भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 542, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 542

द्वितीय तरंग ४०५ चारुचारित्रया तत्र तया सत्रेऽवतारिते । नानापथागतानाथासार्थैरद्यापि भुज्यते ॥ ५८ ॥ ५८. सच्चरित्रा उस देवी द्वारा वहाँ स्थापित सत्र १ में नाना पन्थों से आये अनाथ आज भी भोजन करते हैं । आभ्यामभ्यधिकं कर्तुं शक्तिः कस्येति निश्चितम् । विचिन्त्यारोचकी धाता नापत्यं निर्ममे तयोः ॥ ५६ ॥ ५९. इन दोनों से अधिक करने की निश्चय ही किस की शक्ति है ? यह सोचकर अरोचकी विधाता ने उन दोनों के लिये सन्तति का विधान नहीं किया । वेधाः परां धुरमुपैति परीक्षकाणा- मिच्छोः फलप्रजनने न कृतश्रमो यः । विस्मारितोद्दरसुधारसयोग्यतात् तत् तस्मादुदेत्य किमिवाभ्यधिकं विदध्यात् ॥ ६० ॥ ६०. विधाता परीक्षकों की पराकाष्ठा को प्राप्त होता है, जिस ने इक्षु१ के फल देने में परिश्रम नहीं किया । सुस्वाद सुधा रस को भी विस्मरित कर देने की योग्यता वाले, उससे बढ़कर और वह क्या कर सकता था । पादटिप्पणियाँ : ५८ ( १ ) : सोम यज्ञ का समय जो १३ से १०० दिनों के अन्दर पूर्ण होता है उसके लिये प्राचीन समय में यह शब्द प्रयुक्त किया जाता था । इसका अर्थ आश्रय स्थान, शरण स्थान तथा वह स्थान है, जहाँ गरीबों को भोजन दिया जाता है। धत्तिणी तथा सत्र में सूक्ष्म भेद है। सत्र प्रायः उसी दान के लिए प्रयुक्त होता है जहाँ गरीबों को बना भोजन दिया जाता है जैसे लंगर अथवा क्षेत्र । काशी में क्षेत्र विद्यार्थी तथा सन्यासियों का मुफ्त भोजन स्थान है । सत्र और क्षेत्र समानार्थक हैं । कहावत है—क्षेत्रे भोजं मठे निद्रा । पादटिप्पणियाँ राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५८वां श्लोक है। पाठभेद : श्लोकसंख्या ६० में 'सुवारस' का 'मुदारम्', 'मुदारस्', 'मुवारम्'; 'योग्यतात्तत्' का 'योग्यतात्तु', 'योग्यता तु', 'योग्यता तत्', 'योग्यताः तत्' 'योग्य- वात्तान्' तथा 'दुदेत्य' का पाठभेद 'उत्पादयित्वा' मिलता है । पादटिप्पणियां राजतरंगणी सूक्तिसंग्रह का यह ५३ वाँ श्लोक है । ६०. ( १ ) इक्षु : इसे ईख और पूर्वी उत्तर- प्रदेश तथा बिहार में ऊख कहते हैं । दोनो ही शब्द इक्षु के अपभ्रंश हैं । इक्षु शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद ( १ : ३४ : ७ ) में प्राप्त होता है । तत्प- श्चात् संहिताओं में भी उल्लेख मिलता है । ( मै सं. : ३ : ७ : ९; ४ : २ : ९; वा. स. २५ : १ : तैं. स : ३ : १६ : १; तथा कठक अश्वमेध ३ : ८ ) वैदिक माहित्य से यह पता नही चलता कि इसकी खेती होतो थी अथवा यह वन में उत्पन्न होता था । कश्मीर की उपत्यका किंवा वादी में ईख प्रायः नही होती है । इसकी पैदावार इस समय जम्मू काश्मीर राज्य के जम्मू प्रदेश मे तहसील रन- बीर सिंह पूरा में खूब होती है । इस समय यहाँ ६ हजार एकड़ मे ईख की खेती होती है । जम्मू के

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास) · पृष्ठ 542, कुल 984 में से · BharatKosha