राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग •२८७ पाठभेद : श्लोक संख्या २८३ में 'वन्द्यताम्' का पाठभेद 'वन्ध्यताम्' मिलता है । श्लोक संख्या २८४ में 'चिता' का पाठभेद 'चितं' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २८४ (१) यन्त्र : कूप शब्द का प्रयोग कल्हण ने किया है। यह सम्भवतः अरघट्ट अर्थात् रहट के लिए प्रयोग किया गया है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में इसका प्रायः वर्णन मिलता है। परसियन व्हील इसका नवीन नाम है। ईरान में इसके प्रचलन के बहुत पूर्व से वह भारत में प्रचलित था। यह भारतीय अन्वेषण था न कि परसियन । अपना इतिहास भूल जाने के कारण लोगो ने इसे परसियन व्हील का नाम दे दिया है । कल्हण ने ऐतिहासिक दृष्टि से यन्त्र का यहाँ प्रयोग कर भारत का गौरव बढ़ाया है। रहट अर्थात् परसियन व्हील द्वारा कूप से जल; निकाला जाता है। जगत् यही जानता है कि यह परसियन अर्थात् ईरान' वालों का आविष्कार है। परन्तु कल्हण के वर्णन से प्रकट होता है कि कश्मीर में रहट सुदूर प्राचीन काल से प्रचलित था । भारतवर्ष में मेवाड़ ऐसा स्थान है जहाँ विदेशी प्रभाव कम पड़ सका है। वहाँ की जनता शताब्दियों तक स्वाधीनता के लिए युद्ध करती रही । अपनी स्वतन्त्रता सुरक्षित रखने में सफल रही । मै जब हिन्दुस्तानिक लिमिटेड का अध्यक्ष हुआ तो प्राप्य साधनो के कारण मेवाड का कोना-कोना छान डाला । आश्चर्य हुआ । भारतीय संस्कृति सभ्यता वहाँ अपने कुछ मौलिक रूप में दिखाई दी । मन्दिरो की श्रृंखलाएं अछूती खडी हैं। वे खण्डित एवं भंग नहीं किये गये थे । कश्मीर में जिस प्रकार ग्राम-ग्राम में प्राचीन काल में देव स्थान थे उसी प्रकार यहाँ प्रत्येक ग्राम तथा स्थान पर मन्दिर, स्मारक, सती का चौरा आदि बने दिखाई देंगे । पुराने रीति-रिवाज भी कायम मिलेंगे। अपनी भाषा वे बोलते हैं । उस पर फारसी तथा अंग्रेजी का कम प्रभाव पड़ा है। इस समय परिवर्तन तेजी के साथ हो रहा है । मैंने यहाँ पर रहट चलते हुए बहुत देखे । वे अत्यन्त प्राचीन शैली के हैं। शताब्दियों पूर्व से चलते आ रहे हैं। वे लकड़ी के बनाये जाते हैं। परसियन व्हील का नाम बहुत सुना था। यह भी सुना था कि रहट परसियन आविष्कार है। ईरान से भारत में आया था। यह धारणा तथा मान्यता गलत है। 'रहट' भारतीय आविष्कार है। भारत में आज से सहस्रों वर्ष पूर्व चलता था। आज भी चल रहा है। उनका मूल रूप आज भी मेवाड़ में दिखाई पड़ता है। राजस्थान में रहट बहुलता के साथ मिलेगा। मेवाड़ में ५२ विशाल झीलें हैं। वापियाँ हैं। कूप हैं। जलस्रोत हैं। स्रोतस्विनियाँ हैं। सरोवर हैं। पानी की कमी नहीं है। एतदर्थ रहट अत्यन्त उपयोगी पानी उठाने तथा सींचने के लिए कश्मीर के तुल्य उपयोगी यहाँ सिद्ध हुआ, है। कश्मीर में जल का सर्वत्र सुपास है। प्रायः वही बात उदय- पुर के क्षेत्र के विषय में कही जायेगी । कश्मीर में पुराने ढंग के रहट दिखाई नही देंगे। परन्तु मेवाड़ में गांव गांव में अभी तक वे मिलते हैं। यद्यपि बीस पचीस वर्ष में वे भी लोप हो जायेंगे । उनका स्थान पम्पिंग सैट अथवा लौह रहट ले लेगा । नवम्बर सन् १९६७ में मेवाड़ का पर्यटन आरम्भ किया। पुराने मन्दिरों, दुर्गों, भग्नावशेषो के साथ रहटो को देखा। मैने उनका नाम पूछा- लोगों ने उसका नाम 'अरहट' बताया । राज- तरंगिणी के 'अरघट्ट' शब्द की ओर तुरन्त ध्यान गया। इस विषय पर टिप्पणी लिख चुका था। लेकिन उसे पुनः लिखने का निश्चय किया।