राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 490, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ३६१ स्तनयुगललग्नस्रस्तमूर्धांशुकानां त्रिकवलनविलोलं वीक्ष्य दूरात्स्वदेशम् । अवहत रुदतीनां मौलिविन्यस्तहस्तं पथि नृपवनितानामश्रुभिर्निर्झराम्भः ॥३७२॥ ३७२. पीछे मुड़कर दूर से स्वदेश को देखकर, शिर से गिरे वस्त्र को स्तन युगल पर सम्हालती, तथा मस्तक पर हाथ रख कर रुदन करती, नृपवनिताओ के अश्रुओं से, मार्ग में निर्झर जल बहने लगा । प्रीतिस्थैर्यैरुचितवचनाप्तिभया शोकशान्त्या निर्व्याजाज्ञाग्रहणगुरुभिस्तैश्च तैश्चोपचारैः । तस्य स्नेहादुपगतवतो राज्यविभ्रंशदुःखं मन्दीचक्रुः स्वभुवि सुजना भूपतेर्भूमिपालाः ॥३७३॥ ३७३. स्थिर प्रीतियों से, उचित वचन प्रयोग से, शोक शान्ति से, अकारण आज्ञा ग्रहण करने की गम्भीरता से, स्नेह से तथा और भी उन-उन उपचारों द्वारा अपनी भूमि में आये इस भूपति के राज्य विभ्रंश के दुःख को सज्जन भूमिपालों ने मन्द कर दिया। दी और स्वयं नमित चंचु होने लगे किन्तु दैव का हृदय उनके दुर्दिन को देखकर भी नहीं पसीजा। मानव हृदय उनके भाग्य विपर्यय पर इस विदाई के समय उन्हें बिदाकर दो बूँद आँसू भी नही बहा सका । वह काम किया पक्षियों ने। पाठभेद : श्लोकसंख्या ३७२ ये 'तलनग्न' का 'बलनद्ध'; 'विलोलं' की 'विलोमं'; 'नृपवनितानां' का 'प्लवलानां वलं कृत' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३७२ (१) श्लोक संख्या ३६८ से ३७८ तक करुण रस से ओत प्रोत संस्कृत साहित्य एवं काव्य में उत्कृष्ट माने जायेगा। कल्हण करुण रस व्यक्त करने की प्रतिभा का स्वयं एक उदाहरण उपस्थित करता है । इसी प्रकार का उदाहरण स्पेन के इतिहास में मिलता है । स्पेन का अन्तिम मूर राजा बोअबदिल को सन् १४९२ ई० में फेस्टिलियन ने निर्वासित कर दिया। वह जब अपने राज परिवार के साथ ४६ पदुल पर्वत पर पहुँचा तो अन्तिम बार उसने करुण दृष्टि से ग्रनडा को देखा । जहाँ पर बोअबदिल ने पर्वत पर अन्तिम बार ग्रनडा को देखा था और स्पेन से विदाई ली थी उसे आज भी 'एल डलटियों सीसपिरो-डेल-मोरो' अर्थात् 'मूर की अन्तिम आह' कहते हैं । राजा युधिष्ठिर किस दिशा में गया था, किस मार्ग, संकट किंवा द्वार से कश्मीर का त्याग किया था, किस स्थान से रानियों ने अपनी मातृभूमि कश्मीर मण्डल का अन्तिम दर्शन कर उसे पुष्पांजलि अर्पित की थी । पता नही चलता । कल्हण इस घटना स्थल के विषय में शान्त है । उसको यह शान्ति इस बात को प्रकट करती है। उसने किसी प्रचलित श्रुति के आधार पर अथवा पूर्व इतिहासकारों के अत्यन्त गूढम सूत्र के आधार- पर उक्त वर्णन लिखा है । राजा युधिष्ठिर तथा उसके राज्य की परिस्थिति, विद्रोह, भ्रष्टशासन, मन्त्रियों के कुमन्त्र आदि घटनाओं का वर्णन 'दशकुमारचरित' में कवि