भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 546

द्वितीय तरंग ४०९ तस्याभूदद्भुतोदन्तो भवभक्तिविभूषितः । राज्ञः संधिमतिर्नाम मन्त्री मतिमतां वरः ॥ ६५ ॥ ६५. उस राजा का अद्भुत वृत्तान्त युक्त, शिवभक्ति विभूषित, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ सन्धिमति नामक मन्त्री हुआ। नास्त्युपायः स संसारे कोऽपि योऽपोहितुं क्षमः । भूपालमत्तकरिणामेषां चपलकर्णताम् ॥ ६६ ॥ ६६. संसार में कोई भी ऐसा उपाय नहीं है, जो इन भूपाल रूपी मत्त गजों की चपल कर्णता१ को दूर करने में समर्थ हो। अत्यद्भुतमतिः शङ्क्यः सोऽयमुक्त्वेति यद्विटैः । तस्मिन्धीसचिवे द्वेषस्तेनाग्राह्यत भूभुजा ॥ ६७ ॥ ६७. "अत्यन्त अद्भुत मतिमान् भी यह आशंकनीय है", यह कहकर, विटों ने, राजा को उस धीमान् मन्त्री के प्रति द्वेषयुक्त कर दिया।


[बायाँ स्तम्भ] कर रख देते थे। यह पुतली किंवा प्रतिमा शाल वृक्ष की बनती थी अतएव उसे शालभंजिका कहा जाता था। एक मत और है। शालभंजिका एक उत्सव प्रति वर्ष मनाया जाता था। यदि शालभंजिका का अर्थ वेश्या किंवा गणिका से लिया जाय तो काशी में गणिकाओं का लोलार्क छठ के दिन बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक तक मेला लगता था। काशी की सभी गणिका कीनाराम के स्थल पर तथा मार्गों में गाती थीं। उनका स्वागत सत्कार होता था। आज से पचास वर्ष पूर्व तक यह उत्सव धूमधाम से होता था। अब यह बन्द हो गया है। सुधारवादी प्रवाह में तिरोहित हो गया है। केवल स्मृति मात्र शेष रह गयी है। वृत्त शालभंजिका संस्कृत का एक प्रसिद्ध नाटक है। पाठभेद : श्लोक संख्या ६५ में 'दन्तो' का 'दान्तो', 'राज्ञः' का 'राज्ञा' तथा 'संधिमति' का पाठभेद 'संधिगति' मिलता है। ५२


[दायाँ स्तम्भ] श्लोक संख्या ६६ में 'योऽपोहितुं' का पाठ- भेद 'यो पिहितुं' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ४७४वां श्लोक है। ६६(१) चपलकर्णता—कल्हण ने यहाँ चपल शब्द का प्रयोग साभिप्राय किया है। चाटुकार तथा दरबारियों की बातें सुनकर राजाओं की वृत्ति का चंचल हो जाना अर्थात् राजा का चपलकर्ण हो जाना स्वाभाविक है। हाथी का चंचल कर्ण उसका स्वभाव है। मत्त हाथी का कान सर्वदा चंचल रहता है। यहां 'चपलकर्ण' श्लिष्ट है। पाठभेद : श्लोक संख्या ६७ में 'शङ्क्य.' का पाठभेद 'शक्यः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ६७(१) श्री स्टीन ने श्लोक संख्या ६६ एवं ६७ का एक ही में अनुवाद किया है। रणजीत सीताराम पण्डित ने अलग अलग अनुवाद ...