॥ छं० ॥ ४६६ ॥ रू० ॥ २२३ ॥ ॥ बीसलदेवजी का संधि स्वीकार कर वहां महल बनाने और नगर बसाने को कहना ॥ अरिल्लं ॥ फिर राजन कही तुम जानौ । मेरो उहाँ महल हु थानौ ॥ एक मास में नगर बसावौ । इतनी कहि अरु पाइन आवौ ॥ छं० ॥ ४६७ ॥ रू० ॥ २२४ ॥ ॥ माल मँगा कर बीसलपुर बसाना और वहां से पीछा फिरना ॥ दूहा ॥ पावासर तोंअर कहे । भरें कोरि कौ भाग ॥ जब ही माल मँगाइ करि । नगर बसावन लाग ॥ छं० ॥ ४६८ ॥ रू० ॥ २२५ ॥ जीति खेत चहुआन नृप । चालुक धाय अधाय ॥ फिरि बाहुरि बीसल चल्यौ । बीसल नगर वसाय ॥ छं० ॥ ४६९ ॥ रू० ॥ २२६ ॥ सो संवत नव सत्त अर्ध । बरस तीस कछ अग्ग ॥ पुर पहन बीसल नृपति । राजत सयन्तह जग्ग * ॥ छं० ॥ ४७० ॥ रू० ॥ २२७ ॥ २२३-२२४ पाठान्तर :-कें । कै । पांइन । ताले ॥ २२३ ॥ राजन । राजन । जानो । इहं । मंल्लिहू । हाँ । मैं । वंसायौ । वसाउ । पायना । आयौ ॥ २२४ ॥ २२५-२७ पाठान्तर :-कहै । भरै । भरैं । मंगांय । वमाउन ॥ २२५ ॥ जीती । चहुंआंन । चहुंवान । नृप । धाय । फिरिं ॥ २२६ ॥ सत । अंध । अगि । जगिग ॥ २२७ ॥

  • इस रूपक में कहे संवत् के विषय में हमारी टिप्पण १६८ पढ़ो और विचार करो । इस ग्रंथ के रूपक १६८ में बीसलदेवजी के पाट बैठने का संवत् ८२१ कहा है परंतु ख्यातियों में सं० ९३१ भी मिलता है । उन के राज्य करने के वर्ष ६४ कवि ने बता ही दिये हैं अतएव यह रूपक पाट बैठने के रूपक १६८ में आठ सै के स्थान में नो सैं अथवा नव सैं का पाठ होना स्वयम् सिद्ध करता है क्योंकि जो ऐसा न माने तौ । ११८ वर्ष का राज्य समय होगा । ख्याति में लिखे बीसलदेवजी के पाट बैठने के संवत् के अनुसार जो लेखा लगा कर हमने टिप्पण १६८ में संवत् १०८६ सिद्ध किया है वही कर्नल टॉड साहब भी नीचे लिखे प्रमाण अनुमान करते हैं :-

६४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ एक दूती का बीसलदेवजी को एक बहुत सुन्दर बणिकसुता की खबर देना ॥ दूहा ॥ बणिक सुता कौमारि का । एक अनूप नरिंद ॥ कामलता दूती कहै । मनोँ सरद कौ चंद ॥ छं० ॥ ४७१ ॥ रू० ॥ २२८ ॥ ॥ बीसलदेवजी का बीसलपुर में प्रविष्ट होना ॥ कवित्त ॥ संवत नव सत अद्ध । वरष दस तीय सत्त अग ॥ पुर प्रविष्ट बीसल्ल नरिंद । राजंत सयल जग ॥ तिन्हि पहन इक्क वणिक । मंडि ग्रह राज विबाहति ॥ रचिव देव नृप सबद । दिष्यि तिय देव डूवाहति ॥ जै जै सबद वंदिन चवचि । मागध पुत्र पाँवच मति ॥ अन धन प्रवान् वह पुच्छवि परि । बरष्यौ जेम पुरंद गति । छं० ॥ ४७२ ॥ रू० ॥ २२९ ॥ "Mahmood's final retreat from India by Sindh to avoid the armies collected "by Byramdeo and the prince of Ajmere," to oppose him, was in A. H. 417, A. D. 1026, or S. 1082, nearly the same date as that assigned by Chund, S. 1086," Vol. II, page 419. इस के सिवाय पाठकों को यह भी विचार करना होगा कि इस समय गुजरात देश के पट्टन का चालुक राजा कौन सा था कि जिस से बीसलदेवजी का युद्ध हुआ । अतएव हम जैन ग्रंथ प्रबंध चिन्तामणि और कुमारपाल चरित्र आदिक के अनुसार शोध हुए संवत् मूलराजजी सोलंकी से लेकर करण तक के नीचे लिखते हैं:— १ मूलराज = संवत् ९८८ से ५५ वर्ष राज किया २ चामुंडराय = ,, १०४३ से १३ वर्ष ,, ,, ३ वल्लभराज = ,, १०५६ से ११॥ मांस ६ दिन ४ दुर्ल्लभराज = ,, १०५६ से ११॥ वर्ष राज किया ५ भीम = ,, १०७८ से ५० वर्ष ,, ,, ६ करण = ,, ११२८ से ३२ वर्ष ,, ,, २२८ पाठान्तर :—कौमारिका । कहै । मनहुत ॥ २२९ पाठान्तर :—सं० १७७० की पुस्तक में "सर संवत् नव सत्त । वरष दस पंच सत्त अग" पाठ है । वीसल्ल । नृपति । राज्यंत । तिन । पट्टन । गृह । दिषि । तीय । डूवाहित । पुत्त । पहु । पुहमि । पद्ध । पुरिंद ॥ इस रूपक के संवत् के विषय में टिप्पण १६८ और २२५-२८ और बीसल नगर अथवा बीसलपुर के विषय में टिप्पण १८० और १८४ अवलोकन करो ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ६५ ॥ बीसलदेवजी का पीछा अजमेर आना और वहां उन का हास होना ॥ दूहा ॥ इह विधि मंड्यौ राज वरि । जव्य वणिक अजमेर ॥ वरष चयोदस मद्धि वय । भयौ हास सब नैर ॥ छं० ॥ ४७३ ॥ रु० ॥ २३० ॥ ॥ बणिकसुता गौरी का पुष्कर में तप करना और बीसलदेवजी का उस पर मोहित होना ॥ पद्धरी ॥ आषाढ मास उज्जाल पष्व । दिन तोय सोम वंदन सरुष्प ॥ सटिवाय गज्जि नीसांन गैन । अति उंच मंडि न्रिप अवधि छैन ॥ छं० ॥ ४७४ ॥ किलकांत उपन्न आकान्त अभ्भ । वियुस्यौ मद्धि जन्न पहुमि गब्भ ॥ विल्लसंत राज तिय देव साथ । निकसै बार कहु एक भाय ॥ छं० ॥ ४७५ ॥ चिहुँ कोद घूम घन पुब्ब पूर । दिन पांच आनि दरसाइ सूर ॥ रस वार सोम वीरंम दिन्न । ते वंस सेव जन वंद किन्न ॥ छं० ॥ ४७६ ॥ सो षंड मास लगि रत स मान । घर घरे धुंम जन्न मद्दिर आन ॥ छं० ॥ ४७७ ॥ रु० ॥ २३१ ॥ साटक ॥ स्यामंगं रवरंग अंग रवनी । अनी सु रंगेसवे ॥ साहंसं सक पाइ राइ सुगता । जुग्ता सरित्तारणे ॥ नीलं वास वनूर बंध विधना । चरि चार् धारा तनं ॥ भूमिं संकि स्वधीन पुन्य तनयं । देवा रहस्सं मनं ॥ छं० ॥ ४७८ ॥ रु० ॥ २३२ ॥ कवित्त ॥ धरतिय धरि उर वास । वास धर उर तिय धारिय ॥ दिग कज्जल लगि धार । धार कज्जल दिग धारिय ॥ २३० पाठान्तर :-परि । मधि ॥ २३१ पाठान्तर :-उजास । पष । सुरुप्प । सरूष । मिटिंबाय । गज । नीसांन । गैन । उंच । वैन । उपज्ल । अभ्र । वियूस्यौ । मधि । पुहमि । गभ । निकसै । चिहुं । धुंमि । पुब । पंच । दरसाई । विरंम । दिनं । तैं । बंध । किन । स नाभ । आभ ॥ २३२ पाठान्तर :-स्यामांगं । अवनी । पाय । जुगता । सरितारण । विधिना । हार । भूमि ॥ २३३ पाठान्तर :-धरतिय उर । धारि । मधि । हिय । रंगिय । नूपर । सा । पुहुप । पहुप । रहस्सि ॥

६६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ] रच्यौ चार चिय सङ्गि । मडि चिय चार सु रंमिय ॥ नूपुर पय सो अवंत । अवत नूपुर पय अंगियं ॥ अविसय न पुहप घन बन रसिय । रसय बनी घन पुफ्फ सुम ॥ भू इंद रचसि रक्सि वस रमिय । बीसल रस भू इंद रम ॥ छं० ॥ ४७९ ॥ रु० ॥ २३३ ॥ ॥ पुष्कर की तपस्वनी की बीसलदेवजी के प्रति अरदासि ॥ दूहा ॥ हैं राजंन मंगो थहै। इह मेरी अरदासि ॥ पुहकर की कहै तपसनी । रूप रंग की रासि ॥ छं० ॥ ४८० ॥ रु० ॥ २३४ ॥ अरिल्ला ॥ पिच सनेह सपूत सवांनिय । देवनि भूमिन संब संमानिय ॥ खो रति मांन थरैं घन डंबर । असय मडि निज उज्जलं अंबर ॥ छं० ॥ ४८१ ॥ रु० ॥ २३५ ॥ दूहां ॥ उज्जलं पष दसमीं दिवस । अह दसरथ के नंद ॥ नयर वंइ अर कंथ दस । रुचिकै किए निकंद ॥ छं० ॥ ४८२ ॥ रु० ॥ २३६ ॥ दीप माल दीप सुरग । ग्रह ग्रह महखं अवास ॥ हरिपुर हर मानत मनह । चितवत चिंतत वास ॥ छं० ॥ ४८३ ॥ रु० ॥ २३७ ॥ ॥ बीसलदेवजी का पुष्कर में बनिकसुता गौरी का सतीत्व भ्रष्ट करना और उस का उन को दानव होने का शाप देना ॥ कवित्त ॥ एकादसमी दिवस । देव नर नाग सब्ब मिल ॥ सुर सक्कव तजि वास । आनि पुहकर प्रसाद पिल्ल ॥ तहां बनिक नंदिनी । पुत्रि गवरी तप मंढौ ॥ दिषि ता ह बीसल नरिंद । बढि मार प्रचंढौ ॥ २३४-३७ पाठान्तर :- हों। इहै। अरदास । दै । तपशनी ॥ २३४ ॥ मुरिल्ल । सवांनिय । सवांनीय । संवानीय । सब । समानिय । मांन । मधि । उज़ल ॥ २३५ ॥ नैर । बध । अरि । निकंव ॥ २३६ ॥ सुरंम । चिंतवत्त ॥ २३७ ॥ २३८ पाठान्तर :- एकादशमी । द्वाव । मिलि । पास । आंनि । पिलि । देषि । द्वादशी । असू । सद । तितहिं । दिंषिति । तहु । मंन । कहुं ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ६७ द्वादसो दिवस दिन चल्ल करि । चउद्द खद्द कीनी नृपति ॥ ' जित तिनह दिप्पि तिहि सन दुचित्त । न चिय राज कछु छिन विपति ॥ छं० ॥ ४८४ ॥ रू० ॥ २३८ ॥ पद्धरी ॥ वर विसन्न लोक पुक्कर प्रकास । सुर नर सु नाग रिषि सुनि अवास ॥ धर धरन करम सुभ परम पाइ । जय सुर चवंत गुन अगम गाइ ॥ छं० ॥ ४८५ ॥ निर्तिय अगनवार दिन कर प्रकास । गय दार तपनि करि कपट पास ॥ तन रचित नीर उर ध्यान देव । नृप मानि रहस करि वर अभेव ॥ छं० ॥ ४८६ ॥ वाँढ विकल झाझ तम धूम नैन । गछि कुस सकुथ्य दइ दुसिप वैन ॥ धर चरति अंग जल धार भार । हथ पटक गंग जट समुष पार ॥ छं० ॥ ४८७ ॥ धरि ध्यान ध्यान तिन अगनि ईस । पंडे सु जग्गि तंपे जगीस ॥ रवि पहस पाय सासन सरूढ । उर धरे देव तिन देव गूढ ॥ छं० ॥ ४८८ ॥ जुग पानि नाभि ताली उगांय । रमि द्रिष्ट द्रिष्ट गिरि वंभ राय ॥ तिर पुटिय भाल शिल कमलम्मूर । इह भांति ताव तप तपनि जूर ॥ छं० ॥ ४८९ ॥ तप चवन्न मुक्कि किय विरथ काम । कर मंखि राज मुक्कु आप ताम ॥ छं० ॥ ४९० ॥ रू० ॥ २३९ ॥ दूहा ॥ पुची वनिक सराप दिय । अर पुक्कर नर लोइ ॥ असुर होइ बीसल नृपति । नरपञ्चारी सोइ ॥ छं० ॥ ४९१ ॥ रू० ॥ २४० ॥ ॥ गौरी का बीसलदेवजी को भयभीत देखकर कहना कि तुम्हारा पोता तुम्हारी सुकीर्त्ति करै ॥ दूहा ॥ दिष्पि राज भय भीत तन । तन मंन धूजत तथ्य ॥ मो उद्धारन पय गहन । कथ कुसुमन वर कथ्य ॥ छं० ॥ ४९२ ॥ रू० ॥ २४१ ॥ २३९ पाठान्तरः-वर । प्रकाश । रिप । करकम । पाय । गाय । अनग । चिन कर । ध्यान । ज्वाल । नैन । कुश । सकुथ । दय । बैन । बैन । हरत । पिट्टि । ध्यान ध्यान । जंगि । तंडे । तंभे । सुष्ट । पांनि । नाभा । द्रष्टि द्रष्टि । राइ । तरपटीय शील शिल कमल मूल । नांति । तप प्रवल मुनिं कियय विरथ वंम । सराप । तांम ॥ २४०-४१ पाठान्तरः-वर्णिक । उपति । नर भषन करे सोय ॥ २४० ॥ दिपि । तथ । कथ । कुसुम । चर । कथ ॥ २४१ ॥

९८ पृथ्वीराजरासौ ! [ आदि पर्व दूहा ॥ तो सुत्र सुत्त उद्दार मति । गति तिन देव प्रकास ॥ धर मंडन डंडन भरन । सो तुम कर हु सु वास ॥ कूं० ॥ ४८३ ॥ रु० ॥ २४२ ॥ ॥ तपस्वनी के कोप से बीसलदेवजी का सांप के काटने से अलोप होना ॥ कवित्त ॥ सपत दिवस अनुसिष्ष । सुष्ष मधि दिग्ग प्रजारिय ॥ असि विष वड़ैन अंग । अगनि गन दनुज उदारिय ॥ सहस अङ्ग तन बङ्ग । झार मुष चार विकारिनि । सर्व असन करि असम । सैन छिन चैन निकारनि ॥ आहुट्ठ दीघ साहुट्ठ मधि । पलप पदम बिन कदम बिन ॥ गृह गवरि ग्यान गन गल्ह करि । रम्य राज आरन्न छिन ॥ कूं० ॥ ४८४ ॥ रु० ॥ २४३ ॥ दूहा ॥ भय दिवाच आहुट्ठ दुति । तप सरनी कौ दोष ॥ जल बेली विहु ब्राग विष । ते छिन भये अलोप ॥ कूं० ॥ ४८५ ॥ रु० ॥ २४४ ॥ ॥ जिस तपस्वनी के शाप से बीसलदेवजी असुर हुए उस के तप का आना की मा सविस्तर वर्णन करती है ॥ दूहा ॥ सुनंच पुत्त तिन तपनि तप । भिन्न भिन्न परिमान ॥ जिद्दि दुसिष्ष नृप असुर हुअ । रच्यौ सवर बुरमान ॥ कूं० ॥ ४८६ ॥ रु० ॥ १४५ ॥ बनिक पुच्च मन इम धरिय । मो पति ताप अपार ॥ जो तप्पह मंडौं प्रबख । तौ कुछौं संसार ॥ कूं० ॥ ४८७ ॥ रु० ॥ २४६ ॥ २४२ पाठान्तर :- सुत सुत । उद्दार । मंड ॥ २४३ पाठान्तर :- अनुसिष । सुष । द्विग । उद् भच्चिय । वार । विकारनि । सैन । चैन । आहुठ । साहुठ । ग्यांन । गल्ह । आरंन ॥ २४४-४६ पाठान्तर :- भये । भए । आंगुठ । कौ । कोपु । विहुं । वृष । भए ॥ २४४ ॥ भिंने । भिंन । परिमांन । जिहिं । दुसिष । नृप । भय । वरमांन ॥ २४५ ॥ धरीय । मो तन पाप अपार । मो पित ताप अपार । जो तप मंडौ निय प्रवल ॥ २४६ ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ६६ कवित्त ॥ धन अप्पिय सब ब्रह्म । उच्चर तिय ध्यान सु धारिय ॥ चिंतवि पुच्छकर तिष्य । रित्तु ग्रीषम मति चारिय ॥ पंच अगनि वर सीस । मेघ धारा धर मंडिय ॥ वरषा काल प्रचंड । सीत जल मड़ि सु बुड्डिय ॥ खंडिय सु वास संसार सुख । जोति निरंजन उर सचिय ॥ डूम कंक नालि मंडिय गगन । पीयै वाम दक्षिण मुचिय ॥ कूं० ॥ ४९८ ॥ रू० ॥ २४७ ॥ पद्धरी ॥ पहु समय तिष्य वर सजर किन्न । उर नयर धारि तिन भुवन चिन्न ॥ रुष च्यार देव पद भेटि ठौर । मन धऱ्यौ ध्यान सब तिष्य मौर ॥ कूं० ॥ ४९९ ॥ वढि बाच मास तिन पान कीन । सिर अद्ध उड़ दिग वरन दीन ॥ सचि वेद अध्ध कवि पंच मंडि । दत्ति दर्प दर्प मन मयन षंडि ॥ कूं० ॥ ५०० ॥ विहसित्त नगर नन प्रसध साध । सिर द्रवत उदक विष प्रातमाध ॥ चव वरष अम्र घर धार भूमि । गिरि गुरनि गिरनि गन लूम लूमि ॥ कूं० ॥ ५०१ ॥ परि मुहुँ उड्डं उपलंत बिन्द । गहराय वाय दस दिसनि हून्द ॥ घर हरत अंग जल धार धार । हर थटिय गंग जट मुकट पार ॥ कूं० ॥ ५०२ ॥ धरि ध्यान ग्यांन तिन अग्र ईस । षंड्यौ स जग्ग मंडै जगीस ॥ उर धरे देव तिन अंग गूढ । रुचि पदम पाय सामन सरूढ ॥ कूं० ॥ ५०३ ॥ जुग पानि नाभि ताछी बनाय । रमि दिष्ट सृिष्ट गिरवान राय ॥ तरपटी सान्न सिद्ध कमल भूर । इचि भंति भाव तप तवनि जूर ॥ कूं० ॥ ५०४ ॥ रू० ॥ २४८ ॥ २४७ पाठान्तरः-ब्रह्म । ताय । ध्यांन । तिष्य । रितु । चारीय । शीस । मंडय । शीत । मधि । बुडय । साव । ज्योति । बंक । वांम । दषिन ॥ २४८ पाठान्तरः-तिष्ठ । किंन । धार । चिन्ह । ध्यांन । तिष्य । पांन । कींन । संचि । दर्प दर्पं । मैंन । विहसित । विहसीत । नगन । माध । आभ्य । अम्र । घर । भूम । लूंबि । भूमि । मूहुँ । विंद । गहराव । वाव । दह । दिसा । इंद । भार । सुमुष । ध्यांन । ग्यांन । संरूढ । पांति । शिष्ट । गिरवरन । राइ । मूल । इहिं ॥ इस रूपक के अंत की पांच तुकों को कवि पिछले रूपक २४६ में भी कह आया है। यह चंद की संस्कृत-काव्य-सम शैली का एक उदाहरण है और ऐसे उदाहरण इस महाकाव्य में अनेक आवेंगे। कवियों की ऐसी निज शैलियों को देखकर भाषा के क्षुद्र और अपरिपक्व कवि झट चंद जैसे हिन्दी भाषा के वास्तविक कविराज को दोष देने लग जाते हैं परंतु संस्कृत भाषा के

१०० पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व कवित्त ॥ देव चरित रमि धाइ । इक्क कार हीय मद्धि धरि ॥ सु रचि तिथ्य अडसट्ठि । मान पहुकर प्रकास करि ॥ दिग अंबर उर धारि । तारि तारी तप तारनि ॥ मन सुर भाग समान । खाइ रष्यै परि पारनि ॥ बर तर्प चंद अन दर्प करि । तामस द्रिग विकराल मन ॥ सस गवरि अंग अंग सिष उसिष । नृपति समंतन असुर वन ॥ छं० ॥ ५०५ ॥ रू० ॥ २४८ ॥ ॥ श्राप से विमुक्त होने के विचार से बीसलदेवजी का गोकर्ण की यात्रा के लिये बीसल सरवर पर प्रस्थान करना ॥ दूहा ॥ तजि नरिंद अजमेर पुर । चित गोक्रन हर थान ॥ बीसल सरवर ऊपरैं । बीसल दिय प्रस्थान ॥ छं० ॥ ५०६ ॥ रू० ॥ २५० ॥ ॥ तपस्विनी के श्राप से बीसलदेवजी की बुद्धि का चल विचल होना ॥ दूहा ॥ काम कुमत्तौ उप्पन्नौ । दीय तपसनी स्वाप ॥ बीसल दे बुधि चल विचल । प्रगटि पुब्ब कौ पाप ॥ छं० ॥ ५०७ ॥ रू० ॥ २५१ ॥ महाकाव्यादि के पठित विद्वानों को चंद कवि पर तो नहीं किन्तु इन दोष देने वालों की कुशाग्र बुद्धि पर बड़ा आश्चर्य होगा क्योंकि संस्कृत काव्यों तथा अन्य बड़े २ ग्रंथों में प्रायः ऐसे उदाहरण मिलते हैं। देखो माघ के चतुर्थ सर्ग के २१ वें श्लोक में सहरितालसमाननवांशुकः । दो वार प्रयोग हुआ है और रघुवंश के दूसरे सर्ग के श्लोक ३१ की अंत की पंक्ति चित्रार्पितारम्भइवावतस्थे ॥ कुमारसंभव के तीसरे सर्ग के ४२ वें श्लोक में भी महाकवि कालिदासजी ने प्रयोग कियी है। तथा रघुवंश के सातवें सर्ग के ६ छठे श्लोक से लेकर ग्यारहवें ११ तक के सब श्लोक जैसे के तैसे कुमारसंभव के सातवें ७ सर्ग के ५७ सत्तावनवें श्लोक से ६२ बासठवें तक महाकवि कालिदासजी ने प्रयोग किये हैं ॥ २४८ पाठान्तरः-द्वार । इक्क । रहिय । रहीय । मधि । तिथ । अडसठि । मांन । उधारि । समांन । रषे । पारन तर्प । दर्प । अंग अंग ॥ २५०-५१ पाठान्तरः-तेजिं । नरेंद्र । चिंत । गऊकन । यांन । उपरे । प्रस्थांन ॥ २५० ॥ कांम । कुमती । ऊपनों । दिय । तपशिनी । सराप । कों ॥ २५१ ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १०१ ॥ बीसलदेवजी को सांप का काटना और उस से उन का मरना ॥ दूहा ॥ वार रवी तिथि सत्तमी । चलि रथ सुतर सतंग ॥ तिहि वेरां आयौ कहै । डेरा माँचि पनंग ॥ छं० ॥ ५०८ ॥ रु० ॥ २५२ ॥ कवित्त ॥ देषि राज करि क्रोध । वान को दंड धरिय कर ॥ वेधि पनग फन छिक्कि । पद्यौ धर तरफत बेसिर ॥ कुट तिहि बेर सतंग । खेल देषन कौं धायौ ॥ एक मोजरी मढ़ि । पनग फन आनि लुकायौ ॥ फिरि राय आय हेंवर चढ्यौ । पहरत मोजे पग डस्यौ ॥ भवितव्य बात आघात गति । इतनी कहि राजन ढस्यौ ॥ छं० ॥ ५०९ ॥ रु० ॥ २५३ ॥ दूहा ॥ ओषद मंच अनंत जप । कितने करे उपाय ॥ ज्यों ज्यों तन लहरत चढत । त्यों त्यों दुचितौ राय ॥ छं० ॥ ५१० ॥ रु० ॥ २५४ ॥ कवित्त ॥ राज मरन उपनो । सब्ब जन सोच उपन्नौ ॥ पट रागिनि पावार । निकसि तब ही सत किन्नौ ॥ तिन मुष इम उच्चरौ । होइ जदवनि सपुत्तय ॥ यो असीस इह फुरौ । तुम्म भोगवहु धरत्तिय ॥ जिन रथी मढ़ि उठे अतुर । धपै ज्वाल तिन मुष विषय ॥ नर भषय जहां लसकर* सहर । मिलै मनिष ते ते अभय ॥ छं० ॥ ५११ ॥ रु० ॥ २५५ ॥ २५२ पाठान्तर :-तिथ । सपतमी । तिथि । कह्यो । डेरां । मांहि । माहि । पबंग ॥ २५३ पाठान्तर :-वांन । बंड । नाग । छिक्र । वेंसिर । छुट्यो । सं० १७९० और १६४७ में “मिलि राजन मोजरीय” । को । आयौ । मधि । पनंग । आंनि । आय राय ॥ २५४ पाठान्तर :-उपद्द । उपाइ । ज्यों ज्यों । लहरी । त्यो त्यो । दुचितो ॥ २५५ पाठान्तर :-उपनौ । ऊपनौ । उपंतो । निकसी । कीनो । इह । उच्चलौ । सपुतय । सपुतह । कुरौं । भोगवो । धरतय । इन । मधि उठै । भपै । शहर । मिले । मनुष । भपै ॥

  • हिं० लसकर (SK: लश To be skilful or clever, to do anything skilfully and scien- tifically or लस To play or sport, to work and कर Who or what does, makes or causes.) Hence a camp or cantonment &c.

५०२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ बीसलदेवजी के मरण और असुर हो नर भक्षण करने की बात सुनकर सारंगदेवजी का अपनी राणी को रणथंभ भेजना और आप उन से युद्ध करने को तयार होना ॥ दूहा ॥ सुनिय बात तो तात तब । हौं पठई रिनथंभ ॥ संच वद्दि तिन तेग बल । जुद्ध जुरन आरंभ ॥ छं० ॥ ५१२ ॥ रु० ॥ २५६ ॥ ॥ सारंगदेवजी की राणी गवरी का चिंता करना ॥ दूहा ॥ उन गति मो गति इक्क होइ । कै अवगत्ति मिलंत ॥ हास मिटै दुष को संधै । इहय चित्त मो चिंत ॥ छं० ॥ ५१३ ॥ रु० ॥ २५७ ॥ ॥ सारंगदेवजी का सेना लेकर ढुंढा राक्षस से युद्ध करने को अजमेर पहुँचना ॥ दूहा ॥ एक सल्ल भरि सध्य करि । सवल सकर दिय फेरि ॥ द्वै निसान चहुवान चढि । पहुँचिय गढ अजमेर ॥ छं० ॥ ५१४ ॥ रु० ॥ २५८ ॥ ॥ सारंगदेवजी का तीन दिन कोट में रहना, वहां असुर का न मिलना और अजमेर की भ्रष्ट और भयानक दशा देखकर चिंता करना ॥ कवित्त ॥ अति उद्यान सब थान । भये गढ धाम भयानक ॥ दिष्ट देषि सारंग । दैव चिंते तब बानिक ॥ ताकै कुल उपनीय । तपनि चम कौ कुल षोयौ ॥ तात पुकारे नीर । भरे नैनन्ह घन रोयौ ॥ दिन तीन रहत हुअ कोट मधि । असुर नयन दिष्यौ नहियँ ॥ तब सुचित भए सारंग दे । पुरी बसाऔं इह कहिय ॥ छं० ॥ ५१५ ॥ रु० ॥ २५९ ॥ ५६-५८ पाठान्तर :-वत्त । हों । मो । रन । वंदि । बर । जुध ॥ २५६ ॥ इन । हुंक । हुव । कैं । अवगति । चित ॥ २५७ ॥ भर । सद्य । निसांन । चहुआंन । चहुवांन । पहुचिय ॥ २५८ ॥ २५९ पाठान्तर :-उद्यांन । यांन । धांम । वांनिक । वाकै । नैननं । रहंत । बसावौ । बसावौं । कहीय ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १०३ ॥ सारंगदेवजी और उन के पिता ढूंढा दानव का परस्पर युद्ध होकर सारंगदेवजी का मारा जाना ॥ कवित्त ॥ एका दसमी दिवस । प्रान दानव पुर आयौ ॥ सकल सेन लै सस्त्र । उठि लरिवे कौं धायौ ॥ वे वाहैं तरवारि । इहै मुष पकरि सु कहै ॥ ज्यों वेनी द्रुम सघन । देषि मरकट फल चुहै ॥ किय पिता पुत्त जुध सम असम । गिर सौ जनु सारँग गिर्यौ ॥ मन जानि असुर नर घुसि रचै । सब ढूंढा ढूंढत फिर्यौ ॥ छं० ॥ ५१६ ॥ रू० ॥ ३६० ॥ ३६० पाठान्तर :-दशमी । सेंन । शस्त्र । उठि । कों । वाहे । ज्या । चुट्टै । किय पिता जुध सम अरु असम । सो । सारंग ॥ पाठक महाशयो ! चंद की वर्णन कियी हुई बीसलदेवजी की यह दानव कथा आप को अद्भुत मालूम होगी और इस में कुछ संदेह भी नहीं है कि मनुष्य मरकर फिर दानव नहीं हो सक्ता और न ऐसे चरित्र कर सक्ता है कि जैसे चंद ने वर्णन किये हैं। देखो अद्भुत वही पदार्थ है कि जो स्वयम् तौ अद्भुत हो और दूसरों को अद्भुत ही प्रतीत हो परंतु जो आप किंचित सूक्ष्म विचार करेंगे तो आप को ज्ञात होगा कि चंद ने जो कुछ कहा है वह सत्य है अर्थात् जो आप को अद्भुत मालूम होकर असत्य निश्चय होता है वह वास्तविक सत्य ही है। जब तक मैं जो कुछ अंत में आप को कहना चाहता हूं वह नहीं कहूंगा तब तक मेरा वहां तक का कहना भी आप को अद्भुत ही प्रतीत होगा और वह वास्तव में है भी ऐसा ही क्योंकि जब तक कोई ताला कि जिस का खुलना विचार करने से भी कठिन दीखता हो और वह ऐसी सरलता से खुल न जाय कि जैसे कि “एक तिनके की ओट पहाड़" तौ वह निःसंदेह अद्भुत ही प्रतीत होगा । खैर, अब आप चंद की इस कठिनता के ताले को इस कुंजी से खोलकर अद्भुत वस्तु को देखिये, कि जो कुछ वृत्त चंद ने बीसलदेवजी की दानव कथा में लिखे हैं, वह सब उनके जीवन समय में वरते थे अर्थात् वे वाजीकरण की औषधियों के खाने, कुकर्मों के करने और सांप के काटने से बहुत ही पागल हो गये थे और उन्होंने इस पागलपने में अपने इकलौते पुत्र सारंगदेवजी तक को अपने हाथ से मारडाले थे और राज्य को नष्ट भ्रष्ट कर दिया था। इस वृत्तान्त को चंद ने अपनी काव्य शास्त्र संबन्धी विद्वत्ता दिखाने के लिये अद्भुत रस में लिखा है। अब आप इस प्रसंग को ध्यान देकर पढके समझ लेंगे कि महाकवि चंद ने ठीक अद्भुत रस दिखा दिया है। यह आप के ध्यान में होगा कि ग्रंथकर्ता ने पृष्ठ २३ छंद ८३ रूपक ३६ में कि जो चंद की अनेक कठिनताओं के खोलने की कुंजियों के गुच्छों में से एक बड़ा भारी गुच्छा है उस में कवि ने इस महाकाव्य को “नवं रसं" से नव रसों में लिखा कहा है कि अब यह हमारा काम है कि इस हिन्दी भाषा की महाभारत में से नवों रसों के प्रसंग खोज कर काटें। भला जो हम इस अथवा

१०४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ आना की मा का उसे कहना कि मनुष्यों को ढूंढ २ कर खाने से ढूंढा नाम पड़ा और उसने रम्य अजमेर को वेराम कर दिया ॥ दूहा ॥ ढूंढि ढूंढि खाये नरनि । तातैं ढूंढा नाम ॥ देवपुरी अजमेर पुर । रम्य करी वेराम * ॥ छं० ॥ ५१७ ॥ रू० ॥ २६१ ॥ ॥ आना का माता से कहना कि अभी जाकर मैं उसे मार आऊं ॥ दूहा ॥ मात सुनौ तपसनि वचन । अरु दिय असिस पवारि ॥ अबहि जाय अजमेर गढ । अरि कौं आऊं मारि ॥ छं० ॥ ५१८ ॥ रू० ॥ २६२ ॥ ॥ गवरी का आना को असंतन मंत कहकर शिक्षा करना ॥ दूहा ॥ गवरि असंतन संत कहि । रषसि तोहि कुमार ॥ अरि रष्यस भर नग्ग सें। प्रजा राज संघार ॥ छं० ॥ ५१६ ॥ रू० ॥ २६३ ॥ कवित्त ॥ गवरि मात सिष्षवै । पुत्त आनल्ल इहि सिष्षिय ॥ मानव सैं मानवह । भिरंत दानव न पिष्यिय ॥ बहुत काल बहि गए । भरे जंगल धर पूरन ॥ म्रिग मयंद खंडियहि । ढूंढि पंषिय पति सूरन ॥ जं जीव वनजि मातुल घरह । अंजन घट मंगन करहि ॥ उर धरनि और रष्यस कहत । आनिन रष्यस उर अरहि ॥ छं० ॥ ५२० ॥ रू० ॥ २६४ ॥ ऐसी अन्य कथाओं को जो आगे आवेंगी अद्भुत रस में लिखी हुई न मानें तो फिर आप विचार करें कि अद्भुत रस क्या होता है और उसका लेख कैसा होता है। मेरी सम्मति में तो चंद ने जहां जहां जो २ रस लिखा है वह ऐसा ही उत्तम लिखा है कि यदि हम उसको न भी मानें तथापि हमको लाचार होकर उसे वही संज्ञा देनी पड़ती है जैसे कि यहां हम अद्भुत रस में लिखी हुई यह दानव कथा न भी मानें तथापि हम को यही कहना पड़ेगा कि यह अद्भुत बात है कि मनुष्य मरकर दानव नहीं होता न ऐसे चरित्र कर सक्ता है ॥

  • विराम से वेराम बना मालूम होता है ॥ २६१-६३ पाठान्तरः-ढूंढ । पाए । तातें । नांम । वे राम ॥ २६१ ॥ दीय । असीस । अबै । जाई । कूं । कों। आंऊं ॥ २६२ ॥ मत । करि । रखसि । अहिर रकंस भर नगमं ॥ २६३ ॥ २६४ पाठान्तरः-सिषवै । पुत्र । सिषिय । सों । मानव । दानव । अह । पिषिय । मग । पंषि । पंषी जीवनहु तंज़ि मातुल घरह । रखसं । गहंत । आनन । रष्यस । करहि ॥

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १०५ दूहा ॥ उचरि मात समंत दूच । जीवन मरन न सिद्ध ॥ दुहुं विधि घर वासन करौ । आराधन कि विरुद्ध ॥ छं० ॥ ५२१ ॥ रू० ॥ २६५ ॥ पुत्त असमंत जु सिप्पयौ । सिष्यौ उरव्ह दहंत ॥ ढूंढौ नर ढुंढै भषन । तू सेवनह कहंत ॥ छं० ॥ ५२२ ॥ रू० ॥ २६६ ॥ ॥ आना का माता से कहना कि या तो मैं सिर समपूंगा वा छत्र धारूंगा ॥ दूहा ॥ तब आनल्ल अैसी कत्थिय । मुचि सुभिक्षय यह वत्त ॥ कै सिर उनहि समप्पि हौँ । कै सिर धरि हौं छत्त ॥* छं० ॥ ५२३ ॥ रू० ॥ २६७ ॥ ॥ आना का माता से कहना कि सेवा ऐसी है कि जिस से सब कार्य सिद्धी होती है ॥ कवित्त ॥ सेव देव रंजियै । सेव रष्षस वसि सव्वह ॥ सेव सिंघ पत्तियै । सेव विष जरै न जल्लह ॥ सेव वैर भंजियै । सेव रच पति पावन ॥ सेव दह्रै नह दहन । सेव बहु द्रव्य उपावन ॥ जिहिं सेव देव रष्षस धरहि ! जियन मात तन जाइ नन ॥ आमूढ ढुंढ धावत भषन । नहि सु देव नहि दानवन ॥ छं० ॥ ५२४ ॥ रू० ॥ २६८ ॥ २६५-६६ उचरि । सु मंत्र । सिद्धि । दुहुँ । बर । करो । करौं ॥ २६५ ॥ पुत । सिपियौ । सिप्यौ । भवन ॥ २६६ ॥

  • यह रूपक सं० १६४७ और १७१० की पुस्तकों में नहीं है और जब तक वह किसी और प्राचीन लिखित पुस्तक में न मिले तब तक हम उसे प्रसन्नतापूर्वक क्षेपक संज्ञा नहीं प्रदान कर सक्ते ॥ २६७ पाठान्तर :-सुभिय । वत । कैं । उतहि । हो । हो ॥ २६८ पाठान्तर :-रंजीयै । न सेव सिंघं पत्तियै । जलह । भंजीयै । रचै । सेवव्ह नह दहन । द्विव्य । जिन्हि । नह । सो नह ॥