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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

१८४ राजतरंगिणी एकस्तु तनयस्तस्य वैचित्र्यात्कर्मणां गतेः । स्वधात्र्या विजयक्षेत्रं नीतः प्राणैर्न तत्यजे ॥ २७५ ॥ २७५. भाग्य वैचित्र्य के कारण उसका एक तनय अपनी धात्री के साथ विजयक्षेत्र¹ गया था। अतएव जीवित रह गया। राजा सिद्धाभिधः सोऽथ तथा निश्शेषितं जनम् । नवीचकार जलदो दावदग्धमिवाचलम् ॥ २७६ ॥ सिद्ध :- २७६. सिद्ध नामक उस राजा ने शेष जनों में उसी प्रकार नवजीवन का संचार किया, जिस प्रकार जलद दावानल से दग्ध पर्वत का पुनः नवीकरण कर देता है। पाठभेद : श्लोक संख्या २७१ में 'राज्ञा' का 'राज्ञो', 'कियन्नाम' का 'कियन्माम', 'मते' का 'मतेः', 'यन्त्रा' का 'मत्रा' तथा 'स्ववापि' का 'क्वापि' पाठभेद मिलता है । श्लोक संख्या २७३ में 'दुर्नयेन' का पाठभेद 'इर्णयेन' मिलता है। श्लोक संख्या २७४ में 'अप्यल्प' का पाठभेद 'अत्यल्प' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २७४ (१) गन्धर्वनगर : गन्धर्व नगर काल्प- निक नगर तुल्य माना जाता है। किन्नरपुर का अर्थ किन्नरों का नगर होता है । किन्नर का शाब्दिक अर्थ 'किं कुत्सितो नरः' होता है। देवताओं के गायक माने गये हैं। इनका मुख अश्व तथा शरीर मनुष्य तुल्य होता है। गन्धर्व भी देवताओं के गायक माने गये हैं। मृत्यु के पश्चात् एवं जन्म के पूर्व की यह एक स्थिति मानी गयी है। गन्धर्वनगर दृष्टि दोष के कारण मृगमरीचिका के समान अथवा आकाश में दिखाई देने वाला मिथ्या किंवा आभास रूप नगर है। कश्यप तथा अरिष्टा की सन्तति को गन्धर्व कहते हैं। हाहा, हूहू, तुम्बुरु, किन्नरादि इसके भेद माने गये हैं। गन्धर्वों का देश हिमालय का मध्य भाग माना गया है। गन्धर्व तथा किन्नर देश पुराणों द्वारा निर्दिष्ट किये गये हैं। गन्धर्वों की स्त्रियाँ अप्सरा कही जाती हैं। कश्यप तथा की सन्ततिं अप्सराएँ हैं। चित्ररथ, विश्वावसु, चित्रसेन, आदि गन्धर्व राजाओं का निर्देश सर्वत्र मिलता है। चित्ररथ तथा पाण्डवों का संघर्ष प्रसिद्ध है। गन्धर्व अपनी सुन्दरता, वीरता तथा बल के लिये प्रसिद्ध हैं। पाठभेद : श्लोक संख्या २७५ में 'वैचित्र्यात्' का 'वैचि- त्रात्' तथा 'स्वधात्र्या' का पाठभेद 'स्वधात्रा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २७५ (१) विजय क्षेत्रः विजय क्षेत्र किंवा विजयेश्वर क्षेत्र में विजयेश्वर तथा ब्रिजवोर का नगर सम्मिलित था। टिप्पणी तरंग १ : ३८, १०५ १०६, ११७, १३१, ३१४ तथा तरंग २ : १२३ १२५ तरंग ५ : ४६; तरंग ६ : ९८, तरंग ७: १८३, १८४, ३५४, ४६३, तरंग ८ : २२२२ २३७१, हरचरित चिन्तामणि, राजानक जयद्रथ १० : १९१ रा० त० ७ : ३३६, ४३१, ५२४ भी द्रष्टव्य हैं। किन्नरपुर नगर की भौगोलिक स्थिति यह श्लोक और स्पष्ट करता है। विजय क्षेत्र, विजयेश, चक्रधर, किन्नरपुर सभी एक ही भौगोलिक सी

प्रथमं तरङ्गं ३८५ इतिवृत्तं महाश्चर्यं तस्य पित्र्यं महामतेः । संसारासारताज्ञाने प्राप पुण्योपदेशताम् ॥ २७७ ॥ २७७. उस महामति के लिये पिता का महाश्चर्य पूर्ण इतिवृत्त संसार के असारत्व के ज्ञान में पुण्योपदेश सिद्ध हुआ । भोगयोगेन मालिन्यं नेतुं मध्यगतोऽपि सः । न शक्यते स्म पङ्केन प्रतिमेन्दुरिवामलः ॥ २७८ ॥ २७८. पंक में निर्मल इन्दु प्रतिबिम्ब १ सदृश वह राजा भोग योग के मध्यगत होता भी उससे मलिन नहीं हो सका था। दर्पज्वरोष्णभूपालमध्ये निध्यायतोऽनिशम् । सुधासूतिकलामौलिं तस्यैवोल्लाघतोद्ययौ ॥ २७९ ॥ २७९. दर्प ज्वर से सन्तप्त भूपाल के मध्य में सुधा सूति कला मौलि (शिव) का रात्रि-दिन ध्यान करते हुए केवल वही पूर्ण स्वस्थ रहा। गणितं गुणिना तेन मणींस्तृणमिवोज्झता । खण्डेन्दुमण्डनार्चायां मण्डनत्वमखण्डितम् ॥ २८० ॥ २८०. मणियों को तृण तुल्य त्यागते हुए, इस राजा ने खण्डेन्दु मण्डन (शिव) की अर्चा को अखण्डित मण्डन माना । वितस्ता तट पर एक साथ ही थे। नर का पुत्र सिद्ध छोटा था इसलिए अपनी उपमाता किंवा धात्रीमाता के साथ विजय क्षेत्र गया था। यह स्थान किन्नरपुर के समीप था इसीलिए अपनी धात्रीमाता के साथ सिद्ध गया था। उसको इस अनुपस्थिति में ही किन्नरपुर में अग्निदाह हुआ था । २७६ (१) सिद्ध : आइने अकबरी में नाम 'सिदेह' तथा राज्यकाल ६० वर्ष दिया गया है। सिद्ध का राज्याभिषेक काल २१२४ लौकिक वर्ष होगा। हसन लिखता है—'राजा सिद्ध राजा नर का बेटा था। क० २०९१ में बाप के हादशा के वक्त शहर वैश्वारह से अपनी रज़ाई मा के साथ गया था। उसके वफात के बाद तख्त नशीन हुआ। अदल व इन्साफ, बहादुरी और सुजाअत में वे नज़ीर था। हमेशा रैय्यत के आराम और आशा- यर्श और मखलूक खुदा की फलाह व वहबूद में ब दिल व जान कोशां रहता। साठ बरस हकूमत करके मुल्क अदम में जा बसा।' (पृष्ठ ४६) पाठभेद : श्लोक संख्या २७७ में 'पित्र्यं' का 'चित्रं' तथा 'ताज्ञाने' का पाठभेद 'ताज्ञेन', 'ताज्ञनं' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २७८ (१) चन्द्र प्रतिबिम्ब : पंकमय सरोवर में चन्द्र प्रतिमा अथवा चन्द्रबिम्ब की पड़ती छाया पंक के कारण दूषित नही होतो और न उसका चन्द्र बिम्ब पर कोई प्रभाव पड़ता है। कल्हण ने उपमा दी है। पंकिल जल में अथवा पंक में शशि बिम्ब पडता है। किन्तु उस पंक तथा पंकिल जल के कारण उसके बिम्ब में मलिनता नहीं आती। दूषित पंक अथवा पंकिल जल शशि बिम्ब के संसर्ग में आने पर भी मलिन करने से असमर्थ रहता है। इसी प्रकार भोग के मध्य रहते हुए भी भोग का दोष राजा को स्पर्श नहीं कर पाया था। वह भोग मे रहता भी निर्लिप्त था । निर्मल था !

२८६ राजतरङ्गिणी राज्ञस्तस्यैव राजश्रीः परलोकानुगाऽभवत् । यस्तामयोजयद् भूमौ धर्मेणाऽव्यभिचारिणा ॥ २८१ ॥ २८१. केवल उसी राजा की राज्यश्री उसकी परलोकानुगामिनी हुई। क्यों कि उसने इस भूमि पर अव्यभिचारी धर्म से उस राज्यश्री को संयुक्त कर दिया था। षष्टिमब्दान्प्रशास्योर्वीमासन्नानुचरान्वितः । आरुरोह सदेहोऽसौ लोकाञ्छशिशिखामणेः ॥ २८२ ॥ २८२. इस राजा ने साठ वर्ष तक पृथ्वी का प्रशासन कर निकटवर्ती अनुचरों सहित सदेह शशिशिखामणि के लोक पर आरोहण किया। भृत्या नृपं समाश्रित्य प्रययुः शोचनीयताम् । तत्सुतं तु समालंब्य प्रभुं भुवनवन्द्यताम् ॥ २८३ ॥ २८३. राजा नर का आश्रय लेकर भृत्यों की शोचनीय दशा हुई थी किन्तु उसके पुत्र प्रभु का समालम्बन लेकर उनकी भुवन में वन्दना हुई। यात्याश्रितः किल समाश्रयणीयलक्ष्म्‍यां निन्द्यां गतिं जगति सर्वजनार्चितां वा । गच्छत्यधस्तृणगुणः श्रितकूपयन्त्रः पुष्पाश्रयो सुरशिरोभुवि रूढिमेति ॥ २८४ ॥ २८४. जगत् में आश्रित, आश्रयदाता से प्राप्त निन्दनीय अथवा सर्वजन श्लाघ्य गति को प्राप्त करता है। क्योकि कूप यंत्र का आश्रय वाली तृण की रस्सी नीचे जाती है। और पुष्प का आश्रय लेकर तृण सुर के शिर पर चढ़ता है। पाठभेद : पाठभेद : श्लोक संख्या २७१ में 'रोध्ना' का 'रोहम' श्लोक संख्या २८१ में 'यद् भूमौ' का पाठभेद 'रोयम', 'अनिशम्' का 'भृशम्' तथा 'श्लाघतो- 'यद्भूतो' 'यद्भूतो' 'यद्दुतो' 'यद्भूतो' तथा 'धर्मेणास्य' थयो' का पाठभेद 'श्लाघतोर्मयो' मिलता है। का 'धर्मेणस्य' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २८० (१) मण्डन-विरोधाभास : यहाँ २८२ (१) सिद्ध का राज्यकाल : राजा के लम्बे विरोधाभास अलंकार का प्रयोग कल्हण ने किया राज्यकाल का कारण यह है कि वह शैशवावस्था में है। शंकर के लिए खण्डेन्दुमण्डन शब्द का प्रयोग राजा बन गया था। धात्री माँ के साथ विजयेश्वर में किया है। परन्तु शिव की अर्चना किंवा अर्चा को जाने के उल्लेख से स्पष्ट हो जाता है कि वह उस अखण्डित मण्डन अर्थात् पूर्ण आभूषण माना है। समय शिशु था। शैशवावस्था में उसका अभिभावक खण्डित मण्डन की अर्चा द्वारा खण्डित मण्डनत्व कौन था ? तथा राज्य संचालन किस प्रकार होता की प्राप्ति संगत हो सकती है। परन्तु यहाँ खण्डिते- रहा ? कल्हण ने इस पर प्रकाश नही डाला है। न्दुमण्डन की अर्चा से अखण्डित मण्डन की प्राप्ति सम्भव है। राज्य के मन्त्रियों ने कोई परिषद बना- विरोधाभास का मूल है। कर शासन-सूत्र के संचालन का प्रबन्ध किया हो,

प्रथम तरंग •२८७ पाठभेद : श्लोक संख्या २८३ में 'वन्द्यताम्' का पाठभेद 'वन्ध्यताम्' मिलता है । श्लोक संख्या २८४ में 'चिता' का पाठभेद 'चितं' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २८४ (१) यन्त्र : कूप शब्द का प्रयोग कल्हण ने किया है। यह सम्भवतः अरघट्ट अर्थात् रहट के लिए प्रयोग किया गया है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में इसका प्रायः वर्णन मिलता है। परसियन व्हील इसका नवीन नाम है। ईरान में इसके प्रचलन के बहुत पूर्व से वह भारत में प्रचलित था। यह भारतीय अन्वेषण था न कि परसियन । अपना इतिहास भूल जाने के कारण लोगो ने इसे परसियन व्हील का नाम दे दिया है । कल्हण ने ऐतिहासिक दृष्टि से यन्त्र का यहाँ प्रयोग कर भारत का गौरव बढ़ाया है। रहट अर्थात् परसियन व्हील द्वारा कूप से जल; निकाला जाता है। जगत् यही जानता है कि यह परसियन अर्थात् ईरान' वालों का आविष्कार है। परन्तु कल्हण के वर्णन से प्रकट होता है कि कश्मीर में रहट सुदूर प्राचीन काल से प्रचलित था । भारतवर्ष में मेवाड़ ऐसा स्थान है जहाँ विदेशी प्रभाव कम पड़ सका है। वहाँ की जनता शताब्दियों तक स्वाधीनता के लिए युद्ध करती रही । अपनी स्वतन्त्रता सुरक्षित रखने में सफल रही । मै जब हिन्दुस्तानिक लिमिटेड का अध्यक्ष हुआ तो प्राप्य साधनो के कारण मेवाड का कोना-कोना छान डाला । आश्चर्य हुआ । भारतीय संस्कृति सभ्यता वहाँ अपने कुछ मौलिक रूप में दिखाई दी । मन्दिरो की श्रृंखलाएं अछूती खडी हैं। वे खण्डित एवं भंग नहीं किये गये थे । कश्मीर में जिस प्रकार ग्राम-ग्राम में प्राचीन काल में देव स्थान थे उसी प्रकार यहाँ प्रत्येक ग्राम तथा स्थान पर मन्दिर, स्मारक, सती का चौरा आदि बने दिखाई देंगे । पुराने रीति-रिवाज भी कायम मिलेंगे। अपनी भाषा वे बोलते हैं । उस पर फारसी तथा अंग्रेजी का कम प्रभाव पड़ा है। इस समय परिवर्तन तेजी के साथ हो रहा है । मैंने यहाँ पर रहट चलते हुए बहुत देखे । वे अत्यन्त प्राचीन शैली के हैं। शताब्दियों पूर्व से चलते आ रहे हैं। वे लकड़ी के बनाये जाते हैं। परसियन व्हील का नाम बहुत सुना था। यह भी सुना था कि रहट परसियन आविष्कार है। ईरान से भारत में आया था। यह धारणा तथा मान्यता गलत है। 'रहट' भारतीय आविष्कार है। भारत में आज से सहस्रों वर्ष पूर्व चलता था। आज भी चल रहा है। उनका मूल रूप आज भी मेवाड़ में दिखाई पड़ता है। राजस्थान में रहट बहुलता के साथ मिलेगा। मेवाड़ में ५२ विशाल झीलें हैं। वापियाँ हैं। कूप हैं। जलस्रोत हैं। स्रोतस्विनियाँ हैं। सरोवर हैं। पानी की कमी नहीं है। एतदर्थ रहट अत्यन्त उपयोगी पानी उठाने तथा सींचने के लिए कश्मीर के तुल्य उपयोगी यहाँ सिद्ध हुआ, है। कश्मीर में जल का सर्वत्र सुपास है। प्रायः वही बात उदय- पुर के क्षेत्र के विषय में कही जायेगी । कश्मीर में पुराने ढंग के रहट दिखाई नही देंगे। परन्तु मेवाड़ में गांव गांव में अभी तक वे मिलते हैं। यद्यपि बीस पचीस वर्ष में वे भी लोप हो जायेंगे । उनका स्थान पम्पिंग सैट अथवा लौह रहट ले लेगा । नवम्बर सन् १९६७ में मेवाड़ का पर्यटन आरम्भ किया। पुराने मन्दिरों, दुर्गों, भग्नावशेषो के साथ रहटो को देखा। मैने उनका नाम पूछा- लोगों ने उसका नाम 'अरहट' बताया । राज- तरंगिणी के 'अरघट्ट' शब्द की ओर तुरन्त ध्यान गया। इस विषय पर टिप्पणी लिख चुका था। लेकिन उसे पुनः लिखने का निश्चय किया।

[पृष्ठ संख्या: २८८] राजतरंगिणी


[बायाँ स्तम्भ]

रहट शब्द प्राचीन संस्कृत शब्द 'अरघट्ट' का अपभ्रंश है । 'अर' का अर्थ होता है पहिये की अरा । नेमि के मध्य की खड़ी लकड़ी । उसे पहिये का आरा भी कहते हैं । राष्ट्रीय झण्डों पर चक्र के मध्य केन्द्र बिन्दु से परिधि पर लगी लकड़ियां 'अर' अथवा 'आर' कही जाती है । 'घट' का अर्थ है घड़ा । अर + घट मिलकर बनता है 'अरघट' । अथवा जिसका अर्थ होगा 'घड़ा युक्त आर अथवा अर' । उदयपुर का प्राचीन शैली का 'रहट' आधु- निक रहट से भिन्न है । वह प्राचीन परिभाषा से मिलता है । खड़ा 'अरा' घूमता है । वह चक्र अर्थात् चर्खा को घुमाता है । चर्खा अथवा पहिया पर 'घट' रस्सियों से बँधे रहते हैं । यह 'घट' पहिया से आधुनिक 'रहट' के 'वाल्टी' अथवा 'डब्बो' की तरह नीचे जाते और पानी लेकर घूमते पहिया पर आते हैं । 'अरहट' शब्द इसी 'घरघट' शब्द का अपभ्रंश है । 'मृच्छकटिकम्' नाटक में अरघट, अरघट्टा, रहट का नाम 'कूपयन्त्रघटिका' दिया गया है । (१० : ५६) 'कूपयन्त्रघटिका' वही रस्सी में बँधा घटिका यन्त्र था । जल लेकर ऊपर आता तथा नीचे फिर जाता था । कवि शूद्रक ने उसको उपमा उन्नति एवं अवनति तथा दैव से दी है । भाग्य इसे यन्त्र- घटिका के समान मनुष्य को नीचे गिराता तथा ऊपर उठाता है । 'कांश्चित्तुच्छयति प्रपूरयति वा कांश्चिन्नयत्युन्नतिं कांश्चित् पातविधौ करोति च पुनः कांश्चिन्नयात्याकुलाम् ॥ अन्योन्यप्रतिपक्षसंहतिमियां लोकस्थितिं बोधय- न्नेष क्रीडति कूपयन्त्रघटिका न्यायप्रसक्तो विधिः ॥


[दायाँ स्तम्भ]

कालिदास ने 'मालविकाग्निमित्रम्' नाटक के द्वितीय अंक श्लोक १२ में यन्त्र शब्द का प्रयोग कल्हण के समान किया है । उसका भी अर्थ रहट ही है : बिन्दुच्छेद्यान्पिपासुः परिसरति शिखी भ्रान्तिमद्वारियन्त्रं धर्मैः सम्प्रेक्ष्यमिव नृपगुणे- र्दीर्यते मत्तभसिः ॥ (२:१२) अरघट्ट अरघट्टा, अरघट्टक अथवा रहट को मराठी में 'रहाट' सिन्धी में 'अरट्ट' पंजाबी 'रह्ट' राजस्थानी में 'घरहट' तथा हिन्दी में 'रहट' कहते हैं । यह सब मूल अरघट्ट के अपभ्रंश हैं । इसी प्रकार 'अर' को हरियाणा में 'आरा' हिन्दी में 'आरा गज' कहते हैं । यह लकड़ी या पटिया अथवा चक्र और नेमि के बीच की लम्बी लकड़ी है । परसियन व्हील तथा भारतीय रहट में मौलिक अन्तर था । परसियन व्हील का चलाने वाला पैदल बैल अथवा ऊँट को हाँकता, उसके पीछे स्वयं घूमता है । भारतीय रहट दो प्रकार के होते थे । और हैं । एक तो परसियन रहट की तरह । चलने वाला स्वयं पशु के पीछे हाँकता चलता है । दूसरा रहट पर स्वयं आदमी बैठता है । तेली के पुराने कोल्हू के समान बैठने के लिये स्थान बना रहता है । उसी पर आदमी बैठ कर घानी चलाता है । यही प्रकार मेवाड़ के रहट में विशेष प्रचलित है । रहट पर चलाने वाला स्वयं बैठ जाता है । बैठे ही बैल को हाँकता है । परसियन' रहट में यह बात नहीं है । इस दृष्टि से भारतीय रहट 'परसियन रहट' की अपेक्षा अधिक विकसित था और है । 'परसियन रहट' में मृत्तिका पात्र गोले हंडिया शैली के लगते हैं । ये भी रस्सी से बाँधकर माला रूप चेन की तरह बनाये जाते हैं । उदयपुर के

प्रथम तरंग २८९ सिद्धः सिद्धः सदेहोऽयमिति शब्दं सुरा दिवि । प्राघोषयंस्ताडयन्तः पटहं सप्त वासरान् ॥ २८५ ॥ २८५. 'सिद्ध, १ यह सदेह सिद्ध है ।' सुरगण इसका घोष करते हुए सात दिन तक पटह२ बजाते रहे । रहट का मृत्तिका घट अण्डाकार होता है । प्रत्येक ग्रामों में कुम्हार यह घट अथवा घड़ा बनाते हैं । वह ज्यादा पानी उठाता है । वैज्ञानिक दृष्टि से परसियन-पुराने रहट से यह अधिक विकसित कहा जायगा । कल्हण का वर्णन आठ शताब्दी पूर्व का है । उस समय भारत में और कश्मीर में रहट चलता था । कल्हण ने पुनः 'अरघट्ट' का वर्णन रा० त० ६ : ४८ में किया है । मैंने उदयपुर तथा समीपस्थ स्थानों के वृद्धों से पूछा । उनका 'अरहट' कब से चलता है । वे बोले—"बाप दादों ने अपने बाप-दादों से सुना था । यह बहुत दिन से चलता रहा है । हम भी चला रहे हैं ।" मेवाड़ को छोड़कर शेष भारत में यह नवीन सिंचाई की प्रथा है । उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इसका प्रचलन गत तीस या चालीस वर्षों से हुआ है । पंजाब में निस्सन्देह यह बहुत पूर्व आ गया था । परसियन भाषा, लिपि तथा सभ्यता का उत्तरी भारत में मुगल समय में अधिक प्रचार हुआ था । यदि यह पुराना भी रहा होगा तो इसका नाम परसियन दे दिया गया । अंग्रेजी सभ्यता के समय परसियन तथा अंग्रेजी नाम मिल कर उसका नामकरण 'परसियन व्हील' हो गया । निस्सन्देह 'अरघट' अर्थात् रहट भारतीय आवि- ष्कार था । कश्मीर में हजारों वर्ष पूर्व प्रचलित था । मेवाड़ में आज भी अपने मूल रूप में प्रचलित है । वह परसियन व्हील से अधिक विकसित तथा चलाने में सरल, सुगमता से ग्रामीण साधनों-द्वारा प्राप्य है । रहट को विदेशी आविष्कार कहना तथ्यों एवं प्रमाणों के विपरीत बात होगी । ३७ पाठभेद : श्लोक संख्या २८५ में 'प्राघोष' का 'प्रोद्घोष', 'ताडयन्तः' का 'तानुयन्तः' 'न्तो ह्यनन्' पाठभेद मिलता है । २८५ (१) सिद्ध : दश देव योनि में एक योनि सिद्धों की है । मनुष्यों में जिसका साधन पूरा हो जाता है उसे सिद्ध कहते हैं । जिन संतों तथा योगियों को सिद्धि प्राप्त हो जाती है उन्हें सिद्ध कहते हैं । राजा का नाम सिद्ध था । कल्हण उसके नाम के अनुसार सिद्ध प्रमाणित कर उसे सदेह स्वर्ग भेजता है । सदेह स्वर्ग जाना अत्यन्त कठिन कार्य है । विश्वामित्र तथा त्रिशंकु की कथा सदेह स्वर्ग गमन के लिए प्रसिद्ध है । त्रिशंकु विश्वामित्र की तपस्या के बल से भी सदेह स्वर्ग नहीं जा सका था । आज भी अधर में लटक रहा है । कल्हण ने राजा सिद्ध में भी जलोक के समान अलौकिक गुणों के वर्णन का प्रयास किया है । राजा जलोक आध्यात्मिक तथा राजनीतिक दोनों दृष्टियों से श्रेष्ठ था । परन्तु वह भी सदेह स्वर्ग नहीं जा सका । उसने साधना-द्वारा अपने शरीर का त्याग किया था । राजा सिद्ध को कल्हण सदेह स्वर्ग पहुँचा कर, आध्यात्मिक जगत् में उसे मनुष्य वर्ग से ऊपर उठा कर, सिद्ध अर्थात् देव वर्ग में रख देता है । सदेह स्वर्ग महाभारत के पात्रों में केवल धर्म- राज युधिष्ठिर गये थे । भगवान् राम तथा श्री कृष्ण ने भी शरीर त्याग इसी भूमि पर किया था । राजा सिद्ध युधिष्ठिर तुल्य धर्मात्मा था । अपने पिता नर के चरित्र तथा आचरण से उसका चरित्र

२९० राजतरंगिणी उत्पलाक्ष इति ख्यातिं पेशलाक्षतया गतः । तत्सूनुस्त्रिंशतं सार्धां वर्षाणामन्वशान्महीम् ॥ २८६ ॥ उत्पलाक्षः ⸪ २८६. पेशलाक्ष होने के कारण प्रसिद्ध राजा सिद्ध के पुत्र उत्पलाक्ष¹ ने तीस वर्ष छः माह मही का शासन किया । तस्य सूनुर्हिरण्याक्षः स्वनामाङ्कं पुरं व्यधात् । क्ष्मां सप्तत्रिंशतं वर्षान्सप्तमासांश्च भुक्तवान् ॥ २८७ ॥ हिरण्याक्षः २८७. उसके पुत्र हिरण्याक्ष¹ ने अपने नाम पर नगर² बसाया और सैंतीस वर्ष सात माह पृथ्वी का भोग किया । विपरीत था । पिता जितना क्रूर, विषयी एवं लम्पट था , सिद्ध उतना ही अपने गुणो के कारण सिद्ध होकर, सदेह स्वर्ग प्राप्त किया था । (२) पटह : पटह का अर्थ ढोल, मृदंग, डुग्गी, नगाड़ा, डंका होता है । देवगण मृदंग तथा नगाड़ा बजाते थे । पटह झोप, डधोड्री तथा डुग्गी बजाने वालो का होता है । पटह भ्रमण का अर्थ जनता को एकत्रित करने के लिए घूमकर ढोल बजाने वालो का होता है । पाठभेद : श्लोक संख्या २८६ में 'पेशलाक्षतया' का पाठभेद 'पेशलाक्षितया' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २८६ (१) उत्पलाक्ष : यह एक मत है । पुष्क- राक्ष नामक कोई राजा कश्मीर में नही हुआ है । कल्हण की काल गणना अति त्रुटिपूर्ण इस समय की है । मुद्राराक्षस नाटक का काल भी अभी निश्चित नहीं हो सका है । विभिन्न विद्वानो के मतो में उसके रचना काल में शताब्दियो का अन्तर पड़ जाता है । पुष्कराक्ष को चन्द्रगुप्त कालीन राजा मान लिया जाय तो उसका समय अशोक, जलोक आदि सबके पूर्व पड़ जाता है । अर्थात् वह कल्हण के वर्णनानुसार लुप्त राजाओं की श्रेणी में आ जाता है । श्री एर० जो० पण्डित इस राजा का काल कल्हण की गणना के अनुसार ईसा पूर्व ८९५ वर्ष और श्री स्टीन उत्पलाक्ष का समय लौकिक संवत् २१८४ वर्ष तीन मास देते है । प्राप्य सामग्रियों के आधार पर अभी कुछ निश्चयपूर्वक नही कहा जा सकता । इस पर विशेष अनुसन्धान की आव- श्यकता है । यदि मुद्राराक्षस के ऐतिहासिक घटना को सत्य मान लिया जाय तो ऐतिहासिको के मत से चन्द्रगुप्त मौर्य का राज्य काल ईसा पूर्व होता है । मुद्राराक्षस का जो उद्धरण दिया जाता है। वह निम्नलिखित है : 'काश्मीरः पुष्कराक्षः क्षतरिपु, महिमा सैन्यवः सिन्धुषेणः' अंक ५ में पुनः उल्लेख प्रथम अंक श्लोक ११ के पश्चात् आता है : '—कुलूताधिपश्चित्रवर्मा मलयजनपदाधिपः सिंहनादः, कश्मीरदेशाधिपः पुष्कराक्षः, सिन्धुराजः सिन्धुषेनः, पारसिकाधिपतिर्मेघाक्षः अंक ५ में पुनः उल्लेख आता है : '—ये एतेन राक्षसेन सह सौहार्दमुत्पाद्यास्म- च्छरीरद्रोहेण चन्द्रगुप्तमाराधयितुकामाः राजानः तद्यथा कौलूतः चित्रवर्मा, मलयनरपतिसिंहनाद , काश्मीरपुष्कराक्षः सिन्धुराजमुषेणः— आइने अकबरी मे नाम 'अदुत बोल येह' तथा राज्यकाल ३० वर्ष ६ मास दिया गया है । हसन लिखता है—'राजा उत्पलाक्ष क० ५१५२ में वाप

प्रथम तरंग ३६१ हिरण्यकुल इत्यस्य हिरण्योत्सकृदात्मजः । षष्टिं षष्टिं वसुकुलस्तत्सूनुरभवत्समाः ॥ २८८ ॥ हिरण्यकुल : २८८. उसके पुत्र हिरण्यकुल¹ ने हिरण्योत्स² स्थापित किया और साठ वर्ष राज्य किया । वसुकुल : उसके पुत्र वसुकुल³ ने भी साठ वर्ष राज्य किया ।


के कायम मुकाम होकर हमेशा रिआया की फलाह व बहबूद में कोशां रहता था । कुल तीस बरस हकू- मत में गुजारे । पाठभेद : श्लोक संख्या २८७ में 'सप्त त्रिंशति' का पाठ- भेद 'सप्त त्रिंशतं' तथा 'सप्ता त्रिंशति' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २८७ (१) हिरण्याक्ष : आइने अकबरी में 'हिरण्य' नाम तथा राज्यकाल ३७ वर्ष ७ मास दिया गया है । हसन लिखता है—'राजा हरनपाल ने क० २१८४ में बाप के तख्त का रौनक बख्श कर मुकाम रनल आबाद किया । पैंतीस साल सात माह हकूमत व सल्तनत में गुजारे ।' हिरण्याक्ष एक दैत्य का भी नाम है। हिरण्य- कश्यप का भ्राता था । वह वाराह भगवान् द्वारा मारा गया था । (भागवत पुराण ३ : १७ : १८-- ३१, ३ : १८) कथासरित्सागर में हिरण्याक्ष नायक के रूप में चित्रित किया गया है । (६५ : २१५) उसके पिता का नाम कनकाश दिया गया है । उसे कश्मीर का राजा कहा गया है। उसको राजधानी हिरण्य- पुर बतायी गयी है । हरिणाक्ष सरित सागर में एक नायक के रूप में एक विद्याधरी से विवाह करता है । उसके पिता का 'कंच' नाम भी दिया गया है । (२) हिरण्यपुर : श्रीनगर से गान्दर बल तथा सिन्ध उपत्यका में जाने वाली ऊँची सड़क पर 'रांग्येल' ग्राम है । गाव के समीप का नाग एक तीर्थ स्थान माना जाता है । यहाँ हर- मुकुट जाने वाले यात्री आते हैं । इसका उल्लेख तीर्थों में है । सुरेश्वरी माहात्म्य में इसे (२:७) हिरण्यगगा कहा गया है। कल्हण ने इस स्थान को हिरण्यपुर के समीप लिखा है । भिक्षाचर, मयग्राम आधुनिक मनगाम के समीप शिविर डाले पड़ा था । यह स्थान सिन्धु उपत्यका के लार से बहुत दूर नहीं है । लहर अर्थात् लार के विद्रोही जो उसके समर्थक थे, हिरण्यपुर के समीप राजकीय सेना को पराजित किये थे । (रा० त० ८ : ७२९) राजकीय सेना का शिविर अम्रेश्वरपुर अर्थात् अम्बुरहर में पड़ा था । यह स्थान रांग्येल ग्राम से ढाई मील दक्षिण होगा । यही स्थान हिरण्यपुर था । इसी प्रकार जब उच्चल लोहर से बढ़ता आया और सिन्ध उपत्यका से राजधानी पर घेरा डाला था । उस समय मार्ग में ही अर्थात् हिरण्यपुर में ब्राह्मणों ने उसका राज्याभिषेक कर दिया था । पाठभेद : श्लोक संख्या २८८ में 'ण्योत्सकृदा' का 'ण्याक्षस्य चा' तथा 'वसुकुल' का 'बभुकुल' 'बमु- कुल' और 'च मुकुल' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २८८ (१) हिरण्यकुल : आइने अकबरी मे नाम 'हिरेन कुल' तथा उसका राज्यकाल ६० वर्ष दिया गया है । हसन कहता है—'राजा हरन्यगुल (हरण्याक्ष) उसका बेटा था । साठ बरस, अकल व इन्साफ

५६२ राजतरंगिणी अथ म्लेच्छगणाकीर्ण मण्डले चण्डचेष्टितः । तस्याऽऽत्मजोऽभून्मिहिरकुलः कालोपमो नृपः ॥ २८६ ॥ मिहिरकुल : २८६. म्लेच्छ १ गणों से मण्डल आकीर्ण होने पर उसका लड़का चण्डचेष्टा, काल स्वरूप मिहिरकुल २ राजा हुआ ।


से बादशाहत करके दुनिया से रुखसत हुआ । (२) हिरण्योत्स : इस स्थान का पता नहीं चलता। (३) वसुकुल : आइने अकबरी में नाम 'हवि- दकह' तथा उसका राज्यकाल ६० वर्ष दिया गया है। हसन कहता है— राजा 'बस: कुल' राजा हरन्यगुस का बेटा था । इसने भी साठ साल हुकूमत किया । लौकिक वर्ष २३१२ में कश्मीर के राज्य सिंहासन पर बैठा होगा । २८९ (१) म्लेच्छ : पाँचवीं शताब्दी के प्रयोग में आमू दरया के उपत्यका के हूण जुअन जाति से मुक्ति पाकर शक्तिशाली हो गये । शासकों के वंश के कारण येथा-इफथेलाइट कहे जाने लगे । यूनानियों ने इन्हे श्वेत हूण कहा है। यही शब्द आज प्रचलित हैं । यहाँ म्लेच्छ शब्द से इफथे- लाइट हूणों से तात्पर्य हैं । इन हूणों ने आमू दरया के समीपवर्ती प्रदेशो पर अपना राज्य स्थापित किया था । यूनानी बौद्ध सभ्यता का अफगानिस्तान में नाश किया । उत्तरी भारत में राज्य विस्तार कर स्यालकोट को अपनी राजधानी बनाया। भागवत पुराण के अनुसार हूणो पर भरत ने अपनी दिग्विजय यात्रा में विजय प्राप्त की थी । (भागवत ९ २० : ३०) । मत्स्य पुराण में १९ हूणों का वर्णन मिलता है । (मत्स्यपुराण २७२ : ९) हसन लिखता है—'राजा मिहिरकुल राजा वसुकुल का बेटा था । क० २३३६ में हकूमत का झण्डा बुलन्द किया । खुदा का खौफ न होने और बेरहमी और ग़ज़बनाकी में बेमिशाल था । थोड़े जुर्म पर कत्ल करने से गुरेज नहीं करता था । किसी दिन भी खून रेज़ी के बग़ैर चैन न लेता । रहम करने के नाम व निशान का उसको पता तक न था । परिन्दे और चरिन्दे मक़तूलों के गोश्त की उम्मीद में उसके साथ-साथ जाया करते थे । इसके जमाने में तुरकिस्तान के एक हाकिम ने कश्मीर पर हमला कर दिया । राजा ने इन्तहाई जवाँ मरदी, बहादुरी और इस्तकलाल के साथ उसके हमला का मुंहतोड़ जवाब दिया । जिसके नतीजा में बहुत से सिपाही मक़तूल और जख्मी हुए । बिल आखिर शिकस्त खाकर भाग गया । चन्द्रकुल नाम की एक नहर परगना खादिर पारा में खुदवायी । दौरान खुदाई में कोह आसार व अगर के पुश्ता में एक बड़ा भारी पत्थर सदराह हो गया और किसी भी तदवीर और हीला से अपनी जगह से न हिला । यह देखकर राजा को सख्त फिक्र हुई । पूजापाठ के बाद ख्वाब में एक आदमी देखा । जो उससे कह रहा था कि हर वह औरत जो गुनाह बद- कारी से पाक व साफ होगी जब इस पत्थर पर हाथ रखेगी तो वह फौरन मादूम हो जायगा । राजा ने इसी इल्हाम के बमूजिब हर तरफ से औरतो की जमायतों को अहद करवाया । लेकिन किसी एक के भी हाथ लगने से वह पत्थर अपनी जगह से न हिला । राजा निहायत गज़ब- नाक हुआ और औरतों को जिनारकारी और बच्चों को हरामजदगी और मर्दों का बेबस और बेहयाई के बहाने से कत्ल आम कर दिया । कैफियत—'मोरखों ने औरत, बच्चे और मर्द मक़तूलांन की तादाद तीन करोड़ लिखी है लेकिन बाज तीन लाख तक खयाल करते हैं । 'आखिरकार चन्द्रवती जो एक कुम्हार की लड़की थी हाजिर हुई । उसने राजा को बड़े गुस्सा

के साथ मुखातिब होकर कहा राजा साहब अपने पहले ही दिन औरतों को इस मुश्किल काम करने की तल्फीन न फरमाई ताकि पाक दामनी के जोर से वह इस पत्थर को फना कर देती और फिर इतने बेगुनाहों का खून जनाब न होता। अगर औरतों के हाथ लगाने से इस पत्थर ने अपनी जगह से हरकत नहीं की तो हम देखेंगे कि यह सवामन जो अपने लोगों पर की है क्या आप अपने ऊपर कर सकते है? यह कहां और अपना अकपरस्त हाथ पत्थर पर रखा और अपनी जगह से उठाकर एक तरफ फेंक दिया। एक दिन वही राजा अपने महल मे दाखिल हुआ और अपनी रानी को देखा कि एक सुनहरी नकशा व निगार का कपड़ा अजीब तन किये हुए है उस पर राजा सिगल द्वीप की तसवीर है। यह देखते ही राजा के गुस्सा की हांडी जोश मे आ गयी। कसम खाई जब तक राजा सिगल- द्वीप को सजा न दूँगा किसी काम पर हाथ न डालूंगा। उसी दिन से लड़ाई का साज व सामान जमा करके बहुत भारी फौज के हमराह सिगल- द्वीप की तरफ रवाना हो गया। रास्ता मे लाल चोल और करमाट के राजो को अपना मतिअ किया। धीर वहा से जहाजो और किरिश्ययो के जरिए सिगल द्वीप में जा पहुँचा। बड़ी खूंरेजी और जंग व जदल के बाद वहा के राजा को फौज की एक बड़ी तादाद के समेत कत्ल कर डाला। उसकी जगह दूसरा राजा बैठाकर हुक्म नाफिद कर दिया कि इसके बाद कपड़ो पर लोगों के तसवीरों में सूरज की तसवीरें बनायें। वापसी के वक्त जुल्म जुल्म व तम्रदी से काम लेकर बहुत-सा माल गनीमत इकट्ठा कर लिया। जिस वक्त पीर पंजाब के पहाड़ पर पहुँचा अचानक एक हाथी एक टीला से फिसल गया और फिसलते वक्त हाथी ने जोर जोर से दहाड़े मारी। राजा को हाथी का दहाड़ना बहुत पसन्द आया। चुनांचे हुक्म दिया कि एक सौ हाथी इसी तरह टीला से नीचे गिराये जांय। इस वक्त से उस जगह को 'हस्तबज' कहते हैं। काश्मीर में पहुँचकर होल लाड़ के मुकाम पर मिहिरपुर नामका एक शहर आबाद किया। कन्दहार के बरहमनों को बड़ी बड़ी जागीरें अता कीं। मुख्तसर यह कि किस्म किस्म के जुल्मों में वह जालिम इस मरतबा का था कि अहाता तहरीर में नहीं लाया जा सकता। सत्तर साल हुक्मरानी के बाद एक निहायत ही पचीदह और खतरनाक मर्ज उस पर तारी हो गया। एक दिन हवन के लिए आग जलाई थी उसमें अपने आप को आहुति की जगह जलती हुई आग में डालकर जला दिया।' हूण—पुराणों में एक जाति के रूप में हूणों का चित्रण किया है। राजा भरत ने अपने दिग्विजय काल में हूणों का संहार किया था। (भागवत पुराण ६:२०:३०) मत्स्य पुराण (२७२:१९) में १९ हूणों का वर्णन मिलता है। वैदिक साहित्य में हूणों का नाम नहीं मिलता। रघुवंश महाकाव्य में दिग्विजय के समय राजा रघु ने वक्षु के तट पर हूणों को पराजित किया था। (४:८५)। कालान्तर में हूणों के लिए किसी किसी लेखक ने तुषार तथा तुरुष्क शब्द का प्रयोग किया है। यद्यपि तुरुष्क, तथा तुषार वास्तव में तुर्कों के लिए व्यवहृत किया गया है। पुराणों में उल्लेख मिलता है— गान्धारा यवनाश्चैव सिन्धुसौवीरमद्रकाः । शतद्रुजा कुणिन्दाश्च पारदा हारहूणकाः ॥ ब्रह्माण्ड पुराण में 'पारदा हारहूणका' मार्कण्डेय पुराण में 'पारदा हारभूपिका' 'हारहूण' शब्दों का उल्लेख किया गया है। सम्भव है ये हूणों की एक शाखा रहे हों। हूणों ने मध्य एशिया से मध्यभारत तक की भूमि पाँचवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में विजयकर, राज्य स्थापित किया था। कुछ लोगों का मत है। हार हूणों का स्थान हेरात क्षेत्र था। ये वही के निवासी थे। किन्तु यह विवादास्पद है। हर्षचरित में हूणों का स्थान उत्तरापथ में रखा गया है। 'हूणदावानलप्रैव च' का उल्लेख

५६२ राजतरंगिणी अथ म्लेच्छगणाकीर्ण मण्डले चण्डचेष्टितः । तस्याऽऽत्मजोऽभून्मिहिरकुलः कालोपमो नृपः ॥ २८९ ॥ मिहिरकुल : २८९. म्लेच्छ' गणों से मण्डल आकीर्ण होने पर उसका सदृश चण्डचेष्टा, काल सदृश मिहिरकुल राजा हुआ ।

से पादशाहत करके दुनिया से रुखसत हुआ । (२) हिरण्योत्स : इस स्थान का पता नहीं चलता । (३) वसुकुल : आइने अकबरी में नाम 'इद्रि- २५९' तथा उसका राज्यकाल ६० वर्ष दिया गया है। हसन कहता है - राजा 'वमः कुल' राजा हिरण्यकुल का बेटा था। इसने भी साठ साल हुकूमत किया । लौकिक वर्ष २३१२ में कश्मीर के राज्य सिंहासन पर बैठा होगा । २८९ (१) म्लेच्छ : पाँचवी शताब्दी के प्रयोग में भामू दरया के उपत्यका के हूण जुअन जाति से मुक्ति पाकर शक्तिशाली हो गये । शासकों के वंश के कारण येथा-इफथलाइट कहे जाने लगे । यूनानियों ने इन्हे श्वेत हूण कहा है। यही शब्द आज प्रचलित है। यहाँ म्लेच्छ शब्द से इफथे- लाइट हूणो से तात्पर्य है। इन हूणों ने भामू दरया के समीपवर्ती प्रदेशो पर अपना राज्य स्थापित किया था। यूनानी बौद्ध सभ्यता का अफगानिस्तान मे नाश किया । उत्तरी भारत में राज्य विस्तार कर स्यालकोट का अपनी राजधानी बनाया। भागवत पुराण के अनुसार हूणो पर भरत ने अपनी दिग्विजय यात्रा मे विजय प्राप्त की थी । (भागवत ९. २० : ३०) । मत्स्य पुराण में १९ हूणो का वर्णन मिलता है। (मत्स्यपुराण २७२ : ९) हसन लिखता है- 'राजा मिहिरकुल राजा वसुकुल का बेटा था। क० २३३६ में हकूमत का झण्डा बुलन्द किया। खुदा का खोफ न होने घोर बेरहमी और गजबनाकी में बेमिसाल था। थोड़े जुर्म पर कतल करने से गुरेज नहीं करता था। किसी दिन भी खून रेजी के वगैर चैन न लेता ।

रहम करने के नाम व निशान का उसको शक न था। परिन्दे और चरिन्दे मक्तूलो गोश्त की उम्मीद में उसके साथ-साथ र करते थे । उसके जमाने में तुरकिस्तान के हाकिम ने कश्मीर पर हमला कर दिया । र ने इन्तहाई जवाँ मरदी, बहादुरी और हिम्मत के साथ उसके हमला का मुँहतोड़ जवाब द जिसके नतीना में बहुत से सिपाही मक्तूल जख्मी हुए । बित आखोर शिकस्त खाकर गया । चन्दरकुल नाम की एक नहर पर शादिर पारा में खुदवायी। दौरान खुदवाई मौह आगर व अगर के पुस्ता में एक बड़ा स पत्थर खदराहु हो गया और किसी भी तद भोर हीला से अपनी जगह से न हिला। देखकर राजा को सख्त फिक्र हुई। पूजा के बाद ख्वाब मे एक आदमी देखा। जो उ कह रहा था कि हर वह औरत जो गुनाह कारी से पाक व साफ होगी जब इस पत्थर हाथ रखेगी तो वह फौरन नाबूद हो जाय राजा ने इसी इलहाम के बमूजिब हर त औरतों की जमायतों को अरूड़ करवाया। ले किसी एक के भी हाथ लगने से वह प अपनी जगह से न हिला । राजा निहायत नाक हुआ और औरतों को जिनारकारी और व की हरामजदगी और मरदो का बेबस और बेई के बहाने से कतल आम कर दिया। कैफियत -'मोरखों ने औरत, बच्चे और मक्तूलीन की तादाद तीन करोड़ लिखी है ले बाज तीन लाख तक खायल करते हैं। 'आखिरकार चन्द्रवती जो एक कुम्हार लड़की थी हाजिर हुई। उसने राजा को बड़े ग

प्रथम तरंग २६३

के साथ मुखातिब होकर कहा राजा साहब अपने पहले ही दिन औरतों को इस मुश्किल काम करने को तल्फीन न फरमाई ताकि पाक दामनी के जोर से वह इस पत्थर को फना कर देती और फिर इतने बेगुनाहों का खून जनाज न होता । अगर औरतों के हाथ लगाने से इस पत्थर ने अपनी जगह से हरकत नहीं की तो हम देखेंगे कि यह सखामन जो अपने लोगो पर की है क्या आप अपने ऊपर कर सकते हैं ? यह कहाँ और अपना हकपरस्त हाथ पत्थर पर रखा और अपनी जगह से उठाकर एक तरफ फेंक दिया । एक दिन वही राजा अपने महल में दाखिल हुआ और अपनी रानी को देखा कि एक सुनहरी नक्शा व निगार का कपड़ा अजीब तन किये हुए है उस पर राजा सिंघल द्वीप की तसवीर है। यह देखते ही राजा के गुस्सा की हाड़ी जोश में आ गयी । कसम खाई जब तक राजा सिंघल- द्वीप को सजा न दूँगा किसी काम पर हाथ न डालूँगा । उसी दिन से लड़ाई का साज व सामान जमा करके बहुत भारी फौयज के हमराह सिंघल- द्वीप की तरफ रवाना हो गया । रास्ता में लाल चोल और करनाट के राजो को अपना मतिअ किया । और वहां से जहाजों और किश्तियों के जरिए सिंघल द्वीप में जा पहुँचा । बड़ी खूंनरेजी और जंग व अद्ल के बाद वहा के राजा को फौज को एक बड़ी तादाद के समेत कत्ल कर डाला । उसकी जगह दूसरा राजा बैठाकर हुक्म नाफिद कर दिया कि इसके बाद कपड़ों पर लोगों के तसवीरो में सूरज की तसवीरें बनायें । वापसी के वक्त जुर्म जुल्म व तअद्दी से वाम लेकर बहुत-सा माल गनीमत इकट्ठा कर लिया । जिस वक्त पीर पंजाब के पहाड़ पर पहुँचा अचानक एक हाथी एक टीला से फिसल गया और फिसलते वक्त हाथी ने जोर जोर से दहाड़ें मारी । राजा को हाथी का दहाड़ना बहुत पसन्द आया । चुनांचे हुक्म दिया कि एक सौ हाथी इसी तरह टीला से नीचे गिराये जाँय । इस वक्त से उस जगह को 'हस्तवन' कहते हैं । काश्मीर में पहुँचकर होल लाड़ के मुकाम पर मिहिरपुर नामका एक शहर आबाद किया । कन्दहार के बरहमनों को बड़ी बड़ी जागीरें अता कीं । मुख्तसर यह कि किस्म किस्म के जुल्मों में वह जालिम इस मरतबा का था कि बहाता तहरीर में नहीं लाया जा सकता । सत्तर साल हुक्मरानी के बाद एक निहायत ही पचोदह और खतरनाक मर्ज उस पर तारी हो गया । एक दिन हवन के लिए आग जलाई थी उसमें अपने आप को आहुति की जगह जलती हुई आग में डालकर जला दिया ।' हूण—पुराणों में एक जाति के रूप में हूणों का चित्रण किया है। राजा भरत ने अपने दिग्विजय काल में हूणों का संहार किया था । (भागवत पुराण ६ : २० : ३०) मत्स्य पुराण (२७२ : १९) में १९ हूणों का वर्णन मिलता है । वैदिक साहित्य में हूणों का नाम नहीं मिलता । रघुवंश महाकाव्य में दिग्विजय के समय राजा रघु ने वक्षु के तट पर हूणों को पराजित किया था । (४:८५) । कालान्तर में हूणों के लिए किसी किसी लेखक ने तुपार तथा तुरुष्क शब्द का प्रयोग किया है । यद्यपि तुषूक, तथा तुपार वास्तव में तुर्कों के लिए व्यवहृत किया गया है। पुराणों में उल्लेख मिलता है— गान्धारा यवनाश्चैव सिन्धुसौवीरमद्रकाः । शतद्रुजा कुणिन्दाश्च पारदा हारहूणकाः ॥ ब्रह्माण्ड पुराण में 'पारदा हारहूणका' मार्कण्डेय पुराण में 'पारदा हारभूषिका' 'हारहूग' शब्दों का उल्लेख किया गया है। सम्भव है वे हूणों की एक शाखा रहे हों। हूणों ने मध्य एशिया से मध्यभारत तक की भूमि पांचवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में विजयकर, राज्य स्थापित किया था। कुछ लोगों का मत है। हार हूणों का स्थान हेरात क्षेत्र था । वे वहीं के निवासी थे । किन्तु यह विवादास्पद है । हर्षचरित में हूणों का स्थान उत्तरापथ में रखा गया है । 'हूखदार्व्वास्तथैव च' का उल्लेख

७५२ | राजतरंगिणी अथ म्लेच्छगणाकीर्ण मण्डले चण्डचेष्टितः । तस्याऽत्मजोऽभून्मिहिरकुलः कालोपमो नृपः ॥ २८९ ॥ मिहिरकुल : २८९. म्लेच्छ¹ गणों से मण्डल आकीर्ण होने पर उसका लड़का चण्डचेष्टा, काल स्वरूप मिहिरकुल² राजा हुआ । ये बादशाहत करके दुनिया से रुखसत हुआ । (२) हिरण्योत्स : इस स्थान का पता नहीं चलता । (३) वसुबुल : आइने अकबरी में नाम 'दरि- स्वह' तथा उसका राज्यकाल ६० वर्ष दिया गया है। हसन कहता है - राजा 'बसः कुल' राजा हिरण्यकुल का बेटा था। इसने भी साठ साल हकूमत किया । लौकिक वर्ष २४१२ में कश्मीर के राज्य सिंहासन पर बैठा होगा । २८९ (१) म्लेच्छ : पाँचवीं शताब्दी के प्रयोग में आमू दरया के उपत्यका के हूण जुअन जाति से मुक्ति पाकर शक्तिशाली हो गये । शासकों के वंश के कारण येया-इफयेलाइट कहे जाने लगे । यूनानियों ने इन्हें श्वेत हूण कहा है। यही शब्द आज प्रचलित है। यहाँ म्लेच्छ शब्द से इफये- लाइट हूणो से तात्पर्य है। इन हूणो ने आमू दरया के समीपवर्ती प्रदेशो पर अपना राज्य स्थापित किया था। यूनानी बौद्ध सभ्यता का अफगानिस्तान मे नाश किया । उत्तरी भारत में राज्य विस्तार कर स्यालकोट का अपनी राजधानी बनाया। भागवत पुराण के अनुसार हूणो पर भरत ने अपनी दिग्विजय यात्रा मे विजय प्राप्त की थी । (भागवत ९ २० : ३०)। मत्स्य पुराण में ११ हूणो का वर्णन मिलता है। (मत्स्यपुराण २७२ : ९) हसन लिखता है—'राजा मिहिरकुल राजा बसुकुल का बेटा था। क० २३३६ में हकूमत का झण्डा बुलन्द किया । खुदा का खौफ न होने और बेरहमो और गज़बनाकी में बेमिसाल था । थोडे जुर्म पर कत्ल करने से गुरेज नही करता था । किसी दिन भी खून रेजी के बगैर चैन न लेता । रहम करने के नाम व निशान का उसकी पता तक न था । परिन्दे और चरिन्दे मक्तूलों के गोश्त की उम्मीद में उसके साथ-साथ जाया करते थे । उसके जमाने में तुर्किस्तान के एक हाकिम ने कश्मीर पर हमला कर दिया। राजा ने इन्तहाई जराँ मरदी, बहादुरी और इस्तक़लाल के साथ उसके हमला का मुँहतोड़ जवाब दिया। जिसके नतीजा में बहुत से सिपाही मक्तूल और ज़ख्मी हुए । बिल आखिर शिकस्त खाकर भाग गया । चन्द्रकुल नाम की एक नहर परगना शादिर पारा में खुदवायो । दौरान खुदवाई मे मोहे असर व अगर के पुश्ता में एक बड़ा भारी पत्थर सदराह हो गया और किसी भी तदबीर और हीला से अपनी जगह से न हिला । यह देखकर राजा को सख्त फिकर हुई । पूजापाठ के बाद ख्वाब में एक आदमी देखा । जो उससे कह रहा था कि हर वह औरत जो गुनाह बद- कारी मे पाक व साफ होगी जब इस पत्थर पर हाथ रखेगी तो यह फौरन नाबूद हो जायगा । राजा ने इसी इलहाम के बमूजिब हर तरफ से औरतों की जमायतों को अहड़ करवाया । लेकिन किसी एक के भी हाथ लगने से वह पत्थर अपनी जगह से न हिला । राजा निहायत ग़ज़ब- नाक हुआ और औरतों को ज़िनारकारी और बच्चों को हरामज़दगी और मरदो का बेबस और बेहयाई के बहाने से कत्ल आम कर दिया । कैफियत—'मोरखों ने औरत, बच्चे और मद मक्तूलोंन की तादाद तीन करोड़ लिखी है लेकिन बाज तीन लाख तक साबत करते हैं । 'आखिरकार चन्द्रवती जो एक कुम्हार की लड़की थी हाज़िर हुई । उसने राजा को बड़े गुस्सा

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[Column 1] के साथ मुखातिब होकर कहा राजा साहब अपने पहले ही दिन औरतों को इस मुश्किल काम करने की तलकीन न फरमाई ताकि पाक दामनी के जोर से वह इस पत्थर को फना कर देती ओर फिर इतने बेगुनाहों का खून जनाह न होता । अगर औरतों के हाथ लगाने से इस पत्थर ने अपनी जगह से हरकत नहीं की तो हम देखेंगे कि यह सवासन जो अपने लोगों पर की है क्या आप अपने ऊपर कर सकते हैं ? यह कहा और अपना हकपरस्त हाथ पत्थर पर रखा और अपनी जगह से उठाकर एक तरफ फेंक दिया । एक दिन वही राजा अपने महल में दाखिल हुआ और अपनी रानी को देखा कि एक सुनहरी नकशा व निगार का कपड़ा अजीब तन किये हुए है उस पर राजा सिंगल द्वीप की तसबीर है। यह देखते ही राजा के गुस्सा की हाड़ी जोश में आ गयी । कसम खाई जब तक राजा सिंगल- द्वीप को सजा न दूंगा किसी काम पर हाथ न डालूंगा । उसी दिन से लड़ाई का साज़ व सामान जमा करके बहुत भारी फौज के हमराह सिंगल- द्वीप की तरफ रवाना हो गया । रास्ता में लाल चोल और कर्नाट के राजो को अपना मतिअ किया । और वहाँ से जहाजों और किश्तियों के जरिए सिंगल द्वीप में जा पहुँचा । बड़ी खूनरेजी और जंग व जदाल के बाद वहां के राजा को फौज की एक बड़ी तादाद के समेत कत्ल कर डाला । उसकी जगह दूसरा राजा बैठाकर हुक्म नाफ़िद कर दिया कि इसके बाद कपड़ों पर लोगों के तस्वीरों में सूरज की तसवीरें बनायें । वापसी के वक्त जुल्म जुल्म व तअदी से नाम लेकर बहुत-सा माल गनीमत इकट्ठा कर लिया । जिस वक्त पीर पंजाब के पहाड़ पर पहुँचा अचानक एक हाथी एक टीला से फिसल गया और फिसलते वक्त हाथी ने जोर जोर से दहाड़ें मारी । राजा को हाथी का दहाड़ना बहुत पसन्द आया । चुनांचे हुक्म दिया कि एक सौ हाथी इसी तरह टीला से नीचे गिराये जांय । इस वक़्त से उस जगह

[Column 2] को 'हस्तबज' कहते है । काश्मीर में पहुँचकर होल लाड़ के मुकाम पर मिहिरपुर नामका एक शहर आबाद किया । कन्दहार के बरहमनों को बड़ी बड़ी जागीरें अता कीं । मुख़्तसर यह कि किस्म किस्म के जुल्मों में वह जालिम इस मरतबा का था कि अहाता तहरीर में नही लाया जा सकता । सत्तर साल हुक्मरानी के बाद एक निहायत ही पचीदह और ख़तरनाक मर्ज उस पर तारी हो गया । एक दिन हवन के लिए आग जलाई थी उसमें अपने आप को आहुति की जगह जलती हुई आग में डालकर जला दिया ।' हूण—पुराणो में एक जाति के रूप मे हूणो का चित्रण किया है । राजा भरत ने अपने दिग्विजय काल मे हूणो का संहार किया था । (भागवत पुराण ६ : २० : ३०) मत्स्य पुराण (२७२ : १९) में १९ हूणों का वर्णन मिलता है । वैदिक साहित्य में हूणो का नाम नहीं मिलता । रघुवंश महाकाव्य में दिग्विजय के समय राजा रघु ने वक्षु के तट पर हूणो को पराजित किया था । (४:८५) । कालान्तर मे हूणों के लिए किसी किसी लेखक ने तुषार तथा तुरुष्क शब्द का प्रयोग किया है । यद्यपि तुरुष्क, तथा तुषार वास्तव में तुर्कों के लिए व्यवहृत किया गया है । पुराणो में उल्लेख मिलता है— गान्धारा यवनाश्चैव सिन्धुसौवीरमद्रकाः । शतद्रुजा कुणिन्दाश्च पारदा हारहूणकाः ॥ ब्रह्माण्ड पुराण में 'पारदा हारहूणका' मार्कण्डेय पुराण में 'पारदा हारभूषिका' 'हारहूण' शब्दों का उल्लेख किया गया है । सम्भव है वे हूणों की एक शाखा रहे हों । हूणों ने मध्य एशिया से मध्यभारत तक की भूमि पाँचवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में विजयकर, राज्य स्थापित किया था । कुछ लोगों का मत है । हार हूणो का स्थान हेरात क्षेत्र था । वे वही के निवासी थे । किन्तु यह विवादास्पद है । हर्षचरित मे हूणों का स्थान उत्तरापथ में रखा गया है । 'हूणदार्व्वास्तथैव च' का उल्लेख

६९४ राजतरंगिणी मिलता है। कश्मीर के दक्षिण पश्चिम में दार्वा- भिसार का स्थान है। इस मत से पश्चिमोय- उत्तरीय पंजाब में इनका निवास प्रकट होता है। पुराणों में एक स्थान पर हूणों का और उल्लेख आता है। मा (म) रुका माल्वाश्चैव पारियात्रनिवासिनः । सौवीराः सैन्धवा हूणा शाल्वाः शाकलवासिनः ॥ विष्णु पुराण तथा कूर्म पुराण में 'सौवीरा सैन्धवा हूणाः' का उल्लेख आया है। यह भी इस बात की ओर संकेत करता है। पश्चिमी उत्तरी भारत में हूण रहते थे। उनका स्थान सिन्धु नदी से पश्चिम था। क्षोभा तन्त्र ५६ देशों की एक तालिका देता है। उसमें हूणों का उल्लेख है। उन्हें पुलिन्द, कौरव तथा गान्धार के साथ रखा है। संकेत मिलता है। वे पश्चिमोय उत्तरी भारत की तरफ रहते थे । मलाईचैव पामाराः पाषायान्यक (१) पुलिन्द (काः) । हु(हू)ण कौरवगान्धारविदर्भाः सविदेहकाः ॥४४।२ः४ शक्ति संगम तन्त्र ३।७।४३ में हूणों के देश का उल्लेख है। कामगिरिं समारभ्य द्वारकान्तं महेश्वरि । श्रीकुन्तलाभिधो देशो हूणो भृगु महेश्वरि ॥४३॥ यहाँ पर हूण देश कामगिरि के दक्षिण में तथा मरुदेश के उत्तर में रखा गया है। श्रो कुन्तल नाम के कई क्षेत्रों का वर्णन मिलता है। अतएव इस कुन्तल का निर्धारित करना कठिन है। यह कौन कुन्तल है। कामगिरि मरुस्थल के उत्तर में था। सिन्ध राजस्थान तथा पंजाब का दक्षिणी भाग मरुस्थल है। अतएव यहाँ कुन्तल से तात्पर्य उत्तर पश्चिमो भारत में लगाना चाहिए। काम देश का नाम सन् ११७६ ई० के एक अभिलेख में मिला है। जिसमें वहाँ के राजा को सपादलक्ष (सेवालिक) पर्वत के राजा के अन्तर्गत कहा गया है। हूणों को एक जाति के रूप में महाभारत ने चित्रित किया है। उनकी उत्पत्ति नन्दिनी गौ के फेन से हुई थी । गाथा का वर्णन महाभारत आदि पर्व (६५ : ५१) तथा वन पर्व (४३:१४) में किया गया है। हूणों के देश को हूण देश कहा गया है। उनका स्थान पश्चिम दिशा निर्धारित किया गया है। उन पर नकुल ने विजय प्राप्त की थी ! (सभा पर्व ३२ : १३) । हूण देश तथा जाति के राजागण युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भेंट लेकर आए थे ! (सभा पर्व ५१:३४) (२) मिहिरकुल : आइने अकबरी में नाम 'मेरह कुल' तथा राज्यकाल ७० वर्ष दिया गया है। राज्यकाल लौकिक वर्ष ३१७२ से आरम्भ माना जाता है। कुछ ऐतिहासिक इसका सन् ५१५- ५५० ई० मानते हैं। मिहिरकुल इफवेलाइट अथवा श्वेत हूण था। हूणों ने बौद्धों के विरुद्ध जिहाद बोला था। उनके विहारों तथा चैत्यों को नष्ट किया था। भिक्षुओं को तलवार की घाट उतारा था। ह्वेनसांग लिखता है- मिहिरकुल अपने अजेय साहस तथा प्रलोभनीय प्रकृति के कारण धूर्त्त व्यक्ति था। पड़ोसी राजाओं में ऐसा कोई नहीं था। जो सकम्पित उसके आदेशों का पालन न करता रहा हो।' आमू दरया से चलकर हूणों ने हिन्दूकुश पर्वत पार किया। गान्धार लिया। आगे बढ़ना चाहते थे। सन् ४६० ई० में स्कन्दगुप्त ने उनकी बाढ़ रोक ली । ईरान में हूण सफल हुए। ईरान ने हथियार रख दिया। सन् ४८४ ई० में ईरान के राजा को मारकर राज्य पर अधिकार कर लिया। पांचवीं शताब्दी के अन्त तक उनका राज्य बल्ख तक फैल गया । पाँचवीं शताब्दी में तोरमाण ने पंजाब पर अधिकार कर लिया। एक मत है। मालवा के राजा यशोवर्मा ने सन् ५३०-५४५ ई० के बीच हूणों पर विजय प्राप्त की थी। यह भी एक मत है। वे बालादित्य नरसिंह गुप्त से पराजित हो गये थे। इस पराजय के पश्चात् मिहिरकुल ने भारत कश्मीर विजय किया। वहाँ से उसने गान्धार पर आक्रमण किया। वहाँ के राजवंश

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को समाप्त किया। स्तूप, चैत्य तथा विहारों को नष्ट किया। देश को लूटा। अपनी लूट तथा युद्धबन्दियों के साथ कश्मीर लौट पड़ा। मार्ग में उसने बन्दियों को सिन्धु तट पर मार डाला। अन्ततोगत्वा भारत से हूण लोग थानेश्वर के हर्षवंशीय राजाओं द्वारा निकाल बाहर किये गये। हूण बौद्धों के विरोधी थे। वे शिव के उपासक थे। उन्होंने शिव मन्दिर निर्माण कराया था। वे शैव मत के समर्थक थे।

मिहिरकुल तोरमाण का पुत्र था। तोरमाण की मुद्राओं से पता चलता है कि उसने मध्य प्रदेश से इरन सागर तक अधिकार कर लिया था। उससे यह भी पता चलता है कि वह उत्तर प्रदेश, पंजाब और कश्मीर तक पहुँच गया था। तोरमाण ने जैन धर्म जैन श्रुति के अनुसार स्वीकार कर लिया था। पव्वैया में रहने लगा था। यह स्थान चन्द्रभागा अर्थात् चनाब नदी के तट पर पंजाब में है। तोरमाण का उत्तराधिकारी मिहिर- कुल सन् ५१५ ई० में राज्यसिंहासन पर बैठा।

यशोवर्मा तथा बालादित्य से हार कर वह कश्मीर राजा के आश्रय में आया। राजा ने उसे कश्मीर में एक जागीर दी। किन्तु वह कश्मीर के राजा को हटा कर स्वयं राजा बन गया। उसने कन्धार पर आक्रमण कर विजय किया। अनेक लोगों को सिन्धु में डुबाकर मार डाला।

गया है। मिहिरकुल ने नरसिंहगुप्त बाला- दित्य (सन् ४८५-५३० ई०) को पराजित करने का निश्चय किया। परन्तु अपने साथियों के साथ बन्दी बना लिया गया। बालादित्य उसका वध करना चाहता था। परन्तु उसकी मां ने उसे मुक्त कर देने के लिए कहा। बालादित्य ने एक राज- कन्या से उसका विवाह कर दिया।

कश्मीरी इतिहासकारों तथा भारतीय इतिहास- कारों के पाठ में मेल नहीं खाता। मन्दसौर के

शिलालेख से पता चलता है। शैव यशोधर्मन के सम्मुख मिहिरकुल का मस्तक झुक गया था।

कोसमस ने इंडिको प्लुस्तस में मिहिर- कुल (कोसमस : इण्डिको प्लुतस) को गोला नाम से सम्बोधित किया है। चीनी पर्यटक सुंग- युन ने इसे गान्धार का शासक 'येथा' कहा है। मिहिरकुल की राज्य सभा में सन् ५२० ई० में अपना जाना वर्णन करता है।

ह्वेनसांग ने मिहिरकुल को मोह-हिस लो-बुलो लिखा है। उसे महान् साहसी लिखा है। कोई भी ऐसा पड़ोसी राजा नहीं था जो उसका आदेश नहीं मानता था। उसने मिहिरकुल को बौद्धों के एक बड़े भारी पीड़क के रूप में प्रस्तुत किया है। गाया है कि मिहिरकुल ने बौद्धों से एक उपदेशक मांगा। भिक्षुगण उसके भय किंवा स्वल्प ज्ञानी होने के कारण कुछ निश्चय न कर सके। अन्त में उन्होंने राजा के राजभवन के एक भृत्य बौद्ध को धर्मज्ञानी के रूप में चुना। राजा ने अपना अपमान समझा। क्रुद्ध होकर उसने बौद्ध संघ के नाश का आदेश दिया। इससे प्रकट होता है। उस समय बौद्ध संघ निष्क्रिय, प्राणहीन एवं अश्र हो गया था।

राजतरंगिणी का वर्णन तोरमान तथा मिहिर- कुल के भारतीय ऐतिहासिक वर्णन से मेल नहीं खाता। राजतरंगिणी के अनुसार तोरमाण तथा मिहिरकुल के समयों में अन्तर पड़ता है।

चीनी राजदूत सुंगयुन ने सन् ५२० ई० में गान्धार की सीमा के शिविर में राजा मिहिरकुल से भेंट की थी। उसने उस समय के इतिहास पर प्रकाश डाला है। वह अपने समय से दो पीढ़ी पूर्व का इतिहास देकर तत्कालीन समय का वर्णन करता है। वह मिहिरकुल से उसके राज्य के प्रारम्भिक काल में सम्भवतः मिला था। वह लिखता है—उत्तर भारत में श्वेत हूण रहते

है। उनमें एक नाम गोला (मिहिरकुल) है। वह युद्ध के समय २ हजार हाथी तथा विशाल अश्वा- रोही सेना के साथ चलता है। यह भारत का राजा है। वह लोगों को नष्ट करता है। लोगों को सम्पत्ति भेंट करने के लिए बाध्य करता है। फितन नदी (सिन्धु) हूणों के देश को भारत से अलग करती है। यह उल्लेख सन् ५२५- ५३५ ई० का है। इससे दो बात सिद्ध होती हैं। तोरमाण भानुगुप्त से पराजित हो गया था। हूणों का राज्य सिन्धु नदी के पश्चिमी क्षेत्र तक सीमित रह गया था। तोरमाण के पश्चात् मिहिरकुल ने राज्य विस्तार का विचार किया। उसने उत्तरी भारत पर आक्रमण किया। सन् ५३० ई० के शिलालेख से प्रकट होता है वह उसके राज्य का १५वां वर्ष था। उस समय उसका राज्य ग्वालियर तक विस्तृत था। मिहिरकुल के यशोधर्मन तथा नरसिंह गुप्त के कारण उत्तरी भारत का त्याग करना पड़ा। उसने सन् ५४४-५५० ई० के बीच सिन्धु नदी के अधो- भाग स्थित राज्य प्राप्त करने का पुनः प्रयास किया, जिसे खो चुका था। यशोधर्मन महाप्रतापी राजा था। उसके चरणों पर अपमानित राजा मिहिरकुल का मस्तक झुका था। मिहिरकुल शिव के अतिरिक्त और किसी के सम्मुख मस्तक झुकाने में सर्वथा अशक्य था। जिसकी भुजाएं तुषार पर्वत का आलिंगन करती थीं। उसे अपने राज्य के दुर्दम्य होने का दम्भ उत्पन्न हो गया था। यहां तुषार पर्वत से अर्थ हूणों का उस समय हिमालय के पर्वतीय खण्ड में रहना सिद्ध करता है। सुंग-युन ने स्पष्ट कहा है कि हूण राज का कश्मीर के राजा से संघर्ष हुआ था। तुषारपात कश्मीर के अतिरिक्त पश्चिम दिशा में और कहीं नहीं होता अतएव कश्मीर में हूणों का रहना लक्ष्य करता है। मिहिरकुल जब भारत के भीतरी भागों में घुसने का प्रयास कर रहा था। तो मालवा के राजा यशोधर्मन ने उसका सामना किया था। यशोधर्मन के पश्चात् मिहिरकुल का पुनः शक्तिशाली हो जाना मालूम होता है। मिहिरकुल अत्यन्त क्रोधी स्वभाव का था। पर्यटक ह्वेनसांग के अनुसार उसने स्यालकोट तथा समीपवर्ती भूभागों पर अधिकार स्थापित कर लिया था। किसी समय बौद्ध भिक्षुक से रुष्ट हो गया था। उसने अपने अधिकारियों को आज्ञा दी। हिन्दुस्तान के बौद्धों का नाश कर दिया जाय। बुद्ध अनुशासन समाप्त कर दिया जाय। बुद्ध सङ्घ से सम्बन्धित कोई चीज शेष न रह जाय। इसने कश्मीर पर अधिकार करने के पश्चात् वहां बौद्ध विहारों तथा स्तूपों को नष्ट करा दिया। सम्पत्तियां जप्त कर लीं। हूण बौद्ध नहीं थे। वे पिशाचों की पूजा करते थे। हूण राज्य के साथ किपिन अर्थात् कश्मीर का सीमावर्ती विवाद हुआ था। कश्मीर तथा हूण राज में ३ वर्ष तक युद्ध चलता रहा। स्कन्दरिया निवासी एक यूनानी ने हूणों के समय के गुप्तवंशीय राजा का नाम नरसिंह बाला- दित्य दिया है। वह यशोधर्मन तथा हूणों के आक्रमणों से त्रस्त हो गया था। गुप्त साम्राज्य की शक्ति क्षीण होती देखकर हूणों ने अपनी शक्ति बढ़ा ली। वह मिहिरकुल को भेंट भी देने लगा। बालादित्य के साथ हुए युद्ध का वर्णन ह्वेन- सांग करता है—बालादित्य भगवान् बुद्ध के प्रति श्रद्धा-भक्ति रखता था। मिहिरकुल के अत्याचार की बात सुनी तो उसने भेंट भेजना बन्द कर दिया। मिहिरकुल ने उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया। बालादित्य ने एक द्वीप पर शरण ली। सूचना प्राप्त होने पर नाव द्वारा मिहिर- कुल ने द्वीप पर आक्रमण किया। द्वीप पर उसकी

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[बायाँ स्तम्भ] सेना उतरी। उसने अपनी सेना का मुख्य भाग अपने कनिष्ठ भ्राता के नेतृत्व में पीछे छोड़ दिया। वह एक संकीर्ण दर्रा से गुजर रहा था। बाला- दित्य की सेना ने उस पर आक्रमण किया। मिहिरकुल बन्दी बना लिया गया। बालादित्य उसका वध करना चाहता था। परन्तु उसकी माता ने उसे रोका। उसे मुक्त कर दिया। छूटने पर मिहिरकुल ने सुना कि उसका भाई लौट गया है। स्वयं राजसिंहासन पर बैठ गया है। उसने कश्मीर के राजा के यहाँ शरण ली। कश्मीर में मिहिरकुल ने एक विद्रोह आयोजित किया। कश्मीर के राजा को हटाकर स्वयं राजा बन बैठा। उसने गान्धार के राजा को भी मार कर, उसके वंशजों को समाप्त किया। वहाँ का भी राजा बन गया। स्तूपों तथा संघारामों को खूब लूटा। देश को भी लूटा। लौटने के एक वर्ष पश्चात् मर गया। सन् ५६३-५६७ ई० में मध्य भारत में हूणों का लोप हो गया। तुर्क तथा ईरानियों ने भी आमू दरया की उपत्यका के निवासी हूणों का संहार कर हूण शक्ति नष्ट कर दी। मिहिरकुल ने साकल अर्थात् स्यालकोट तथा उसके समीपवर्ती भूखण्डों पर अपना अधिकार कर लिया था। मिहिरकुल की मुद्रा पर-'जयतु वृष' 'जयतु वृष ध्वज' टंकित है। उसकी मुद्राओं पर चन्द्रकला, वृषभ, त्रिशूल, सूर्य का चक्र तथा शैव चिन्ह टंकित हैं। 'मिहिर' का अर्थ सूर्य होता है। यह संस्कृत शब्द है। ईरानी अवेस्ता उल्लिखित मिहिर शब्द मिथ्र अर्थात् 'मित्र' है। ईरान तथा मन्दसौर के अभिलेख मिहिरकुल के इतिहास पर यथेष्ट प्रकाश डालते हैं। प्रश्न उपस्थित होता है कि मिहिरकुल का क्या कोई शिलालेख आदि भी प्राप्य है। जिसके कारण कल्हण की बात की पुष्टि हो। यह सिद्ध माना जाय कि कश्मीर में मिहिरकुल का शासन था। हूण ३८

[दायाँ स्तम्भ] नरेश मिहिरकुल का ग्वालियर का शिलालेख तिथि शासन-काल १३, इस विषय पर प्रकाश डालता है। नाना धातु विचित्रे 'गोपाह्वय नाम्नि भूधरे रम्ये' कारितवान् शैलमयं भानोः प्रासादवरमुख्यम् ॥ ९ पुण्याभिवृद्धि हेतोर्मातापित्रोरात्मनश्चैव। धम्मता च गिरिवरे ( ) स्मि (न) राज्ञः ॥१० 'गोपाह्वय नाम भूधरे' यहाँ गोपा का अर्थ मे गोपाद्रि गिरि अर्थात् गोप पर्वत लगाता हूँ। गोपाद्रि वर्तमान शंकराचार्य पर्वत है। शंकराचार्य पर्वत के मूल में डललेक के तट पर गुपकर जिसका प्राचीन नाम गोपा अग्रहार था, स्थित है। वन, शैल तथा पुण्य की वृद्धि के लिए वह इस शिखर में निवास करता है। यह स्थान पुराधिष्ठान है। पुराधिष्ठान जैसा मैं लिख चुका हूँ गोपाद्रि अर्थात् शंकराचार्य पर्वत के वाम पार्श्व में है। मिहिरकुल के समय में कश्मीर की राजधानी था। अतएव गिरिवर पर बनाने की ओर संकेत शिलालेख में किया गया है। मिहिरकुल बौद्ध धर्म विरोधी हो गया था। उसके शिलालेख से प्रकट होता है कि वह द्विजगणों के प्रति आस्था रखता था। यथा— ( यतो ) (नि) र्ममले भाति ॥ ६ द्विजगण मुख्यैरभि संस्तुते च पुण्याह नाद घोषेण। तिथि नक्षत्र-मुहूर्ते संप्राप्ति सुप्रशस्त (दिने) ७ मातृ तुलस्य तु पौत्रः पुत्रश्च मातृदासस्य । नाम्ना च मातृचेटः पष्वं— ( त दुर्गे ( गु वास्तव्यः ) ॥८॥ इसी शिलालेख से तोरमाण और मिहिरकुल का सम्बन्ध सिद्ध होता है कि मिहिरकुल ऐतिहासिक प्राणी था। तोरमाण का पुत्र था। कल्हण का वर्णन वास्तव में कश्मीर में किसी प्रचलित इतिहास के आधार पर दिया गया है। कल्हण मिहिरकुल को वसुकुल का पुत्र बताता है। वह मिहिरकुल की वंशावली ५ पीढ़ियों तक की देता है। कल्हण मिहिरकुल के पुत्र बक का भी उल्लेख करता है।

२९८ राजतरंगिणी जो उसके पश्चात् कश्मीर का राजा हुआ था। बक के पश्चात् सीधी वंश परम्परा का लोप होता है। उसी के एक वंश का क्षितिनन्द राजा होना कल्हण लिखता है। एक ओर कल्हण स्पष्ट वर्णन करता है तथा दूसरी तरफ तोरमाण तथा मिहिरकुल के शिलालेखो में कश्मीर का उल्लेख नहीं मिलता। 'गोपाद्ध्य' शब्द से उसका सम्बन्ध खींच तानकर जोड़ा जाता है। अशोक के समान मिहिरकुल के कश्मीर सम्बन्ध पर सन्देह किया जा सकता है। अशोक के सम्बन्ध में यही बात राजतरंगिणी में पाई जाती है जिसमे उसके दादा का नाम शकुनी दिया गया है। अशोक की वंशावली दी गयी है। उसमें गोधर, उसके पश्चात् उसका पुत्र सुवर्ण, उसके पश्चात् उसका पुत्र जनक तथा उसके पश्चात् शचीनर और उसके पश्चात् राजा शकुनी का प्रपौत्र अशोक राजा हुआ। जिस प्रकार कल्हण को दी गयी अशोक की वंशावली भारतीय इतिहास से मेल नही खाती उसी प्रकार मिहिरकुल की दी गयी कल्हण की वंशावली भारतीय इतिहास से मेल नहीं खाती। ग्वालियर का शिलालेख इस विषय में स्पष्ट है: श्री तोर (माण इ) ति पः प्रथितो (भू चक्र) यः प्रभूत-गुणः । सत्य प्रदान शौय्यांधेन मही न्याय तः शास्ता ॥ ३ तस्योदित कुल कीर्तेः पुत्रो ( ) तुल विक्रमः पतिः पृथ्व्याः । मिहिर कुले तिख्यातो ( ) भटगो यः पशुपतिम ॥ ४ यह मिहिरकुल या तो भारतीय राजा मिहिरकुल या अथवा वह कश्मीर का भिन्न राजा था। हसन ने रत्नाकर पुराण का उल्लेख बहुत किया है किन्तु उसने वही वंशावली दी है जो कल्हण की है। नीलमत पुराण हूण राजाओं, हूण जाति, तथा मिहिरकुल आदि किसी का उल्लेख नाममात्र के लिए नहीं करता। चीनी लेखकों ने मिहिरकुल के पिता का नाम नहीं दिया है। भारतीय इतिहास लेखको ने कल्हण तथा चीन पर्यटकों द्वारा कश्मीर राजा मिहिरकुल को एक मे मिलाने का प्रयास किया है। इन नामों की समता विशेष रूप से आधार मानी गयी है। इस विषय पर अभी घोर अनुसंधान तथा गवेषणा की आवश्यकता है। ग्वालियर का शिलालेख मिहिरकुल को वसुकुल का पुत्र बताता है। यह एक विचित्र पहेली है। ग्वालियर के शिलालेख तथा कल्हण के काल में ६०० वर्षों का अन्तर है। अतएव 'ग्वालियर का शिलालेख मिथ्या नहीं हो सकता। सम्भव है कि मिहिरकुल को कश्मीर राज्य की परम्परा में जोड़ने का प्रयास किया गया है। उसे ५ पीढ़ी से 'कुल' पदीयराजाओ के साथ कर दिया गया हो। तोरमाण और मिहिरकुल नाम में साम्य नही है परन्तु वसुकुल तथा .मिहिरकुल के नामो में साम्य है और वे एक- वंशीय मालूम होते हैं। यशोधर्मन के मन्दसोर प्रशस्ति में उल्लेख मिलता है: आ लोहित्योपकण्ठा त्तलवन गह(नो) पत्यकादा महेन्द्रादा गंगाश्लिष्टसानोस्तुहिनशिखरणि पश्चिमादापयो धेः । सामन्तैर्यस्य बाहु द्रविण-हृत-म (दै): पादयोराननमद्भि श्चूडा-रत्नां शु-राजि व्यतिकर शवला भूमि भागा क्रियन्ते ॥५॥ स्थाणो रन्यत्रेण ऽणति कृपणतां प्रापितं नोत्तमाङ्गं यस्याश्लिष्टो भुजाभ्यां वहति हिमगिरि र्दुगि-शब्दाभिमान (म्) । नीचैस्तेनापि यस्य प्रणति भुजबला- वर्ज्जन क्लिष्ट मूर्ध्ना (चू) डा पुष्पोपहारेर्मिहिरकुल नृपे णार्चिचता (.) पादयुग्मं ॥६॥ ३

प्रथम तरंग ३६० दक्षिणां सान्तक्रामाशां स्पर्धया जेतुमुद्यता । यन्निषादुत्तरहरिद्विभारान्यमिवान्तकम् ॥ २६० ॥ २९०. उत्तर १ दिशा ने, दक्षिण दिशा २ पर विजय प्राप्त करने के लिए दक्षिण के देवता काल की स्पर्धा में मिहिरकुल को यमराज तुल्य उपस्थित किया । सान्निध्यं यस्य सैन्यान्तर्हन्यमानाशनोत्सुकान् । अजानन्गृध्रकाकादीन्दृष्ट्वाऽग्रे धावतो जनाः ॥ २९१ ॥ २९१. राजा के समीप आने की सूचना लोग उसकी सेना द्वारा मारे जाने वालों के मांस उत्सुक गृध्र, काकादि पक्षियों को उसके आगमन के पूर्व मँडराते हुए देखकर पा जाते थे । दिवारात्र हतप्राणिसहस्रपरिवारितः । योऽभूद् भूपालवेतालो विलासभवनेष्वपि ॥ २९२ ॥ २९२. रात दिन सहस्रों हत प्राणियों से परावृत वह भूपाल अपने विलासभवन में भी वेताल १ था । बालेषु करुणा स्त्रीषु घृणा वृद्धेषु गौरवम् । न बभूव नृशंसस्य यस्य घोराकृतेर्ध्नतः ॥ २९३ ॥ २९३. घोर आकृति, नृशंस और मानव द्रोही इस राजा में बालकों के प्रति करुणा, स्त्रियों के प्रति घृणा तथा वृद्धों के प्रति गौरव भाव नहीं था । ( १ ) उत्तर दिशा : चारों दिशाओं के चार दिक्पाल किंवा देवता है । इन्द्र पूर्व दिशा, वरुण पश्चिम दिशा, कुबेर उत्तर दिशा तथा यम दक्षिण दिशा के देवता हैं। कुबेर धन के स्वामी हैं। उनके कारण लक्ष्मी प्राप्त होती है । वे पालक हैं । सम्पत्ति प्रदायक है । नाशक नहीं है । विष्णु भी रक्षक हैं । विष्णु मन्दिर का मुख इस लिये उत्तर तथा पूर्व दिशा रखा जाता है । उत्तर जिस प्रकार दक्षिण दिशा के ठीक विरोधी दिशा में है । उसी प्रकार दोनों दिशाओं के देवता तथा कर्म भी परस्पर विरोधी हैं । कल्हण इसी ओर संकेत करता है । उत्तर दिशा ने दक्षिण दिशा पर विजय प्राप्ति निमित्त दक्षिण दिशा के संहारक यम तुल्य मिहिरकुल स्वरूप यम- राज उत्पन्न किया था । ( २ ) दक्षिण दिशा : मृत्यु की दिशा है । उसका देवता यम है । शिव संहार के देवता है । अतएव शिव मन्दिर का द्वार दक्षिण तथा पश्चिम होता है । पश्चिम में सन्ध्या जन्म लेती है । व जीवन सन्ध्या की दिशा है । वहाँ अन्धकार उत्पन्न होता है । पूर्व दिशा उदय की दिशा है । वहाँ से सूर्य ज्योति अन्धकार को तिरोहित करती उठती है । और पश्चिम में जाकर लुप्त हो जाती है । उत्तर तथा पूर्व दिशा की ओर मुख कर उत्तम तथा पवित्र कार्य किये जाते हैं । मृत्यु के पश्चात् मनुष्यों का पद दक्षिण दिशा की ओर कर दिया जाता है । मुसलमान भी अपने शव का पद दक्षिण की ओर करके गाड़ते हैं । २९२ ( १ ) वेताल : पिशाचों का एक समूह वेताल कहा जाता है । रुद्र गणों में वेताल सम्मिलित है । रणभूमि में उपस्थित रहते हैं । वहाँ के मानव रक्त एवं मांस भक्षण करते हैं । ( भा०२:१०:३९ ) इनकी देवता मानकर भी पूजा की जाती है। इन्हें सर्वत्र शिव का उपासक माना गया है । ( मत्स्य