भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 544, कुल 984 में से

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पृष्ठ 544

द्वितीय तरंग ४०७ सुतो महीमहेन्द्रस्य जयेन्द्रस्तस्य भूपतेः । क्ष्मामाजानुभुजो राजा बुभोजाथ पृथुप्रथः ॥ ६३ ॥ ६३. उस मही महेन्द्र भूपति का पुत्र आजानुबाहु, इन्द्र तुल्य राजा जयेन्द्र ने पृथ्वी का भोग किया । पादटिप्पणियाँ : ६३ ( १ ) जयेन्द्र : श्री विल्सन ने अभिषेक काल ईसापूर्व ६० वर्ष ९ मास तथा समीकृत काल स० ९८ई० और राज्य काल ३७ वर्ष माना है । श्री स्टीन ने राज्याभिषेक का समय कल्हण के आधार पर गणनाकर लौकिक संवत् ३००४ वर्ष तथा राज्यकाल ३७ वर्ष रखा है । एस. पो. पण्डित ने यह समय ईसापूर्व ६१ वर्ष तथा राज्यकाल ३७ वर्ष माना है । श्री यातो ने यह समय सप्तर्षि संवत् ३८९८ तथा सन् १२८ ई० दिया है । आइने अकबरी में जयेन्द्र को 'चुन्दर' लिखा है । राज्यकाल ३७ वर्ष दिया गया है । आइने अकबरी में सन्धिमति के विषय में सबसे अधिक लिखा है । अबुलफजल कहता है—राजा जयेन्द्र इस दृष्टि में लौकिक संवत् ३००४ में राजा हुआ । वह भूमि पर महेन्द्र अर्थात् इन्द्र तुल्य था । वह आजानुबाहु था । राजा पृथु तुल्य प्रतापी था । सन्धिमति : उसका मन्त्री महा मेधावी सन्धि- मान था । वह शिवभक्त था । महात्मन् ईशान का शिष्य था । उसकी कीर्ति कश्मीर मण्डल में व्याप्त हो गई थी । राजा एवं राजन्य वर्ग कान के कच्चे होते हैं । राजदरबारियों ने मन्त्री की मेधा उसकी कीर्ति तथा प्रिय होने का दूसरा अर्थ लगाना आरम्भ किया । राजा के सम्मुख उसके गुण दोष रूप में बढ़ा-चढ़ाकर किये जाने लगे । उसकी बढ़ती ख्याति तथा शक्ति राजा के लिए घातक सिद्ध होगी यह बात राजा के मन में बैठा दी गयी । राजा मन्त्री से शंकित रहने लगा । उसके प्रति द्वेष भावना उत्पन्न हो गई । चपल कर्ण राजा ने उसका राज दरबार में आना बन्द कर दिया । उससे क्रोधित होकर उसकी सब सम्पत्ति छीन कर उसे दरिद्र बना दिया । हसन लिखता है—राजा जयेन्द्र सन्दमत वजीर के इमदाद व इनायत से २९९४ क० में बापके कायम मुकाम तख्त नशीन हुआ । कुछ मुद्दत अदल व इन्साफ में गुजारी । बिल आखीर अपने वजीर से नाराज होगया । और अरसा दस साल तक उसे कैद व बन्द में मवतिला रखा । और जिस कदर भी उसके पास असबाब था लूट लिया । लेकिन अवाम वजीर की नेक नियती से खुश थे और अपनी जगह परचमी गोरषा करते कि किसी न किसी दिन वजीर ही बादशाह होगा । यह चीज भी राजा के कान में पहुँच गयी । हुकम दिया कि वजीर को सूली दे दें । चुनाच शाही हुकम के बमूजिब वजीर को सूली पर चढ़ा दिया गया । और गरीब जानसे रुखसत हुआ । लेकिन इसके बाद ही राजा पर वहशत व दीवानगी सवार हो गयी और चन्द दिनों बाद खुद भी दुनिया से रुखसत हो गया । मुद्दत हकूमत ३७ साल । चूंकि राजा जयेन्द्र बे औलाद था । इसलिए उसकी वफात के चन्द दिनों तक सल्तनत कश्मीर बादशाह के बगैर रही । ईशानदेव नामक एक आबिद वजाहिद इन्शान को जो वजीर सन्दमत का मुरी था और अरसा दराज से मुकाम इशः बरारी में गोशः नशीन था । जब वजीर मजकूर को सूली की खबर सुनी तो उसके लाश को जलाने की नीयत से दार के नीचे आया । वजीर के जिस्म को सूली से उतार कर गुस्ल देने के लिये तैयार हुआ । कैफियत ( कफ ) ईशानदेव ने जब उसके माथे पर नजर डाली तो देखा कि उसपर यह तीन फिकरह लिखे हुए हैं—

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