भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 394

प्रथम तरंग ३६१ हिरण्यकुल इत्यस्य हिरण्योत्सकृदात्मजः । षष्टिं षष्टिं वसुकुलस्तत्सूनुरभवत्समाः ॥ २८८ ॥ हिरण्यकुल : २८८. उसके पुत्र हिरण्यकुल¹ ने हिरण्योत्स² स्थापित किया और साठ वर्ष राज्य किया । वसुकुल : उसके पुत्र वसुकुल³ ने भी साठ वर्ष राज्य किया ।


के कायम मुकाम होकर हमेशा रिआया की फलाह व बहबूद में कोशां रहता था । कुल तीस बरस हकू- मत में गुजारे । पाठभेद : श्लोक संख्या २८७ में 'सप्त त्रिंशति' का पाठ- भेद 'सप्त त्रिंशतं' तथा 'सप्ता त्रिंशति' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २८७ (१) हिरण्याक्ष : आइने अकबरी में 'हिरण्य' नाम तथा राज्यकाल ३७ वर्ष ७ मास दिया गया है । हसन लिखता है—'राजा हरनपाल ने क० २१८४ में बाप के तख्त का रौनक बख्श कर मुकाम रनल आबाद किया । पैंतीस साल सात माह हकूमत व सल्तनत में गुजारे ।' हिरण्याक्ष एक दैत्य का भी नाम है। हिरण्य- कश्यप का भ्राता था । वह वाराह भगवान् द्वारा मारा गया था । (भागवत पुराण ३ : १७ : १८-- ३१, ३ : १८) कथासरित्सागर में हिरण्याक्ष नायक के रूप में चित्रित किया गया है । (६५ : २१५) उसके पिता का नाम कनकाश दिया गया है । उसे कश्मीर का राजा कहा गया है। उसको राजधानी हिरण्य- पुर बतायी गयी है । हरिणाक्ष सरित सागर में एक नायक के रूप में एक विद्याधरी से विवाह करता है । उसके पिता का 'कंच' नाम भी दिया गया है । (२) हिरण्यपुर : श्रीनगर से गान्दर बल तथा सिन्ध उपत्यका में जाने वाली ऊँची सड़क पर 'रांग्येल' ग्राम है । गाव के समीप का नाग एक तीर्थ स्थान माना जाता है । यहाँ हर- मुकुट जाने वाले यात्री आते हैं । इसका उल्लेख तीर्थों में है । सुरेश्वरी माहात्म्य में इसे (२:७) हिरण्यगगा कहा गया है। कल्हण ने इस स्थान को हिरण्यपुर के समीप लिखा है । भिक्षाचर, मयग्राम आधुनिक मनगाम के समीप शिविर डाले पड़ा था । यह स्थान सिन्धु उपत्यका के लार से बहुत दूर नहीं है । लहर अर्थात् लार के विद्रोही जो उसके समर्थक थे, हिरण्यपुर के समीप राजकीय सेना को पराजित किये थे । (रा० त० ८ : ७२९) राजकीय सेना का शिविर अम्रेश्वरपुर अर्थात् अम्बुरहर में पड़ा था । यह स्थान रांग्येल ग्राम से ढाई मील दक्षिण होगा । यही स्थान हिरण्यपुर था । इसी प्रकार जब उच्चल लोहर से बढ़ता आया और सिन्ध उपत्यका से राजधानी पर घेरा डाला था । उस समय मार्ग में ही अर्थात् हिरण्यपुर में ब्राह्मणों ने उसका राज्याभिषेक कर दिया था । पाठभेद : श्लोक संख्या २८८ में 'ण्योत्सकृदा' का 'ण्याक्षस्य चा' तथा 'वसुकुल' का 'बभुकुल' 'बमु- कुल' और 'च मुकुल' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २८८ (१) हिरण्यकुल : आइने अकबरी मे नाम 'हिरेन कुल' तथा उसका राज्यकाल ६० वर्ष दिया गया है । हसन कहता है—'राजा हरन्यगुल (हरण्याक्ष) उसका बेटा था । साठ बरस, अकल व इन्साफ