राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
पातंजल-योगसूत्र १५१
पातंजल-योगसूत्र १५१
योगीगण ईश्वर सम्बन्धी सृष्टि-कर्तृत्व आदि विविध भावो की कोई बात नही उठाते। योगियो के ईश्वर से जगत् के सृष्टि-कर्ता ईश्वर का बोध नही होता। वेद के मतानुसार ईश्वर जगत्-स्रष्टा है। वेद का अभिप्राय यह है कि जगत् में जब सामंजस्य देखा जाता है, तो जगत् अवश्य एक इच्छा-शक्ति का ही प्रकाश होगा।
योगीगण ईश्वर का अस्तित्व स्थापित करने के लिए एक नए प्रकार की युक्ति काम मे लाते हैं। वे कहते हैं —
तत्र निरतिशयं सर्वज्ञत्वबीजम् ॥२५॥
सूत्रार्थ—औरो में जिस सर्वज्ञत्व का बीज मात्र रहता है, वही उनमें निरतिशय अर्थात् अनन्त भाव धारण करता है।
व्याख्या—मन को सदैव अति वृहत् और अति क्षुद्र, इन दो चरम भावो के भीतर ही घूमना पड़ता है। तुम एक ससीम देश की बात भले ही सोचो, पर वही भावना तुम्हारे भीतर असीम देश का भाव भी जगा देगी। यदि आँखे बन्द करके तुम एक छोटेसे देश के बारे मे सोचो, तो देखोगे, उस छोटेसे देशरूप वृत्त के साथ ही उसके चारो ओर अमर्यादित विस्तारवाला एक दूसरा वृत्त भी है। काल के बारे मे भी ठीक यही बात है। मान लो, तुम एक सेकण्ड समय के बारे मे सोच रहे हो। तो उसके साथ-ही-साथ तुमको अनन्त काल की भी बात सोचनी पड़ेगी। ज्ञान के बारे मे भी ठीक ऐसा ही समझना चाहिए। मनुष्य मे ज्ञान का केवल बीज-भाव है; पर इस क्षुद्र ज्ञान की बात मन मे लाने के साथ ही अनन्त ज्ञान के बारे मे भी सोचना पड़ेगा। इस प्रकार, हमारे मन की गठन से ही यह बिलकुल स्पष्ट है कि एक अनन्त ज्ञान है। इस अनन्त ज्ञान को ही योगीगण ईश्वर कहते हैं।
१५२ राजयोग
स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥२६॥
सूत्रार्थ—वे प्राचीन गुरुगणों के भी गुरु हैं, क्योकि वे काल से सीमित नहीं हैं।
व्याख्या—यह सत्य है कि समस्त ज्ञान हमारे भीतर ही निहित है, पर उसे एक दूसरे ज्ञान के द्वारा जागृत करना पडता है। यद्यपि जानने की शक्ति हमारे अन्दर ही विद्यमान है, फिर भी हमे उसे जगाना पडता है। और योगियो के मतानुसार, ज्ञान को इस प्रकार जगाना अर्थात् ज्ञान का उन्मेष एक दूसरे ज्ञान के सहारे ही हो सकता है। अचेतन जड पदार्थ ज्ञान का विकास कभी नही करा सकता—केवल ज्ञान की शक्ति से ही ज्ञान का विकास होता है। हमारे अन्दर जो ज्ञान है, उसको जगाने के लिए ज्ञानी पुरुषो का हमारे पास रहना सदैव आवश्यक है। यही कारण है कि इन गुरुओ की आवश्यकता सदा ही बनी रही है। जगत् कभी भी इन आचार्यों से रहित नही हुआ। उनकी सहायता बिना कोई भी ज्ञान नही आ सकता। ईश्वर सारे गुरुओ के भी गुरु हैं, क्योकि ये सब गुरु कितने ही उन्नत क्यो न रहे हो, वे देवता या स्वर्गदूत ही क्यो न रहे हो, पर वे सब-के-सब बद्ध थे और काल से सीमित थे, किन्तु ईश्वर काल से आबद्ध नही है। योगियो के दो विशेष सिद्धान्त हैं। एक तो यह कि सान्त वस्तु की भावना करते ही मन बाध्य होकर अनन्त की भी बात सोचेगा, और यदि उस मानसिक अनुभूति का एक भाग सत्य हो, तो उसका दूसरा भाग भी अवश्यमेव सत्य होगा। क्यो ? इसलिए कि जब दोनो उस एक ही मन की अनुभूतियाँ है, तो दोनो अनुभूतियो का मूल्य समान ही होगा। मनुष्य का ज्ञान अल्प है अर्थात् मनुष्य अल्पज्ञ है—
पातंजल-योगसूत्र १५३
पातंजल-योगसूत्र १५३
इसी से जाना जाता है कि ईश्वर का ज्ञान अनन्त है, ईश्वर अनन्तज्ञानसम्पन्न है। यदि हम इन दोनो अनुभूतियो मे से एक को ग्रहण करे, तो दूसरे को भी क्यो न ग्रहण करेगे? युक्ति तो कहती है—या तो दोनो को मान लो, या फिर दोनो को ही छोड़ दो। यदि में विश्वास करूँ कि मनुष्य अल्पज्ञानसम्पन्न है, तो मुझे यह भी अवश्य मानना पडेगा कि उसके पीछे कोई असीमज्ञानसम्पन्न पुरुष है। दूसरा सिद्धान्त यह है कि गुरु बिना कोई भी ज्ञान नही हो सकता। आजकल के दार्शनिको का जो कथन है कि मनुष्य का ज्ञान उसके स्वय के भीतर से उत्पन्न होता है, यह सच है, सारा ज्ञान मनुष्य के भीतर ही विद्यमान है, पर उस ज्ञान के विकास के लिए कुछ अनुकूल परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। हम गुरु बिना कोई ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। अब बात यह है कि यदि मनुष्य, देवता अथवा कोई स्वर्गदूत हमारे गुरु हो, तो वे भी तो ससीम हैं, फिर उनसे पहले उनके गुरु कौन थे? हमे मजबूर होकर यह चरम सिद्धान्त स्थिर करना ही होगा कि एक ऐसे गुरु है, जो काल के द्वारा सीमाबद्ध या अवच्छिन्न नही हैं। उन्ही अनन्त ज्ञानसम्पन्न गुरु को, जिनका आदि भी नही और अन्त भी नही, ईश्वर कहते है।
तस्य वाचकः प्रणवः ॥२७॥
सूत्रार्थ—प्रणव अर्थात् ओकार उनका वाचक (प्रकाशक) है।
व्याख्या—तुम्हारे मन में जो भी भाव उठता है, उसका एक प्रतिरूप शब्द भी रहता है, इस शब्द और भाव को अलग नही किया जा सकता। एक ही वस्तु के बाहरी भाग को शब्द और अन्तर्भाग को विचार या भाव कहते हैं। कोई भी व्यक्ति
१५४ राजयोग
१५४ राजयोग
विश्लेषण के बल से विचार को शब्द से अलग नहीं कर सकता। बहुतो का मत है कि कुछ लोग एक साथ बैठकर यह स्थिर करने लगे कि किस भाव के लिए कौनसे शब्द का प्रयोग किया जाय, और इस प्रकार भाषा की उत्पत्ति हो गई। किन्तु यह प्रमाणित हो चुका है कि यह मत भ्रमात्मक है। जब से मनुष्य विद्यमान है, तब से शब्द और भाषाएँ रही हैं। अब बात यह है कि एक भाव और एक शब्द मे परस्पर क्या सम्बन्ध है। यद्यपि हम देखते है कि एक भाव के साथ एक शब्द का रहना अनिवार्य है, तथापि ऐसा नहीं कि एक भाव एक ही शब्द द्वारा प्रकाशित हो। बीस विभिन्न देशो मे भाव एक ही होने पर भी भाषाएँ बिलकुल भिन्न-भिन्न हो सकती है। प्रत्येक भाव को प्रकट करने के लिए एक-न-एक शब्द की आवश्यकता अवश्य होगी, किन्तु इस एक भाव के प्रकाशक शब्दो का एक ही उच्चारण-विशिष्ट होना कोई आवश्यक नहीं। विभिन्न देशो मे भिन्न-भिन्न उच्चारण-विशिष्ट शब्दो का व्यवहार होगा। इसीलिए टीकाकार ने कहा है, "यद्यपि भाव और शब्द का परस्पर सम्बन्ध स्वाभाविक है तथापि एक शब्द और एक भाव के बीच एक नितान्त अलङ्घनीय सम्बन्ध ही रहे, ऐसी कोई बात नही।" * यद्यपि ये सब शब्द भिन्न-भिन्न होते है, तो भी शब्द और भाव का परस्पर सम्बन्ध स्वाभाविक है। यदि वाच्य और वाचक के बीच प्रकृत सम्बन्ध रहे, तभी यह कहा जा सकता है कि भाव और शब्द के बीच परस्पर सम्बन्ध है। यदि ऐसा न हो, तो वह वाचक शब्द कभी
* 'सर्वे एव शब्दा सर्वाकारार्थाभिधानसमर्था—इति स्थित एतैषा सर्वकारितैः स्वाभाविक. सम्बन्ध ।'—व्यासभाष्य की वाचस्पतिमिश्र-कृत टीका।
पातंजल-योगसूत्र १५५:
पातंजल-योगसूत्र १५५:
सर्वसाधारण के उपयोग मे नही आ सकता। वाचक वाच्यपदार्थ का प्रकाशक होता है। यदि वह वाच्य वस्तु पहले से अस्तित्व में रहे, और हम यदि पुन-पुन परीक्षा द्वारा यह देखे कि उस वाचक शब्द ने उस वस्तु को अनेक बार सूचित किया है, तो हम निश्चित रूप से यह मान सकते है कि उस वाच्य और वाचक के बीच एक यथार्थ सम्बन्ध है। यदि ये वाच्यपदार्थ न भी रहे, तो भी हजारो मनुष्य उनके वाचको के द्वारा ही उनका ज्ञान प्राप्त करेंगे। पर हां, वाच्य और वाचक के बीच एक स्वाभाविक सम्बन्ध रहना अनिवार्य है। ऐसा होने पर, ज्योही उस वाचक-शब्द का उच्चारण किया जायगा, त्योही वह उस वाच्यपदार्थ की बात मन में ला देगा। सूत्रकार कहते है, ओकार ईश्वर का वाचक है। सूत्रकार ने विशेष रूप से 'ॐ' शब्द का ही उल्लेख क्यो किया है ? 'ईश्वर'—इस भाव को व्यक्त करने के लिए तो सैकडो शब्द है। एक भाव के साथ हजारो शब्दो का सम्बन्ध रहता है। 'ईश्वर'—इस भाव का सैकडो शब्दो के साथ सम्बन्ध है और उनमे से प्रत्येक ही तो ईश्वर का वाचक है। फिर उन्होने 'ॐ' को ही क्यो चुना ? हां, ठीक है, पर वैसा होने पर भी उन शब्दो मे से एक सामान्य शब्द चुन लेना चाहिए। उन सारे वाचको का एक सामान्य आधार निकालना होगा, और जो वाचक-शब्द सबका सामान्य वाचक होगा, वही सर्वश्रेष्ठ समझा जायगा, और वास्तव में वही उसका यथार्थ वाचक होगा। किसी शब्द के उच्चारण के लिए हम कण्ठ नली और तालु का शब्द-उच्चारण के आधार-रूप मे व्यवहार करते हैं। क्या ऐसा कोई भौतिक शब्द है, जिसकी कि अन्य सब शब्द अभिव्यक्ति हैं, जो स्वभावत ही दूसरे सब शब्दो को समझा-
३५६ राजयोग
३५६ राजयोग
सकता है? हाँ, 'ओम्' (अउम्) ही वह शब्द है, वही सारे शब्दो की भित्तिस्वरूप है। उसका प्रथम अक्षर 'अ' सभी शब्दो का मूल है—वह सारे शब्दो की कुजी के समान है, वह जिह्वा या तालु के किसी अंश को स्पर्श किए बिना ही उच्चारित होता है। 'म' समस्त शब्दो का अन्तिम शब्द है, उसका उच्चारण करने में दोनो ओठो को बन्द करना पडता है। और 'उ' शब्द जिह्वा के मूल से लेकर मुख के मध्यवर्ती शब्दाधार की अन्तिम सीमा तक मानो ढुलकता आता है। इस प्रकार 'ॐ' शब्द के द्वारा शब्दोच्चारण की सम्पूर्ण क्रिया प्रकट हो जाती है। अतएव वही स्वाभाविक वाचक-शब्द है, वही सब विभिन्न शब्दो की जननीस्वरूप है। जितने प्रकार के शब्द उच्चारित हो सकते है—हमारी ताकत मे जितने प्रकार के शब्द-उच्चारण की सम्भावना है, 'ओम्' उन सभी का सूचक है। यह सब तात्त्विक चर्चा छोड देने पर भी, हम देखते है कि भारतवर्ष में जितने सारे विभिन्न धर्मभाव है, यह ओंकार उन सबका केन्द्रस्वरूप है, वेद के सब विभिन्न धर्मभाव इस ओंकार का ही अवलम्बन किए हुए हैं। अब प्रश्न यह है कि इसके साथ अमेरिका, इगलैण्ड और अन्यान्य देशो का क्या सम्बन्ध है ? उत्तर यह है कि सब देशों मे इस ओंकार का व्यवहार हो सकता है। कारण, भारतवर्ष में धर्म के विकास की प्रत्येक अवस्था मे—उसके प्रत्येक सोपान में ओंकार को अपनाया गया है, उसका आश्रय लिया गया है और वह ईश्वर सम्बन्धी सारे विभिन्न भावो को व्यक्त करने के लिए व्यवहृत हुआ है। अद्वैतवादी, द्वैतवादी, द्वैताद्वैतवादी, भेद-वादी, यहाँ तक कि नास्तिको ने भी अपने उच्चतम आदर्श को प्रकट करने के लिए इस ओंकार का अवलम्बन किया था।
पातंजल-योगसूत्र १५७
मानव-जाति के अधिकांश के लिए यह ओंकार उनकी अपनी धार्मिक स्पृहा का एक प्रतीक बन गया है। अतएव अन्य सब देशो की विभिन्न जातियां भी इसका अवलम्बन कर सकती है। अँगरेजी गॉड (God) शब्द को लो। वह जिस भाव को प्रकट करता है, वह कोई अधिक दूर तक नही जा सकता। यदि तुम उसके अतिरिक्त अन्य कोई भाव उस शब्द से व्यक्त करने की इच्छा करो, तो तुम्हे उसमे विशेषण लगाना पडेगा—जैसे Personal (सगुण), Impersonal (निर्गुण), Absolute (निर्विशेष) आदि-आदि। अन्य दूसरी भाषाओ मे ईश्वर-वाचक जो सब शब्द हैं, उनके बारे मे भी यही बात घटती है, उनमे बहुत कम भाव प्रकट करने की शक्ति है, किन्तु 'ॐ' शब्द मे ये सभी प्रकार के भाव विद्यमान है। अतएव सर्वसाधारण को उसका ग्रहण करना चाहिए।
तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥२८॥
**सूत्रार्थ—**इस (ओंकार) का जप और उसके अर्थ का ध्यान (समाधि-लाभ का उपाय है)।
**व्याख्या—**जप अर्थात् बारम्बार उच्चारण की आवश्यकता क्या है? हम सस्कार-विषयक मतवाद को न भूले होगे, हमे स्मरण होगा कि समस्त सस्कारो की समष्टि हमारे मन में विद्यमान है। ये सस्कार क्रमश सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होकर अव्यक्त भाव धारण करते है। पर वे बिलकुल लुप्त नही हो जाते, वे मन के अन्दर ही रहते है, और ज्योही उन्हे यथोचित स्फूर्ति मिलती है, बस त्योही वे मानस-सरोवर की सतह पर उठ आते हैं। परमाणु-कम्पन कभी बन्द नही होता। जब यह सारा ससार नाश को प्राप्त होता है, तब सब बड़े-बड़े कम्पन या प्रवाह लुप्त
१५८ राजयोग
हो जाते हैं, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, पृथ्वी, सभी लय को प्राप्त हो जाते है, पर परमाणुओं मे का कम्पन बच रहता है। इन बड़े बड़े ब्रह्माण्डो मे जो कार्य होता है, प्रत्येक परमाणु वही कार्य करता है। ठीक ऐसा ही चित्त के बारे मे भी है। चित्त में होनेवाले सब कम्पन अदृश्य अवश्य हो जाते हैं, फिर भी परमाणु के कम्पन के समान उनकी सूक्ष्म गति अक्षुण्ण बनी रहती है, और ज्योही उन्हे कोई स्फूर्ति मिलती है, बस त्योही वे पुन बाहर आ जाते है। अब हम समझ सकेगे कि जप अर्थात् वारम्वार उच्चारण का तात्पर्य क्या है। हम लोगो के अन्दर जो धर्म के सस्कार हैं, उन्हे विशेष रूप से बल देने मे यह प्रधान सहायक है।
"क्षणमिह सज्जनसंगतिरेका। भवति भवार्णवतरणे नौका।"*
—साधुओं की एक क्षण की भी संगति भवसागर पार होने के लिए नौका-स्वरूप है। सत्संग की ऐसी जबरदस्त शक्ति है! बाह्य सत्संग की जैसी शक्ति बतलाई गई है, वैसी ही आन्तरिक सत्संग की भी है। इस ओंकार का बारम्बार जप करना और उसके अर्थ का मनन करना ही आन्तरिक सत्संग है। जप करो और उसके साथ उस शब्द के अर्थ का ध्यान करो। ऐसा करने से, देखोगे, हृदय मे ज्ञानालोक आयगा और आत्मा प्रकाशित हो जायगी।
'ॐ' शब्द पर मनन तो करोगे ही, पर साथ ही उसके अर्थ पर भी मनन करो। कुसंगति छोड़ दो, क्योकि पुराने घाव के चिह्न अभी भी बने हुए है, उन पर कुसंगति की गर्मी लगने भर की देर है कि बस वे फिर से ताजे हो उठेंगे। ठीक इसी प्रकार हम लोगो मे जो उत्तम सस्कार है, वे भले ही अभी अव्यक्त हो, पर
* शंकराचार्यकृत मोहमुद्गर, ५।
पातंजल-योगसूत्र १५९
पातंजल-योगसूत्र १५९
सत्संग से वे फिर से जागरित हो जायँगे—व्यवत भाव धारण कर लेगे। संसार मे सत्सग से पवित्र और कुछ भी नहीं है, क्योकि सन्सग से ही शुभ संस्कारो के जागरित होने का सुयोग उपस्थित होता है—वे सब शुभ सस्कार चित्तरूपी सरोवर की तली से ऊपरी सतह पर उठ आते हैं।
ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥२९॥
सूत्रार्थ—उससे अन्तर्दृष्टि प्राप्त होती है और (योग के) विघ्नों का नाश होता है।
व्याख्या—इस ओंकार के जप और चिन्तन का पहला फल यह देखोगे कि क्रमश अन्तर्दृष्टि विकसित होने लगेगी और योग के मानसिक एव शारीरिक विघ्नसमूह दूर होते जायँगे। योग के ये विघ्न कौन-कौनसे हैं ?
व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥३०॥
सूत्रार्थ—रोग, मानसिक जडता, सन्देह, उद्यमशून्यता, आलस्य, विषय-तृष्णा, मिथ्या अनुभव, एकाग्रता न पाना, और उसे पाने पर भी उसका न ठहरना—ये जो चित्त के विक्षेप हैं, वे ही विघ्न हैं।
व्याख्या—व्याधि—इस जीवन-समुद्र के उस पार जाने के लिए यह शरीर ही एकमात्र नाव है। इसे स्वस्थ रखने के लिए विशेष यत्न करना चाहिए। जिसका शरीर अस्वस्थ है, वह योगी नही हो सकता। मानसिक जडता आने पर हमारा योगविषयक सारा अनुराग जाता रहता है। और इस अनुराग के अभाव मे, साधन करने के लिए जिस दृढ सकल्प एव शक्ति का रहना आवश्यक है, उसका कुछ भी शेष नही रह जाता। हमारा इस विषय मे विचारजनित विश्वास कितना भी क्यों
| १६० | राजयोग |
|---|
न रहे, पर जब तक दूरदर्शन, दूरश्रवण आदि अलौकिक अनुभूतियाँ नही होती, तब तक इस विद्या की सत्यता के बारे मे बहुतसे सशय उपस्थित होगे। जब इन सबका थोडा-थोडा आभास आने लगता है, तो मन भी क्रमश दृढ होता जाता है। और उससे साधक साधनमार्ग मे और भी अध्यवसायशील होता जाता है। अनवस्थितत्व—साधन करते-करते देखोगे कि कुछ दिन या कुछ सप्ताह तो मन अनायास ही एकाग्र और स्थिर हो जाता है, उस समय ऐसा मालूम होगा कि तुम साधनमार्ग मे बहुत शीघ्र उन्नति कर रहे हो। अचानक एक दिन देखोगे कि तुम्हारा यह उन्नति-स्रोत बन्द हो गया है, मानो जहाज दलदल में फँस गया हो। पर उससे कही हताश मत हो जाना, अध्यवसाय मत खो बैठना। लगे रहो। इस प्रकार उत्थान और पतन मे से होते हुए ही उन्नति होती है।
दुःखदौर्मनस्यांगमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः ॥३१॥
सूत्रार्थ—दुःख, मन खराब होना, शरीर हिलना, अनियमित श्वास-प्रश्वास—ये सब (चित्त के) विक्षेपों के साथ-साथ उत्पन्न होते हैं।
व्याख्या—जब कभी एकाग्रता का अभ्यास किया जाता है, तभी मन और शरीर पूर्ण स्थिरभाव धारण करते हैं। जब साधना ठीक तरीके से नही होती, अथवा जब चित पर्याप्त सयत नही रहता, तभी ये सब विघ्न आ उपस्थित होते हैं। ओकार के जप और ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण से मन दृढ होता है तथा नया वल प्राप्त होता है। साधनमार्ग में ऐसी स्नायविक चंचलता प्राय सभी को आती है। उधर तनिक भी ध्यान न दे साधना करते रहो। साधना से ही वे सब चले जायेंगे, और तब आसन स्थिर हो जायगा।
पातंजल-योगसूत्र १६१
पातंजल-योगसूत्र १६१
तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥३२॥
**सूत्रार्थ—**उनको दूर करने के लिए एक तत्त्व का अभ्यास (करना चाहिए)।
**व्याख्या—**कुछ समय तक के लिए मन को किसी विशिष्ट विषय के आकार में परिणत करने की चेष्टा करने से पूर्वोक्त विघ्न दूर हो जाते हैं। यह उपदेश अत्यन्त साधारण रूप से दिया गया है। अगले सूत्रो में यही उपदेश विस्तृत रूप से समझाया जायगा और विशिष्ट ध्येय-विषयो के सम्बन्ध में इस साधारण उपदेश का प्रयोग बतलाया जायगा। एक ही प्रकार का अभ्यास सब के लिए उपयोगी नही हो सकता, इसी लिए विभिन्न उपायो की बात कही गई है। प्रत्येक मनुष्य स्वयं परीक्षा करके अपने लिए उपयोगी उपाय चुन ले सकता है।
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां
भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥३३॥
**सूत्रार्थ—**सुख, दुःख, पुण्य और पाप—इन भावों के प्रति क्रमशः मित्रता, दया, आनन्द और उपेक्षा का भाव धारण कर सकने से चित्त प्रसन्न होता है।
**व्याख्या—**हममें ये चार प्रकार के भाव रहने ही चाहिए। यह आवश्यक है कि हम सब के प्रति मैत्री-भाव रखे, दीन-दुखियों के प्रति दयावान हो, लोगो को सत्कर्म करते देख सुखी हो, और दुष्ट मनुष्य के प्रति उपेक्षा दिखाएँ। इसी प्रकार, जो भी विषय हमारे सामने आते हैं, उन सब के प्रति भी हमारे ये ही भाव रहने चाहिए। यदि कोई विषय सुखकर हो, तो उसके प्रति मित्रता अर्थात् अनुकूल भाव धारण करना चाहिए। इसी तरह, यदि कोई दुखकर घटना हमारी भावना का विषय हो, तो हमारे
११
१६२ राजयोग
१६२ राजयोग
अन्त करण को उसके प्रति करुणापूर्ण होना चाहिए । यदि वह कोई शुभ विषय हो, तो हमें आनन्दित होना चाहिए, तथा असत् विषय होने पर उसके प्रति उदासीन रहना ही श्रेयस्कर है । इन सब विभिन्न विषयों के प्रति मन के इस प्रकार विभिन्न भाव धारण करने से मन शान्त हो जायगा । मन की इस प्रकार के विभिन्न भावों को धारण करने की असमर्थता ही हमारे दैनिक जीवन की अधिकांश गडबडी एव अशान्ति का कारण है । मान लो, किसी ने मेरे प्रति कोई अनुचित व्यवहार किया । तो मै तुरन्त उसका प्रतिकार करने को उद्यत हो जाता हूँ । और इस प्रकार बदला लेने की भावना ही यह दर्शा देती है कि हम चित्त को दवा रखने मे असमर्थ हो रहे हैं । वह उस वस्तु की ओर तरगाकार में प्रवाहित होता है, और बस हम अपनी मन की शक्ति खो बैठते हैं । हमारे मन मे घृणा अथवा दूसरो का अनिष्ट करने की प्रवृत्ति के रूप में जो प्रतिक्रिया होती है, वह मन की शक्ति का क्षय मात्र है । दूसरी ओर, यदि किसी अशुभ विचार या घृणाप्रसूत कार्य अथवा किसी प्रकार की प्रतिक्रिया की भावना का दमन किया जाय, तो उससे शुभकरी शक्ति उत्पन्न होकर हमारे ही उपकार के लिए सचित रहती है । यह बात नही कि इस प्रकार के सयम से हमारी कोई क्षति होती हो, वरन् उससे तो हमारा आशातीत उपकार ही होता है । जब कभी हम घृणा अथवा क्रोध की वृत्ति को संयत करते हैं, तभी वह हमारे अनुकूल शुभ शक्ति के रूप में सचित होकर उच्चतर शक्ति मे परिणत हो जाती है ।
प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥३४॥
सूत्रार्थ— अथवा प्राणवायु को बाहर निकालने और धारण करने से भी (चित्त स्थिर होता है) ।
पातंजल-योगसूत्र १६३
**व्याख्या—**यहाँ पर 'प्राण' शब्द का व्यवहार हुआ है। प्राण ठीक श्वास नही है। समग्र जगत् मे जो शक्ति व्याप्त हो रही है, उसी का नाम है प्राण। संसार मे तुम जो कुछ देखते हो, जो कुछ हिलता-डुलता या कार्य करता है, जिसमें भी जीवन है—वह सब-का-सब इस प्राण की ही अभिव्यक्ति है। जगत् में जितनी भी शक्तियाँ विद्यमान है, उनकी समष्टि को प्राण कहते हैं। कल्प-आरम्भ के पूर्व यह प्राण एक प्रकार से बिलकुल गतिहीन अवस्था मे रहता है, और कल्प के शुरू होने पर वह फिर से व्यक्त होना प्रारम्भ करता है। यह प्राण ही गति के रूप मे—मनुष्यो अथवा अन्य प्राणियों में स्नायविक गति के रूप मे—प्रकाशित होता है। फिर यही विचार तथा अन्य शक्तियो के रूप में भी प्रकाशित होता है। यह सारा जगत् इस प्राण एव आकाश की समष्टि है। मनुष्य-देह के बारे मे भी ठीक यही बात है। जो कुछ तुम देखते हो या अनुभव करते हो, वे सारे पदार्थ आकाश से उत्पन्न हुए है और प्राण से सारी विभिन्न शक्तियाँ। इस प्राण को बाहर निकालने और धारण करने का नाम ही प्राणायाम है। योगदर्शन के पितृस्वरूप पतंजलि ने इस प्राणायाम के बारे मे कोई विशेष विधान नही किया है, परन्तु उनके बाद दूसरे योगियो ने इस प्राणायाम के सम्बन्ध मे अनेक तत्त्वो का आविष्कार कर उसकी एक महान् विद्या तैयार कर दी। पतंजलि के मतानुसार, यह प्राणायाम चित्तवृत्तिनिरोध के विभिन्न उपायो मे से केवल एक उपाय है, परन्तु उन्होने इस पर कोई विशेष जोर नही दिया है। उनका अभिप्राय इतना ही रहा है कि श्वास को बाहर निकालकर फिर से अन्दर खींच लो और कुछ देर तक उसे धारण किए रखो, उससे मन अपेक्षाकृत कुछ स्थिर हो,
१६४ राजयोग
जायगा। किन्तु बाद में इसी से प्राणायाम नामक एक विशेष विद्या की उत्पत्ति हो गई। अब हम देखेंगे कि ये सब बाद के योगीगण उसके बारे मे क्या कहते हैं। इस सम्बन्ध में मैंने पहले ही कुछ कहा है, यहाँ पर उसकी कुछ पुनरावृत्ति करने से वह मन में पक्का बैठ जायगा। पहले तो, यह ध्यान रखना होगा कि यह प्राण ठीक श्वास-प्रश्वास नहीं है, वरन् जिस शक्ति के बल से श्वास-प्रश्वास को गति होती है, जो वस्तुत श्वास-प्रश्वास की भी जीवनी-शक्ति है, वही प्राण है। फिर, यह 'प्राण' शब्द सब इन्द्रियो के लिए भी व्यवहार मे लाया जाता है, वे सब-की-सब प्राण कहलाती हैं, मन को भी प्राण कहा जाता है॥ अतएव हम देखते है कि प्राण का अर्थ है शक्ति। तो भी इसे हम शक्ति नाम नहीं दे सकते, क्योकि शक्ति तो इस प्राण की अभिव्यक्ति मात्र है। यह प्राण ही शक्ति तथा नाना प्रकार की गति के रूप मे प्रकाशित होता है। चित्त यन्त्रस्वरूप होकर चारो ओर से प्राण को भीतर खींचता है और उससे शरीर-रक्षा करनेवाली विभिन्न जीवनी-शक्तियाँ तथा विचार, इच्छा एवं अन्यान्य सब शक्तियाँ उत्पन्न करता है। पूर्वोक्त प्राणायाम-क्रिया से हम शरीर की समस्त भिन्न-भिन्न गतियो को तथा शरीर के अन्तर्गत समस्त भिन्न-भिन्न स्नायविक शक्तिप्रवाहो को वश में ला सकते है। पहले हम उनको पहचानने लगते है, उनका साक्षात् अनुभव करने लगते है, और फिर धीरे-धीरे उन पर अधिकार प्राप्त करते जाते हैं—उनको वशीभूत करने में सफल होते जाते हैं। पतंजलि के बाद के इन योगियो के मतानुसार मनुष्य-देह मे तीन मुख्य प्राण-प्रवाह अर्थात् नाडियाँ हैं। वे एक को इड़ा, दूसरे को पिंगला और तीसरे को सुषुम्ना कहते
पातंजल-योगसूत्र १६५
हैं। उनके मतानुसार, पिंगला मेरुदण्ड के दाहिनी ओर है और इड़ा बाईं ओर, और उस मेरुदण्ड के मध्य में से होते हुए सुषुम्ना नाम की एक खोखली नाली है। उनके मतानुसार इड़ा और पिंगला ये दो नाड़ियाँ प्रत्येक मनुष्य में कार्य करती हैं, उनके सहारे ही हमारा जीवन चलता है। सुषुम्ना का कार्य सभी में होना सम्भव अवश्य है, किन्तु असल में योगी के शरीर में ही उसके भीतर से कार्य हुआ करता है। तुम्हें याद रखना चाहिए कि योगी योगसाधन के बल से अपने शरीर को परिवर्तित कर लेते हैं। तुम जितना ही साधन करोगे, तुम्हारा शरीर उतना ही परिवर्तित होता जायगा। साधन के पूर्व तुम्हारा शरीर जैसा था, बाद में वैसा नहीं रह जायगा। यह बात कोई अयौक्तिक नहीं है, युक्ति के द्वारा इसको समझाया जा सकता है। हम जो कुछ नए विचार सोचते हैं, वे मानो हमारे मस्तिष्क में एक नई प्रणाली तैयार कर देते हैं। इससे हम अच्छी तरह समझ सकते हैं कि मनुष्य-स्वभाव इतनी रक्षणशीलता का पक्षपाती क्यों है। मनुष्य-स्वभाव ही ऐसा है कि वह पहले चले हुए रास्ते में ही भ्रमण करना पसन्द करता है, क्योंकि वह अपेक्षाकृत सरल होता है। यदि दृष्टान्त के रूप में हम सोचें कि मन एक सुई के समान है और मस्तिष्क उसके सामने एक कोमल पिण्ड, तो, हम देखेंगे कि हमारा प्रत्येक विचार मस्तिष्क के अन्दर मानो एक रास्ता—एक लीक तैयार कर देता है, और यदि मस्तिष्क के अन्दर का धूसर पदार्थ उस रास्ते के चारों ओर एक सीमा खड़ी न कर दे, तो वह रास्ता बन्द हो जायगा। यदि वह धूसर रंगवाला पदार्थ न रहता, तो हमारी स्मृति ही सम्भव न होती; क्योंकि स्मृति का अर्थ है—मानो इन पुराने रास्तों पर से होकर
१६६ राजयोग
१६६ राजयोग
जाना—जो विचार एक बार उठ चुके हैं, उनका मानो पदानुगमन करना। तुम लोगो ने शायद गौर किया होगा, जब मैं सब लोगो के परिचित कुछ विषयो को लेकर, उन्ही को घुमा-फिराकर कुछ बोलता हूँ, तो तुम सब अनायास ही मेरी बात समझ लेते हो। इसका कारण बस इतना ही है कि इस विचार की लीके या प्रणालियाँ हर एक के मस्तिष्क मे विद्यमान है, और उन पर से होकर केवल बारम्बार आना-जाना मात्र आवश्यक होता है। परन्तु जब कभी कोई नया विषय हमारे सामने आता है, तब मस्तिष्क मे एक नई प्रणाली के निर्माण की आवश्यकता होती है, इसीलिए वह विषय उतनी सरलता से समझ मे नहीं आता। यही कारण है कि मस्तिष्क (मनुष्य नही, मस्तिष्क ही) बिना जाने ही किसी नए प्रकार के भाव द्वारा परिचालित होने से इनकार करता है। वह मानो बलपूर्वक इस नए प्रकार के भाव की गति को रोकने का प्रयत्न करता है। प्राण नई-नई प्रणालियाँ बनाने का प्रयत्न कर रहा है, और मस्तिष्क उसे करने नही देता। बस यही मनुष्य की रक्षणशीलता का रहस्य है। मस्तिष्क मे ये प्रणालियाँ जितने थोडे परिमाण मे होगी और प्राणरूप सुई उसके भीतर जितनी कम लीके तैयार करेगी, मस्तिष्क उतना ही रक्षणशीलताप्रिय होगा, वह उतना ही नए प्रकार के विचार और भाव के विरुद्ध लडाई ठानेगा। मनुष्य जितना ही चिन्तनशील होता है, उसके मस्तिष्क के भीतर के मार्ग उतने ही अधिक जटिल होते हैं, और उतनी ही सुगमता से वह नए-नए भाव ग्रहण कर सकता है तथा उन्हे समझ सकता है। प्रत्येक नवीन भाव के सम्बन्ध मे ऐसा ही समझना चाहिए। मस्तिष्क में एक नवीन भाव आते ही उसके भीतर एक नई
पातंजल-योगसूत्र १६७
पातंजल-योगसूत्र १६७
प्रणाली तैयार हो जाती है। यही कारण है कि योगाभ्यास के समय हमारे सामने पहले इतनी शारीरिक बाधाएँ आती हैं; क्योंकि योग सम्पूर्णतया नवीन प्रकार के विचारों एवं भावों की समष्टि है। इसीलिए हम देखते हैं कि धर्म का वह अंश, जो प्राकृतिक, जागतिक भाव को लेकर सामने आता है, सर्वसाधारण के लिए इतनी बहुतायत से ग्राह्य होता है, और उसका दूसरा अंश अर्थात् दर्शन या मनोविज्ञान, जो केवल मनुष्य के आभ्यन्तरिक भाग को लेकर संलग्न रहता है, साधारणतः लोगों को उतना ग्राह्य नहीं होता। हमें अपने इस जगत् की व्याख्या स्मरण रखनी चाहिए। हमारा यह जगत् क्या है ? वह तो हमारे ज्ञान के स्तर पर प्रकाशित अनन्त सत्ता मात्र है। अनन्त का केवल कुछ अंश हमारे ज्ञान के सामने प्रकाशित हुआ है और उसी को हम अपना जगत् कहते हैं। अतएव हमने देखा कि जगत् के अतीत एक अनन्त सत्ता वर्तमान है। और धर्म को इन दोनों को लेकर रहना पड़ता है। अर्थात् यह क्षुद्र पिण्ड, जिसे हम अपना जगत् कहते हैं, और जगत् के अतीत अनन्त सत्ता—ये दोनों ही धर्म के विषय हैं। जो धर्म इन दोनों में से केवल एक को लेकर रहता है, वह अपूर्ण है। धर्म को इन दोनों को ही अपना विषय बनाना चाहिए। अनन्त का जो भाग हम अपने इस ज्ञान के भीतर से अनुभव करते हैं, जो मानो देश-काल-निमित्तरूप चक्र के भीतर आ पड़ा है, उसको धर्म के जिस अंश ने अपना विषय बनाया है, वह अंश अनायास हमें बोधगम्य हो जाता है, क्योंकि हम तो पहले से ही उसी के अन्दर हैं और इस जगत् के भाव एक प्रकार से स्मरणातीत काल से ही हमारे परिचित हैं। पर उसका जो अंश अनन्त को लेकर है, वह हमारे
१६८ | राजयोग
१६८ | राजयोग
लिए सर्वथा नवीन है, इसीलिए उसके चिन्तन से मस्तिष्क में नई प्रणालियाँ तैयार होती रहती हैं, जिससे सारा शरीर ही मानो उलट-पलट जाता है। यही कारण है कि साधन करते समय साधारण मनुष्य पहले-पहल अपने मार्ग से विच्युत हो जाता है। इन विघ्न-बाधाओ को यथासम्भव कम करने के लिए ही पतंजलि ने इन सब उपायो का आविष्कार किया है, ताकि हम उनमें से ऐसी किसी एक साधनप्रणाली को चुनकर अपना लें, जो हमारे लिए सर्वथा उपयोगी हो।
विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनी ॥३५॥
सूत्रार्थ—जिन सब समाधियो में अलौकिक इन्द्रिय-विषयों की अनुभूति होती है, वे मन की स्थिति का कारण होती हैं।
व्याख्या—यह बात धारणा अर्थात् एकाग्रता से अपने-आप आती रहती है, योगीगण कहते हैं कि यदि नासिका के अग्र भाग मे मन को एकाग्र किया जाय, तो कुछ दिनो में ही अद्भुत सुगन्धि का अनुभव होने लगता है। इसी प्रकार जिह्वामूल में मन को एकाग्र करने पर सुन्दर शब्द सुनाई देता है। जिह्वाग्र में ऐसा करने पर दिव्य रसास्वादन होता है। जिह्वा के बीच में संयम करने पर प्रतीत होता है कि मैने मानो किसी एक वस्तु का स्पर्श किया। तालु मे संयम करने पर दिव्य रूप दीख पडते हैं। यदि कोई अस्थिरचित्त व्यक्ति इस योग के कुछ साधनो का अवलम्बन करना चाहे और फिर भी उनकी सच्चाई में सन्दिग्ध-चित्त हो, तो कुछ दिन साधन करने के बाद, ये सब अनुभूतियाँ होने पर, फिर उसे सन्देह नही रहेगा। तब फिर वह अध्यवसाय के साथ साधन करता रहेगा।
पातंजल-योगसूत्र १६९
विशोका वा ज्योतिष्मती ॥३६॥
सूत्रार्थ— अथवा शोक से रहित ज्योतिष्मान् पदार्थ के (ध्यान) से भी (समाधि होती है)।
व्याख्या— यह और एक प्रकार की समाधि है। ऐसा ध्यान करो कि हृदय मे मानो एक कमल है; उसकी पँखुडियाँ अधोमुखी है और उसके भीतर से सुषुम्ना गई है। उसके बाद पूरक करो, फिर रेचक करते समय सोचो कि वह कमल पँखुडियों सहित ऊर्ध्वमुखी हो गया है और कमल के भीतर एक महाज्योति विद्यमान है। उस ज्योति का ध्यान करो।
वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥३७॥
सूत्रार्थ— अथवा जिस हृदय ने इन्द्रिय-विषयों के प्रति समस्त आसक्ति छोड़ दी है, (उसके ध्यान से भी चित्त स्थिर होता है)।
व्याख्या— किन्ही महापुरुष या साधु को लो, जो पूर्ण रूप से अनासक्त हो और जिन पर तुम्हारी अत्यन्त श्रद्धा हो। उनके हृदय के बारे मे चिन्तन करो। उनका अन्त करण सर्व विषयों में अनासक्त हो गया है, अत उनके अन्त करण के बारे मे चिन्तन करने पर तुम्हारा अन्त करण शान्त हो जायगा। यदि यह न कर सको, तो और एक उपाय है —
स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥३८॥
सूत्रार्थ— अथवा स्वप्नावस्था में कभी-कभी जो अपूर्व ज्ञान-लाभ होता है, उसका, तथा सुषुप्ति अवस्था में प्राप्त सात्त्विक सुख का ध्यान करने से भी (चित्त प्रशान्त होता है)।
व्याख्या— कभी-कभी मनुष्य ऐसा स्वप्न देखता है कि उसके पास देवता आकर बातचीत कर रहे हैं; वह मानो एक प्रकार से भावावेश में चूर हो गया है, वायु में एक अपूर्व संगीत
१७० राजयोग
की ध्वनि बहती हुई चली आ रही है और वह उसे सुन रहा है। उस स्वप्नावस्था मे वह आनन्द में मस्त रहता है। जब वह जागता है, तब स्वप्न की वे घटनाएँ उसके मन पर एक गहरी छाप छोड़ जाती हैं। उस स्वप्न को सत्य मानकर उसका ध्यान करो। यदि तुम इसमें भी समर्थ न होओ, तो जो कोई पवित्र वस्तु तुम्हे अच्छी लगे, उसी का ध्यान करो।
यथाभिमतध्यानाद्वा ॥३९॥
सूत्रार्थ— अथवा जिसे जो कोई चीज अच्छी लगे, उसी के ध्यान से (समाधि प्राप्त होती है)।
व्याख्या— इससे यह न समझ लेना चाहिए कि किसी असत् वस्तु का भी ध्यान करने से बनेगा। जो कोई सत् वस्तु तुम्हे अच्छी लगे, जो स्थान तुम्हे बहुत पसन्द हो, जो दृश्य या जो भाव तुम्हे बहुत अच्छा लगता हो, जिससे तुम्हारा चित्त एकाग्र हो जाता हो, उसी का चिन्तन करो।
परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥४०॥
सूत्रार्थ— इस प्रकार ध्यान करते-करते परमाणु से लेकर परम बृहत् पदार्थ तक सभी में उनके मन की गति अव्याहत हो जाती है।
व्याख्या— मन इस अभ्यास के द्वारा अत्यन्त सूक्ष्म से लेकर बृहत्तम वस्तु तक सभी पर सुगमता से ध्यान कर सकता है। ऐसा होने पर ये मनोवृत्ति-प्रवाह भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगते हैं।
क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदंजनता समापत्तिः ॥४१॥
सूत्रार्थ— जिन योगी की चित्तवृत्तियां इस प्रकार क्षीण हो चुकी है (वश में आ चुकी है) उनका चित्त उस समय ग्रहीता (आत्मा) ग्रहण (अन्त करण और इन्द्रियाँ) और ग्राह्य (पञ्चभूत और विषयो) में उसी