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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 534 में से

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पृष्ठ 113

७० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास से क्या दुःख, इसीसे उसने ऐसा किया होगा।" यह सुनकर पृथ्वीराज ने कहा—"अब यह मेवाड़ का सारा राज्य तुम्हारे लिए तैयार है।" सूरजमल ने उत्तर दिया—"मैं अब कलंक-कालिमा लगाकर मेवाड़ में जल पीना भी नहीं चाहता।" तदनंतर वह मेवाड़ के बाहर कांठल में चला गया¹ और फिर पीछा मेवाड़ में न लौटा। इस घटना के थोड़े दिनों बाद ही सिरोही के राव जगमाल-द्वारा ज़हर दिये जाने पर कुंवर पृथ्वीराज का देहांत हो गया एवं वि० सं० १५६६ (ई० स० १५०६) में महाराणा रायमल भी स्वर्ग को सिधारा। फिर कुंवर संग्रामसिंह (सांगा) मेवाड़ का महाराणा हुआ, जिससे उस (सूरजमल) का मेल रहा² और पाया जाता है कि सादड़ी आदि की जागीर उसकी अविद्य- मानता में भी उसके नाम बनी रही। कर्नल टॉड का कथन है कि सूरजमल ने सादड़ी में रहते हुए अपने पहले के किये हुए इस प्रण को कि यदि वह अपनी भूमि न रख सकेगा तो ऐसे व्यक्तियों को दे देगा, जो राजाओं से भी अधिक शक्ति-शाली हों, पूरा किया। वह अपनी भूमि ब्राह्मणों, चारणों आदि में बांटकर मेवाड़ से निकल गया³। कांठल के जंगल की ओर जाते हुए उसे एक स्थान पर अच्छे शकुन हुए। इससे उसे चारणी की कही हुई भविष्यवाणी का स्मरण हो आया। उस शुभ शकुन को देख उसने वहां रुककर उधर के भील आदि लुटेरों का दमन किया और वहां देवलिया का क़सबा आबाद किया तथा वह कांठल प्रदेश का स्वामी हो गया⁴। (१) वीरविनोद; प्रथम भाग, पृ० ३४८-६। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जिल्द १, पृ० ३३८। (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५४। (३) मुंहणोत नैणसी की ख्यात में इन गांवों के नाम भीमळ, धारता, गोठिया, वींझणा, बोसोळा (बासोला), भरखिया, वालिया, ताहरून, चारणखेड़ी, खरदेवला, भारकी और सुआली दिये हैं (प्रथम भाग, पृ० ६४)। (४) टॉड; राजस्थान; जिल्द १, पृ० ३४७।

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