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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत हरिसिंह १४६ वदि २ = ता० २३ अप्रेल) को निशान भेज सूचित किया कि तुम्हारी नियुक्ति सूबे अहमदाबाद पर की गई है। इसलिए आज्ञापत्र के पहुंचते ही तत्काल अपनी जमीयत के साथ उज्जैन से सूबे अहमदाबाद में पहुंच अपनी नियुक्ति का हाल पूछ लो एवं इस विषय में सख्त ताकीद समझकर आज्ञा के विरुद्ध न करो¹। बादशाह शाहजहां वि० सं० १७१४ (ई० स० १६५७) में अधिक बीमार हो गया । उसकी अपने ज्येष्ठ पुत्र शाहज़ादे दाराशिकोह पर अत्यधिक कृपा थी, इसलिए वह सदा वादशाह [हाशिया: शाहजादे दाराशिकोह और मुराद का महारावत को अपनी-अपनी तरफ मिलाने का प्रयत्न करना] के पास रहता था। वादशाह की बीमारी के दिनों में उक्त शाहज़ादे ने कागजों का आना जाना बंद कर दिया था, इसलिए उस (वादशाह) की मृत्यु का झूठा संवाद तमाम भारत में फैल गया, जिससे वादशाह के अन्य तीनों शाहजादे भी वादशाह बनने के लिए आतुर हो गए² । इस अवसर पर शाहज़ादे दाराशिकोह ने सन् जुलूस ३१ ता० ३ मोहर्रम हि० १०६८ (वि० १७१४ आश्विन सुदि ४-५ = ई० स० १६५७ ता० १ अक्टूबर) को महारावत के नाम इस आशय का निशान भेजा— "हम तुमको अपना विश्वासपात्र समझते हैं, इसलिए अपने हृदय को काबू में रखकर विश्वासपात्रता एवं ताबेदारी के मार्ग में स्थित रहे³"। उधर शाहज़ादे मुरादबख़्श ने महारावत को, जिससे उसका गुजरात में रहते हुए निकट संपर्क रह चुका था, सन् जुलूस ३१ ता० १२ मोहर्रम हि० १०६८ (वि० सं० १७१४ आश्विन सुदि १३ = ई० स० १६५७ ता० १० अक्टूबर) को लिखा "जब से हमारी सेवाओं से विमुख हुए हो तब से अभी तक तुमने अपने समाचारं की अर्ज़ी नहीं भेजी । हमको तुम्हारी मित्रता से यह आशा न थी। अपनी दोस्ती को वादे के मुआफिक (१) शाहजादे मुरादबख्श के फ़ारसी निशान का अंग्रेज़ी अनुवाद । (२) मुंशी देवीप्रसाद; शाहजहां नामां, तीसरा हिस्सा, पृ० १६६। (३) शाहजादे दाराशिकोह के फ़ारसी निशान का अंग्रेजी अनुवाद ।