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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 984 में से

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पृष्ठ 387

१८४ राजतरंगिणी एकस्तु तनयस्तस्य वैचित्र्यात्कर्मणां गतेः । स्वधात्र्या विजयक्षेत्रं नीतः प्राणैर्न तत्यजे ॥ २७५ ॥ २७५. भाग्य वैचित्र्य के कारण उसका एक तनय अपनी धात्री के साथ विजयक्षेत्र¹ गया था। अतएव जीवित रह गया। राजा सिद्धाभिधः सोऽथ तथा निश्शेषितं जनम् । नवीचकार जलदो दावदग्धमिवाचलम् ॥ २७६ ॥ सिद्ध :- २७६. सिद्ध नामक उस राजा ने शेष जनों में उसी प्रकार नवजीवन का संचार किया, जिस प्रकार जलद दावानल से दग्ध पर्वत का पुनः नवीकरण कर देता है। पाठभेद : श्लोक संख्या २७१ में 'राज्ञा' का 'राज्ञो', 'कियन्नाम' का 'कियन्माम', 'मते' का 'मतेः', 'यन्त्रा' का 'मत्रा' तथा 'स्ववापि' का 'क्वापि' पाठभेद मिलता है । श्लोक संख्या २७३ में 'दुर्नयेन' का पाठभेद 'इर्णयेन' मिलता है। श्लोक संख्या २७४ में 'अप्यल्प' का पाठभेद 'अत्यल्प' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २७४ (१) गन्धर्वनगर : गन्धर्व नगर काल्प- निक नगर तुल्य माना जाता है। किन्नरपुर का अर्थ किन्नरों का नगर होता है । किन्नर का शाब्दिक अर्थ 'किं कुत्सितो नरः' होता है। देवताओं के गायक माने गये हैं। इनका मुख अश्व तथा शरीर मनुष्य तुल्य होता है। गन्धर्व भी देवताओं के गायक माने गये हैं। मृत्यु के पश्चात् एवं जन्म के पूर्व की यह एक स्थिति मानी गयी है। गन्धर्वनगर दृष्टि दोष के कारण मृगमरीचिका के समान अथवा आकाश में दिखाई देने वाला मिथ्या किंवा आभास रूप नगर है। कश्यप तथा अरिष्टा की सन्तति को गन्धर्व कहते हैं। हाहा, हूहू, तुम्बुरु, किन्नरादि इसके भेद माने गये हैं। गन्धर्वों का देश हिमालय का मध्य भाग माना गया है। गन्धर्व तथा किन्नर देश पुराणों द्वारा निर्दिष्ट किये गये हैं। गन्धर्वों की स्त्रियाँ अप्सरा कही जाती हैं। कश्यप तथा की सन्ततिं अप्सराएँ हैं। चित्ररथ, विश्वावसु, चित्रसेन, आदि गन्धर्व राजाओं का निर्देश सर्वत्र मिलता है। चित्ररथ तथा पाण्डवों का संघर्ष प्रसिद्ध है। गन्धर्व अपनी सुन्दरता, वीरता तथा बल के लिये प्रसिद्ध हैं। पाठभेद : श्लोक संख्या २७५ में 'वैचित्र्यात्' का 'वैचि- त्रात्' तथा 'स्वधात्र्या' का पाठभेद 'स्वधात्रा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २७५ (१) विजय क्षेत्रः विजय क्षेत्र किंवा विजयेश्वर क्षेत्र में विजयेश्वर तथा ब्रिजवोर का नगर सम्मिलित था। टिप्पणी तरंग १ : ३८, १०५ १०६, ११७, १३१, ३१४ तथा तरंग २ : १२३ १२५ तरंग ५ : ४६; तरंग ६ : ९८, तरंग ७: १८३, १८४, ३५४, ४६३, तरंग ८ : २२२२ २३७१, हरचरित चिन्तामणि, राजानक जयद्रथ १० : १९१ रा० त० ७ : ३३६, ४३१, ५२४ भी द्रष्टव्य हैं। किन्नरपुर नगर की भौगोलिक स्थिति यह श्लोक और स्पष्ट करता है। विजय क्षेत्र, विजयेश, चक्रधर, किन्नरपुर सभी एक ही भौगोलिक सी

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