राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमं तरङ्गं ३८५ इतिवृत्तं महाश्चर्यं तस्य पित्र्यं महामतेः । संसारासारताज्ञाने प्राप पुण्योपदेशताम् ॥ २७७ ॥ २७७. उस महामति के लिये पिता का महाश्चर्य पूर्ण इतिवृत्त संसार के असारत्व के ज्ञान में पुण्योपदेश सिद्ध हुआ । भोगयोगेन मालिन्यं नेतुं मध्यगतोऽपि सः । न शक्यते स्म पङ्केन प्रतिमेन्दुरिवामलः ॥ २७८ ॥ २७८. पंक में निर्मल इन्दु प्रतिबिम्ब १ सदृश वह राजा भोग योग के मध्यगत होता भी उससे मलिन नहीं हो सका था। दर्पज्वरोष्णभूपालमध्ये निध्यायतोऽनिशम् । सुधासूतिकलामौलिं तस्यैवोल्लाघतोद्ययौ ॥ २७९ ॥ २७९. दर्प ज्वर से सन्तप्त भूपाल के मध्य में सुधा सूति कला मौलि (शिव) का रात्रि-दिन ध्यान करते हुए केवल वही पूर्ण स्वस्थ रहा। गणितं गुणिना तेन मणींस्तृणमिवोज्झता । खण्डेन्दुमण्डनार्चायां मण्डनत्वमखण्डितम् ॥ २८० ॥ २८०. मणियों को तृण तुल्य त्यागते हुए, इस राजा ने खण्डेन्दु मण्डन (शिव) की अर्चा को अखण्डित मण्डन माना । वितस्ता तट पर एक साथ ही थे। नर का पुत्र सिद्ध छोटा था इसलिए अपनी उपमाता किंवा धात्रीमाता के साथ विजय क्षेत्र गया था। यह स्थान किन्नरपुर के समीप था इसीलिए अपनी धात्रीमाता के साथ सिद्ध गया था। उसको इस अनुपस्थिति में ही किन्नरपुर में अग्निदाह हुआ था । २७६ (१) सिद्ध : आइने अकबरी में नाम 'सिदेह' तथा राज्यकाल ६० वर्ष दिया गया है। सिद्ध का राज्याभिषेक काल २१२४ लौकिक वर्ष होगा। हसन लिखता है—'राजा सिद्ध राजा नर का बेटा था। क० २०९१ में बाप के हादशा के वक्त शहर वैश्वारह से अपनी रज़ाई मा के साथ गया था। उसके वफात के बाद तख्त नशीन हुआ। अदल व इन्साफ, बहादुरी और सुजाअत में वे नज़ीर था। हमेशा रैय्यत के आराम और आशा- यर्श और मखलूक खुदा की फलाह व वहबूद में ब दिल व जान कोशां रहता। साठ बरस हकूमत करके मुल्क अदम में जा बसा।' (पृष्ठ ४६) पाठभेद : श्लोक संख्या २७७ में 'पित्र्यं' का 'चित्रं' तथा 'ताज्ञाने' का पाठभेद 'ताज्ञेन', 'ताज्ञनं' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २७८ (१) चन्द्र प्रतिबिम्ब : पंकमय सरोवर में चन्द्र प्रतिमा अथवा चन्द्रबिम्ब की पड़ती छाया पंक के कारण दूषित नही होतो और न उसका चन्द्र बिम्ब पर कोई प्रभाव पड़ता है। कल्हण ने उपमा दी है। पंकिल जल में अथवा पंक में शशि बिम्ब पडता है। किन्तु उस पंक तथा पंकिल जल के कारण उसके बिम्ब में मलिनता नहीं आती। दूषित पंक अथवा पंकिल जल शशि बिम्ब के संसर्ग में आने पर भी मलिन करने से असमर्थ रहता है। इसी प्रकार भोग के मध्य रहते हुए भी भोग का दोष राजा को स्पर्श नहीं कर पाया था। वह भोग मे रहता भी निर्लिप्त था । निर्मल था !