राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ, भूमिका व प्रस्तावना
राजयोग
(पातंजल-योगसूत्र, सूत्रार्थ और व्याख्या सहित)
स्वामी विवेकानन्द
( तृतीय संस्करण )
श्रीरामकृष्ण आश्रम,
धन्तोली, नागपुर-१.
प्रकाशक-
स्वामी भास्करेश्वरानन्द,
अध्यक्ष, श्रीरामकृष्ण आश्रम,
धन्तोली, नागपुर-१.
अनुवादक-
प० सूर्यकान्त त्रिपाठी, 'निराला',
प्रा० श्री दिनेशचन्द्रजी गुह, एम ए.
श्रीरामकृष्ण-शिवानन्द-स्मृतिग्रन्थमाला
पुष्प ११ वाँ
( श्रीरामकृष्ण आश्रम, नागपुर द्वारा सर्वाधिकार सुरक्षित । )
<br>मूल्य ३ रु.
मुद्रक-
प वि. बेलवलकर, व्यवस्थापक,
हरिहरेश्वर मुद्रणालय,
महाल, नागपुर-२.
दो शब्द
प्रस्तुत पुस्तक का यह नवीन तृतीय संस्करण पाठकों के हाथ में रखते हुए हमें बड़ी प्रसन्नता हो रही है। इस पुस्तक में पातंजल-योगसूत्र, उन सूत्रों के अर्थ और उन पर स्वामी विवेकानन्दजी की टीका भी सम्मिलित है। पातंजल-योगदर्शन एक विश्व-विख्यात ग्रन्थ है और हिन्दुओं के सारे मनोविज्ञान की नींव है। इसीलिए स्वामीजी स्वयं इस महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ पर टीका लिख गए हैं। इस ग्रन्थ की माँग, विशेषकर स्वामीजी की टीका सहित, हिन्दी-जनता बहुत अरसे से कर रही थी। परमात्मा की कृपा से हम पाठकों की माँग पूरी करने में सफल हो सके—इसका हमें विशेष आनन्द है।
प्रत्येक व्यक्ति में अनन्त ज्ञान और शक्ति का आवास है। राजयोग उन्हें जागृत करने का मार्ग प्रदर्शित करता है। इसका एकमात्र उद्देश्य है—मनुष्य के मन को एकाग्र कर उसे 'समाधि' नामवाली पूर्ण एकाग्रता की अवस्था में पहुँचा देना। स्वभाव से ही मानव-मन अतिशय चंचल है। वह एक क्षण भी किसी वस्तु पर ठहर नहीं सकता। इस मन की चंचलता को नष्ट कर उसे किस प्रकार अपने काबू में लाना, किस प्रकार उसकी इतस्ततः बिखरी हुई शक्तियों को समेटकर सर्वोच्च ध्येय में एकाग्र कर देना—यही राजयोग का विषय है। जो साधक प्राण का संयम कर, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान द्वारा इस समाधि-अवस्था की प्राप्ति करना चाहते हैं, उनके लिए यह ग्रन्थ बड़ा उपादेय सिद्ध होगा।
इस पुस्तक के आरम्भ से लेकर १०५ पृष्ठ तक का अनुवाद पण्डित सूर्यकान्तजी त्रिपाठी 'निराला' ने किया है। उनके इस बहुमूल्य कार्य के लिए हम उनके परम कृतज्ञ हैं।
१०६ पृष्ठ से लेकर पुस्तक का शेष सब अंश (पातजल-योगसूत्र को मिलाकर) प्राध्यापक श्री दिनेशचन्द्रजी गुह, एम ए, द्वारा अनुवादित हुआ है। उनके भी प्रति हम अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
हमें विश्वास है कि धर्म को व्यावहारिक जीवन में उतारने के प्रयत्नशील लोगो के लिए यह पुस्तक अत्यन्त लाभदायक सिद्ध होगी।
नागपुर, }
१-५-१९६१ }
—प्रकाशक
अनुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ग्रन्थकार की भूमिका | ... ... एक से तीन |
| १. अवतरणिका | ... ... १ |
| २ साधना के प्राथमिक सोपान | ... ... २१ |
| ३ प्राण | ... ... ३६ |
| ४ प्राण का आध्यात्मिक रूप | ... ... ५४ |
| ५ अध्यात्म प्राण का सयम | .. ... ६८ |
| ६. प्रत्याहार और धारणा | ... .. ७६ |
| ७. ध्यान और समाधि | ... ... ९० |
| ८. सक्षेप मे राजयोग | ... ... १०६ |
पातंजल-योगसूत्र
| उपक्रमणिका | ... ... ११७ |
| प्रथम अध्याय—समाधिपाद | ... ... १२६ |
| द्वितीय अध्याय—साधनपाद | ... ... १८१ |
| तृतीय अध्याय—विभूतिपाद | ... . २३२ |
| चतुर्थ अध्याय—कैवल्यपाद | ... ... २५६ |
| परिशिष्ट—योग के बारे मे अन्यान्य शास्त्रो के मत | .. २७१ |
"प्रत्येक आत्मा अ-व्यक्त ब्रह्म है । बाह्य एव अन्त.प्रकृति को वशीभूत करके आत्मा के इस ब्रह्मभाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है ।
कर्म, उपासना, मन सयम अथवा ज्ञान, इनमे से एक, एक से अधिक या सभी उपायो का सहारा लेकर अपना ब्रह्मभाव व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ ।
बस यही धर्म का सर्वस्व है । मत, अनुष्ठान- पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया- कलाप तो उसके गौण अग-प्रत्यग मात्र हैं ।"
—विवेकानन्द
भूमिका
ऐतिहासिक जगत् के प्रारम्भ से लेकर वर्तमान काल तक मानव-समाज में अनेक अलौकिक घटनाओं के उल्लेख देखने को मिलते हैं। आज भी, जो समाज आधुनिक विज्ञान के भरपूर आलोक में रह रहे हैं, उनमें भी ऐसी घटनाओं की गवाही देनेवाले लोगों की कमी नहीं। पर हाँ, ऐसे प्रमाणों में अधिकांश विश्वास-योग्य नहीं, क्योंकि जिन व्यक्तियों से ऐसे प्रमाण मिलते हैं, उनमें से बहुतेरे अज्ञ हैं, कुसंस्काराच्छन्न हैं अथवा धूर्त हैं। बहुधा यह भी देखा जाता है कि लोग जिन घटनाओं को अलौकिक कहते हैं, वे वास्तव में नकल हैं। पर प्रश्न उठता है, किसकी नकल ? यथार्थ-अनुसन्धान किए बिना कोई बात बिलकुल उड़ा देना सत्यप्रिय वैज्ञानिक-मन का परिचय नहीं देता। जो वैज्ञानिक सूक्ष्मदर्शी नहीं, वे मनोराज्य की नाना प्रकार की अलौकिक घटनाओं की व्याख्या करने में असमर्थ हो उन सबका अस्तित्व ही उड़ा देने का प्रयत्न करते हैं। अतएव वे तो उन व्यक्तियों से अधिक दोषी हैं, जो सोचते हैं कि बादलों के ऊपर अवस्थित कोई पुरुषविशेष या बहुतसे पुरुषगण उनकी प्रार्थनाओं को सुनते हैं और उनके उत्तर देते हैं—अथवा उन लोगों से, जिनका विश्वास है कि ये पुरुष उनकी प्रार्थनाओं के कारण संसार का नियम ही बदल देंगे। क्योंकि इन बाद के व्यक्तियों के सम्बन्ध में यह दोहाई दी जा सकती है कि वे अज्ञानी हैं, अथवा कम-से-कम यह कि उनकी शिक्षा-प्रणाली दूषित रही है, जिसने उन्हें ऐसे अप्राकृतिक पुरुषों का सहारा लेने की सीख दी और जो निर्भरता अब उनके अवनत-स्वभाव का एक अंग ही बन गई है। पर पूर्वोक्त शिक्षित व्यक्तियों के लिए तो ऐसी किसी दोहाई की गुंजाइश नहीं।
हजारों वर्षों से लोगों ने ऐसी अलौकिक घटनाओं का पर्यवेक्षण किया है, उनके सम्बन्ध में विशेष रूप से चिन्तन किया है और फिर उनमें से कुछ साधारण तत्त्व निकाले हैं, यहाँ तक कि, मनुष्य की धर्म-प्रवृत्ति की
दो
आधारभूमि पर भी विशेष रूप से, अत्यन्त सूक्ष्मता के साथ, विचार किया गया है। इन समस्त चिन्तन और विचारो का फल यह राजयोग विद्या है। यह राजयोग आजकल के अधिकांश वैज्ञानिको की अक्षम्य धारा का अवलम्बन नहीं करता—वह उनकी भाँति उन घटनाओ के अस्तित्व को एकदम उडा नहीं देता, जिनकी व्याख्या दुरूह हो, प्रत्युत वह तो धीर भाव से, पर स्पष्ट शब्दो में, अन्धविश्वास से भरे व्यक्ति को बता देता है कि यद्यपि अलौकिक घटनाएँ, प्रार्थनाओ की पूर्ति और विश्वास की शक्ति ये सब सत्य हैं, तथापि इनका स्पष्टीकरण ऐसी कुसस्कार-भरी व्याख्या द्वारा नहीं हो सकता कि ये सब व्यापार बादलो के ऊपर अवस्थित किसी व्यक्ति या कुछ व्यक्तियो द्वारा सम्पन्न होते हैं। वह घोषणा करता है कि प्रत्येक मनुष्य, सारी मानव-जाति के पीछे वर्तमान ज्ञान और शक्ति के अनन्त सागर की एक क्षुद्र प्रणाली मात्र है। वह शिक्षा देता है कि जिस प्रकार वासनाएँ और अभाव मानव के अन्तर में है, उसी प्रकार उसके भीतर ही उन अभावो के मोचन की शक्ति भी है, और जहाँ कही और जब कभी किसी वासना, अभाव या प्रार्थना की पूर्ति होती है, तो समझना होगा कि वह इस अनन्त भाण्डार से ही पूर्ण होती है, किसी अप्राकृतिक पुरुष से नहीं। अप्राकृतिक पुरुषो की भावना मानव में कार्य की शक्ति को भले ही कुछ परिमाण में उद्दीप्त कर देती हो, पर उससे आध्यात्मिक अवनति भी आती है। उससे स्वाधीनता चली जाती है, भय और कुसस्कार हृदय पर अधिकार जमा लेते हैं तथा 'मनुष्य स्वभाव से ही दुर्बलप्रकृति है' ऐसा भयकर विश्वास हममें घर कर लेता है। योगी कहते हैं कि अप्राकृतिक नाम की कोई चीज नहीं है, पर हाँ, प्रकृति में दो प्रकार की अभिव्यक्तियाँ हैं—एक है स्थूल और दूसरी, सूक्ष्म। सूक्ष्म कारण है और स्थूल, कार्य। स्थूल सहज ही इन्द्रियो द्वारा उपलब्ध की जा सकती है, पर सूक्ष्म नही। राजयोग के अभ्यास से सूक्ष्म की अनुभूति अर्जित होती रहती है।
तीन
भारतवर्ष में जितने वेदमतानुयायी दर्शनशास्त्र हैं, उन सबका एक ही लक्ष्य है, और वह है—पूर्णता प्राप्त करके आत्मा को मुक्त कर लेना । इसका उपाय है योग । 'योग' शब्द बहुभावव्यापी है। सांख्य और वेदान्त उभय मत किसी-न-किसी प्रकार के योग का समर्थन करते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक का विषय है—राज-योग । पातञ्जल-सूत्र राजयोग का शास्त्र है और उस पर सर्वोच्च प्रामाणिक ग्रन्थ है । अन्यान्य दार्शनिकों का किसी-किसी दार्शनिक विषय में पतञ्जलि से मतभेद होने पर भी, वे सभी, निश्चित रूप से, उनकी साधनाप्रणाली का अनुमोदन करते हैं। लेखक ने न्यूयार्क में कुछ छात्रों को इस योग की शिक्षा देने के लिए जो वक्तृताएँ दी थीं, वे ही इस पुस्तक के प्रथम अंश में निबद्ध हैं। और इसके दूसरे अंश में पतञ्जलि के सूत्र, उन सूत्रों के अर्थ और उन पर संक्षिप्त टीका भी सन्निविष्ट कर दी गई है। जहाँ तक सम्भव हो सका, पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग न करने और वार्तालाप की सहज और सरल भाषा में लिखने का प्रयत्न किया गया है। इसके प्रथमांश में साधनार्थियों के लिए कुछ सरल और विशेष उपदेश दिए गए हैं, पर उन सभी लोगों को विशेष रूप से सावधान कर दिया जा रहा है कि योग के कुछ साधारण अंगों को छोड़कर, निरापद योग-शिक्षा के लिए गुरु का सदा पास रहना आवश्यक है। वार्तालाप के रूप में प्रदत्त ये सब उपदेश यदि लोगों के हृदय में इस विषय पर और भी अधिक जानने की पिपासा जगा दें, तो फिर गुरु का अभाव न रहेगा ।
पातञ्जलदर्शन सांख्यमत पर स्थापित है। इन दोनों मतों में अन्तर बहुत ही थोड़ा है। इनके दो प्रधान मतभेद ये हैं—पहला तो, पतञ्जलि आदि-गुरु के रूप में एक सगुण ईश्वर की सत्ता स्वीकार करते हैं, जब कि सांख्य का ईश्वर लगभग-पूर्णताप्राप्त एक व्यक्ति मात्र है, जो कुछ समय तक एक सृष्टि-कल्प का शासन करता है। और दूसरा, योगीगण आत्मा या पुरुष के समान मन को भी सर्वव्यापी मानते हैं, पर सांख्यमतवाले नहीं।
—ग्रन्थकर्ता
( स्वामी विवेकानन्द )
स्वामी विवेकानन्द
प्रथम अध्याय
राजयोग
प्रथम अध्याय
अवतरणिका
हमारे समस्त ज्ञान स्वानुभूति पर टिके है। आनुमानिक ज्ञान (सामान्य से सामान्यतर या सामान्य से विशेष, दोनो) की बुनियाद स्वानुभूति है। जिनको निश्चित विज्ञान (exact science) * कहते है, उनकी सत्यता सहज ही लोगो की समझ मे आ जाती है, क्योकि वे प्रत्येक व्यक्ति से कहते है—'तुम स्वयं यह देख लो कि यह बात सत्य है अथवा नही, और तब उस पर विश्वास करो।' विज्ञानवित् तुमको किसी भी विषय पर विश्वास कर बैठने को न कहेगे। उन्होने स्वय कुछ विषयो का प्रत्यक्ष अनुभव किया है और उन पर विचार करके वे कुछ सिद्धान्तो पर पहुँचे हैं। जब वे अपने उन सिद्धान्तो पर हमसे विश्वास करने के लिए कहते हैं, तब वे जन-साधारण की अनुभूति पर उनके सत्यासत्य के निर्णय का भार छोड देते हैं। प्रत्येक निश्चित विज्ञान की एक सामान्य आधार-भूमि है और उससे जो सिद्धान्त उपलब्ध होते हैं, इच्छा करने पर कोई भी उनका सत्यासत्य तत्काल समझ ले सकता है। अब प्रश्न यह हैं, धर्म की ऐसी सामान्य आधार-भूमि कोई है भी या नही? हमे इसका उत्तर देने के लिए 'हाँ' और 'नही' दोनो कहने होगे। ससार
* निश्चित विज्ञान (exact science) अर्थात् वे विज्ञान, जिनके तत्त्व इतनी दूर तक सत्य निर्णीत हुए है कि गणना के बल पर उनके द्वारा भविष्य निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है, जैसे गणित, गणित-ज्योतिष इत्यादि।
२ राजयोग
२ राजयोग
में धर्म के सम्बन्ध में सर्वत्र ऐसी शिक्षा मिलती है कि धर्म केवल श्रद्धा और विश्वास पर स्थापित है, और अधिकांश स्थलों में तो वह भिन्न-भिन्न मतों की समष्टि मात्र है। यही कारण है कि धर्मों के बीच केवल विवाद-झगड़ा दिखाई देता है। ये मत फिर विश्वास पर स्थापित हैं। कोई-कोई कहते हैं कि बादलों के ऊपर एक महान् पुरुष है, वे ही सारे संसार का शासन करते हैं; और वक्ता महोदय केवल अपनी बात के बल पर ही मुझसे इनमें विश्वास करने को कहते हैं। मेरे भी ऐसे अनेक भाव हो सकते हैं, जिन पर विश्वास करने के लिए मैं दूसरों से कहता हूँ, और यदि वे कोई युक्ति चाहें, इस विश्वास का कारण पूछें, तो मैं उन्हें युक्ति-तर्क देने में असमर्थ हो जाता हूँ। इसीलिए आजकल धर्म और दर्शन-शास्त्रों की इतनी निन्दा सुनी जाती है। प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति का मानो यही मनोभाव है—“हटाओ, खाक-पत्थर है, धर्म क्या है, कुछ मतों के गट्ठे भर हैं। उनके सत्यासत्य-विचार का कोई एक मापदण्ड नहीं, जिसके जी में जो आया, बस वही बक गया।” किन्तु ये लोग चाहे जो कुछ सोचें, वास्तव में धर्म-विश्वास की एक सार्वभौमिक भित्ति है—वही विभिन्न देशों के विभिन्न सम्प्रदायों के भिन्न-भिन्न मतवादों और सब प्रकार की विभिन्न धारणाओं को नियमित करती है। उन सबके मूल में जाने पर हम देखते हैं कि वे भी सार्वजनिक अभिज्ञता और अनुभूति पर प्रतिष्ठित हैं।
पहली बात तो यह कि यदि आप पृथ्वी के भिन्न-भिन्न धर्मों का जरा विश्लेषण करें, तो आपको ज्ञात हो जायगा कि वे दो श्रेणियों में विभक्त हैं। कुछ की शास्त्र-भित्ति है, और कुछ की शास्त्र-भित्ति नहीं। जो शास्त्र-भित्ति पर स्थापित हैं वे सुदृढ़
अवतरणिका ३
है, उन धर्मों के माननेवालो की सख्या भी अधिक है। जिनकी शास्त्र-भित्ति नही है, वे धर्म प्राय लुप्त हो गए है। कुछ नए उठे अवश्य है, पर उनके अनुयायी बहुत थोडे है। फिर भी उक्त सभी सम्प्रदायो मे यह मतैक्य दीख पडता है कि उनकी शिक्षा विशिष्ट व्यक्तियो के प्रत्यक्ष अनुभव मात्र है। ईसाई तुमसे अपने धर्म पर, ईसा पर, ईसा के अवतारत्व पर, ईश्वर और आत्मा के अस्तित्व पर और उस आत्मा की भविष्य उन्नति की सम्भवनीयता पर विश्वास करने को कहता है। यदि मै उससे इस विश्वास का कारण पूछूँ, तो वह कहता है, “यह मेरा विश्वास है।” किन्तु यदि तुम ईसाई धर्म के मूल मे जाओ, तो देखोगे कि वह भी प्रत्यक्ष अनुभूति पर स्थापित है। ईसा ने कहा है, “मैने ईश्वर के दर्शन किए हैं।” उनके शिष्यो ने भी कहा है, “हमने ईश्वर का अनुभव किया है।”—इत्यादि-इत्यादि।
बौद्ध धर्म के सम्बन्ध मे भी ऐसा ही है। बुद्धदेव की प्रत्यक्षानुभूति पर यह धर्म स्थापित है। उन्होने कुछ सत्यो का अनुभव किया था। उन्होने उन सबको देखा था, वे उन सत्यो के संस्पर्श मे आए थे, और उन्ही का उन्होने ससार मे प्रचार किया। हिन्दुओं के सम्बन्ध मे भी ठीक यही बात है, उनके शास्त्रो में ‘ऋषि’ नाम से सम्बोधित किए जानेवाले ग्रन्थकर्ता कह गए हैं, “हमने कुछ सत्यो के अनुभव किए हैं।” और उन्ही का वे ससार मे प्रचार कर गए हैं। अत यह स्पष्ट है कि ससार के समस्त धर्म उस प्रत्यक्ष अनुभव पर स्थापित है, जो ज्ञान की सार्वभौमिक और सुदृढ भित्ति है। सभी धर्माचार्यो ने ईश्वर को देखा था। उन सभी ने आत्मदर्शन किया था, अपने अनन्त स्वरूप का ज्ञान सभी को हुआ था, सबने अपनी भविष्य अवस्था देखी थी, और जो कुछ
४
राजयोग
उन्होने देखा था, उसी का वे प्रचार कर गए। भेद इतना ही है कि इनमे से अधिकांश धर्मो मे, विशेषत आजकल, एक अद्भुत दावा हमारे सामने उपस्थित होता है, और वह यह कि ‘इस समय ये अनुभूतियाँ असम्भव है। जो धर्म के प्रथम संस्थापक हैं, वाद मे जिनके नाम से उस धर्म का प्रवर्तन और प्रचलन हुआ, ऐसे केवल थोडे व्यक्तियो के लिए ही ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव सम्भव हुआ था। अव ऐसे अनुभव के लिए कोई रास्ता नही रहा, फलत अव धर्म पर विश्वास भर कर लेना होगा।’ इस बात को मै पूरी शक्ति से अस्वीकृत करता हूँ। यदि ससार मे किसी प्रकार के विज्ञान के किसी विषय की किसी ने कभी प्रत्यक्ष उपलब्धि की है, तो इससे इस सार्वभौमिक सिद्धान्त पर पहुँचा जा सकता है कि पहले भी कोटि-कोटि बार उसकी उपलब्धि की सम्भावना थी और भविष्य मे भी अनन्त काल तक उनकी उपलब्धि की सम्भावना बनी रहेगी। एकरूपता ही प्रकृति का एक बडा नियम है। एक बार जो घटित हुआ है, वह पुन घटित हो सकता है।
इसीलिए योग-विद्या के आचार्यगण कहते हैं कि धर्म पूर्वकालीन अनुभूतियो पर केवल स्थापित ही नही, वरन् इन अनुभूतियो से स्वय सम्पन्न हुए बिना कोई भी धार्मिक नही हो सकता। जिस विद्या के द्वारा ये अनुभूतियाँ होती है, उसका नाम है योग। धर्म के सत्यो का जब तक कोई अनुभव नही कर लेता, तब तक धर्म की बात करना ही वृथा है। भगवान के नाम पर इतनी लडाई, विरोध और झगडा क्यो? भगवान के नाम पर जितना खून बहा है, उतना और किसी कारण से नही। ऐसा क्यो? इसीलिए कि कोई भी व्यक्ति मूल तक नही गया। सब लोग पूर्वजो के कुछ आचारो का अनुमोदन करके ही सन्तुष्ट थे। वे
अवतरणिका
चाहते थे कि दूसरे भी वैसा ही करें। जिन्हें आत्मा की अनुभूति या ईश्वर-साक्षात्कार न हुआ हो, उन्हें यह कहने का क्या अधिकार है कि आत्मा या ईश्वर है ? यदि ईश्वर हो, तो उनका साक्षात्कार करना होगा, यदि आत्मा नामक कोई चीज हो, तो उसकी उपलब्धि करनी होगी। अन्यथा विश्वास न करना ही भला। ढोंगी होने से स्पष्टवादी नास्तिक होना अच्छा। एक ओर, आजकल के विद्वान् कहलानेवाले मनुष्यों के मन का भाव यह है कि धर्म, दर्शन और परमपुरुष का अनुसन्धान यह सब निष्फल है। और दूसरी ओर, जो अर्धशिक्षित हैं, उनका मनोभाव ऐसा जान पड़ता है कि धर्म, दर्शन आदि की वास्तव में कोई बुनियाद नहीं, उनकी इतनी ही उपयोगिता है कि वे संसार के मंगल-साधन की बलशाली प्रेरक शक्तियाँ हैं,—यदि लोगों का ईश्वर की सत्ता में विश्वास रहेगा, तो वे सत्, नीति-परायण और सौजन्यशाली नागरिक होंगे। जिनके ऐसे मनोभाव हैं, उनको इसके लिए दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि वे धर्म के सम्बन्ध में जो शिक्षा पाते हैं, वह केवल सारशून्य, अर्थहीन अनन्त शब्दसमष्टि पर विश्वास मात्र है। उन लोगों से शब्दों पर विश्वास करके रहने के लिए कहा जाता है, क्या ऐसा कोई कभी कर सकता है ? यदि मनुष्य द्वारा यह सम्भव होता, तो मानव-प्रकृति पर मेरी तिलमात्र श्रद्धा न रहती। मनुष्य चाहता है सत्य, वह सत्य का स्वयं अनुभव करना चाहता है, और जब वह सत्य की धारणा कर लेता है, सत्य का साक्षात्कार कर लेता है, हृदय के अन्तरतम प्रदेश में उसका अनुभव कर लेता है, वेद कहते हैं, तभी उसके सारे सन्देह दूर होते हैं, सारा तमोजाल छिन्न-भिन्न हो जाता है और सारी वक्रता सीधी हो जाती है—
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राजयोग
"भिद्यते हृदयग्रन्थिश्च्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥"*
"शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा
आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ।"†
"वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्
आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥"‡
"हे अमृत के पुत्रो, हे दिव्यधामनिवासियो, सुनो—मैंने अज्ञानान्धकार से आलोक में जाने का रास्ता पा लिया है। जो समस्त तम के पार है, उनको जानने पर ही वहाँ जाया जा सकता है—मुक्ति का और कोई दूसरा उपाय नहीं।"
इस सत्य को प्राप्त करने के लिए, राजयोग-विद्या मानव के समक्ष यथार्थ व्यावहारिक और साधनोपयोगी वैज्ञानिक प्रणाली रखने का प्रस्ताव करती है। पहले तो, प्रत्येक विद्या के अनुसन्धान और साधन की प्रणाली पृथक्-पृथक् है। यदि तुम ज्योतिषी होने की इच्छा करो और बैठे-बैठे केवल ज्योतिष-ज्योतिष कहकर चिल्लाते रहो, तो तुम कभी ज्योतिषशास्त्र के अधिकारी न हो सकोगे। रसायनशास्त्र के सम्बन्ध में भी ऐसा ही है, उसमें भी एक निर्दिष्ट प्रणाली का अनुसरण करना होगा, प्रयोगशाला (laboratory) में जाकर विभिन्न द्रव्यादि लेने होंगे, उनको एकत्र करना होगा, उन्हें उचित अनुपात में मिलाना होगा, फिर
* मुण्डक उपनिषद्—२।२।८
† श्वेताश्वतर उपनिषद्—२।५
‡ श्वेताश्वतर उपनिषद्—३।८
अवतरणिका ७
उनको लेकर उनकी परीक्षा करनी होगी, तब कही तुम रसायन-वित् हो सकोगे। यदि तुम ज्योतिषी होना चाहते हो, तो तुम्हे वेधशाला मे जाकर दूरबीन की सहायता से ताराओ और ग्रहो का पर्यवेक्षण करके उनके विषय मे आलोचना करनी होगी, तभी तुम ज्योतिषी हो सकोगे। प्रत्येक विद्या की अपनी एक निर्दिष्ट प्रणाली है। मै तुम्हे सैकडो उपदेश दे सकता हूँ, परन्तु तुम यदि साधना न करो, तो तुम कभी धार्मिक न हो सकोगे। सभी युगो में, सभी देशो मे, निष्काम, शुद्धस्वभाव साधु-महापुरुष इसी सत्य का प्रचार कर गए है। ससार का हित छोडकर अन्य कोई कामना उनमे नही थी। उन सभी लोगो ने कहा है कि इन्द्रियाँ हमे जहाँ तक सत्य का अनुभव करा सकती है, हमने उससे उच्चतर सत्य प्राप्त कर लिया है, और वे उसकी परीक्षा के लिए तुम्हे बुलाते है। वे कहते है, 'तुम एक निर्दिष्ट साधन-प्रणाली लेकर सरल भाव से साधना करते रहो, और यदि यह उच्चतर सत्य प्राप्त न हो, तो फिर भले ही कह सकते हो कि इस उच्चतर सत्य के सम्बन्ध की बाते केवल कपोलकल्पित है। पर हाँ, इससे पहले इन उक्तियो की सत्यता को बिल्कुल अस्वीकृत कर देना किसी तरह युक्तिपूर्ण नही है।' अतएव निर्दिष्ट साधन-प्रणाली लेकर श्रद्धापूर्वक साधना करना हमारे लिए आवश्यक है, और तब प्रकाश निश्चय ही आयगा।
कोई ज्ञान प्राप्त करने के लिए हम साधारणीकरण की सहायता लेते है। इसके लिए घटनाओ का पर्यवेक्षण आवश्यक है। हम पहले घटनावली का पर्यवेक्षण करते है, फिर उनका साधारणीकरण करते है और फिर उनसे अपने सिद्धान्त या मतामत निकालते है। हम जब तक यह प्रत्यक्ष नही कर लेते कि हमारे मन के