भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत सूरजमल ७१ मेवाड़ छोड़ने के पीछे सूरजमल का जीवन कहां और किस प्रकार बीता, यह विषय अंधकार में है । उसके समय का कोई शिलालेख या सूरजमल का देहान्त ताम्रपत्र नहीं मिला है, जिससे उसके जीवन पर कुछ प्रकाश पड़े । प्रतापगढ़ राज्य की ख्यात से पाया जाता है कि सूरजमल का परलोकवास वि० सं० १५८७ ( ई० स० १५३०) में हुआ१ । ख्यातों के अतिरिक्त महारावत सूरजमल का मृत्यु- सम्वत् कहीं उपलब्ध नहीं हुआ है । ऐसी दशा में यदि ख्यात में उल्लिखित उसका मृत्यु-संवत् ठीक हो तो यही मानना पड़ेगा कि वह मेवाड़ से चले जाने पर बीस वर्ष से अधिक जीवित रहा था । सूरजमल के पांच राणियां थीं, जिनसे उसके रणधीर२, बाघसिंह, ( १ ) महारावत सूरजमल का मृत्युकाल ख्यातों में कहीं वि० सं० १५८४ और कहीं १५८७ लिखा हुआ मिलता है । एक ख्यात में यह भी लिखा है कि सूरजमल ने बड़ी सादड़ी में वि० सं० १५५० ( ई० स० १४६३ ) में सूरसागर तालाब बनवाया था । सूरजमल और पृथ्वीराज के बीच २६ लड़ाइयां हुईं । बड़ी सादड़ी छोड़ने के बाद वह. साटोला ( मेवाड़ ) और कांठल के बीच के पहाड़ों में रहा और वि० सं० १५८४ (ई० स० १५२७) में सीकरी के पास के मेवातियों से लड़ने में अपने पुत्र सैंसमल- सहित काम आया । ख्यातों में दिये हुए उपर्युक्त संवत्, मिती और वारों का मिलान करने पर ये सब कथन प्रक्षिप्त ठहरते हैं, क्योंकि जो वार दिये गये हैं, वे उक्त तिथि को नहीं मिलते । घटनाक्रम पर विचार करने से भी बहुधा संवत् कल्पित ही प्रतीत होते हैं । यह संभव है कि सूरजमल खानवे के युद्ध में महाराणा संग्रामसिंह के साथ गया हो और फ़तहपुर सीकरी के पास किसी स्थान में काम आया हो, परंतु इस संबंध में जब तक कोई पु प्रमाण न मिले निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता और न उसके मृत्यु-समय का निर्णय ही हो सकता है । ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में लिखा है कि रणधीर मेवाड़ के महाराणा की तरफ़ से किसी युद्ध में लड़कर मारा गया था । यदि ख्यातों का कथन ठीक हो तो यही मानना पड़ेगा कि रणधीर, सूरजमल और पृथ्वीराज के बीच झगड़ा होने के पूर्व ही मारा गया होगा ।