राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 391, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें[पृष्ठ संख्या: २८८] राजतरंगिणी
[बायाँ स्तम्भ]
रहट शब्द प्राचीन संस्कृत शब्द 'अरघट्ट' का अपभ्रंश है । 'अर' का अर्थ होता है पहिये की अरा । नेमि के मध्य की खड़ी लकड़ी । उसे पहिये का आरा भी कहते हैं । राष्ट्रीय झण्डों पर चक्र के मध्य केन्द्र बिन्दु से परिधि पर लगी लकड़ियां 'अर' अथवा 'आर' कही जाती है । 'घट' का अर्थ है घड़ा । अर + घट मिलकर बनता है 'अरघट' । अथवा जिसका अर्थ होगा 'घड़ा युक्त आर अथवा अर' । उदयपुर का प्राचीन शैली का 'रहट' आधु- निक रहट से भिन्न है । वह प्राचीन परिभाषा से मिलता है । खड़ा 'अरा' घूमता है । वह चक्र अर्थात् चर्खा को घुमाता है । चर्खा अथवा पहिया पर 'घट' रस्सियों से बँधे रहते हैं । यह 'घट' पहिया से आधुनिक 'रहट' के 'वाल्टी' अथवा 'डब्बो' की तरह नीचे जाते और पानी लेकर घूमते पहिया पर आते हैं । 'अरहट' शब्द इसी 'घरघट' शब्द का अपभ्रंश है । 'मृच्छकटिकम्' नाटक में अरघट, अरघट्टा, रहट का नाम 'कूपयन्त्रघटिका' दिया गया है । (१० : ५६) 'कूपयन्त्रघटिका' वही रस्सी में बँधा घटिका यन्त्र था । जल लेकर ऊपर आता तथा नीचे फिर जाता था । कवि शूद्रक ने उसको उपमा उन्नति एवं अवनति तथा दैव से दी है । भाग्य इसे यन्त्र- घटिका के समान मनुष्य को नीचे गिराता तथा ऊपर उठाता है । 'कांश्चित्तुच्छयति प्रपूरयति वा कांश्चिन्नयत्युन्नतिं कांश्चित् पातविधौ करोति च पुनः कांश्चिन्नयात्याकुलाम् ॥ अन्योन्यप्रतिपक्षसंहतिमियां लोकस्थितिं बोधय- न्नेष क्रीडति कूपयन्त्रघटिका न्यायप्रसक्तो विधिः ॥
[दायाँ स्तम्भ]
कालिदास ने 'मालविकाग्निमित्रम्' नाटक के द्वितीय अंक श्लोक १२ में यन्त्र शब्द का प्रयोग कल्हण के समान किया है । उसका भी अर्थ रहट ही है : बिन्दुच्छेद्यान्पिपासुः परिसरति शिखी भ्रान्तिमद्वारियन्त्रं धर्मैः सम्प्रेक्ष्यमिव नृपगुणे- र्दीर्यते मत्तभसिः ॥ (२:१२) अरघट्ट अरघट्टा, अरघट्टक अथवा रहट को मराठी में 'रहाट' सिन्धी में 'अरट्ट' पंजाबी 'रह्ट' राजस्थानी में 'घरहट' तथा हिन्दी में 'रहट' कहते हैं । यह सब मूल अरघट्ट के अपभ्रंश हैं । इसी प्रकार 'अर' को हरियाणा में 'आरा' हिन्दी में 'आरा गज' कहते हैं । यह लकड़ी या पटिया अथवा चक्र और नेमि के बीच की लम्बी लकड़ी है । परसियन व्हील तथा भारतीय रहट में मौलिक अन्तर था । परसियन व्हील का चलाने वाला पैदल बैल अथवा ऊँट को हाँकता, उसके पीछे स्वयं घूमता है । भारतीय रहट दो प्रकार के होते थे । और हैं । एक तो परसियन रहट की तरह । चलने वाला स्वयं पशु के पीछे हाँकता चलता है । दूसरा रहट पर स्वयं आदमी बैठता है । तेली के पुराने कोल्हू के समान बैठने के लिये स्थान बना रहता है । उसी पर आदमी बैठ कर घानी चलाता है । यही प्रकार मेवाड़ के रहट में विशेष प्रचलित है । रहट पर चलाने वाला स्वयं बैठ जाता है । बैठे ही बैल को हाँकता है । परसियन' रहट में यह बात नहीं है । इस दृष्टि से भारतीय रहट 'परसियन रहट' की अपेक्षा अधिक विकसित था और है । 'परसियन रहट' में मृत्तिका पात्र गोले हंडिया शैली के लगते हैं । ये भी रस्सी से बाँधकर माला रूप चेन की तरह बनाये जाते हैं । उदयपुर के