भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

पृष्ठ 508, कुल 735 में से

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त्रयोदशः सर्गः ४४९

क्वचित्प्रभा चान्द्रमसी तमोभिश्छायाविलीनैः शबलीकृतेव ।
अन्यत्र शुभ्रा शरदभ्रलेखा रन्ध्रेष्विवालक्ष्यनभःप्रदेशा ॥ ५६ ॥
क्वचिच्च कृष्णोरगभूषणेव भस्माङ्गरागा तनुरीश्वरस्य ।
पश्यानवद्याङ्गि ! विभाति गङ्गा भिन्नप्रवाहा यमुनातरङ्गैः ॥ ५७ ॥

अन्वयः—क्वचित्प्रभालेपिभिः इन्द्रनीलैः अनुविद्धा मुक्तामयी यष्टिः इव इन्दीवरैः उत्खचितान्तरा सितपङ्कजानां माला इव यमुनातरङ्गैः भिन्नप्रवाहा गंगा विभाति । क्वचित् कादम्बसंसर्गवती प्रियमानसानां खगानां पंक्तिः इव अन्यत्र कालागुरुदत्तपत्रा भुवः चन्दनकल्पिता भक्तिः इव ( विभाति ) । क्वचित् छायाविलीनैः तमोभिः शबलीकृता चान्द्रमसी प्रभा इव अन्यत्र रन्ध्रेषु आलक्ष्य-नभःप्रदेशा शुभ्रा शरदभ्रलेखा इव ( विभाति ) । हे अनवद्याङ्गि ! पश्य क्वचिच्च कृष्णोरगभूषणभस्माङ्गरागा ईश्वरस्य तनुः इव यमुनातरङ्गैः भिन्न-प्रवाहा गंगा विभाति ।

क्वचिदिति— हे अनवद्याङ्गि ! यमुनातरङ्गैर्भिन्नप्रवाहा व्यामिश्रौघा गङ्गा जाह्नवी विभाति त्वं पश्य । केव क्वचित्प्रदेशे प्रभया लिम्पन्ति सन्निहितमिति प्रभालेपिभिरिन्द्रनीलैरनुविद्धा सह गुम्फिता मुक्तामयी यष्टिरिव हारावलिरिव विभाति । अन्यत्र प्रदेशे इन्दीवरैर्नीलोत्पलैरुत्खचितान्तरा सह ग्रथिता सितपङ्कजानां पुण्डरीकाणां मालेव । विभातीति सर्वत्र संबन्धः । क्वचित्कादम्बसंसर्गवती नीलहंससंसृष्टा प्रियं मानसं नाम सरो येषां तेषां खगानां राजहंसानां पंक्तिरिव । 'राजहंसास्तु त चञ्चुचरणैर्लोहितैः सिताः' इत्यमरः । अन्यत्र कालागुरुणा दत्तपत्रा रचितमकरिकापत्रा भूवश्चन्दनकल्पिता भक्तिरिव क्वचिच्छायासु विलीनैः स्थितैस्तमोभिः शबलीकृता कर्बुरीकृता चान्द्रमसी प्रभा चन्द्रिकेव । अन्यत्र रन्ध्रेष्वालक्ष्यनभःप्रदेशा शुभ्रा शरदभ्रलेखा शरन्मेघपंक्तिरिव क्वचित्कृष्णोरगभूषणा भस्माङ्गरागेश्वरस्य तनुरिव विभाति । शेषो व्याख्यातः । कलापकम् ।

भाषार्थ—हे सुन्दर सीते ! देखो यमुनाजी की काली लहरों से मिली श्वेत लहरों वाली गंगाजी कैसी-कैसी सुन्दर लग रही हैं। कहीं तो ये चमकीली इन्द्रनील मणियों से गूंथी हुई माला जैसी लगती हैं और कहीं-कहीं नीले और श्वेत कमलों से मिश्रित माला के समान शोभित हो रही हैं कहीं श्यामवर्ण के हंसों की श्रेणी से मिले हुए श्वेत हंसों की श्रेणी के समान शोभा दे रही हैं। कहीं श्वेत चन्दन से लिप्त पृथ्वी पर बीच-बीच में काले अगर से बनाई गई रचना के समान सुशोभित हो रही हैं। कहीं-कहीं ये वृक्ष के नीचे की उस चांदनी के समान लगती हैं, जिसके बीच-बीच में पत्तों की छाया पड़ी हो और कहीं पर शरद

२९ र० सम्पू०

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