राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
~२३६ राजयोग
व्याख्या—प्रतिदिन नियमित रूप से अभ्यास करने पर मन का यह नियत संयम प्रवाहाकार में चलता रहता है एव उसकी स्थिरता होती है, और तब मन सदैव एकाग्रशील रह सकता है।
सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥११॥
सूत्रार्थ—सब प्रकार के विषयो का चिन्तन करने की वृत्ति का क्षय हो जाना और किसी एक ही ध्येयविषय का चिन्तन करनेवाली एकाग्रता-शक्ति का उदय हो जाना—यह चित्त का समाधि-परिणाम है।
व्याख्या—मन सर्वदा ही नाना प्रकार के विषय ग्रहण कर रहा है, सदैव सब प्रकार की वस्तुओ में जा रहा है। फिर मन की ऐसी भी एक उच्चतर अवस्था है, जब वह केवल एक ही वस्तु को ग्रहण करके अन्य सब वस्तुओ को छोड दे सकता है। इस एक वस्तु को ग्रहण करने का फल है समाधि।
शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणाम ॥१२॥
सूत्रार्थ—जब मन शान्त और उदित अर्थात् अतीत और वर्तमान दोनों अवस्थाओ में ही तुल्य-प्रत्यय हो जाता है, अर्थात् दोनो को ही एक साथ ग्रहण कर सकता है, तब उसे चित्त का एकाग्रता-परिणाम कहते हैं।
व्याख्या—मन एकाग्र हुआ है, यह कैसे जाना जाय? मन के एकाग्र हो जाने पर समय का कोई ज्ञान न रहेगा। जितना ही समय का ज्ञान जाने लगता है, हम उतने ही एकाग्र होते जाते हैं। हम अपने दैनिक जीवन में भी देख पाते हैं कि जब हम कोई पुस्तक पढ़ने में तल्लीन रहते हैं, तब समय की ओर हमारा बिलकुल ध्यान नहीं रहता। जब हम पढ़कर उठते हैं, तो आश्चर्य करने लगते हैं कि इतना समय बीत गया! सारा समय मानो एकत्र होकर वर्तमान में एकीभूत हो जाता है। इसी-
पातञ्जल-योगसूत्र-३ २३७
लिए कहा गया है कि अतीत, वर्तमान और भविष्य आकर जितना ही एकीभूत होते जाते हैं, मन उतना ही एकाग्र होता जाता है ।
एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ॥१३॥
**सूत्रार्थ—**इसी से भूतो में और इन्द्रियों में होनेवाले धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणाम—(ये तीनों) कहे जा चुके ।
**व्याख्या—**पीछे के तीन सूत्रो में चित्त के निरोध आदि परिणामो की जो बात कही गई है, उसके द्वारा भूतो और इन्द्रियो के धर्म, लक्षण और अवस्थारूप तीन प्रकार के परिणामो की भी व्याख्या कर दी गई । मन लगातार वृत्ति के रूप में परिणत हो रहा है, यह मन का धर्मरूप परिणाम है । वह अतीत, वर्तमान और भविष्य इन तीन कालो के भीतर से होकर चल रहा है, यह मन का लक्षणरूप परिणाम है । कभी निरोधसस्कार प्रबल और व्युत्थानसस्कार दुर्बल हो जाता है, तो कभी ठीक इसका उलटा होता है, यह मन का अवस्थारूप परिणाम है । मन के इन तीन परिणामो के समान भूतो और इन्द्रियो के भी त्रिविध परिणाम समझना चाहिए । जैसे, मिट्टी का पिण्ड जब अपना पिण्डरूप धर्म छोडकर घटरूप धर्म में परिणत हो जाता है, तब उसे धर्म-परिणाम कहते हैं । जब इसी घटना को हम समय की दृष्टि से देखते हैं अर्थात् उसके वर्तमान, अतीत और भविष्य अवस्थारूप परिणामो को देखते हैं, तब उसे लक्षण-परिणाम कहते हैं । फिर उसके नवीनत्व, पुरातनत्व आदि अवस्थारूप परिणामो को अवस्था-परिणाम कहते हैं ।
पहले के सूत्रो में जिन सब समाधियो की बात कही गई है, उनका उद्देश्य यह है कि योगी मन के परिणामो पर इच्छापूर्वक क्षमता प्राप्त कर सके । उससे पूर्वोक्त सयमीशक्ति प्राप्त होती है ।
२३८ राजयोग
शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ॥१४॥
सूत्रार्थ— शान्त (अतीत), उदित (वर्तमान) और अव्यपदेश्य (आनेवाले) धर्म जिसमें अवस्थित हैं, वह धर्मी है।
व्याख्या— धर्मी उसे कहते हैं, जिस पर काल और संस्कार कार्य कर रहे हैं, जिसमें सतत परिणाम हो रहा है और जो हरदम व्यक्त भाव धारण कर रहा है।
क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥१५॥
सूत्रार्थ— भिन्न-भिन्न परिणाम होने का कारण है क्रम की भिन्नता (पूर्वापर पार्थक्य)।
परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ॥१६॥
सूत्रार्थ— पूर्वोक्त तीन परिणामों में चित्त-संयम करने से अतीत और अनागत (भविष्य) का ज्ञान उत्पन्न होता है।
व्याख्या— पहले संयम की जो परिभाषा दी गई है, हम उसे न भूलें। जब मन वस्तु के बाहरी भाग को छोड़कर उसके आभ्यन्तरिक भावों के साथ अपने को एकरूप करने की उपयुक्त अवस्था में पहुँच जाता है, जब दीर्घ अभ्यास के द्वारा मन केवल उसी की धारणा करके क्षण भर में उस अवस्था में पहुँच जाने की शक्ति प्राप्त कर लेता है, तब उसे संयम कहते हैं। इस अवस्था को प्राप्त करके यदि योगी भूत और भविष्य जानने की इच्छा करे, तो उन्हें केवल संस्कार के परिणामों में संयम का प्रयोग करना होगा। कुछ संस्कार वर्तमान अवस्था में कार्य कर रहे हैं, कुछ का भोग समाप्त हो चुका है और कुछ अभी भी फल प्रदान करने के लिए संचित हैं। इन सबों में संयम का प्रयोग करके वे भूत और भविष्य सब जान लेते हैं।
पातंजल-योगसूत्र-३ २३९
पातंजल-योगसूत्र-३ २३९
शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभाग- संयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥१७॥
सूत्रार्थ—शब्द, अर्थ और प्रत्यय (ज्ञान)—इनको, आपस में अध्यास हो जाने के कारण, जो संकरावस्था हो रही है, उसके विभाग में संयम करने से समस्त प्राणियों की वाणी का ज्ञान (हो जाता है)।
व्याख्या—शब्द से उस बाह्य विषय का बोध होता है, जो मन में किसी वृत्ति को जागरित कर देता है। अर्थ कहने से शरीर मे का वह प्रवाह समझना चाहिए, जो इन्द्रिय-द्वार से प्राप्त विषयो के अभिघात से उत्पन्न हुई संवेदना को ले जाकर मस्तिष्क में पहुँचा देता है। और ज्ञान कहने से मन की उस प्रतिक्रिया को समझना चाहिए, जिससे विषयानुभूति होती है। इन तीनों के मिश्रित होने से ही हमारे इन्द्रियग्राह्य विषय उत्पन्न होते हैं। मान लो, मैने एक शब्द सुना, पहले बाहर में एक कम्पन हुआ, तत्पश्चात् श्रवणेन्द्रिय द्वारा मन में एक बोध-प्रवाह गया, उसके बाद मन ने प्रतिक्रिया की, और मैं उस शब्द को जान सका। मैंने यह जो उस शब्द को जाना है, वह तीन पदार्थों का मिश्रण है—पहला, कम्पन, दूसरा, अनुभूतिप्रवाह, और तीसरा, प्रतिक्रिया। साधारणत, ये तीन व्यापार पृथक् नही किए जा सकते, पर अभ्यास के द्वारा योगी उनको पृथक् कर सकते हैं। जब मनुष्य इनको अलग करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है, तब वह फिर जिस किसी शब्द में सयम का प्रयोग करे, वह उसी क्षण उस अर्थ को समझ सकता है, जिसको प्रकाशित करने के लिए वह शब्द उच्चारित हुआ है, फिर वह शब्द चाहे मनुष्य द्वारा किया गया हो, चाहे अन्य किसी प्राणी द्वारा।
२४० राजयोग
संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम् ॥१८॥
सूत्रार्थ—सस्कारो को प्रत्यक्ष कर लेने से पूर्वजन्म का ज्ञान (हो जाता है)।
व्याख्या—हम जो कुछ अनुभव करते है, वह समस्त हमारे चित्त मे तरग के रूप में आया करता है। वह फिर चित्तरूपी सरोवर की तली मे चला जाता है और क्रमश ' सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता जाता है। वह बिलकुल नष्ट नही हो जाता। वह वहाँ जाकर अत्यन्त सूक्ष्मभाव से रहता है। यदि हम उस तरग को फिर से ऊपर ला सके, तो वही स्मृति कहलाती है। अतएव योगी यदि मन से इन सब पूर्वसस्कारो में सयम कर सके, तो वे पूर्वजन्म की बाते स्मरण करना आरम्भ कर देंगे।
प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ॥१९॥
सूत्रार्थ—दूसरे के शरीर में जो सब चिह्न हैं, उनमें संयम करने से उस व्यक्ति के मन का ज्ञान (हो जाता है)।
व्याख्या—प्रत्येक व्यक्ति के शरीर मे कुछ विशिष्ट चिह्न रहते हैं, जिनके द्वारा उसको दूसरे व्यक्तियो से पृथक् करके पहचाना जाता है। जब योगी किसी मनुष्य के इन विशेष चिन्हो में सयम करते हैं, तब वे उस मनुष्य के मन का स्वभाव जान लेते है।
न च तत् सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ॥२०॥
सूत्रार्थ—किन्तु उस चित्त का अवलम्बन क्या है, यह वे नहीं जान सकते, क्योंकि वह उनके सयम का विषय नहीं है।
व्याख्या—ऊपर के सूत्र मे शरीर के चिन्हो मे सयम की जो बात कही गई है, उसके द्वारा उस व्यक्ति के मन में उस.
पातंजल-योगसूत्र-३ २४१
पातंजल-योगसूत्र-३ २४१
समय क्या चल रहा है, यह नही जाना जा सकता। उसको जानने के लिए तो दो बार संयम करने की आवश्यकता होगी, पहले, शरीर के लक्षणों में, और उसके बाद मन में। तब योगी उस व्यक्ति के मन के समस्त भाव जान लेंगे।
कायरूपसंयमात् तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे
चक्षुःप्रकाशासंयोगेऽन्तर्धानम् ॥२१॥
सूत्रार्थ—शरीर के रूप में संयम कर लेने से जब उस रूप को अनुभव करने की शक्ति रोक ली जाती है, तब आंख की प्रकाश-शक्ति के साथ उसका संयोग न रहने के कारण योगी अन्तर्धान हो जाते हैं।
व्याख्या—मान लो, कोई योगी इस कमरे में खड़े हैं। वे आपातदृष्टि से सबके सामने से अन्तर्धान हो सकते हैं। वे वास्तव में अन्तर्धान हो जाते हों, सो बात नही, पर हाँ, कोई उन्हें देख न सकेगा, बस इतना ही। शरीर का रूप और शरीर—इन दोनों को मानो वे अलग-अलग कर डालते हैं। जब योगी ऐसी एकाग्रता-शक्ति प्राप्त कर लेते हैं कि वे वस्तु के रूप और उस वस्तु को एक-दूसरे से अलग कर डालते हैं, तभी इस प्रकार की अन्तर्धान-शक्ति उन्हें प्राप्त होती है। उसमें अर्थात् रूप और उस रूपवान् वस्तु के पार्थक्य में संयम का प्रयोग करने से उस रूप को अनुभव करने की शक्ति में मानो एक बाधा पड़ती है; क्योंकि रूप और उस रूपविशिष्ट वस्तु के परस्पर संयुक्त होने पर ही हमें उस वस्तु का ज्ञान होता है।
एतेन शब्दाद्यन्तर्धानमुक्तम् ॥२२॥
सूत्रार्थ—इसके द्वारा ही शब्द आदि के अन्तर्धान होने की अर्थात् शब्द आदि को दूसरों की इन्द्रियगोचर न होने देने की भी व्याख्या कर दी गई।
१६
२४२ राजयोग
सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्त- ज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ॥२३॥
सूत्रार्थ—शीघ्र फल उत्पन्न करनेवाला और देर से फल देनेवाला—ऐसे दो प्रकार के कर्म होते हैं। इनमें संयम करने से, अथवा अरिष्ट-नामक मृत्युलक्षणों से भी, योगीगण देहत्याग का ठीक समय जान लेते हैं।
व्याख्या—जब योगी अपने कर्म मे—अर्थात् अपने मन के उन सस्कारो में, जिनका कार्य आरम्भ हो गया है तथा उनमें, जिनका कार्य अभी आरम्भ नही हुआ है—सयम का प्रयोग करते हैं, तब वे उन सस्कारो के द्वारा, जिनका कार्य अभी आरम्भ नही हुआ है, यह ठीक जान लेते हैं कि उनकी मृत्यु कब होगी। किस समय, किस दिन, कितने बजे, यहाँ तक कि कितने मिनट पर उनकी मृत्यु होगी—यह सब उन्हें ज्ञात हो जाता है। हिन्दू लोग मृत्यु की इस निकटता को जान लेना विशेष आवश्यक समझते हैं, क्योकि गीता मे यह उपदेश है कि मृत्यु-समय के विचार आनेवाले जीवन को नियमित करने के लिए विशेष प्रयोजनीय कारणस्वरूप है।
मैत्र्यादिषु बलानि ॥२४॥
सूत्रार्थ—मैत्री आदि गुणों (१।३३) में संयम करने से वे सब गुण अत्यन्त प्रबल भाव धारण करते हैं।
बलेषु हस्तिबलादीनि ॥२५॥
सूत्रार्थ—हाथी आदि के बल में सयम का प्रयोग करने से योगी के शरीर में उस-उस प्राणी के सदृश बल आ जाता है।
व्याख्या—जब योगी यह सयम-शक्ति प्राप्त कर लेते हैं, तब यदि वे बल की इच्छा करे, तो हाथी के बल मे सयम का प्रयोग करके वे हाथी के समान बल प्राप्त कर लेते हैं।
पातंजल-योगसूत्र-३ २४३
पातंजल-योगसूत्र-३ २४३
प्रत्येक मनुष्य में अनन्त शक्ति निहित है। यदि वह उपाय जानता हो, तो वह उस शक्ति का इच्छानुसार व्यवहार कर सकता है। योगी ने उसे प्राप्त करने की विद्या खोज निकाली है।
प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम् ॥२६॥
सूत्रार्थ— (पहले कही गई, १।३६,) महाज्योति में संयम करने से सूक्ष्म, व्यवधान-युक्त और दूरवर्ती वस्तुओ का ज्ञान हो जाता है।
व्याख्या— हृदय मे जो महाज्योति है, उसमें संयम करने से योगी अत्यन्त दूरवर्ती वस्तु को भी देख सकते हैं। यदि कोई वस्तु पहाड़ के अन्तराल में रहे, तो उसे भी वे देख लेते हैं, और अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुओ का. भी उन्हे ज्ञान हो जाता है।
भुवनज्ञानं सूर्ये सयमात्॥२७'।
सूत्रार्थ— सूर्य में संयम करने से सम्पूर्ण जगत् का ज्ञान (प्राप्त हो जाता है)।
चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ॥२८॥
सूत्रार्थ— चन्द्रमा में (सयम करने से) तारासमूह का ज्ञान (हो जाता है)।
ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ॥२९॥
सूत्रार्थ— ध्रुव तारे में (सयम करने से) ताराओं की गति का ज्ञान (हो जाता है)।
नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ॥३०॥
सूत्रार्थ— नाभिचक्र में (सयम करने से) शरीर की बनावट ज्ञात हो जाती है।
कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ॥३१॥
सूत्रार्थ— कण्ठकूप में (सयम करने से) भूख और प्यास की निवृत्ति हो जाती हैं।
२४४ | राजयोग
व्याख्या—अत्यन्त भूखा मनुष्य यदि कण्ठकूप में चित्त का संयम कर सके, तो उसकी भूख शान्त हो जाती है।
कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ॥३२॥
सूत्रार्थ—कूर्मनाडी में (संयम करने से) शरीर की स्थिरता होती है।
व्याख्या—जब वे साधना करते हैं, तब उनका शरीर चञ्चल नहीं होता।
मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ॥३३॥
सूत्रार्थ—सिर की ज्योति में (संयम करने से) सिद्धपुरुषों के दर्शन होते हैं।
व्याख्या—यहाँ सिद्ध का तात्पर्य भूतयोनि की अपेक्षा थोड़ी उच्च योनि से है। जब योगी अपने सिर के ऊपरी भाग में मन संयम करते हैं, तब वे इन सिद्धों के दर्शन करते हैं। यहाँ पर 'सिद्ध' शब्द से मुक्त पुरुष नहीं समझना चाहिए।
प्रातिभाद्वा सर्वम् ॥३४॥
सूत्रार्थ—अथवा प्रातिभ ज्ञान उत्पन्न होने से समस्त ज्ञान प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या—प्रातिभ ज्ञान अर्थात् प्रतिभा की शक्ति अर्थात् पवित्रता के द्वारा लब्ध ज्ञानविशेष के प्राप्त हो जाने पर बिना किसी प्रकार के संयम के ही समस्त ज्ञान प्राप्त हो सकता है। जब मनुष्य उच्च प्रतिभाशक्ति प्राप्त कर लेता है, तब उसे इस महा आलोक की प्राप्ति हो जाती है। उसके ज्ञान से समस्त प्रकाशित हो जाता है। बिना किसी प्रकार का संयम किए ही उसे आप-से-आप समस्त ज्ञान प्राप्त होता जाता है।
हृदये चित्तसंवित् ॥३५॥
सूत्रार्थ—हृदय में (संयम करने से) मनोविषयक ज्ञान प्राप्त हो जाता है।
पातंजल-योगसूत्र-३ २४५
पातंजल-योगसूत्र-३ २४५
सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थत्वात् स्वार्थसंयमात् पुरुषज्ञानम् ॥३६॥
सूत्रार्थ—पुरुष और बुद्धि, जो कि अत्यन्त पृथक् हैं—उनके विवेक के अभाव से ही भोग होता है। वह भोग परार्थ है अर्थात् किसी अन्य या पुरुष के लिए है। बुद्धि की एक दूसरी अवस्था का नाम है स्वार्थ; उसमें संयम करने से पुरुष का ज्ञान होता है।
व्याख्या—पुरुष और बुद्धि वास्तव में सर्वथा भिन्न हैं; ऐसा होने पर भी पुरुष बुद्धि में प्रतिबिम्बित होकर उसके साथ अपने को अभेद समझता है और उसी से अपने को सुखी या दुःखी अनुभव करता रहता है। बुद्धि की इस अवस्था को परार्थ कहते हैं, क्योंकि उसके सारे भोग अपने लिए नहीं, वरन् पुरुष के लिए हैं। इसके सिवा बुद्धि की और एक अवस्था है—उसका नाम है स्वार्थ। जब बुद्धि सत्त्वप्रधान होकर अत्यन्त निर्मल हो जाती है और उसमें पुरुष विशेष रूप से प्रतिबिम्बित होता है, तब वह बुद्धि अन्तर्मुखी होकर केवल पुरुष का अवलम्बन करती है। उस 'स्वार्थ' नामक बुद्धि में संयम करने से पुरुष का ज्ञान होता है। केवल पुरुष का अवलम्बन करनेवाली बुद्धि में संयम करने को कहने का तात्पर्य यह है कि शुद्ध पुरुष ज्ञाता होने के कारण कभी ज्ञान का विषय नहीं बन सकता।
ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते ॥३७॥
सूत्रार्थ—उससे प्रातिभ ज्ञान और (अलौकिक) श्रवण, स्पर्श, दर्शन, स्वाद एवं वार्ता (घ्राण)—ये (छ सिद्धियाँ) प्रकट होती हैं।
ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ॥३८॥
सूत्रार्थ—ये (छहों) समाधि में उपसर्ग (विघ्न) हैं, पर व्युत्थान (संसार-अवस्था) में सिद्धिरूप हैं।
२४६ राजयोग
व्याख्या—योगी जानते हैं कि संसार के यावत् भोग पुरुष और मन के संयोग द्वारा होते हैं। यदि वे इस सत्य में कि 'आत्मा और प्रकृति एक दूसरे से पृथक् वस्तु है,' चित्त का संयम कर सके, तो उन्हें पुरुष का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। उससे विवेकज्ञान उदित होता है। जब वे इस विवेक को प्राप्त कर लेते हैं, तब उन्हें प्रातिभ नामक अत्यन्त उच्च कोटि का दैवज्ञान प्राप्त होता है। पर ये सब सिद्धियाँ उस उच्चतम लक्ष्य अर्थात् उस पवित्रस्वरूप आत्मा के ज्ञान और मुक्ति की प्रतिबन्धकस्वरूप हैं। ये सब तो मानो रास्ते में प्राप्त होनेवाली चीजें भर हैं। यदि योगी इन सिद्धियों का परित्याग कर दें, तभी वे उस उच्चतम ज्ञान को प्राप्त कर सकते हैं। यदि वे इनमें अटक जायें, तो फिर उनकी उन्नति रुक जाती है।
बन्धकारणशैथिल्यात् प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः ॥३९॥
सूत्रार्थ—जब बन्धन का कारण शिथिल हो जाता है और योगी चित्त के प्रचारस्थानों को (अर्थात् शरीरस्थ नाड़ीसमूह को) जान लेते हैं, तब वे दूसरे के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।
व्याख्या—योगी एक देह में रहकर और उस देह में क्रियाशील रहते हुए भी अन्य किसी मृत देह में प्रवेश करके उसे गतिशील कर सकते हैं। इसी प्रकार, वे किसी जीवित शरीर में प्रवेश करके उस व्यक्ति के मन और इन्द्रियों को निरुद्ध कर सकते हैं, तथा उस समय तक के लिए उस शरीर के भीतर से काम कर सकते हैं। प्रकृति और पुरुष के विवेक को प्राप्त करने पर ही ऐसा करना उनके लिए सम्भव होता है। यदि वे दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की इच्छा करें, तो उस शरीर में संयम
पातंजल-योगसूत्र-३ २४७
पातंजल-योगसूत्र-३ २४७
का प्रयोग करने से ही वह सिद्ध हो जायगा, क्योकि उनके मतानुसार, उनकी आत्मा ही सर्वव्यापी नही है, वरन् उनका मन भी सर्वव्यापी है। उनका मन उस सर्वव्यापी (समष्टि) मन का एक अंश मात्र है। पर अभी वह इस शरीर के स्नायुओ के भीतर से ही काम कर सकता है, किन्तु जब योगी इन स्नायविक प्रवाहो से अपने को मुक्त कर लेते है, तब वे दूसरे शरीर के द्वारा भी काम कर सकते हैं।
उदानजयाज्जलपंककण्टकादिष्वसंग उत्क्रान्तिश्च ॥४०॥
सूत्रार्थ— उदान नामक स्नायुप्रवाह पर जय प्राप्त कर लेने से योगी के शरीर से पानी या कीचड का सयोग नही होता, वे कांटों पर चल सकते हैं और इच्छामृत्यु होते हैं।
व्याख्या— उदान नामक जो स्नायविक शक्ति-प्रवाह फेफडे और शरीर के सारे ऊपरी भाग को चलाता है, उस पर जब योगी जय प्राप्त कर लेते हैं, तब वे अत्यन्त हल्के हो जाते हैं। वे फिर जल में नही डूबते, काँटो पर या तलवार की धार पर वे अनायास चल सकते हैं, आग मे खड़े रह सकते हैं और इच्छा मात्र से ही इस शरीर को छोड दे सकते हैं।
समानजयात्प्रज्वलनम् ॥४१॥
सूत्रार्थ— समान वायु को जीत लेने से (उनका शरीर) दीप्तिमान् हो जाता है।
व्याख्या— वे जब कभी इच्छा करते हैं, तभी उनके शरीर से ज्योति बाहर निकल आती है।
श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद्दिव्यं श्रोत्रम् ॥४२॥
सूत्रार्थ— कान और आकाश का जो परस्पर सम्बन्ध है, उसमें सयम करने से दिव्य कर्ण प्राप्त होता है।
२४८ राजयोग
२४८ राजयोग
व्याख्या—यह है आकाशतत्त्व, और यह उसका अनुभव करने के लिए यन्त्रस्वरूप कान है। इनमें संयम करने से योगी दिव्य कर्ण प्राप्त करते है। तब वे सब कुछ सुन सकते हैं। अत्यन्त दूर कोई बातचीत या शब्द होने पर भी वे उसे सुन सकते हैं।
कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाश-
गमनम् ॥४३॥
सूत्रार्थ—शरीर और आकाश के सम्बन्ध में चित्तसंयम करने से और (रुई आदि) हल्की वस्तु में संयम करने से योगी आकाश में गमन कर सकते हैं।
व्याख्या—आकाश ही इस शरीर का उपादान है; आकाश ने ही एक प्रकार से विकृत होकर इस शरीर का रूप धारण किया है। यदि योगी शरीर के उपादानभूत उस आकाश-धातु में संयम का प्रयोग करे, तो वे आकाश के समान हल्के हो जाते हैं और जहाँ इच्छा हो, वायु मे से होकर जा सकते हैं। ऐसा ही दूसरे के सम्बन्ध में भी है।
बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः ॥४४॥
सूत्रार्थ—बाहर में मन की जो यथार्थ वृत्ति अर्थात् मन की धारणा है, उसका नाम है महाविदेहा, उसमें संयम का प्रयोग करने से, प्रकाश का जो आवरण है, वह नष्ट हो जाता है।
व्याख्या—अज्ञानवश मन सोचता है कि वह इस देह में से कार्य कर रहा है। यदि मन सर्वव्यापी हो, तो हम केवल एक ही प्रकार के स्नायुओ द्वारा क्यो आबद्ध रहेगे, इस अह को एक ही शरीर मे सीमाबद्ध करके क्यो रखेगे ? ऐसा करने का तो कोई कारण नही दिखता। योगी अपने इस अह-भाव को, जहाँ कही इच्छा हो वही अनुभव करना चाहते है। अह-भाव के चले
पातंजल-योगसूत्र-३ २४९
जाने पर इस देह में जो मानसिक वृत्तिप्रवाह जागरित होता है, उसे 'अकल्पिता वृत्ति' या 'महाविदेहा' कहते है। जब वे उसमे संयम करने में सफल होते है, तब प्रकाश के सारे आवरण नष्ट हो जाते हैं और समस्त अन्धकार एव अज्ञान नष्ट हो जाने के कारण सब कुछ उन्हे चैतन्यमय प्रतीत होता है।
स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद्भूतजयः ॥४५॥
सूत्रार्थ—भूतों की स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व—इन पांच प्रकार की अवस्थाओ में संयम करने से पांचो भूतों पर विजय प्राप्त हो जाती है।*
व्याख्या—योगी समस्त भूतो मे संयम करते हैं, पहले, स्थूल भूत में और फिर उसके बाद उसकी अन्यान्य सूक्ष्म अवस्थाओ मे संयम करते हैं। बौद्धो के एक सम्प्रदाय मे यह संयम विशेष रूप से प्रचलित है। वे मिट्टी का एक लोदा लेकर उसमे संयम का प्रयोग करते हैं, फिर क्रमश, वह जिन सब सूक्ष्म भूतो से निर्मित हुआ है, उन्हे देखना शुरू करते हैं। जब वे उसकी समस्त सूक्ष्म अवस्थाओ के बारे मे जान लेते हैं, तब वे उस भूत पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। ऐसा ही अन्य सब भूतो के बारे में भी समझना चाहिए। योगी सभी पर जय प्राप्त कर सकते हैं।
ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसम्पत्तद्धर्मानभिघातश्च ॥४६॥
सूत्रार्थ—उससे अणिमा आदि सिद्धियों का आविर्भाव होता है, कायसम्पत् की प्राप्ति होती है और सारे शारीरिक धर्मों से बाधा नहीं होती।
* स्वरूप—पृथ्वी की ठोसता, जल की तरलता आदि। अन्वय—सत्त्व, रज और तम प्रत्येक भूत में व्याप्त है, यह जानना। अर्थवत्त्व—विशेष-विशेष भोग-प्रदान की सामर्थ्य।
२५० राजयोग
२५० राजयोग
व्याख्या—इसका तात्पर्य यह है कि योगी अष्टसिद्धियों की प्राप्ति कर लेते हैं। वे अपने को इच्छानुसार परमाणु के समान छोटा या पर्वत के समान बड़ा कर सकते हैं, वे अपने को पृथ्वी के समान भारी और वायु के समान हल्का कर सकते हैं, वे जहाँ चाहें जा सकते हैं, जिस पर चाहे प्रभुत्व कर सकते हैं, जिस पर चाहे विजय प्राप्त कर सकते हैं। सिंह उनके पैरो के पास मेमने के समान शान्तभाव से बैठा रहेगा, और वे जो भी चाहे, उनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण होगी।
रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्पत् ॥४७॥
सूत्रार्थ—रूप, लावण्य, बल और वज्र के समान दृढता—ये कायसम्पत् हैं।
व्याख्या—तब शरीर अविनाशी हो जाता है, कोई भी वस्तु उसे किसी प्रकार का नुकसान नही पहुँचा सकती। यदि योगी स्वयं इच्छा न करे, तो दुनिया की कोई भी ताकत उनके शरीर का नाश नही कर सकती। "कालदण्ड को भग्न कर वे इस जगत् में शरीर लेकर वास करते हैं।" वेदो मे कहा है कि ऐसे व्यक्ति को बीमारी, मृत्यु या अन्य कोई क्लेश नही होता।
ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः ॥४८॥
सूत्रार्थ—इन्द्रियो की बाह्य पदार्थ की ओर गति, उससे उत्पन्न ज्ञान, इस ज्ञान से विकसित अह-प्रत्यय, इन्द्रियो के त्रिगुणमयत्व और उनके भोगदातृत्व—इन पाँचो में संयम करने से इन्द्रियो पर विजय प्राप्त हो जाती है।
व्याख्या—बाह्य वस्तु की अनुभूति के समय इन्द्रियाँ मन से बाहर जाकर विषय की ओर दौडती है, उसी से उपलब्धि
पातंजल-योगसूत्र-३ २५१
पातंजल-योगसूत्र-३ २५१
और अस्मिता की उत्पत्ति होती है। जब योगी उनमें तथा अन्य दोनों में भी क्रमशः संयम का प्रयोग करते हैं, तब वे इन्द्रियों पर जय प्राप्त कर लेते हैं। जो कोई वस्तु तुम देखते या अनुभव करते हो—जैसे एक पुस्तक—उसे लेकर उसमें संयम का प्रयोग करो। उसके बाद पुस्तक के रूप में जो ज्ञान है, उसमें, फिर जिस अहंभाव के द्वारा उस पुस्तक का दर्शन होता है, उसमें संयम करो। इस अभ्यास से समस्त इन्द्रियाँ विजित हो जाती हैं।
ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च ॥४९॥
सूत्रार्थ—उस (इन्द्रियजय) से शरीर को मन के सदृश गति, शरीर के बिना भी विषयों का अनुभव करने की शक्ति और प्रकृति पर विजय—ये तीनो सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
व्याख्या—जैसे भूत-जय से कायसम्पत् की प्राप्ति होती है, वैसे ही इन्द्रिय-जय से उपर्युक्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ॥५०॥
सूत्रार्थ—पुरुष और बुद्धि के परस्पर पार्थक्य-ज्ञान में संयम करने से सब वस्तुओं पर अधिष्ठातृत्व और सर्वज्ञातृत्व प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या—जब हम प्रकृति पर जय प्राप्त कर लेते हैं तथा पुरुष और प्रकृति का भेद अनुभव कर लेते हैं अर्थात् जान लेते हैं कि पुरुष अविनाशी, पवित्र और पूर्णस्वरूप है, तब सर्व-शक्तिमत्ता और सर्वज्ञता प्राप्त हो जाती है।
तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ॥५१॥
सूत्रार्थ—इन सब (सिद्धियों) को भी त्याग देने से दोष का बीज नष्ट हो जाता है, और उससे कैवल्य की प्राप्ति हो जाती है।
व्याख्या—तब वे कैवल्य की प्राप्ति कर लेते हैं, वे मुक्त
२५२ | राजयोग
हो जाते है। जब वे सर्वशक्तिमत्ता और सर्वज्ञता इन दोनो को भी त्याग देते हैं, तब वे सारे प्रलोभन, यहाँ तक कि, देवताओं द्वारा दिए गए प्रलोभनो का भी अतिक्रमण कर सकते है। जब योगी इन सब अद्भुत शक्तियो को प्राप्त करके भी उन्हे त्याग देते है, तब वे चरम लक्ष्य पर पहुँच जाते है। वास्तव मे ये शक्तियाँ हैं क्या?—केवल अभिव्यक्तियाँ। स्वप्न की अपेक्षा उनमे भला कौनसी श्रेष्ठता है? सर्वशक्तिमत्ता भी तो एक स्वप्न है। वह केवल मन पर निर्भर रहती है। जब तक मन का अस्तित्व है, तभी तक सर्वशक्तिमत्ता सम्भव हो सकती है, पर हमारा लक्ष्य तो मन के भी अतीत है।
स्थान्युपनिमन्त्रणे संगस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसंगात् ॥५२॥
सूत्रार्थ—देवताओ द्वारा प्रलोभित किए जाने पर भी उसमें आसक्त होना या आनन्द का अनुभव करना उचित नहीं है, क्योकि उससे पुनः अनिष्ट होना सम्भव है।
व्याख्या—और भी बहुत से विघ्न है। देवता आदि योगी को प्रलोभित करने आते हैं। वे नही चाहते कि कोई पूर्ण रूप से मुक्त हो। हम लोग जैसे ईर्ष्यापरायण है, वे भी वैसे ही हैं, वरन् कभी-कभी तो वे इस बात मे हम लोगो से भी आगे बढ जाते हैं। वे डरते हैं कि कही वे अपने पद को न खो बैठें। जो योगी पूर्ण सिद्ध नही होते, वे शरीर त्यागने के बाद देवता बन जाते हैं। वे सीधे रास्ते को छोडकर मानो बगल के एक रास्ते से चले जाते हैं और इन सब शक्तियो को प्राप्त करते है। उनको फिर से जन्म लेना पडता है। पर जो इतने शक्तिसम्पन्न है कि इन प्रलोभनो का उन पर कोई प्रभाव नही पडता, वे सीधे उस लक्ष्य-स्थल पर पहुँच जाते है और मुक्त हो जाते हैं।
पातंजल-योगसूत्र-३
पातंजल-योगसूत्र-३
२५३
क्षणतत्क्रमयो संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ॥५३॥
सूत्रार्थ— क्षण और उसके क्रम में संयम करने से विवेकजनित ज्ञान उत्पन्न होता है।
व्याख्या— देवता, स्वर्ग और शक्तियो से बचने का फिर उपाय क्या है? उपाय है विवेक—सदसत् विचार। इस विवेक-ज्ञान को दृढ करने के उद्देश्य से ही इस सयम का उपदेश दिया गया है। 'क्षण' का अर्थ है काल का सूक्ष्मतम अग्र। एक क्षण के पहले जो क्षण बीत चुका है, और उसके बाद जो क्षण प्रकट होगा—इस लगातार सिलसिले को 'क्रम' कहते हैं। अतः उपर्युक्त विवेकजनित ज्ञान को दृढ करने के लिए क्षण और उसके क्रम में सयम करना होगा।
जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्ति ॥५४॥
सूत्रार्थ— जाति, लक्षण और देशभेद से जिन वस्तुओ का भेद न किए जा सकने के कारण जो तुल्य प्रतीत होती हैं, उनको भी इस उपर्युक्त संयम द्वारा अलग करके जाना जा सकता है।
व्याख्या— हम जो दुख भोगते हैं, वह अज्ञान से, सत्य और असत्य के अविवेक से उत्पन्न होता है। हम सभी बुरे को भला समझते हैं और स्वप्न को वास्तविक। एकमात्र आत्मा ही सत्य है, पर हम यह भूल गए है। शरीर एक मिथ्या स्वप्न मात्र है, पर हम सोचते है कि हम शरीर है। यह अविवेक ही दुःख का कारण है। और यह अविवेक अविद्या से उत्पन्न होता है। विवेक के उदय के साथ ही बल भी आता है, और तभी हम इस शरीर, स्वर्ग तथा देवता आदि की कल्पनाओ को त्यागने मे समर्थ होते हैं। जाति, चिह्न और स्थान के द्वारा हम वस्तुओं को अलग करते हैं। उदाहरणार्थ, एक गाय की बात ले लो। गाय का कुत्ते से जो
२५४ राजयोग
भेद है, वह जातिगत है। और दो गायों में परस्पर भेद हम कैसे करते हैं? चिह्न के द्वारा। फिर दो वस्तुएँ सर्वथा समान होने पर हम स्थानगत भेद के द्वारा उन्हें अलग कर सकते हैं। किन्तु जब वस्तुएँ ऐसी मिली हुई रहती हैं कि अलग करने के ये सब विभिन्न उपाय बिल्कुल काम में नहीं आते, तब उपर्युक्त साधन-प्रणाली के अभ्यास से लब्ध विवेक के बल से हम उन्हें पृथक् कर सकते हैं। योगियों का उच्चतम दर्शन इस सत्य पर आधारित है कि पुरुष शुद्धस्वभाव एवं नित्य पूर्णस्वरूप है और संसार में वही एकमात्र अमिश्र वस्तु है। शरीर और मन तो मिश्र पदार्थ हैं, फिर भी हम सदैव अपने आपको उनके साथ मिला दे रहे हैं। सबसे बड़ी गलती यही है कि यह पार्थक्य-ज्ञान नष्ट हो गया है। जब यह विवेक-शक्ति प्राप्त होती है, तब मनुष्य देख पाता है कि जगत् की सारी वस्तुएँ, वे फिर वहिजंगत् की हों, या अन्तर्जगत् की, मिश्र पदार्थ हैं, अतएव वे पुरुष नहीं हो सकतीं।
तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् ॥५५॥
सूत्रार्थ—जो विवेकज्ञान समस्त वस्तुओं को तथा वस्तुओं की सब प्रकार की अवस्थाओं को एक साथ ग्रहण कर सकता है, उसे तारकज्ञान कहते हैं।
व्याख्या—तारक का अर्थ है—जो संसार से तारण करता है। सारी प्रकृति की सूक्ष्म और स्थूल सर्वविध अवस्थाएँ इस ज्ञान की ग्राह्य हैं। इस ज्ञान में किसी प्रकार का क्रम नहीं है। यह सारी वस्तुओं को क्षणभर में एक साथ ग्रहण कर लेता है।
सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति ॥५६॥
सूत्रार्थ—जब सत्त्व (बुद्धि) और पुरुष—इन दोनों की समानभाव से शुद्धि हो जाती है, तब कैवल्य की प्राप्ति होती है।
पातंजल-योगसूत्र-३ २५५
व्याख्या— कैवल्य ही हमारा लक्ष्य है, इस लक्ष्य-स्थल पर पहुँचने पर आत्मा जान लेती है कि वह सर्वदा ही अकेली थी, उसे सुखी करने के किए अन्य किसी की भी आवश्यकता न थी। जब तक अपने को सुखी करने के लिए हमें अन्य किसी की आवश्यकता होती है, तब तक हम गुलाम हैं। जब पुरुष जान लेता है कि वह मुक्तस्वभाव है और उसको पूर्ण करने के लिए अन्य किसी की भी जरूरत नहीं, जब वह यह जान लेता है कि यह प्रकृति क्षणिक है, इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, तभी मुक्ति की प्राप्ति होती है, तभी यह कैवल्य प्राप्त होता है। जब आत्मा जान लेती है कि जगत् के छोटे-से-छोटे परमाणु से लेकर देवता तक किसी पर उसके निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है, तब आत्मा की उस अवस्था को कैवल्य और पूर्णता कहते हैं। जब शुद्धि और अशुद्धि दोनो से मिला हुआ सत्त्व अर्थात् बुद्धि, पुरुष के समान शुद्ध हो जाती है, तब यह कैवल्य प्राप्त हो जाता है, तब वह बुद्धि केवल निर्गुण, पवित्रस्वरूप पुरुष को प्रतिबिम्बित करती है।