राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०८ राजतरंगिणी अलोलकीर्तिकल्लोलदुकूलवलनोज्ज्वलाम् । बभार यद्भूजस्तम्भो जयश्रीसालभञ्जिकाक् ॥ ६४ ॥ ६४. जिसके भुजस्तम्भ ने, निश्चल कीर्तिकल्लोलरूपी दुकूल के वलन से शोभायमान जयश्री शालभंजिका' को धारण किया था।
१-जब तक यह शख्स जिन्दा रहेगा मुफलिस रहेगा। २-दस साल तक कैद में रहकर दार पर मरेगा। ३-उसके बाद राज लेगा। ईशान देव ने दिल में सोचा कि इन तीन फिकरो में से दो का मजमून ब अमल आ गया है। और तीसरे फिकरह का मजमून भी यकीमन् अमल में आयेगा। लिहाजा उसकी लाश वही छोड़कर एक पोशीदह जगह तलाश की। वहाँ उसे रखकर खुदा की कुदरत का मुन्तज़िर रहने लगा। एक रात देखा कि मैदान नूरानी हो गया है। और चन्द जोगनी आई हैं। उन्होंने वजीर की लाश को सूली से उतार लिया है। और उससे बातचीत में मशगूल हैं। ईशानदेव तमाम रात काँपता रहा और हैरान था कि यह कौन हैं। सुबह के वक्त जब जोगिनी जाने लगीं और उन्होंने लाश मजकूर को बदस्तूर दार पर लटकाना चाहा तो ईशानदेव ने तलवार हाथ में लेकर जोगनियों को डराया और बाद में जोर जोर से शोर व गोगा मचाया यह देख कर औरतें गायब हो गयीं उनमें से एक ने कहा— “ईशान देव इस शख्स को खुदा ने हमारी वजह से जिन्दा किया है। हम पर तू क्यों तलवार उठाता है। वह राजा सन्धीमान है। और एक दिन बहुत बडा राजा होगा। जब वजीर जिन्दा हो गया तो अपने पीर के पैरों में पड़ा। उस वक्त लोग हरतरफ से जमा हुए और वजीर को जिन्दा देखकर निहायत हैरान हुए। लोग उसे पहले से जानते थे। उसे देखने ही पहचान गये। चेदाचीन में दायर उसके अखलाक बरीमाना को देखकर उसे मुल्क कश्मीर की हुकूमत कबूल करने को कहा। पहले तो उसने इन्कार किया। बिलाखिर अपने पीर के कहने से सल्तनत कबूल करने पर राजी हो गया। (पृष्ठ ५४-५५)
पाठभेद : श्लोक संख्या ६४ में 'अलोल' का 'आलोल' 'दुकूल' का 'दुकूल' 'धो' का 'द्यो' तथा 'साल-भञ्जिकाम्' का पाठभेद 'शालभञ्ज्रिकाम्' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ : ६४ (१) शालभंजिकाः-अर्थ पुतली होता है। इसका अर्थ वेश्या भी होता है। साँची स्तूपों के घेरे पर शालभंजिका मूर्तियाँ उत्कीर्ण मिलती हैं। मेरे एक मित्र ने शालभंजिका का अर्थ पर्वों तथा पवित्र उत्सवों अथवा यात्रा के समय लाज वर्षा करने वाली कमनीय बालाओं से किया है। किन्तु इसका वर्णन मुझे कहीं नहीं मिल सका। वृक्ष को पकड़ कर स्त्रियाँ खड़ी होती थी। उसके तले उत्सव मनाती थीं। इस प्रकार वृक्षों को पकड़ने वाली स्त्रियों को शालभंजिका कहा गया है। कालान्तर में इसी प्रकार की मूर्ति काष्ठ तथा पाषाण पर बनायी जाने लगी। उसे शालभंजिका की संज्ञा दे दी गयी। निःसन्देह यहाँ इसका तात्पर्य निर्जीव पुतली से है। पुतली चालक के संकेत पर ही कार्य करती है। इसी प्रकार जयश्री इस राजा के अभिप्रायानुसार कार्य करती है। अर्थात् उसे विजय प्राप्त होता ही है। शालभंजिका का एक अर्थ और मिलता है। यह काष्ठ की स्त्री प्रतिमा घटसहित बनायी जाती थी। उत्सवों तथा शुभ कार्य काल में द्वार पर मजा