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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

४०४ राजतरंगिणी सा यत्र शुचिचारित्रा विपन्नं पतिमन्वगात् । स्थानं जनैस्तद् वाक्पुष्टाटवीत्यद्यापि गद्यते ॥ ५७ ॥ ५७. पवित्रचरित्रा उसने जहां दिवंगत पति का अनुगमन किया था, उस स्थान को लोग आज भी वाक्पुष्टाटवी¹ नाम से कहते हैं। के साथ, पत्नियों, दास, पशु, स्नेही, अस्त्र-शस्त्र, नलिन प्रच्छद पर जाने से शीतल हो गयी थी । अश्वादि जला दिये जाते थे अथवा मारकर अथवा पाठभेद : जीते जी कब्र के साथ गाड दिये जाते थे । श्लोकसंख्या ५७ में 'शुचिचारित्रा' का पाठभेद ब्रह्मपुराण, व्यास स्मृति तथा अथर्ववेद का सम- 'शुचिचारित्र्या' तथा 'शुचिदारिद्रा' मिलता है । र्थन सती प्रथा के पक्ष मे लिया जाता है । किन्तु वह अत्यन्त क्षीण समर्थन स्रोत प्रमाणित हुआ है। पादटिप्पणियाँ : भगवान् मनु ने सती होने के लिए कहीं नहीं ५७ (१) वाक्पुष्टाटवी : वाक्पुष्टा अटवी लिखा है । कहाँ है। इसका पता नहीं चलता । जोनराज ने आधुनिक युग में सती शुद्ध रूप से नही परन्तु वाक्पुष्टा अटवी का उल्लेख अलाउद्दीन (अल्लेश्वर ) प्रेमिकायें जो प्रेमी को पति स्वरूप मानती थी उनके के सम्बन्ध में किया है। इसके समीप एक गिरि गह्वर साथ प्राण त्याग दी हैं। जर्मनी के अधिनायक मे एक डायन के होने का वर्णन किया है। जिससे हिटलर की आत्महत्या के समय उसकी प्रेमिका इवा अलाउद्दीन का सामना हुआ था । अतएव यह स्थान ब्रौ ने भी एक साथ एक मुहूर्त मे आत्म हत्या किसी पर्वत के समीप रहा होगा । जोनराज ने की थी । दोनो का शव एक साथ एक ही स्थान वाक्पुष्टाटवी का उल्लेख किया है। (जोन राज श्लोक पर फूंका गया था । ३४३) उससे प्रकट होता है कि उसके समय तक उस इसी प्रकार इटली के अधिनायक बेनितो स्थान का महत्व था तथा लोगों में धुंधली स्मृति उस मुसोलिनी की प्रेमिका जो उनके साथ थी । उनके घटना की शेष रह गयी थी । साथ ही गोली से मार दी गयी थी। उसने मुसोलिनी राजपुत्रः स वाक्पुष्टाटवीं लोहारसाददन् । के साथ ही मरना पसन्द किया था । भावना सती योगिनीचक्रमद्राक्षीत् कदाचिद्गिरिगह्वरे ॥३४६॥ प्रथा तथा अन्य दोनों उदाहरणों से एक ही प्रकार पं० गोविन्द कोल के अनुसार यह स्थान खूंद की हैं । नर वाव परगना में वूटू ग्राम होना चाहिए । इस ५६ (३) नलिन : कल्हण ने चिता की स्थान पर गुलाब गड दर्रा के पर्वत बाहमूल से होकर ज्वाला की उपमा नलिन से दी है। कश्मीर में पहुँचते है । श्री स्टीन ने इस स्थान की यात्रा सित- नलिन अर्थात् कुमुदिनी का रेशा शीतलता लाने के म्बर सन् १८९१ मे की थी । किन्तु यहाँ पर लिए प्रयोग किया जाता है। अधिकतया उसका लेप उन्हें स्थानीय लोगों से उक्त कथा के विषय मे कुछ करते हैं । कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तल में इस जानकारी नहीं मिल सकी । प्रकार के प्रयोग का वर्णन किया है। पाठभेद : कल्हण ने अग्नि ज्वाला को नलिन जैसा शीतल- श्लोकसंख्या ५८ में 'नानापथागता' का पाठभेद प्रद बनाया है। रानी के विरह ज्वर को उष्णता 'नानागतपथागता' मिलता है ।

द्वितीय तरंग ४०५ चारुचारित्रया तत्र तया सत्रेऽवतारिते । नानापथागतानाथासार्थैरद्यापि भुज्यते ॥ ५८ ॥ ५८. सच्चरित्रा उस देवी द्वारा वहाँ स्थापित सत्र १ में नाना पन्थों से आये अनाथ आज भी भोजन करते हैं । आभ्यामभ्यधिकं कर्तुं शक्तिः कस्येति निश्चितम् । विचिन्त्यारोचकी धाता नापत्यं निर्ममे तयोः ॥ ५६ ॥ ५९. इन दोनों से अधिक करने की निश्चय ही किस की शक्ति है ? यह सोचकर अरोचकी विधाता ने उन दोनों के लिये सन्तति का विधान नहीं किया । वेधाः परां धुरमुपैति परीक्षकाणा- मिच्छोः फलप्रजनने न कृतश्रमो यः । विस्मारितोद्दरसुधारसयोग्यतात् तत् तस्मादुदेत्य किमिवाभ्यधिकं विदध्यात् ॥ ६० ॥ ६०. विधाता परीक्षकों की पराकाष्ठा को प्राप्त होता है, जिस ने इक्षु१ के फल देने में परिश्रम नहीं किया । सुस्वाद सुधा रस को भी विस्मरित कर देने की योग्यता वाले, उससे बढ़कर और वह क्या कर सकता था । पादटिप्पणियाँ : ५८ ( १ ) : सोम यज्ञ का समय जो १३ से १०० दिनों के अन्दर पूर्ण होता है उसके लिये प्राचीन समय में यह शब्द प्रयुक्त किया जाता था । इसका अर्थ आश्रय स्थान, शरण स्थान तथा वह स्थान है, जहाँ गरीबों को भोजन दिया जाता है। धत्तिणी तथा सत्र में सूक्ष्म भेद है। सत्र प्रायः उसी दान के लिए प्रयुक्त होता है जहाँ गरीबों को बना भोजन दिया जाता है जैसे लंगर अथवा क्षेत्र । काशी में क्षेत्र विद्यार्थी तथा सन्यासियों का मुफ्त भोजन स्थान है । सत्र और क्षेत्र समानार्थक हैं । कहावत है—क्षेत्रे भोजं मठे निद्रा । पादटिप्पणियाँ राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५८वां श्लोक है। पाठभेद : श्लोकसंख्या ६० में 'सुवारस' का 'मुदारम्', 'मुदारस्', 'मुवारम्'; 'योग्यतात्तत्' का 'योग्यतात्तु', 'योग्यता तु', 'योग्यता तत्', 'योग्यताः तत्' 'योग्य- वात्तान्' तथा 'दुदेत्य' का पाठभेद 'उत्पादयित्वा' मिलता है । पादटिप्पणियां राजतरंगणी सूक्तिसंग्रह का यह ५३ वाँ श्लोक है । ६०. ( १ ) इक्षु : इसे ईख और पूर्वी उत्तर- प्रदेश तथा बिहार में ऊख कहते हैं । दोनो ही शब्द इक्षु के अपभ्रंश हैं । इक्षु शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद ( १ : ३४ : ७ ) में प्राप्त होता है । तत्प- श्चात् संहिताओं में भी उल्लेख मिलता है । ( मै सं. : ३ : ७ : ९; ४ : २ : ९; वा. स. २५ : १ : तैं. स : ३ : १६ : १; तथा कठक अश्वमेध ३ : ८ ) वैदिक माहित्य से यह पता नही चलता कि इसकी खेती होतो थी अथवा यह वन में उत्पन्न होता था । कश्मीर की उपत्यका किंवा वादी में ईख प्रायः नही होती है । इसकी पैदावार इस समय जम्मू काश्मीर राज्य के जम्मू प्रदेश मे तहसील रन- बीर सिंह पूरा में खूब होती है । इस समय यहाँ ६ हजार एकड़ मे ईख की खेती होती है । जम्मू के

४०६ राजतरंगिणी दीर्घदुर्दिननष्टार्कं राष्ट्रमात्मापनागतः । ज्ञात्वा राज्यग्निसाद्देहं सा चकारेति केचन ॥ ६१ ॥ ६१. अपने दुष्कृत्य के कारण बहुत दिनों तक रवि रहित राष्ट्र को जानकर उस रानी ने देह को अग्निसात् कर दिया। ऐसा कुछ लोगों का विचार है। ततोऽन्यकुलजो राजा विजयोऽष्टावभूत्समाः । पत्तनेन परीतं यश्चकार विजयेश्वरम् ॥ ६२ ॥ ६२. तदुपारन्त अन्य कुलोत्पन्न राजा विजय आठ वर्ष रहा, जिसने विजयेश¹ को नगर से घिरवाया।

नहरी क्षेत्र में भी ईख की उपज होने लगी है। इस राज में कुल ईख १.६ हजार हेक्टर मे बोया जाता है। उत्पादन ११.२३ हजार मेट्रिक टन का होता है। मैने सन् १९६३ मे जम्मू प्रदेश की यात्रा मे यह खेती देखी है। ईख अच्छी होती है। शर्करा अर्थात् चीनी का उत्पादन सर्वप्रथम भारत मे ही प्रारम्भ हुआ था। यूनानी भारत में आये। उन्हे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि डण्ठल से शहद निकलती है। जो महत्त्व भारत में शर्करा का प्राचीन काल में था वही पश्चिम तथा यूरोप मे मधु का था। कश्मीर उपत्यका में ईख का अभाव था। वहाँ उसका माधुर्य दुर्लभ पदार्थों मे समझा जाता था। आम भारत मे साधारण चीज है। किन्तु वही श्रीनगर में दुर्लभ पदार्थ है। इक्षु यद्यपि मधुर था परन्तु विधाता ने उसे फल नहीं दिया है। यदि उसमे फल होता तो सम्भवतः गन्ने के माधुर्य से भी अधिक माधुर्य होता। ईख के रस को सुधारस से भी ऊँचा स्थान कल्हण देता है। पाठभेद : श्लोक संख्या ६१ मे 'नष्टार्कम्' का पाठभेद 'नष्टार्क' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ६२. (१) · श्री विल्सन ने अभिषेक का काल ईसापूर्व ६६ वर्ष ९ मास तथा समीकृत काल सन् ९० ई० और राज्य काल ८ वर्ष दिया है।

श्री स्टीन ने ग्रहण के आधार पर गणना कर राज्याभिषेक का समय लौकिक संवत् २९९६ तथा राज्य काल आठ वर्ष दिया है। प्रो एम० पी० पण्डित ने ईसा पूर्व ६९ वर्ष तथा राज्य काल ८ वर्ष दिया है। श्री याली ने यह समय सप्तर्षि संवत् ३८६१ तथा सन् ९१ ई० दिया है। १ आइने अकबरी में राजा विजय को 'बेजोरो' लिखा है। राज्य काल ८ वर्ष दिया गया है। हसन लिखता है—राजा विजय २९६८ क० में अराकीने सल्तनत के इत्तफाक और मशविरह से सरवराद्राय सल्तनत हुआ। शहर के बड़े लोगो में से था। बेजबारह का शहर तामीर करके अपना पायतख्त बनाया। विजय शूर का मन्दिर इन्तहाई रफअत और संगीनी के साथ बुलन्द किया। मुद्दत हकूमत आठ बरस। (२) विजयेश : टिप्पणी विजयेश्वर ८४ तथा १०५ द्रष्टव्य है। श्री विल्सन ने (पृष्ठ ३०) लिखा है कि विजयेश का मन्दिर राजा विजय ने राजधानी के अन्दर बनवाया। यह बात प्रमाणित नही होती। विजय ने विजयेश का मन्दिर ब्रिजवोर अर्थात् विजय क्षेत्र मे बनाया। यही परम्परा, जनश्रुति तथा अन्य उपलब्ध प्रमाणो से प्रमाणित होता है। विल्सन को इस विषय मे भ्रम हो गया है।

द्वितीय तरंग ४०७ सुतो महीमहेन्द्रस्य जयेन्द्रस्तस्य भूपतेः । क्ष्मामाजानुभुजो राजा बुभोजाथ पृथुप्रथः ॥ ६३ ॥ ६३. उस मही महेन्द्र भूपति का पुत्र आजानुबाहु, इन्द्र तुल्य राजा जयेन्द्र ने पृथ्वी का भोग किया । पादटिप्पणियाँ : ६३ ( १ ) जयेन्द्र : श्री विल्सन ने अभिषेक काल ईसापूर्व ६० वर्ष ९ मास तथा समीकृत काल स० ९८ई० और राज्य काल ३७ वर्ष माना है । श्री स्टीन ने राज्याभिषेक का समय कल्हण के आधार पर गणनाकर लौकिक संवत् ३००४ वर्ष तथा राज्यकाल ३७ वर्ष रखा है । एस. पो. पण्डित ने यह समय ईसापूर्व ६१ वर्ष तथा राज्यकाल ३७ वर्ष माना है । श्री यातो ने यह समय सप्तर्षि संवत् ३८९८ तथा सन् १२८ ई० दिया है । आइने अकबरी में जयेन्द्र को 'चुन्दर' लिखा है । राज्यकाल ३७ वर्ष दिया गया है । आइने अकबरी में सन्धिमति के विषय में सबसे अधिक लिखा है । अबुलफजल कहता है—राजा जयेन्द्र इस दृष्टि में लौकिक संवत् ३००४ में राजा हुआ । वह भूमि पर महेन्द्र अर्थात् इन्द्र तुल्य था । वह आजानुबाहु था । राजा पृथु तुल्य प्रतापी था । सन्धिमति : उसका मन्त्री महा मेधावी सन्धि- मान था । वह शिवभक्त था । महात्मन् ईशान का शिष्य था । उसकी कीर्ति कश्मीर मण्डल में व्याप्त हो गई थी । राजा एवं राजन्य वर्ग कान के कच्चे होते हैं । राजदरबारियों ने मन्त्री की मेधा उसकी कीर्ति तथा प्रिय होने का दूसरा अर्थ लगाना आरम्भ किया । राजा के सम्मुख उसके गुण दोष रूप में बढ़ा-चढ़ाकर किये जाने लगे । उसकी बढ़ती ख्याति तथा शक्ति राजा के लिए घातक सिद्ध होगी यह बात राजा के मन में बैठा दी गयी । राजा मन्त्री से शंकित रहने लगा । उसके प्रति द्वेष भावना उत्पन्न हो गई । चपल कर्ण राजा ने उसका राज दरबार में आना बन्द कर दिया । उससे क्रोधित होकर उसकी सब सम्पत्ति छीन कर उसे दरिद्र बना दिया । हसन लिखता है—राजा जयेन्द्र सन्दमत वजीर के इमदाद व इनायत से २९९४ क० में बापके कायम मुकाम तख्त नशीन हुआ । कुछ मुद्दत अदल व इन्साफ में गुजारी । बिल आखीर अपने वजीर से नाराज होगया । और अरसा दस साल तक उसे कैद व बन्द में मवतिला रखा । और जिस कदर भी उसके पास असबाब था लूट लिया । लेकिन अवाम वजीर की नेक नियती से खुश थे और अपनी जगह परचमी गोरषा करते कि किसी न किसी दिन वजीर ही बादशाह होगा । यह चीज भी राजा के कान में पहुँच गयी । हुकम दिया कि वजीर को सूली दे दें । चुनाच शाही हुकम के बमूजिब वजीर को सूली पर चढ़ा दिया गया । और गरीब जानसे रुखसत हुआ । लेकिन इसके बाद ही राजा पर वहशत व दीवानगी सवार हो गयी और चन्द दिनों बाद खुद भी दुनिया से रुखसत हो गया । मुद्दत हकूमत ३७ साल । चूंकि राजा जयेन्द्र बे औलाद था । इसलिए उसकी वफात के चन्द दिनों तक सल्तनत कश्मीर बादशाह के बगैर रही । ईशानदेव नामक एक आबिद वजाहिद इन्शान को जो वजीर सन्दमत का मुरी था और अरसा दराज से मुकाम इशः बरारी में गोशः नशीन था । जब वजीर मजकूर को सूली की खबर सुनी तो उसके लाश को जलाने की नीयत से दार के नीचे आया । वजीर के जिस्म को सूली से उतार कर गुस्ल देने के लिये तैयार हुआ । कैफियत ( कफ ) ईशानदेव ने जब उसके माथे पर नजर डाली तो देखा कि उसपर यह तीन फिकरह लिखे हुए हैं—

४०८ राजतरंगिणी अलोलकीर्तिकल्लोलदुकूलवलनोज्ज्वलाम् । बभार यद्भूजस्तम्भो जयश्रीसालभञ्जिकाक् ॥ ६४ ॥ ६४. जिसके भुजस्तम्भ ने, निश्चल कीर्तिकल्लोलरूपी दुकूल के वलन से शोभायमान जयश्री शालभंजिका' को धारण किया था।


१-जब तक यह शख्स जिन्दा रहेगा मुफलिस रहेगा। २-दस साल तक कैद में रहकर दार पर मरेगा। ३-उसके बाद राज लेगा। ईशान देव ने दिल में सोचा कि इन तीन फिकरो में से दो का मजमून ब अमल आ गया है। और तीसरे फिकरह का मजमून भी यकीमन् अमल में आयेगा। लिहाजा उसकी लाश वही छोड़कर एक पोशीदह जगह तलाश की। वहाँ उसे रखकर खुदा की कुदरत का मुन्तज़िर रहने लगा। एक रात देखा कि मैदान नूरानी हो गया है। और चन्द जोगनी आई हैं। उन्होंने वजीर की लाश को सूली से उतार लिया है। और उससे बातचीत में मशगूल हैं। ईशानदेव तमाम रात काँपता रहा और हैरान था कि यह कौन हैं। सुबह के वक्त जब जोगिनी जाने लगीं और उन्होंने लाश मजकूर को बदस्तूर दार पर लटकाना चाहा तो ईशानदेव ने तलवार हाथ में लेकर जोगनियों को डराया और बाद में जोर जोर से शोर व गोगा मचाया यह देख कर औरतें गायब हो गयीं उनमें से एक ने कहा— “ईशान देव इस शख्स को खुदा ने हमारी वजह से जिन्दा किया है। हम पर तू क्यों तलवार उठाता है। वह राजा सन्धीमान है। और एक दिन बहुत बडा राजा होगा। जब वजीर जिन्दा हो गया तो अपने पीर के पैरों में पड़ा। उस वक्त लोग हरतरफ से जमा हुए और वजीर को जिन्दा देखकर निहायत हैरान हुए। लोग उसे पहले से जानते थे। उसे देखने ही पहचान गये। चेदाचीन में दायर उसके अखलाक बरीमाना को देखकर उसे मुल्क कश्मीर की हुकूमत कबूल करने को कहा। पहले तो उसने इन्कार किया। बिलाखिर अपने पीर के कहने से सल्तनत कबूल करने पर राजी हो गया। (पृष्ठ ५४-५५)

पाठभेद : श्लोक संख्या ६४ में 'अलोल' का 'आलोल' 'दुकूल' का 'दुकूल' 'धो' का 'द्यो' तथा 'साल-भञ्जिकाम्' का पाठभेद 'शालभञ्ज्रिकाम्' मिलता है।

पादटिप्पणियाँ : ६४ (१) शालभंजिकाः-अर्थ पुतली होता है। इसका अर्थ वेश्या भी होता है। साँची स्तूपों के घेरे पर शालभंजिका मूर्तियाँ उत्कीर्ण मिलती हैं। मेरे एक मित्र ने शालभंजिका का अर्थ पर्वों तथा पवित्र उत्सवों अथवा यात्रा के समय लाज वर्षा करने वाली कमनीय बालाओं से किया है। किन्तु इसका वर्णन मुझे कहीं नहीं मिल सका। वृक्ष को पकड़ कर स्त्रियाँ खड़ी होती थी। उसके तले उत्सव मनाती थीं। इस प्रकार वृक्षों को पकड़ने वाली स्त्रियों को शालभंजिका कहा गया है। कालान्तर में इसी प्रकार की मूर्ति काष्ठ तथा पाषाण पर बनायी जाने लगी। उसे शालभंजिका की संज्ञा दे दी गयी। निःसन्देह यहाँ इसका तात्पर्य निर्जीव पुतली से है। पुतली चालक के संकेत पर ही कार्य करती है। इसी प्रकार जयश्री इस राजा के अभिप्रायानुसार कार्य करती है। अर्थात् उसे विजय प्राप्त होता ही है। शालभंजिका का एक अर्थ और मिलता है। यह काष्ठ की स्त्री प्रतिमा घटसहित बनायी जाती थी। उत्सवों तथा शुभ कार्य काल में द्वार पर मजा

द्वितीय तरंग ४०९ तस्याभूदद्भुतोदन्तो भवभक्तिविभूषितः । राज्ञः संधिमतिर्नाम मन्त्री मतिमतां वरः ॥ ६५ ॥ ६५. उस राजा का अद्भुत वृत्तान्त युक्त, शिवभक्ति विभूषित, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ सन्धिमति नामक मन्त्री हुआ। नास्त्युपायः स संसारे कोऽपि योऽपोहितुं क्षमः । भूपालमत्तकरिणामेषां चपलकर्णताम् ॥ ६६ ॥ ६६. संसार में कोई भी ऐसा उपाय नहीं है, जो इन भूपाल रूपी मत्त गजों की चपल कर्णता१ को दूर करने में समर्थ हो। अत्यद्भुतमतिः शङ्क्यः सोऽयमुक्त्वेति यद्विटैः । तस्मिन्धीसचिवे द्वेषस्तेनाग्राह्यत भूभुजा ॥ ६७ ॥ ६७. "अत्यन्त अद्भुत मतिमान् भी यह आशंकनीय है", यह कहकर, विटों ने, राजा को उस धीमान् मन्त्री के प्रति द्वेषयुक्त कर दिया।


[बायाँ स्तम्भ] कर रख देते थे। यह पुतली किंवा प्रतिमा शाल वृक्ष की बनती थी अतएव उसे शालभंजिका कहा जाता था। एक मत और है। शालभंजिका एक उत्सव प्रति वर्ष मनाया जाता था। यदि शालभंजिका का अर्थ वेश्या किंवा गणिका से लिया जाय तो काशी में गणिकाओं का लोलार्क छठ के दिन बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक तक मेला लगता था। काशी की सभी गणिका कीनाराम के स्थल पर तथा मार्गों में गाती थीं। उनका स्वागत सत्कार होता था। आज से पचास वर्ष पूर्व तक यह उत्सव धूमधाम से होता था। अब यह बन्द हो गया है। सुधारवादी प्रवाह में तिरोहित हो गया है। केवल स्मृति मात्र शेष रह गयी है। वृत्त शालभंजिका संस्कृत का एक प्रसिद्ध नाटक है। पाठभेद : श्लोक संख्या ६५ में 'दन्तो' का 'दान्तो', 'राज्ञः' का 'राज्ञा' तथा 'संधिमति' का पाठभेद 'संधिगति' मिलता है। ५२


[दायाँ स्तम्भ] श्लोक संख्या ६६ में 'योऽपोहितुं' का पाठ- भेद 'यो पिहितुं' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ४७४वां श्लोक है। ६६(१) चपलकर्णता—कल्हण ने यहाँ चपल शब्द का प्रयोग साभिप्राय किया है। चाटुकार तथा दरबारियों की बातें सुनकर राजाओं की वृत्ति का चंचल हो जाना अर्थात् राजा का चपलकर्ण हो जाना स्वाभाविक है। हाथी का चंचल कर्ण उसका स्वभाव है। मत्त हाथी का कान सर्वदा चंचल रहता है। यहां 'चपलकर्ण' श्लिष्ट है। पाठभेद : श्लोक संख्या ६७ में 'शङ्क्य.' का पाठभेद 'शक्यः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ६७(१) श्री स्टीन ने श्लोक संख्या ६६ एवं ६७ का एक ही में अनुवाद किया है। रणजीत सीताराम पण्डित ने अलग अलग अनुवाद ...

४१० राजतरंगिणी निवारितप्रवेशोऽथ सकोपस्तमहेतुकम् । निनाय हृतसर्वस्वं यावदायुर्र्दारिद्र्ताम् ॥ ६८ ॥ ६८. उस कुपित राजा ने मन्त्री का प्रवेश निषिद्ध कर दिया१। और निष्कारण सर्वस्व हरण कर उसे यावज्जीवन के लिये दरिद्र बना दिया । तस्य भूपतिविद्वेषग्रीष्मोष्मपरिशोषिणः । आप्याय्यं राजपुरुषा वार्तयाऽपि न चक्रिरे ॥ ६६ ॥ ६९. भूपति के विद्वेष रूपी ग्रीष्म ऋतु की गर्मी से परिशोषित उसे, राजपुरुषों ने वार्ता से भी सन्तुष्ट नहीं किया । गिरं गभीरो गृह्णाति क्ष्माभृद्यावत्तदग्रगाः । उक्तानुवादिनस्ताम्व्यक्तं प्रतिरवा इव ॥ ७० ॥ ७०. जब१ गम्भीर राजा कुछ कहता है तो, उसी समय उक्ति की पुनरुक्ति करने वाले उसके अग्रगामी (राजा के साथ आगे चलने वाले चाटुकार) प्रतिध्वनि सदृश शब्द करते हैं । स तु राजविरुद्धत्वदारिद्र्याभ्यां न विव्यथे । गतप्रत्यूहया प्रीतः प्राप्तया हरसेवया ॥ ७१ ॥ ७१. समुपलब्ध निर्विघ्न हर सेवा से प्रसन्न वह (सन्धिमति) राजा की विरुद्धता एवं दारिद्र्य से दुःखी नहीं हुआ । किया है । मैने भी दोनो श्लोको का अनुवाद अलग किन्तु काम नहीं कर सकता था । राजा की अकृपा हो दिया है । इसमें अर्थ समझने मे कठिनाई का यह प्रतीक था । नहीं होती । राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रहका यह ४५वां श्लोक है । पाठभेद : ७० ( १ ) इसका द्वितीय अर्थ यह होता है— श्लोक संख्या ६८ में 'सकोपस्त' का पाठभेद 'जब गम्भीर पर्वत ध्वनि प्राप्त करता है तो उसके 'स कोपात्त' मिलता है । पार्श्ववती प्रतिध्वनि के रूप में स्पष्ट दोहरा देते हैं ।" पादटिप्पणियाँ : अग्रगा का अर्थ पर्वत के सम्मुख स्थित पहाड़ ६८ (१) प्रवेश निषिद्ध—देशी राज्यों में से भी होता है । पर्वत से उठती ध्वनि को सम्मुख यह प्रथा भारतीय राज्यो के विलय पूर्व ( १६४७- स्थित पहाड़ी दोहरा देती है अर्थात् ध्वनि को प्रति- ४८ ) तक जारी थी । इसे 'ड्योढ़ी बन्द' करना ध्वनित करती है । अग्रग का अर्थ मार्गदर्शक भी कहते थे । राजप्रासाद के ड्योढ़ी [ देहली ] के होता है । भीतर प्रवेश नहीं किया जा सकता था । राजस्थान क्ष्माभृत् का अर्थ पर्वत तथा राजा दोनों में यह प्रथा दूसरे प्रकार मे प्रचलित थी । यदि राजा होता है । अप्रसन्न होता था तो आज्ञा दे देता था 'घर बैठो' । पाठभेद : घर मे राज्य कर्मचारी रहता था । वेतन पाता था । श्लोक संख्या ७१ में 'दारिद्र्याभ्यां' का 'दारि-

An exact, line-by-line transcription of the Hindi and Sanskrit text shown in the image:

द्वितीय तरंग ४११ अथ भाव्यर्थमाहात्म्यात्प्रपथे प्रतिमन्दिरम् । राज्यं संधिमतेर्भावीत्यश्रुताऽपि सरस्वती ॥ ७२ ॥ ७२. भावी घटना के माहात्म्य से प्रत्येक घर में अश्रुत¹ भी वह वाणी फैल गयी— “राज सन्धिमति का होने वाला है।” नाचोदिता वाक्चरतीत्याप्तेभ्यः श्रुतवान्नृपः । ततः संभृतसंत्रासः कारावेश्मनि तं न्यधात् ॥ ७३ ॥ ७३. “बिना कही बात नहीं फैलती है।” इस प्रकार विश्वस्तों से राजा ने सुना और संत्रस्त होकर, उसे कारागार¹ में रख दिया। तत्र तस्योग्रनिगडैः पीडिताङ्घ्रेर्विशुष्यतः । पूर्णोऽभूद्दशमो वर्षो भूपतेश्चायुषोऽवधिः ॥ ७४ ॥ ७४. वहां उग्र निगड बन्धन से पीड़ित चरणयुक्त शुष्क उस मंत्री का दसवां वर्ष तथा राजा के आयु की अवधि पूर्ण हो गयी। निष्पुत्रः स महीपालो मुमूर्षुद्दाहमादधे । रोगोत्थया पीडया च चिन्तया च तदीयया ॥ ७५ ॥ ७५. निष्पुत्र एवं मुमूर्षु वह महीपाल रोगोत्पन्न पीड़ा और उस चिन्ता से दग्ध होने लगा। द्राम्यां' और 'हरसेवया' का पाठभेद 'हरिसेवया' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ७१ (१) हर एकादश रुद्रो में से एक है। यहाँ पर शिव के अर्थ में प्रयोग किया गया है। कम्बुज कम्बोडिया में हरि-हर की पूजा व्यापक रूप से प्रचलित थी। अर्धनारीश्वर के समान एक ही मूर्ति में दक्षिण ओर हरि तथा वाम अर्धांग में हर अर्थात् शिव की आकृति सवेशभूषा रहती थी। कम्बो- डिया के एंग कोरवाट में इस प्रकार की अनेक मूर्तियाँ मैंने अपने पर्यटन काल सन् १९५७ में देखी थी। पाठभेद : श्लोक संख्या ७२ में 'प्रतिम' का पाठ भेद 'नवम' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ७२ ( १ ) अश्रुत सरस्वती—इसका शाब्दिक अर्थ दो है। वह वाणी जो, सुनायी नही पड़ती। किवदन्ती या अफवाह के अर्थ में भी इस शब्द का प्रयोग किया गया है। पाठभेद : श्लोक संख्या ७३ में 'संभृत' का 'सद्भूत' तथा 'न्यधात्' का पाठभेद 'व्यधात्' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ७३(१) कारावेश्म—कारागार को उस समय कारावेश्म कहते थे। प्राचीन भारत में कारागार व्यवस्था बहुत विकसित हो चुकी थी। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में कारागार का जो रूप प्रस्तुत किया है वह बहुत ही विकसित कहा जायगा। उसमें बन्दियों के भोजन, वस्त्र, बेड़ी, मुलाकात, जेल का शासन, जेल रक्षको अर्थात् वार्डरों का भ्रष्टाचार आदि पर आजकल के पटु कारागार विशेषज्ञ की तरह प्रकाश डाला गया है। पाठभेद : श्लोक संख्या ७५ में 'मादधे' का पाठभेद

४१२ राजतरंगिणी ऊष्मायमाणो विद्वेषवह्निना ज्वलताऽनिशम् । न विना तद्वधं मेने भवितव्यप्रतिक्रियाम् ॥ ७६ ॥ ७६. विद्वेषाग्नि से रात्रि-दिन जलते रहने के कारण नितरां पीड़ित होते हुए उस राजा ने उसके (सन्धमति) वध के बिना, भवितव्यता की प्रतिक्रिया असम्भव समझा । भाव्यर्थस्याऽबुधाः कुर्युदुपायं स्थगनाय यम् । स एवाऽनावृतं द्वारं ज्ञेयं दैवेन कल्पितम् ॥ ७७ ॥ ७७. मूर्ख जन भवितव्यता को अन्यथा करने हेतु, जिस उपाय को करते हैं, वही भाग्य निर्मित अनावृत द्वार है ।¹ दग्धाङ्गारकदम्बके विलुठतः स्तोकोन्मिषत्तेजसो वेधा वह्निकणस्य शक्तिमतुलामाधातुकामो हठात् । तन्निर्वापणमिच्छतः प्रतनुते पुंसः समीपस्थिते संतापद्रुतभूरिसर्पिषि घटे पानीयकुम्भभ्रमम् ॥ ७८ ॥ ७८. जब विधाता दग्ध अंगार समूह में चिनगाते हुए स्वल्प तेज वाले वह्निकण को हठात् अतुल शक्ति सम्पन्न करने की इच्छा करता है, तब उस अग्नि को बुझाने के इच्छुक पुरुष में उसके निकटस्थ ताप-तरल प्रचुर घृत घट में जल कुम्भ का भ्रम कर देता है ।¹ अथ राजाज्ञया क्रूरैर्वधकर्माधिकारिभिः । निशि संधिमतिः शूले समारोप्य विपादितः ॥ ७९ ॥ ७९. राजा की आज्ञा से क्रूर वध कर्माधिकारियों ने रात्रि में सन्धिमति को शूलपर¹ चढ़ाकर हत्या कर दी ।

'माददे' मिलता है । अनुवादकों ने किया है । श्री रणजीत सीताराम राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रहका यह ४६वां श्लोक है । पण्डित के मत से इस श्लोक का शाब्दिक अर्थ कुछ श्लोक संख्या ७७ में 'स्याऽबुधाः' का पाठभेद अस्पष्ट होता है परन्तु तात्पर्य समझ में आ जाता है । 'य बुधाः' मिलता है । ७९ ( १) शूलः - शूली की प्रथा प्राचीन पादटिप्पणियाँ : भारत में प्रचलित थी । स्थानभेद के कारण शूल ७७(१) कल्हण पुरानी बातों को नवीन शैली से अर्थात् शूल देने के प्रक्रिया में भी अन्तर था । शूलीपर कहता है । यही शैली उसने भाग्य वर्णन में चढ़ाने के लिए कल्हण ने समारोप शब्द का प्रयोग अपनायी है । कल्हण की कवि रूप में वह सबसे बड़ी किया है । विशेषता है । श्री विल्फोर्ड का मत है कि जिस शूली पर मरना पाठभेद : सन्धिमति का कहा जाता है वह वास्तव में 'क्रास' श्लोक संख्या ७८ में 'स्थिते' का पाठभेद था । ( एशियाटिक रिसर्च भाग १० ) किन्तु यह 'स्थितेः' मिलता है । बात गलत है । शूली की प्रथा भारत में बहुत पादटिप्पणियाँ : प्राचीन है । महाभारत में माण्डव्य ऋषि को ७८( १) इस श्लोक का अर्थ कई प्रकार से शूलीपर चढ़ाने का वर्णन मिलता है । 'क्रास' के

द्वितीय तरंग ४१३ प्रोतशूले श्रुते तस्मिन् शोकशङ्कोर्महीपतेः । निरगाद्रोगभग्नस्य पूर्वं पश्चात्तु जीवितम् ॥ ८० ॥ ८०. उसे शूल विद्ध हुआ सुनने पर रोग से भग्न महीपाल का शोक शंकु ( शूल ) पहले और बाद में प्राण निकल गया । सप्तत्रिंशतिवर्षेषु यातेष्वस्मिन्निरन्वये । प्रशान्तभूमिपालाऽभूत्कतिचिद्दिवसानि भूः ॥ ८१ ॥ ८१. वंश हीन उस राजा के सैतीस वर्ष बीत जानेपर कुछ दिनों तक यह पृथिवी भूमि- पाल रहित हो गयी थी । अथ संन्धिमतिं बुद्ध्वा तथा व्यापादितं गुरोः । ईशानाख्यस्य हृदयं विवशं वशिनोऽप्यभूत् ॥ ८२ ॥ ८२. सन्धिमति को उस प्रकार व्यापादित ( मारा गया ) जानकर, जितेन्द्रिय भी गुरु ईशान का हृदय विवश हो गया । शिरीष इव संसारे सुखोच्छेद्ये मनीषिणाम् । हन्ताऽऽनृशंस्यं तद्वृन्तमिवैकमवशिष्यते ॥ ८३ ॥ ८३. शिरीष पुष्प सदृश सरलता पूर्वक नष्ट होने वाले, इस संसार में खेद है । मनिषियों की क्रूरता ही उसके (शिरीष पुष्प के) वृन्त की तरह अवशिष्ट रह जाती है । स श्मशानभुवं प्रायादनाथस्येव शुष्यतः । कर्तुं विनयिनस्तस्य स्वोचितामन्तसत्क्रियाम् ॥ ८४ ॥ ८४. अनाथ के समान सूखते हुए उस विनयी की, अपने करने योग्य अन्तिम संस्कार करने के लिये वे ( गुरु ) श्मशान भूमिपर गये । कारण भ्रम फैला है । सन्धिमति को ईशा मसीह पश्चात् छूटा था । रूप में जोडने का वृथा प्रयास किया गया है । पाठभेद : श्री विल्सन ने [पृष्ठ ३१] पर लिखा है कि श्लोक संख्या ८३ में 'तद्वृन्तमिव' का जिस रात्रि में राजा का निधन हुआ और उसका 'तद्वृत्तम' तथा 'तद्वृत्त्यमिव' पाठभेद मिलता है । शरीर जलाया गया उसी रात्रि सन्धिमति को बधि- ८३ [१] शिरीष- उत्तरी भारत के बगीचों कोने शूली पर चढाया । तथा सडकों पर शिरीष का वृक्ष बहुत मिलता है । कल्हण ने उक्त श्लोक में स्पष्ट वर्णन किया है इसका वृक्ष सुन्दर तथा रात्रि में अति सुगन्धदायक कि राजा का प्राण सन्धिमति के शूली लगने के होता है ।

षष्ठ तरङ्ग: यशस्कर, पर्वगुप्त व रानी दिद्दा का शासन

४१४ राजतरंगिणी तं चाऽस्थिशेषमद्राक्षीत्कृप्यमाणं वलाद् वृकैः । शूलमूलावबद्धास्थिखण्डावष्टम्भनिश्चलम् ॥ ८५ ॥ ८५. शृगालों द्वारा वलात् नोचे जाते हुए तथा शूल मूल में बँधे, अस्थि खण्ड के सहारे निश्चल, अस्थि मात्र अवशिष्ट उसे ( गुरु ने ) देखा । समीरणसमीकीर्णमुण्डरन्ध्राग्रनिर्गतैः । ध्वनितैरनुशोचन्तमिवाऽवस्थां तथाविधाम् ॥ ८६ ॥ ८६. वहां समीरण समाकीर्ण मुख रन्ध्र द्वारा निर्गत ध्वनियों से मानो वह अपनी उस प्रकार की अवस्था को सोच रहा था । हा वत्स द्रष्टुमीदृक्ते जीवाम्यद्येति वादिना । तस्याऽऽकृष्यत मूलान्तःप्रोतं तेनाऽथ कीकसम् ॥ ८७ ॥ ८७. 'हा ! वत्स !! आज मैं तुम्हें इस प्रकार देखने के लिये जीवित हूँ ?' इस प्रकार कहते हुए उसने ( ईशान ) शूल विद्ध अस्थि को खींचा । वेष्टिताङ्घ्रिः शिरशीर्णैस्तत्कचैर्धूलिधूसरैः । अनैषीत्तं स कङ्कालं वारयन्भषतो वृकान् ॥ ८८ ॥ ८८. शिरसे गिरे धूल धूसरित उसके केशों से लिप्त चरण वह ( ईशान ) गुर्राते हुए वृकों को हटाता हुआ उस के कंकाल को ले गया । उचितां सत्क्रियां कर्तुं ततस्तस्य समुद्यतः । भाले विधातृलिखितं श्लोकमेतमवाचयत् ॥ ८९ ॥ ८९. तदनन्तर उचित सत्क्रिया करने के लिये समुद्यत उसने भाल१ पर विधातृ लिखित इस श्लोक२ को वाँचा । पाठभेद : श्लोक संख्या ८६ में 'समाकीर्ण' का पाठभेद 'समाकीर्ण' तथा 'समापूर्ण' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : श्री स्टीन ने ८५ एवं ८६ श्लोको का अनुवाद एक साथ किया है। हिन्दी अनुवाद में भी एक साथ ही अनुवाद किया गया है। किन्तु श्री रणजोत सीताराम पण्डित ने उनका अनुवाद अलग अलग किया है। यहाँ भी अनुवाद अलग ही किया गया है। उससे अर्थ में किसो प्रकार की विप्रतिपत्ति नहीं होती है। पाठभेद : श्लोक संख्या ८८ में 'वेष्टिताङ्घ्रिः' का 'वेष्टिताङ्घ्र' 'सकङ्काल' का 'स्वकं कालं' तथा 'भषतो' का पाठभेद 'भाषतो' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ८९ [ १ ] भालरेखाः-प्राचीन काल में रेखा विज्ञान सामुद्रिक विद्या बहुत विकसित थी । हस्त- रेखा, पादरेखा, ललाटरेखा, आदि देखकर जन्म- पत्र तैयार कर दिया जाता था । आज भी प्रत्यन्त मेधावी अनुभवी सामुद्रिक हस्तरेखा देखकर जन्म तिथि निकाल लेते हैं ।

द्वितीय तरंग ४१५ 'यावज्जीवं दरिद्रत्वं दश वर्षाणि बन्धनम् । शूलस्य पृष्ठे मरणं पुना राज्यं भविष्यति' ॥ ६० ॥ ९०. "यावज्जीवन दारिद्रता, दश वर्षों तक बन्धन, शूल पृष्ठपर मरण, पुनः राज्य होगा।"

खोपड़ी पर रेखाएँ होती हैं। भगवान् बुद्ध के समय वंगीस खोपड़ी देखकर भविष्य तथा भूत दोनों कालो को कह देते थे। यह उनका पेशा हो गया था। उसने इस प्रकार बहुत धन अर्जन किया था। भगवान् बुद्ध ने उसके सम्मुख पांच खोपड़ियां रख दीं। उसने चार का सच्चा हाल बता दिया परन्तु पांचवें का भविष्य नहीं बता सका क्योकि वह एक निर्वाण प्राप्त व्यक्ति की खोपड़ी थी। [सुत्तनिपात. वंगीस सुत्त: संयुक्त निकाय: ८:१-१२ पर गाथा २६४] भारत में एक प्रचलित आख्यान है। एक ज्योतिषी थे। उन्हें एक खोपड़ी मिल गयी। उसपर लिखा था 'ताहू पर कछु ओर' अभी कुछ और होना बाकी है। पण्डित को महान् आश्चर्य हुआ। मर जाने पर अब इसका क्या होगा। परीक्षा के लिये उसे लाकर घर में रख दिया। खोपड़ी घर में रखने पर लोगों को आश्चर्य हुआ। पण्डित की स्त्री को लोगो ने बहका दिया। इस खोपड़ी के कारण उस पर विपत्ति आने वाली थी। पण्डितानी ने क्रोधावेश में खोपड़ी ऊखल मे डालकर कूट डाला। पण्डितजी लौट कर आये। उन्हें बात मालूम हुई। उन्हें पण्डितानी की दुर्बल बुद्धि पर तो दया आयी। तथापि अपने शास्त्र पर उन्हें और विश्वास हो गया। कपाल रेखा की वाणी सत्य उतरी। २. श्लोक—श्लोक में चार पाद एवं आठ मात्रायें होती है। रामायण तथा महाभारत श्लोकों में लिखे गये हैं। संस्कृत का कोई भी पद जो अनुष्टुप् छन्द में होता है, उसे श्लोक कहते है। यह गायत्री की स्तुति में कहा गया था। कल्हण ने अनुष्टुप् छन्द में ही राजतरंगिणी का निबन्धन किया है। किन्तु आदि एवं अन्त में उसने छन्द परिवर्तित कर दिया है। महाकाव्य का यह एक लक्षण हैं कि सर्ग के अन्त में छन्द परिवर्तित कर दी जाती है। कालिदास की भी यही शैली है। पाठभेद : श्लोक संख्या ९० मे 'पुना राज्यं' का पाठभेद 'पुन राज्यं' तथा 'पुनः राज्यं' मिलता है। पादटिप्पणियाँ ९०(१) सन्धिमति और महात्मा ईशामसीह यदि सन्धिमति का नाम संयोग से ईशान होता तो उसे ईशा मानने मे सन्देह का अवसर नही मिलता। कुछ यह बात प्रचलित हो गई है कि महात्मा ईशा मसीह कश्मीर आए थे। वहाँ दश वर्ष निवास किया था। वह किसी बौद्ध बिहार में निवास करते थे। कश्मीर मे ही उन्होने ज्ञानाजंन किया था। ईशा के जीवन में १० वर्ष का काल अज्ञात है। वे १० वर्ष कहा थे ? क्या किये, ? कुछ पता नही चलता। जीवन चरित्र की मूल घटनाओं में साम्य है। कुछ मुसलिम लेखकों का मत हैं कि प्रभु ईशा- मसीह की कब्र कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में है। उसे हजरत यूज आसफ कहते है। यह मजार श्री- नगर मे खानयार में है। यह भी कहा जाता है कि यूज आसफ महात्मन् मूसा के वंशज थे। मिस्र के बादशाह ने कश्मीर में उन्हें अपना राजदूत बना कर कश्मीर के राजा के दरबार मे भेजा था। अरबी में यदि यूज़ आसफ लिखा जाय तो यह बोधि-सत्त्व तुल्य लगेगा। सम्भव है कि उक्त मज़ार मिस्री राजदूत यूज़ आसफ की रही होगी अथवा वहाँ कोई स्तूप था। जिसका सम्बन्ध बोधि- सत्त्व से था। उसे ही यूज़ आसफ इस्लामीकरण निमित्त कर दिया गया।

४१६ राजतरंगिणी पादत्रयस्य दृष्टार्थः श्लोकस्याऽसीत्स योगवित् । द्रष्टव्ये तुर्यपादार्थप्रत्यये कौतुकान्वितः ॥ ६१ ॥ ९१. श्लोक' के पाद त्रय का अर्थ देखकर, द्रष्टव्य चतुर्थ पादस्थ अर्थ के विश्वास में वह योगवेत्ता कौतुकान्वित हो गया था । अचिन्तयच्च संभ्रान्तः कथमेतद्भविष्यति । उवाच च विधेः शक्तिमचिन्त्यां कलयंश्चिरम् ॥ ६२ ॥ ९२. सम्भ्रान्त होते हुए उसने सोचा—'यह कैसे होगा ?' और देर तक विचार करते हुए विधाता की शक्ति को (मन ही मन) अचिन्त्य कहा । कश्मीर में हिन्दूराज के अन्त तथा इसलाम के प्रचार के साथ हिन्दूपरम्परा हिन्दू इतिहास आदि को इसलामीकरण करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। आदम, मूसा, सुलेमान, ईशा आदि नवियो के नाम से कश्मीर के पुराने स्थान तथा गाथाओं का नाम- करण किया जाने लगा। यहाँ तक कि हिन्दू राजाओं का नाम भी बदल कर उन्हें मुसलमानी जामा पहना दिया गया। यह इसलिये किया गया कि नवीन बने मुसलमान तथा भावी सन्तानें हिन्दू इतिहास संस्कृत, सभ्यता को पूर्णतया भूलकर यही समझें कि कश्मीर में सनातन काल से इसलाम परम्परा कायम थी और उन्होंने हिन्दूधर्म त्याग कर मुसलमान बनकर कुछ बुरा नही किया है। बल्कि पुराने मूल मजहब में पुनः लौट आए हैं। जिसे कभी त्याग दिया था। सन्धिमति का राज प्राप्ति के पश्चात् राज त्याग कर चले जाने का उल्लेख है। सन्धिमति का राज- त्याग के पश्चात् सन्त होकर चले जाने का भी उल्लेख है। परन्तु उनका हुआ क्या ? वे कहाँ गये, कहाँ रहे तथा कहाँ मरे इतिहास के गर्भ में है। ईशामसीह का पता सूली पर चढ़ने के पश्चात् नही लगता। हाँ यह कहा जाता है कि उन्होंने यहूदियों के राजा होने की बात कही जिसके कारण तत्कालीन सत्ता तथा कानून के अनुसार उन्हें सूली पर चढ़ाया गया। सन्धिमति भी कश्मीर राज के कल्पित विद्रोहके नाम पर ही सूली का आलिंगन किया था। बाइबिल के समालोचकों में एक-मत ईशामसीह को ऐतिहासिक व्यक्ति जैसा वर्णन किया गया है नही मानता। रूसी वैज्ञानिकों ने 'डेडसी स्क्रोल' जिसमे बाइबिल लिखी है उसका अन्वेषण कर बताया है कि स्क्रोल का काल ईशा के कथित जन्म काल से पूर्व का है। ईशा तथा सन्धिमति के जीवन- काल तथा चरित्र मे इतना साम्य है कि अभी गवेषणा की आवश्यकता है। सन्धिमति के गुरु का नाम ईशान था। यह शब्द 'ईशा' से मिलता है। इस विषय पर बिना कुछ विशेष अध्ययन के कहना आधिकारिक ढंग मे ठीक न होगा। यदि ईशान को ही कुछ लेखकों ने ईशा नाम साम्य के कारण दिया होता तो बात कुछ दूसरी हो जाती। पाठभेद : श्लोक संख्या ९१ में 'दृष्टार्थः' का 'दृष्टार्थे'; 'तुर्य' का 'चतुर्थ' तथा 'पादार्थ' का पाठभेद पदार्थे' मिलता है । श्लोक संख्या ९२ में 'कथमे' का पाठभेद 'कार्यो मे' मिलता है ।

द्वितीय तरंग ४१७ तत्तत्कर्मव्यतिकरकृतः पारतन्त्र्यानुरोधा- त्सज्जाः सर्वे व्यवसितहठोन्मूलनाय प्रयत्नात् । चित्रं तत्राऽप्युदयति विधेः शक्तिरत्यद्भुतेयं यन्माहात्म्याद्विविधघटनासिद्धयो निर्निरोधाः ॥ ९३ ॥ ९३. “तत् तत् कर्म संसर्ग में संलग्न, सब लोग पारतन्त्र्य के अनुरोध से, सुनिश्चित (नियति) का प्रयत्न पूर्वक हठात् उन्मूलन हेतु समुद्यत होते हैं, किन्तु आश्चर्य है, वहां भी विधाता की यह अद्भुत शक्ति उदित हो जाती है। जिसके प्रभाव से, द्विविध घटना सिद्धियाँ निरोध रहित हो जाती हैं।” मणिपूरपुरे पार्थं निहतं समजीवयत् । फणिकन्याप्रभावेन सर्वाश्चर्यनिधिर्विधिः ॥ ९४ ॥ .९४. सभी आश्चर्यों के निधि विधि ने मणिपुर¹ में निहत पार्थ को नागकन्या² के प्रभाव से जीवित किया था । पादटिप्पणियाँ : महाभारत युद्ध के पश्चात्, महाराज युधिष्ठिर ९३. राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ५०वाँ ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया । यज्ञीय अश्व के श्लोक है । साथ अर्जुन मणिपुर पहुँचे । बभ्रुवाहन ने अश्व पाठभेद : पकड़ लिया । जब उसे मालूम हुआ कि उसके पिता श्लोकसंख्या ९४ में 'वेन' का पाठभेद 'वेग' का अश्व है तो द्रव्यादि भेंट के साथ वापस कर दिया । मिलता है । पादटिप्पणियाँ: अर्जुन को पुत्र का यह कार्य कायरता पूर्ण प्रतीत हुआ । उसने धनादि लोटा दिया ! ९४ (१) मणिपुर : इस समय केन्द्रीय शासित प्रदेश है । इसका क्षेत्रफल २२१४६ वर्ग कीलो अर्जुन का व्यंग बभ्रुवाहन समझ गया । उसने मीटर है । भागवत पुराण (९:२२:३२) के अनुसार अपने मन्त्री सुबुद्धि से परामर्श कर अश्व पकड़ यहाँ की राजकन्या के गर्भ से अर्जुन पुत्र बभ्रुवाहन लिया । सेनापति सुमति के साथ अर्जुन पर आक्रमण हुआ था । किया । अर्जुन, ससैन्य केवल पराजित ही नही हुआ; (२) नागकन्या : मणिपुर के राजा चित्रवाहन उसे अपने प्राण भी गवाना पड़ा । अर्जुन की ओर थे । उनकी कन्या का नाम चित्रांगदा था । विवाह से कर्ण पुत्र वृषकेतु भी इस युद्ध में मारा गया था । अर्जुन के साथ हुआ था । उनका पुत्र बभ्रुवाहन था । गर्वोन्मत्त बभ्रुवाहन ने पिता के परास्त तथा पुत्र को अर्जुन ने चित्रवाहन को दे दिया । विवाह हत्या की बात माता चित्रांगदा से आकर कही । के समय चित्रवाहन ने शर्त रखी थी । चित्रांगदा से चित्रांगदा पति की मृत्यु का समाचार सुनकर, विलाप उत्पन्न पुत्र, उसका राजवंश चलायेगा । चित्रवाहन करने लगी । अर्जुन के शव के साथ सती होने का नाना होते भी बभ्रुवाहन का धर्मपिता था । यह निश्चय किया । बभ्रुवाहन को पितृ-हत्या के दोष मणिपुर का कालान्तर में राजा हुआ । ( म० आ० का अपराध मालूम पड़ा । वह भी आत्महत्या करने २०६:२४-२६; २०७:२१-३३ ) पर तत्पर हो गया । ५३

४१८ राजतरंगिणी द्रोणपुत्रास्त्रनिर्दग्धं मातुर्गर्भे परिक्षितम् । जीवयन्कृष्णमाहात्म्याद्दाता धुर्योऽधिकारिणाम् ॥ ९५ ॥ ९५. द्रोण-पुत्रास्त्र¹ से माता के गर्भ में दग्ध परिक्षित² को कृष्ण के माहात्म्य से जीवित³ करता हुआ विधाता अधिकारियों में अग्रणी हुआ ।”

उलूपी नागकन्या थी । उसका पिता कौरव्य नाग था । वह बालविधवा थी । अर्जुन ने उससे गन्धर्व विवाह किया था । पति की मृत्यु का समाचार सुनी । दुःखी आयी । चित्रांगदा को सान्त्वना दी । बभ्रुवाहन ने पिता तथा माता की जीवन रक्षा का उपाय विमाता से पूछा । उलूपी ने बताया । यदि शेष नाग से मृत संजीवन मणि लायी जाय तो अर्जुन जीवित हो सकता है । बभ्रुवाहन शेषनाग के पास गया । मणि मागा । अन्य नागो की मंत्रणा पर शेष नाग ने मणि देना अस्वीकार कर दिया । बभ्रुवाहन का शेषनाग से युद्ध हुआ । शेषनाग युद्ध में पराजित हो गया । बभ्रुवाहन मणि लेकर शव के समीप आया । अर्जुन का शव मस्तक हीन उसने देखा । हताश हो गया । परन्तु कृष्ण अपने पुण्य प्रभाव से मस्तक पुनः लाये । उसका शव से सन्धि कर दिया गया । अर्जुन जीवित होगये । ( जै० प्र० ३७:२१-४०, म० आश्व० ७९-९०) महाभारत में यह कथा दूसरो तरह से दी गयी है । वहाँ यह वर्णन मिलता है । बभ्रुवाहन ने अपनी विमाता उलूपी के अस्त्रो-शस्त्रों द्वारा अर्जुन को युद्ध में मूर्छित किया था । यह घटना सुनकर चित्रांगदा ने सपत्नी उलूपी की निर्भर्त्सना की । उलूपी को अपनी भूल का ज्ञान हुआ । उसने बभ्रुवाहन को मृत संजीवक मणि दी । बभ्रुवाहन ने अर्जुन के वक्ष स्थल पर मणि रखकर पिता को जीवित किया । (म० आश्व० ८१:१-१०, ९०:१ ) ९५ (१) द्रोणपुत्र . अश्वत्थामा से यहाँ तात्पर्य है । अश्वत्थामा चिरंजीवियों में एक है । (२) परिक्षित • उत्तरा के गर्भ से उत्पन्न अभिमन्यु का पुत्र था । महाराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण

की मृत्यु के पश्चात् ३६ वर्ष राज्य किया । राज्य- सिंहासन पर बैठने के समय परिक्षित की आयु ३६ वर्ष थी । इसकी पत्नी का नाम भद्रवती किंवा भाद्रवती था । उनके चार पुत्र जनमेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन तथा भीमसेन थे । कृपाचार्य को ऋत्विज बनाकर भागीरथी के तटपर इसने ३ अश्वमेध यज्ञ किये थे । इसका देहावसान ९६ वर्ष की अवस्था में हुआ था । इसने ६० वर्ष राज्य किया था । ( दे० भा० २:८ ) कृष्ण की मृत्यु के पश्चात् कलि ने पृथ्वी में प्रवेश किया । शूद्र रूप धारण कर वह पशु आदि की हत्या करने लगा । कलि को समाप्त करने के लिए परिक्षित उद्यत हो गया । कलि राजा परिक्षित की शरण में आया । निवास के लिये स्थान पूछने पर द्यूत, मद्य, व्यभिचार, हिंसा तथा सुवर्ण पाच स्थानों में रहने के लिये राजा ने आदेश दिया । धर्म तथा पृथिवी को संतोष हुआ । (भा० : १ : १६:१७) मृगया निमित्त एक समय परिक्षित वन में गये । उन्हें प्यास लगी । जल ढूँढने लगे । शमीक मुनि के आश्रम में पहुँचे । मुनि ध्यानस्थ थे । वह राजा का आना जान न सके । जल की याचना सुन न सके । राजा को क्रोध आया । उसने पास ही पड़े, एक मृत सर्प को मुनि के गले में डाल दिया । वापस चला गया । ( म० आ० ३६:१७-२१ ) शमीक के पुत्र शृंगी ऋषि को यह बात ज्ञात हुई । उसने शाप दिया । गले में साँप डालने वाले की मृत्यु सात दिन पश्चात् सर्प दंश से हो जायगी । शमीक के पुत्र का नाम कहीं-कहीं 'गविजात' भी दिया गया है । शमीक को शाप की बात ज्ञात हुई । मुनि को दुःख हुआ । पुत्र की भर्त्सना की । अपने शिष्य

गौरमुख से शाप की बात परिक्षित को बताने के लिये भेजा । ( म० भा० ३८:१३-२८ ) तक्षक नाग यथा समय परिक्षित को दंश करने के लिये प्रस्थान किया । मार्ग में कश्यप मान्त्रिक मिला । वह नाग का विष उतारने परिक्षित के पास जा रहा था । तक्षक ने उसे यथेष्ट धन देकर, वापस कर दिया । निश्चित समय पर तक्षक द्वारा सर्पदंश के कारण परिक्षित की मृत्यु हो गयी । ( म० आ० ३६-४०, ४५-४७ दे० भा० २:८-१० ) भागवत पुराण के अनुसार तक्षक ने ब्राह्मण रूप धर कर परिक्षित के राजभवन में प्रवेश किया था । तक्षक परिक्षित के समीप पहुँचते ही, तत्काल नागस्वरूप धारण कर, उसकी हत्या का कारण हुआ । ( भा० १२:६ ) महाभारत में यह कथा दूसरी प्रकार से दी गयी है । तक्षक ने कतिपय नागों को फल, पुष्प देकर परिक्षित के पास भेजा । एक फल में सूक्ष्म रूप कीड़ा बनकर बैठ गया । तपस्वी वेशधारी नाग परिक्षित के द्वार पर फल पुष्प भेंट करने की अनुमति माँगने लगे । परिक्षित ने उनके फल को स्वीकार किया । एक बड़ा फल स्वयं ले लिया । शेष अपने मित्रो को दे दिया । परिक्षित ने फल फोड़ा । उसमे से एक लाल कीड़ा निकला । उसे देखकर परिक्षित ने व्यंगपूर्वक कहा—'सूर्य अस्ताचल जा रहा है । सातवाँ दिन पूरा हो रहा है । कहीं यही न तक्षकराज बन जाय ?' परिक्षित उस कीड़े को अपनी गर्दन पर लेकर जैसे खेलने लगा । परन्तु तत्काल वह कीड़ा तक्षक नाग बन गया । उसके शरीर से लिपट गया । परिक्षित सर्पदंस से तत्काल मर गया । पुराणों के अनुसार परिक्षित जन्म से मगध देश के राजा महापद्म का समय १५०० वर्षों का होता है । (मत्स्य० २७३:३६) विष्णु पुराण में 'ज्ञेय' का 'शतं' पाठ मानकर यह अवधि एक हजार एकसौ पन्द्रह वर्षों की निश्चित की गयी है । (विष्णु० : ४:२४:३२ )

( ३ ) जीवित करना—परिक्षित उत्तरा के गर्भ में था । महाभारत में दुर्योधन कौरवों से परा- जित हो गया था । केवल अश्वत्थामा शेष रह गया था । वह पाण्डवद्रोही था । रात्रि में द्रोपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी थी । उसने इसी प्रकार सूत, सोम, धृष्टद्युम्न, शिखंडी आदि अनेक वीरों का नाश किया । प्रसन्न अश्वत्थामा दुर्योधन के समीप गया । दुर्योधन घायल था । तड़प रहा था । भारतीय युद्ध की सम्पूर्ण सेना में केवल पाँच पाण्डव, श्री कृष्ण पाण्डव पक्ष के तथा कौरव पक्ष के केवल तीन अश्वत्थामा, कृपाचार्य एवं कृतवर्मा जीवित बच गये थे । द्रौपदी के पुत्रो आदि की हत्या सुनकर दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ । सुखपूर्वक प्राण विसर्जन किया । द्रौपदी अत्यन्त दुःखी हुई । उसने प्रतिज्ञा की । अश्वत्थामा के मस्तक की मणि निकालकर यदि युधिष्ठिर के मस्तक पर वह न देखेगी तो प्राण त्याग देगी । भीम ने मणि प्राप्त हेतु अश्वत्थामा पर आक्रमण कर दिया । ( म. सौ. ८, ९ ११ ) अश्वत्थामा चिरंजीवी था । भीमसेन का उसे हराना कठिन था । अतएव श्री कृष्ण, अर्जुन के साथ भीम की सहायता के लिए गये । पाण्डवों के नाश हेतु अश्वत्थामा ने ब्रह्माशीर नामक अस्त्र का प्रयोग किया । उसके प्रतिकार निमित्त अर्जुन ने भी वही अस्त्र छोड़ा । पृथ्वी जलने लगी । व्यासादि मुनियों ने अश्वत्थामा को पाण्डवो के शरण जाने के लिये कहा । उसने अपने अस्त्र को लौटाना स्वीकार नही किया । किन्तु मणि देने पर उद्यत हो गया । उत्तरा के गर्भस्थ परिक्षित पर उसने अस्त्र छोड़ा । अस्त्र के कारण गर्भस्थ शिशु जलने लगा । उत्तरा ने भगवान् का स्मरण किया । भगवान् ने शिशु की रक्षा की । विष्णु का नाम इसलिये "विष्णु- रात" पड़ गया । महाँ भारत के अनुसार कुरु वंश के परिक्षीण होने पर इसने जन्म लिया था । अतएव परिक्षित नाम पड़ा था । ( म० अश्व० ७० : १० )

४२२ राजतरंगिणी उद्घाटिततमोरिः स ततः पितृवनावने । ददर्श योगिनीस्तेजःपरिवेषान्तरस्थिताः ॥ १०० ॥ १००. तदुपरान्त उसने गवाक्ष खोलकर श्मशान भूमि पर तेज के परिवेश में स्थित योगिनियों को देखा। तासां संभ्रममालक्ष्य कङ्कालं चापवादितम् । ईशानस्तां श्मशानोर्वी धृतासिश्चकितो ययौ ॥ १०१ ॥ १०१. उनके सम्भ्रम एवं अपहृत कंकाल को देखकर तलवार लिये चकित ईशान उस श्मशान पर गया । अथाऽपश्यत्तरुच्छन्नः शायितं मण्डलान्तरे । सन्धीयमानसर्वाङ्गं कङ्कालं योगिनीगणैः ॥ १०२ ॥ १०२. तत्पश्चात् वृक्ष के ओट से उसने देखा कि योगिनियाँ मध्य में कंकाल को सुलाकर सब अंगो को जोड़ रही थीं। उल्लसद्वरसम्भोगवाञ्छा मद्यपदेवताः । वीरालाभान्समन्विष्य कङ्कालं तमपाहरन् ॥ १०३ ॥ १०३. वर सम्भोग की उत्कट कामना वश उन मद्यप योगिनियों ने किसी वीर (पुरुष) के अभाव में खोजकर उस कंकाल का अपहरण कर लिया । एकमेकं स्वमङ्गं च विनिधाय क्षणादथ । कुतोऽप्यानोय पुंलक्ष्म्म पूर्णाङ्गं तं प्रचक्रिरे ॥ ०४ ॥ १०४. अपने एक-एक अंग को रखकर और कहीं से पुंलक्ष्म्म ( शिश्न ) लाकर, उसे सर्वांग पूर्ण कर दिया । जोनराज ने भी इस शब्द का प्रयोग किया है। अलग-अलग कर दिया गया है। इससे अर्थ में अपहृतताडनाइण्डघण्टानाशण्ठटांकृतम् । विप्रतिपत्ति नहीं होती है। मनांसि न पुनस्तेषां वीराणां माह्यमस्पृशन् ॥ पाठभेद : पाठभेद : श्लोक संख्या १०१ में 'मालक्ष्य' का पाठभेद 'मावर्य्य' मिलता है। श्लोक संख्या १०० में 'ददर्श' का 'दर्शयन्' तथा श्लोक संख्या १०३ में 'सम्भोग' का 'संयोग' 'स्थिताः' का पाठभेद 'स्थितः' मिलना है। 'मद्यप-देवता' का 'मध्यमदेवता' 'मुद्यमदेवताः पादटिप्पणियाँ : तथा 'तमपाहरन्' का पाठभेद 'तमुपाहरन्' मिलता है। श्लोक संख्या ९९ और १०० का अनुवाद श्री श्लोक संख्या १०४ में 'कुतो' का 'ततो' तथा स्टीन, श्री पण्डित तथा अन्य अनुवादकों ने एक 'पुंलक्ष्म्म' का पाठभेद 'पुलिङ्ग' मिलता है। साथ ही किया है। यहाँ पर दोनो श्लोकों का अनुवाद

द्वितीय तरंग ४१९ गौरमुख से शाप की बात परिक्षित को बताने के लिये भेजा। (म० आ० ३८:१३-२८) तक्षक नाग यथा समय परिक्षित को दंश करने के लिये प्रस्थान किया। मार्ग में कश्यप मान्त्रिक मिला। वह नाग का विष उतारने परिक्षित के पास जा रहा था। तक्षक ने उसे यथेष्ट धन देकर, वापस कर दिया। निश्चित समय पर तक्षक द्वारा सर्पदंस के कारण परिक्षित की मृत्यु हो गयी। (म० आ० ३६-४०, ४५-४७ दे० भा० २:८-१०) भागवत पुराण के अनुसार तक्षक ने ब्राह्मण रूप धर कर परिक्षित के राजभवन में प्रवेश किया था। तक्षक परिक्षित के समीप पहुँचते ही, तत्काल नागस्वरूप धारण कर, उसकी हत्या का कारण हुआ। (भा० १२:६) महाभारत मे यह कथा दूसरी प्रकार से दी गयी है। तक्षक ने कतिपय नागों को फल, पुष्प देकर परिक्षित के पास भेजा। एक फल में सूक्ष्म रूप कीड़ा बनकर बैठ गया। तपस्वी वेशधारी नाग परिक्षित के द्वार पर फल पुष्प भेंट करने की अनुमति मांगने लगे। परिक्षित ने उनके फल को स्वीकार किया। एक बड़ा फल स्वयं ले लिया। शेष अपने मित्रो को दे दिया। परिक्षित ने फल फोड़ा। उसमे से एक लाल कीड़ा निकला। उसे देखकर परिक्षित ने व्यंगपूर्वक कहा—'सूर्य अस्ताचल जा रहा है। सातवाँ दिन पूरा हो रहा है। कहीं यही न तक्षकराज बन जाय?' परिक्षित उस कीड़े को अपनी गर्दन पर लेकर जैसे खेलने लगा। परन्तु तत्काल वह कोड़ा तक्षक नाग बन गया। उसके शरीर से लिपट गया। परिक्षित सर्पदंस से तत्काल मर गया। पुराणों के अनुसार परिक्षित जन्म से मगध देश के राजा महापद्म का समय १५०० वर्षों का होता है। (मत्स्य० २७३:३६) विष्णु पुराण में 'ज्ञेय' का 'शत' पाठ मानकर यह अवधि एक हजार एकसो पन्द्रह वर्षों की निश्चित की गयी है। (विष्णु० : ४:२४:३२) (३) जीवित करना—परिक्षित उत्तरा के गर्भ में था। महाभारत में दुर्योधन कौरवों से परा- जित हो गया था। केवल अश्वत्थामा शेष रह गया था। वह पाण्डवद्रोही था। रात्रि में द्रोपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी थी। उसने इसी प्रकार सूत, सोम, धृष्टद्युम्न, शिखंडी आदि अनेक वीरों का नाश किया। प्रसन्न अश्वत्थामा दुर्योधन के समीप गया। दुर्योधन घायल था। तड़प रहा था। भारतीय युद्ध की सम्पूर्ण सेना में केवल पाँच पाण्डव, श्री कृष्ण पाण्डव पक्ष के तथा कौरव पक्ष के केवल तीन अश्वत्थामा, कृपाचार्य एवं कृतवर्मा जीवित बच गये थे। द्रौपदी के पुत्रों आदि की हत्या सुनकर दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ। सुखपूर्वक प्राण विसर्जन किया। द्रौपदी अत्यन्त दुःखी हुई। उसने प्रतिज्ञा की। अश्वत्थामा के मस्तक की मणि निकालकर यदि युधिष्ठिर के मस्तक पर वह न देखेगी तो प्राण त्याग देगी। भीम ने मणि प्राप्त हेतु अश्वत्थामा पर आक्रमण कर दिया। (म. सौ. ८,९ ११) अश्वत्थामा चिरंजीवी था। भीमसेन का उसे हराना कठिन था। अतएव श्री कृष्ण, अर्जुन के साथ भीम की सहायता के लिए गये। पाण्डवों के नाश हेतु अश्वत्थामा ने ब्रह्मशीर नामक अस्त्र का प्रयोग किया। उसके प्रतिकार निमित्त अर्जुन ने भी वही अस्त्र छोड़ा। पृथ्वी जलने लगी। व्यासादि मुनियों ने अश्वत्थामा को पाण्डवों के शरण जाने के लिये कहा। उसने अपने अस्त्र को लौटाना स्वीकार नहीं किया। किन्तु मणि देने पर उद्यत हो गया। उत्तरा के गर्भस्थ परिक्षित पर उसने अस्त्र छोड़ा। अस्त्र के कारण गर्भस्थ शिशु जलने लगा। उत्तरा ने भगवान् का स्मरण किया। भगवान् ने शिशु की रक्षा की। विष्णु का नाम इसलिये "विष्णु- रात" पड़ गया। यहाँ भारत के अनुसार कुरु वंश के परिक्षीण होने पर इसने जन्म लिया था। अतएव परिक्षित नाम पड़ा था। (म० अश्व० ७० : १०)

४१८ राजतरंगिणी द्रोणपुत्रास्त्रनिर्दग्धं मातर्गर्भे परिक्षितम् । जीवयन्कृष्णमाहात्म्यादाता धुर्योऽधिकारिणाम् ॥ ९५ ॥ ९५. द्रोण-पुत्रास्त्र १ से माता के गर्भ में दग्ध परिक्षित २ को कृष्ण के माहात्म्य से जीवित ३ करता हुआ विधाता अधिकारियों में अग्रणी हुआ ।” उलूपी नागकन्या थी । उसका पिता कौरव्य नाग था । वह बालविधवा थी । अर्जुन ने उससे गन्धर्व विवाह किया था । पति की मृत्यु का समाचार सुनी । दुःखी आयी । चित्रांगदा को सान्त्वना दी । बभ्रुवाहन ने पिता तथा माता की जीवन रक्षा का उपाय विमाता से पूछा । उलूपी ने बताया । यदि शेष नाग से मृत संजीवन मणि लायी जाय तो अर्जुन जीवित हो सकता है । बभ्रुवाहन शेषनाग के पास गया । मणि मागा । अन्य नागो की मंत्रणा पर शेष नाग ने मणि देना अस्वीकार कर दिया । बभ्रुवाहन का शेषनाग से युद्ध हुआ । शेषनाग युद्ध में पराजित हो गया । बभ्रुवाहन मणि लेकर शव के समीप आया । अर्जुन का शव मस्तक हीन उसने देखा । हताश हो गया । परन्तु कृष्ण अपने पुण्य प्रभाव से मस्तक पुनः लाये । उसका शव से सन्धि कर दिया गया । अर्जुन जीवित होगये । ( जै० प्र० ३७:२१-४०, म० आश्व० ७९-९०) महाभारत में यह कथा दूसरो तरह से दी गयी है । वहाँ यह वर्णन मिलता है । बभ्रुवाहन ने अपनी विमाता उलूपी के अस्त्रों-शस्त्रो द्वारा अर्जुन को युद्ध में मूच्छित किया था । वह घटना सुनकर चित्रांगदा ने सपत्नी उलूपी को निर्भर्त्सना की । उलूपी को अपनी भूल का ज्ञान हुआ । उसने बभ्रुवाहन को मृत संजीवक मणि दी । बभ्रु वाहन ने अर्जुन के वक्ष स्थल पर मणि रखकर पिता को जीवित किया । (म० आश्व० ८१:९-१०, ९०:१ ) ९५ (१) द्रोणपुत्र : अश्वत्थामा से यहाँ तात्पर्य है । अश्वत्थामा चिरंजीवितों में एक है । (२) परिक्षित : उत्तरा के गर्भ से उत्पन्न अभिमन्यु का पुत्र था । महाराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण की मृत्यु के पश्चात् ३६ वर्ष राज्य किया । राज्य- सिंहासन पर बैठने के समय परिक्षित की आयु ३६ वर्ष थी । इसकी पत्नी का नाम भद्रवती किंवा भाद्रवती था । उनके चार पुत्र जनमेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन तथा भीमसेन थे । कृपाचार्य को ऋत्विज बनाकर भागीरथी के तटपर इसने ३ अश्वमेध यज्ञ किये थे । इसका देहावसान ९६ वर्ष की अवस्था में हुआ था । इसने ६० वर्ष राज्य किया था । ( दे० भा० २:८ ) कृष्ण की मृत्यु के पश्चात् कलि ने पृथ्वी में प्रवेश किया । शूद्र रूप धारण कर वह पशु आदि की हत्या करने लगा । कलि को समाप्त करने के लिए परिक्षित उद्यत हो गया । कलि राजा परिक्षित की शरण में आया । निवास के लिये स्थान पूछने पर जूआ, मद्य, व्यभिचार, हिंसा तथा स्वर्ण पाच स्थानों में रहने के लिये राजा ने आदेश दिया । धर्म तथा पृथ्वी को संतोष हुआ । (आ० : १ : १६:१७) मृगया निमित्त एक समय परिक्षित वन में गये । उन्हें प्यास लगी । जल ढूढ़ने लगे । ऋचीक मुनि के आश्रम में पहुँचे । मुनि ध्यानस्थ थे । वह राजा का आना जान न सके । जल की याचना सुन न सके । राजा को क्रोध आया । उसने पास ही पड़े, एक मृत सर्प को मुनि के गले में डाल दिया । वापस चला गया । ( म० आ० ३६:१७-२१ ) शमीक के पुत्र श्रृंगी ऋषि को यह बात ज्ञात हुई । उसने शाप दिया । गले में साँप डालने वाले की मृत्यु सात दिन पश्चात् सर्प दंश से हो जायगी । शमीक के पुत्र का नाम कही-कही 'गविजात' भी दिया गया है । शमीक को शाप की बात ज्ञात हुई । मुनि को दुःख हुआ । पुत्र की भर्त्सना की । अपने शिष्य

द्वितीय तरंग ४१९ गौरमुख से शाप की बात परीक्षित को बताने के लिये भेजा । ( म० आ० ३८:१३-२८ ) तक्षक नाग यथा समय परीक्षित को दंश करने के लिये प्रस्थान किया । मार्ग में कश्यप मान्त्रिक मिला । वह नाग का विष उतारने परीक्षित के पास जा रहा था । तक्षक ने उसे यथेष्ट धन देकर, वापस कर दिया । निश्चित समय पर तक्षक द्वारा सर्पदंस के कारण परीक्षित की मृत्यु हो गयी । ( म० आ० ३६-४०, ४५-४७ दे० भा० २:८-१० ) भागवत पुराण के अनुसार तक्षक ने ब्राह्मण रूप धर कर परीक्षित के राजभवन में प्रवेश किया था । तक्षक परीक्षित के समीप पहुँचते ही, तत्काल नागस्वरूप धारण कर, उसकी हत्या का कारण हुआ । ( भा० १२:६ ) महाभारत में यह कथा दूसरी प्रकार से दी गयी है । तक्षक ने कतिपय नागों को फल, पुष्प देकर परीक्षित के पास भेजा । एक फल में सूक्ष्म रूप कीड़ा बनकर बैठ गया । तपस्वी वेशधारी नाग परीक्षित के द्वार पर फल पुष्प भेंट करने की अनुमति माँगने लगे । परीक्षित ने उनके फल को स्वीकार किया । एक बड़ा फल स्वयं ले लिया । शेष अपने मित्रों को दे दिया । परीक्षित ने फल फोड़ा । उसमें से एक लाल कीड़ा निकला । उसे देखकर परीक्षित ने व्यंगपूर्वक कहा—'सूर्य अस्ताचल जा रहा है । सातवाँ दिन पूरा हो रहा है। कहीं यही न तक्षकराज बन जाय ?' परीक्षित उस कीड़े को अपनी गर्दन पर लेकर जैसे खेलने लगा । परन्तु तत्काल वह कीड़ा तक्षक नाग बन गया । उसके शरीर से लिपट गया । परीक्षित सर्पदंस से तत्काल मर गया । पुराणों के अनुसार परीक्षित जन्म से मगध देश के राजा महापद्म का समय १५०० वर्षों का होता है । (मत्स्य० २७३:३६) विष्णु पुराण में 'ज्ञेय' का 'शत' पाठ मानकर यह अवधि एक हजार एकसौ पन्द्रह वर्षों की निश्चित की गयी है । (विष्णु० : ४:२४:३२ ) ( ३ ) जीवित करना—परीक्षित उत्तरा के गर्भ में था । महाभारत में दुर्योधन कौरवों से परा- जित हो गया था । केवल अश्वत्थामा शेष रह गया था । वह पाण्डवद्रोही था । रात्रि में द्रौपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी थी । उसने इसी प्रकार सूत, सोम, धृष्टद्युम्न, शिखंडी आदि अनेक वीरों का नाश किया । प्रसन्न अश्वत्थामा दुर्योधन के समीप गया । दुर्योधन घायल था । तड़प रहा था । भारतीय युद्ध की सम्पूर्ण सेना में केवल पाँच पाण्डव, श्री कृष्ण पाण्डव पक्ष के तथा कौरव पक्ष के केवल तीन अश्वत्थामा, कृपाचार्य एवं कृतवर्मा जीवित बच गये थे । द्रौपदी के पुत्रों आदि की हत्या सुनकर दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ । सुखपूर्वक प्राण विसर्जन किया । द्रौपदी अत्यन्त दुःखी हुई । उसने प्रतिज्ञा की । अश्वत्थामा के मस्तक की मणि निकालकर यदि युधिष्ठिर के मस्तक पर वह न देखेगी तो प्राण त्याग देगी । भीम ने मणि प्राप्त हेतु अश्वत्थामा पर आक्रमण कर दिया । ( म. सौ. ८, ९ ११ ) अश्वत्थामा चिरंजीवी था । भीमसेन का उसे हराना कठिन था । अतएव श्री कृष्ण, अर्जुन के साथ भीम की सहायता के लिए गये । पाण्डवों के नाश हेतु अश्वत्थामा ने ब्रह्मशीर नामक अस्त्र का प्रयोग किया । उसके प्रतिकार निमित्त अर्जुन ने भी वही अस्त्र छोड़ा । पृथ्वी जलने लगी । व्यासादि मुनियों ने अश्वत्थामा को पाण्डवों के शरण जाने के लिये कहा । उसने अपने अस्त्र को लौटाना स्वीकार नहीं किया । किन्तु मणि देने पर उद्यत हो गया ।