राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०६ राजतरंगिणी दीर्घदुर्दिननष्टार्कं राष्ट्रमात्मापनागतः । ज्ञात्वा राज्यग्निसाद्देहं सा चकारेति केचन ॥ ६१ ॥ ६१. अपने दुष्कृत्य के कारण बहुत दिनों तक रवि रहित राष्ट्र को जानकर उस रानी ने देह को अग्निसात् कर दिया। ऐसा कुछ लोगों का विचार है। ततोऽन्यकुलजो राजा विजयोऽष्टावभूत्समाः । पत्तनेन परीतं यश्चकार विजयेश्वरम् ॥ ६२ ॥ ६२. तदुपारन्त अन्य कुलोत्पन्न राजा विजय आठ वर्ष रहा, जिसने विजयेश¹ को नगर से घिरवाया।
नहरी क्षेत्र में भी ईख की उपज होने लगी है। इस राज में कुल ईख १.६ हजार हेक्टर मे बोया जाता है। उत्पादन ११.२३ हजार मेट्रिक टन का होता है। मैने सन् १९६३ मे जम्मू प्रदेश की यात्रा मे यह खेती देखी है। ईख अच्छी होती है। शर्करा अर्थात् चीनी का उत्पादन सर्वप्रथम भारत मे ही प्रारम्भ हुआ था। यूनानी भारत में आये। उन्हे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि डण्ठल से शहद निकलती है। जो महत्त्व भारत में शर्करा का प्राचीन काल में था वही पश्चिम तथा यूरोप मे मधु का था। कश्मीर उपत्यका में ईख का अभाव था। वहाँ उसका माधुर्य दुर्लभ पदार्थों मे समझा जाता था। आम भारत मे साधारण चीज है। किन्तु वही श्रीनगर में दुर्लभ पदार्थ है। इक्षु यद्यपि मधुर था परन्तु विधाता ने उसे फल नहीं दिया है। यदि उसमे फल होता तो सम्भवतः गन्ने के माधुर्य से भी अधिक माधुर्य होता। ईख के रस को सुधारस से भी ऊँचा स्थान कल्हण देता है। पाठभेद : श्लोक संख्या ६१ मे 'नष्टार्कम्' का पाठभेद 'नष्टार्क' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ६२. (१) · श्री विल्सन ने अभिषेक का काल ईसापूर्व ६६ वर्ष ९ मास तथा समीकृत काल सन् ९० ई० और राज्य काल ८ वर्ष दिया है।
श्री स्टीन ने ग्रहण के आधार पर गणना कर राज्याभिषेक का समय लौकिक संवत् २९९६ तथा राज्य काल आठ वर्ष दिया है। प्रो एम० पी० पण्डित ने ईसा पूर्व ६९ वर्ष तथा राज्य काल ८ वर्ष दिया है। श्री याली ने यह समय सप्तर्षि संवत् ३८६१ तथा सन् ९१ ई० दिया है। १ आइने अकबरी में राजा विजय को 'बेजोरो' लिखा है। राज्य काल ८ वर्ष दिया गया है। हसन लिखता है—राजा विजय २९६८ क० में अराकीने सल्तनत के इत्तफाक और मशविरह से सरवराद्राय सल्तनत हुआ। शहर के बड़े लोगो में से था। बेजबारह का शहर तामीर करके अपना पायतख्त बनाया। विजय शूर का मन्दिर इन्तहाई रफअत और संगीनी के साथ बुलन्द किया। मुद्दत हकूमत आठ बरस। (२) विजयेश : टिप्पणी विजयेश्वर ८४ तथा १०५ द्रष्टव्य है। श्री विल्सन ने (पृष्ठ ३०) लिखा है कि विजयेश का मन्दिर राजा विजय ने राजधानी के अन्दर बनवाया। यह बात प्रमाणित नही होती। विजय ने विजयेश का मन्दिर ब्रिजवोर अर्थात् विजय क्षेत्र मे बनाया। यही परम्परा, जनश्रुति तथा अन्य उपलब्ध प्रमाणो से प्रमाणित होता है। विल्सन को इस विषय मे भ्रम हो गया है।