भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग ३८३ प्रजानां पालनव्याजान्निशङ्कक्षयकारिणः । अकस्मादन्तकाः केचित्संभवन्ति तथाविधाः ॥ २६६ ॥ २६६. प्रजापालन के ब्याज से प्रजा का निशंक क्षय करने वालों के इस प्रकार के अन्तक¹ अकस्मात् उत्पन्न हो जाते हैं । अद्यापि तत्पुरं दग्धं श्वभ्रीभूतं च तत्सरः । उपचक्रधरं दृष्ट्वा कथेयं स्मर्यते जनैः ॥ २७० ॥ २७०. भस्म हुए उस नगर तथा चक्रधर के समीप छिछले सरोवर¹ को देखकर, इस घटना का आज भी लोग स्मरण करते हैं । राज्ञां रागः कियान्नाम दोषः स्वल्पदृशां मते । तत्तस्य तेन संवृत्तं यन्नाऽभूतक्वापि कस्यचित् ॥ २७१ ॥ २७१. संकुचित दृष्टि वालो के मतानुसार—'राजा का अनुराग कौन बड़ा दोष है ?' तथापि उस नाग ने इस राजा को ऐसा कर दिया, जैसा कही भी किसी के साथ नही हुआ था । सतीदैवतविप्राणामप्येकस्य प्रकोपतः । श्रुतो हि प्रतिवृत्तान्तं त्रैलोक्यस्यापि विप्लवः ॥ २७२ ॥ २७२. सती स्त्री, देवता तथा विप्रों मे किसी एक के भी प्रकोप से त्रैलोक्य के भी विप्लव का वृतान्त सुना गया है । चत्वारिंशतमब्दान्स मासैश्चोनां त्रिभि समाम् । भुवं भुक्त्वा क्षितिपुपा दुर् नयेन क्षयं ययौ ॥ २७३ ॥ २७३. चालीस वर्ष में तीन मास कम भूमि का भोगकर अपने दुर्नीति के कारण राजा न ष्ट हो गया । अप्यल्पकालसंवृष्टप्राकाराट्टालमण्डलम् । तंत्किन्नरपुरं लेभे गन्धर्वनगरोपमाम् ॥ २७४ ॥ २७४. प्राकार एवं अट्टालिकाओं से पूर्ण उस नगर का अस्तित्व अल्प काल तक ही रहा । तत्पश्चात् गन्धर्व नगर सदृश हो गया । २६९ (१) अन्तक : इस शब्द का अर्थ मृत्यु, पाठभेद : काल, यमराज, तथा नाश करने वाला होता है । प्रजा श्लोक संख्या २७० मे 'श्वभ्री' का पाठभेद के निशंक क्षय करने वालो के दलन, किंवा संहारार्थ 'शुभ्री' मिलता है । अन्त निमित्त कोई न कोई कार्य, घटना किंवा व्यक्ति २७० (१) सरोवर : श्री स्टीन ने इसी छिछले उत्पन्न हो जाते हैं जो संहारक के नाश के कारण सरोवर का उल्लेख चक्रधर के अन्तरीप के सम्बन्ध बनते हैं । कल्हण ने अन्तक शब्द का इसी अर्थ में में अपनी टिप्पणी रा० त० १:२०१-२०२ में किया यहाँ प्रयोग किया है । है । यह सरोवर सुश्रवा नाग का कहा जाता है