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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 389, कुल 984 में से

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पृष्ठ 389

२८६ राजतरङ्गिणी राज्ञस्तस्यैव राजश्रीः परलोकानुगाऽभवत् । यस्तामयोजयद् भूमौ धर्मेणाऽव्यभिचारिणा ॥ २८१ ॥ २८१. केवल उसी राजा की राज्यश्री उसकी परलोकानुगामिनी हुई। क्यों कि उसने इस भूमि पर अव्यभिचारी धर्म से उस राज्यश्री को संयुक्त कर दिया था। षष्टिमब्दान्प्रशास्योर्वीमासन्नानुचरान्वितः । आरुरोह सदेहोऽसौ लोकाञ्छशिशिखामणेः ॥ २८२ ॥ २८२. इस राजा ने साठ वर्ष तक पृथ्वी का प्रशासन कर निकटवर्ती अनुचरों सहित सदेह शशिशिखामणि के लोक पर आरोहण किया। भृत्या नृपं समाश्रित्य प्रययुः शोचनीयताम् । तत्सुतं तु समालंब्य प्रभुं भुवनवन्द्यताम् ॥ २८३ ॥ २८३. राजा नर का आश्रय लेकर भृत्यों की शोचनीय दशा हुई थी किन्तु उसके पुत्र प्रभु का समालम्बन लेकर उनकी भुवन में वन्दना हुई। यात्याश्रितः किल समाश्रयणीयलक्ष्म्‍यां निन्द्यां गतिं जगति सर्वजनार्चितां वा । गच्छत्यधस्तृणगुणः श्रितकूपयन्त्रः पुष्पाश्रयो सुरशिरोभुवि रूढिमेति ॥ २८४ ॥ २८४. जगत् में आश्रित, आश्रयदाता से प्राप्त निन्दनीय अथवा सर्वजन श्लाघ्य गति को प्राप्त करता है। क्योकि कूप यंत्र का आश्रय वाली तृण की रस्सी नीचे जाती है। और पुष्प का आश्रय लेकर तृण सुर के शिर पर चढ़ता है। पाठभेद : पाठभेद : श्लोक संख्या २७१ में 'रोध्ना' का 'रोहम' श्लोक संख्या २८१ में 'यद् भूमौ' का पाठभेद 'रोयम', 'अनिशम्' का 'भृशम्' तथा 'श्लाघतो- 'यद्भूतो' 'यद्भूतो' 'यद्दुतो' 'यद्भूतो' तथा 'धर्मेणास्य' थयो' का पाठभेद 'श्लाघतोर्मयो' मिलता है। का 'धर्मेणस्य' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २८० (१) मण्डन-विरोधाभास : यहाँ २८२ (१) सिद्ध का राज्यकाल : राजा के लम्बे विरोधाभास अलंकार का प्रयोग कल्हण ने किया राज्यकाल का कारण यह है कि वह शैशवावस्था में है। शंकर के लिए खण्डेन्दुमण्डन शब्द का प्रयोग राजा बन गया था। धात्री माँ के साथ विजयेश्वर में किया है। परन्तु शिव की अर्चना किंवा अर्चा को जाने के उल्लेख से स्पष्ट हो जाता है कि वह उस अखण्डित मण्डन अर्थात् पूर्ण आभूषण माना है। समय शिशु था। शैशवावस्था में उसका अभिभावक खण्डित मण्डन की अर्चा द्वारा खण्डित मण्डनत्व कौन था ? तथा राज्य संचालन किस प्रकार होता की प्राप्ति संगत हो सकती है। परन्तु यहाँ खण्डिते- रहा ? कल्हण ने इस पर प्रकाश नही डाला है। न्दुमण्डन की अर्चा से अखण्डित मण्डन की प्राप्ति सम्भव है। राज्य के मन्त्रियों ने कोई परिषद बना- विरोधाभास का मूल है। कर शासन-सूत्र के संचालन का प्रबन्ध किया हो,

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