राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०४ राजतरंगिणी सा यत्र शुचिचारित्रा विपन्नं पतिमन्वगात् । स्थानं जनैस्तद् वाक्पुष्टाटवीत्यद्यापि गद्यते ॥ ५७ ॥ ५७. पवित्रचरित्रा उसने जहां दिवंगत पति का अनुगमन किया था, उस स्थान को लोग आज भी वाक्पुष्टाटवी¹ नाम से कहते हैं। के साथ, पत्नियों, दास, पशु, स्नेही, अस्त्र-शस्त्र, नलिन प्रच्छद पर जाने से शीतल हो गयी थी । अश्वादि जला दिये जाते थे अथवा मारकर अथवा पाठभेद : जीते जी कब्र के साथ गाड दिये जाते थे । श्लोकसंख्या ५७ में 'शुचिचारित्रा' का पाठभेद ब्रह्मपुराण, व्यास स्मृति तथा अथर्ववेद का सम- 'शुचिचारित्र्या' तथा 'शुचिदारिद्रा' मिलता है । र्थन सती प्रथा के पक्ष मे लिया जाता है । किन्तु वह अत्यन्त क्षीण समर्थन स्रोत प्रमाणित हुआ है। पादटिप्पणियाँ : भगवान् मनु ने सती होने के लिए कहीं नहीं ५७ (१) वाक्पुष्टाटवी : वाक्पुष्टा अटवी लिखा है । कहाँ है। इसका पता नहीं चलता । जोनराज ने आधुनिक युग में सती शुद्ध रूप से नही परन्तु वाक्पुष्टा अटवी का उल्लेख अलाउद्दीन (अल्लेश्वर ) प्रेमिकायें जो प्रेमी को पति स्वरूप मानती थी उनके के सम्बन्ध में किया है। इसके समीप एक गिरि गह्वर साथ प्राण त्याग दी हैं। जर्मनी के अधिनायक मे एक डायन के होने का वर्णन किया है। जिससे हिटलर की आत्महत्या के समय उसकी प्रेमिका इवा अलाउद्दीन का सामना हुआ था । अतएव यह स्थान ब्रौ ने भी एक साथ एक मुहूर्त मे आत्म हत्या किसी पर्वत के समीप रहा होगा । जोनराज ने की थी । दोनो का शव एक साथ एक ही स्थान वाक्पुष्टाटवी का उल्लेख किया है। (जोन राज श्लोक पर फूंका गया था । ३४३) उससे प्रकट होता है कि उसके समय तक उस इसी प्रकार इटली के अधिनायक बेनितो स्थान का महत्व था तथा लोगों में धुंधली स्मृति उस मुसोलिनी की प्रेमिका जो उनके साथ थी । उनके घटना की शेष रह गयी थी । साथ ही गोली से मार दी गयी थी। उसने मुसोलिनी राजपुत्रः स वाक्पुष्टाटवीं लोहारसाददन् । के साथ ही मरना पसन्द किया था । भावना सती योगिनीचक्रमद्राक्षीत् कदाचिद्गिरिगह्वरे ॥३४६॥ प्रथा तथा अन्य दोनों उदाहरणों से एक ही प्रकार पं० गोविन्द कोल के अनुसार यह स्थान खूंद की हैं । नर वाव परगना में वूटू ग्राम होना चाहिए । इस ५६ (३) नलिन : कल्हण ने चिता की स्थान पर गुलाब गड दर्रा के पर्वत बाहमूल से होकर ज्वाला की उपमा नलिन से दी है। कश्मीर में पहुँचते है । श्री स्टीन ने इस स्थान की यात्रा सित- नलिन अर्थात् कुमुदिनी का रेशा शीतलता लाने के म्बर सन् १८९१ मे की थी । किन्तु यहाँ पर लिए प्रयोग किया जाता है। अधिकतया उसका लेप उन्हें स्थानीय लोगों से उक्त कथा के विषय मे कुछ करते हैं । कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तल में इस जानकारी नहीं मिल सकी । प्रकार के प्रयोग का वर्णन किया है। पाठभेद : कल्हण ने अग्नि ज्वाला को नलिन जैसा शीतल- श्लोकसंख्या ५८ में 'नानापथागता' का पाठभेद प्रद बनाया है। रानी के विरह ज्वर को उष्णता 'नानागतपथागता' मिलता है ।