राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 488, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३५९ तैर्गन्तुं स्वभुवो निवारितरणैर्दत्तेऽवकाशे तत- स्त्यक्तश्रीनगरात्तरात्स नृपतिस्तात्पर्यतो निर्ययौ । आजानेयरजोऽङ्कुराजललनाप्रस्थानसंदर्शन- क्षुभ्यत्पौरजनाश्रुलाजकणिकाकीर्णेन राजाध्वना ॥३६७॥ ३६७. उन लोगों के, स्वभूमि से जाने हेतु युद्ध बन्द कर अवकाश प्रदान करने पर, वह राजा सम्पत्ति त्याग कर, राजमार्ग द्वारा नगर से निकल गया । उस समय उत्तम अश्व की धूल में राज ललनाओं का प्रस्थान देखकर, दुखित होते पुरजनों की अश्रु रूपी लाज¹ कणिका से वह राजमार्ग व्याप्त हो गया था । राज्याच्च्युतस्य बहुशः परिचाररामा- कोशादि तस्य रिपवो व्रजतोऽपजहुः । उर्वारुहो विगलितस्य नगेन्द्रशृङ्गा- द्वल्लीफलादि रभसादिव गण्डशैलाः ॥३६८॥ ३६८. राज्यच्युत एवं गमनशील उस राजा के बहुत से परिवार, कामिनियां और धनादि को शत्रुओं ने उसी प्रकार हरण कर लिया, जैसे गण्डशैल, पर्वत शिखर से पतित वृक्ष को उसके लताफलादि से वेगपूर्वक वंचित कर देता है । रम्यैः शैलपथैर्व्रजञ्छ्रमवशाच्छायां श्रितः शाखिना- मासीनप्रचलायितेन सुमहद् दुःखं विसस्मार सः । दूरात्पामरपूत्कृतैः श्रुतिपथप्राप्तैः प्रबुद्धस्त्वभूद् दृष्टो निर्झरवारिभिः सह मनाक् श्वभ्रे निमज्जन्निव॥३६६॥ ३६९. रम्य शैल पथ पर गमन करते हुए, क्लान्ति वश वृक्षों की छाया का आश्रय लेकर बैठने और पुनः चलने से, उसने महान् दुःख को विस्मृत कर दिया । दूर से सुने गये पामरों के कोलाहलो से, प्रबुद्ध राजा निर्झर वारि के साथ गर्त में डूबता हुआ सा देखा गया ।
पादटिप्पणियाँ : ३६७. (१) लाज : धान का भुना लावा तथा पुष्प का राजपथ तथा राजा की शोभा-यात्रा के समय अथवा शुभ अवसरों पर वर्षा किया जाना पुरानी परंपरा है। प्रायः समस्त भारतवर्ष में यह प्रचलित है। बंगाल में मृतकों की शव-यात्रा के समय लाज- वर्षा की जाती है। विवाह के समय भी लावा परछने की क्रिया हमारी तरफ प्रचलित है।
पाठभेद : श्लोकसंख्या ३६८ में 'रामा' का रामाः', 'दजहुः' का 'विजहुः', 'विगलितस्य' का 'विच- लितस्य' पाठभेद मिलता है । श्लोक संख्या ३६९ में 'मासीनप्रचलायितेन' का 'मासीनः प्रचलायिलेन' 'मासिन प्रचलायितेन' 'मामीनः प्रलयायितेन' 'मासीनप्रल्यायितेन' 'मासीन