राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१० राजतरंगिणी निवारितप्रवेशोऽथ सकोपस्तमहेतुकम् । निनाय हृतसर्वस्वं यावदायुर्र्दारिद्र्ताम् ॥ ६८ ॥ ६८. उस कुपित राजा ने मन्त्री का प्रवेश निषिद्ध कर दिया१। और निष्कारण सर्वस्व हरण कर उसे यावज्जीवन के लिये दरिद्र बना दिया । तस्य भूपतिविद्वेषग्रीष्मोष्मपरिशोषिणः । आप्याय्यं राजपुरुषा वार्तयाऽपि न चक्रिरे ॥ ६६ ॥ ६९. भूपति के विद्वेष रूपी ग्रीष्म ऋतु की गर्मी से परिशोषित उसे, राजपुरुषों ने वार्ता से भी सन्तुष्ट नहीं किया । गिरं गभीरो गृह्णाति क्ष्माभृद्यावत्तदग्रगाः । उक्तानुवादिनस्ताम्व्यक्तं प्रतिरवा इव ॥ ७० ॥ ७०. जब१ गम्भीर राजा कुछ कहता है तो, उसी समय उक्ति की पुनरुक्ति करने वाले उसके अग्रगामी (राजा के साथ आगे चलने वाले चाटुकार) प्रतिध्वनि सदृश शब्द करते हैं । स तु राजविरुद्धत्वदारिद्र्याभ्यां न विव्यथे । गतप्रत्यूहया प्रीतः प्राप्तया हरसेवया ॥ ७१ ॥ ७१. समुपलब्ध निर्विघ्न हर सेवा से प्रसन्न वह (सन्धिमति) राजा की विरुद्धता एवं दारिद्र्य से दुःखी नहीं हुआ । किया है । मैने भी दोनो श्लोको का अनुवाद अलग किन्तु काम नहीं कर सकता था । राजा की अकृपा हो दिया है । इसमें अर्थ समझने मे कठिनाई का यह प्रतीक था । नहीं होती । राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रहका यह ४५वां श्लोक है । पाठभेद : ७० ( १ ) इसका द्वितीय अर्थ यह होता है— श्लोक संख्या ६८ में 'सकोपस्त' का पाठभेद 'जब गम्भीर पर्वत ध्वनि प्राप्त करता है तो उसके 'स कोपात्त' मिलता है । पार्श्ववती प्रतिध्वनि के रूप में स्पष्ट दोहरा देते हैं ।" पादटिप्पणियाँ : अग्रगा का अर्थ पर्वत के सम्मुख स्थित पहाड़ ६८ (१) प्रवेश निषिद्ध—देशी राज्यों में से भी होता है । पर्वत से उठती ध्वनि को सम्मुख यह प्रथा भारतीय राज्यो के विलय पूर्व ( १६४७- स्थित पहाड़ी दोहरा देती है अर्थात् ध्वनि को प्रति- ४८ ) तक जारी थी । इसे 'ड्योढ़ी बन्द' करना ध्वनित करती है । अग्रग का अर्थ मार्गदर्शक भी कहते थे । राजप्रासाद के ड्योढ़ी [ देहली ] के होता है । भीतर प्रवेश नहीं किया जा सकता था । राजस्थान क्ष्माभृत् का अर्थ पर्वत तथा राजा दोनों में यह प्रथा दूसरे प्रकार मे प्रचलित थी । यदि राजा होता है । अप्रसन्न होता था तो आज्ञा दे देता था 'घर बैठो' । पाठभेद : घर मे राज्य कर्मचारी रहता था । वेतन पाता था । श्लोक संख्या ७१ में 'दारिद्र्याभ्यां' का 'दारि-