राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास स्मरण रखो और वादशाही मिहरवानी को अपने पुराने दस्तूर के अनुकूल ही समझ एवं गुजरे हुए तरीके को छोड़कर मिहरवानी और सेवा के मार्ग में दृढ़ रहो, जिसका परिणाम अच्छा होगा'”। वादशाह शाहजहां की बीमारी सात आठ दिन तक भयंकर रही। उसके पीछे उसका स्वास्थ्य क्रमशः ठीक होने लगा और आश्विन वदि २ (ता० १४ सितंबर) को उसने शाही मुलाज़िमों की सलाम ली²। कार्तिक वदि ३ तथा ५ (ता० १५ तथा १७ अक्टोबर) को वादशाह ने दिल्ली के महल के झरोके में बैठकर जनता को दर्शन दिये³। तदनंतर जब उसका स्वास्थ्य बिलकुल सुधर गया तो वह जल-वायु परिवर्तनार्थ आगरे गया। उन्हीं दिनों गुजरात में रहते हुए शाहज़ादे मुरादबख्श ने, सबसे छोटा शाहजादा होने पर भी अपने को वादशाह घोषित किया। इसकी ख़बर वादशाह को मिलने पर उसने उधर विशेष ध्यान न दिया और पहले शाहज़ादे शुजाअ को सज़ा देना चाहा, जो सिंहासन-प्राप्ति के लोभ से बंगाल से आगे बढ़कर बनारस तक पहुंच गया था। अतएव बड़े शाहज़ादे दाराशिकोह के पुत्र सुलेमानशिकोह को कई बड़े-बड़े अफ़सरों सहित शुजाअ के मुकाबले को रवाना किया। उसके पहुंचने पर शुजाअ ने मुक़ाबला न किया और भाग गया एवं अपने कुसूरों की माफ़ी की अर्ज़ी बादशाह के पास भेज दी, जिसपर वादशाह ने उसके अपराध क्षमा कर सुलेमानशिकोह को अपने पास बुला लिया। वादशाह मुरादबख़्श की कार्यवाही को टाल देना चाहता था, परन्तु दाराशिकोह के दबाव में आकर उसने उसको फरमान भेजा “तुम्हारे पिछले कुसूरों को माफ़कर तुम्हें बराड़ की जागीर दी जाती है, इसलिए वहां चले जाओ”। उसी समय शाहज़ादे औरंगजेब के पास यह आज्ञा पहुंची कि तुम वहां का लश्कर भेज दो। तब औरंगज़ेब के जो बीजापुर की मुहिम पूरी करने को जानेवाला था, बीजापुरवालों से सुलह (१) शाहजादे मुरादबख्श के फ़ारसी निशान का अंग्रेज़ी अनुवाद। (२) मुंशी देवीप्रसाद; शाहजहां नामा, तीसरा हिस्सा, पृ० १६३। (३) वही; पृ० १६४।