भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 489, कुल 984 में से

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पृष्ठ 489

३६० राजतरंगिणी नानाविरुत्तृणपरिमलैरुरुगन्धा वनोर्वी- रम्भःक्षोभप्रतिहतशिलाः पिच्छिलाश्चाद्रिकुल्याः । क्रान्त्वा श्रान्तैर्बिसकिसलयच्छायमुग्धाङ्गलेखै- रध्युत्सङ्गं निहिततनुभिर्मूच्छितं तस्य दारैः ॥३७०॥ ३७०. नाना प्रकार के वीरुत तृणों के परिमल से उग्र गन्धवती वनभूमि, जल के ठोकरों से प्रतिहत शिलाओं और फिसलों से युक्त कुल्याओं को पार करके, मृणाल सदृश मुग्ध अंगलेखाओं एवं उत्संग में निहित शरीरों वाली श्रान्त उसकी स्त्रियां मूच्छित हो गयीं । पर्यन्ताद्रितटाद्विलोक्य सुचिरं दूरीभवन्मण्डलं द्रागामन्त्रयितुं क्षिपत्सु नृपतेर्दारेषु पुष्पान्जलीन् । क्षोणीपृष्ठविकीर्णपक्षति नमतुण्डं स्वनीडस्थितैः सावेगं गिरिकन्दरासु पततां वृन्दैरपि क्रन्दितम् ॥३७१॥ ३७१. सीमान्त पर्वत तट से दूर होते मण्डल को देर तक देखकर शीघ्र विदा लेने के लिये नृपस्त्रियों के पुष्पांजलियों गिराने पर, वेग के साथ नीचे उतरते हुए, गिरिकन्दराओं के, स्वनीड स्थित पक्षिवृन्दों ने भी पृथ्वो तल पर पंख फैला, नमित चंचु हो क्रन्दन १ किया ।

प्रचलायितेन,' 'सुमहद्दुःख' का 'स्वमहद्दुःखः' जहाँ न जाने कितनी मिलनयामिनियों में अपनो महद्दुखः', 'पूत्कृतैः' का, पुत्कृतैः', 'फुत्कृतैः', 'हुत्कृतैः' सुखमय, रसमय, उल्लासमय समय व्यतीत किया तथा 'मनाक् श्वभ्रे' का पाठभेद 'मनः श्वभ्रे' 'पुनः था, उन सबको नमस्कार कर, उन्हें स्मृति के धवल श्वभ्रे' 'गवा श्वभ्रे' 'मनाः श्वभ्रे' 'मानाः श्वभ्रे' पटपर केवल लिखकर विदा हो रही थी । उस 'मनःश्वभ्रे' 'महच्छुव्वश्वभ्रे' पाठभेद मिलता है । कश्मीर मण्डल को उन्हो ने नमस्कार किया जहाँ श्लोकसंख्या ३७० में 'रध्युत्सङ्गं' का पाठभेद वे एक दिन रानी थी । आज रंक थी । करू ओर- 'रप्युत्सङ्गे' तथा 'रध्युरसङ्गे' मिलता है । छोर अज्ञात जगत् मे अनजाने भटकनेवाली थीं उस श्लोकसंख्या ३७१ में 'पर्यन्ताद्रि' का 'पर्य- पवित्र मातृभूमि का जिसे वे पुनः नही देख सकेंगी स्ताद्रि' तथा 'क्षिपत्सु' का पाठभेद 'जहत्सु' और जो केवल उनकी स्मृति मे शेष रह जायगी अन्तिम 'जहत्सु' मिलता है ।

विषयटिप्पणियाँ : इस ३१ (१) नमितं चंचु : कल्हण ने करुण धुर दक्षिण २.को यहाँ पराकाष्ठा कर दी है। मूल प्रचलित ये । वाल समझने पर ही पदलालित्य का रस समग्र इस प्रकार के ३ । हस्तिमात्रान् महाकायाःरन्त करुण दृश्य कल्हण ने पर्वतांश्च समुत्पाटय यन्त्रैः अपनो जन्मभूमि जहाँ उन [ महाकाय महाबली कां। जहाँ युवती हुई थी । वोल घोरज देन करुणा दृश्य का हो गया । वे बैठे- गये । अपने घोपलों से रामाः', का 'विच- 'मासीनप्रचलायितेन' 'मासिन प्रचलायितेन' 'सासीनप्रल्यायितेन' 'मासीन सम्मुख पंख फैलाकर नमस्कार किया ।

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