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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

१५०      प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास स्मरण रखो और वादशाही मिहरवानी को अपने पुराने दस्तूर के अनुकूल ही समझ एवं गुजरे हुए तरीके को छोड़कर मिहरवानी और सेवा के मार्ग में दृढ़ रहो, जिसका परिणाम अच्छा होगा'”। वादशाह शाहजहां की बीमारी सात आठ दिन तक भयंकर रही। उसके पीछे उसका स्वास्थ्य क्रमशः ठीक होने लगा और आश्विन वदि २ (ता० १४ सितंबर) को उसने शाही मुलाज़िमों की सलाम ली²। कार्तिक वदि ३ तथा ५ (ता० १५ तथा १७ अक्टोबर) को वादशाह ने दिल्ली के महल के झरोके में बैठकर जनता को दर्शन दिये³। तदनंतर जब उसका स्वास्थ्य बिलकुल सुधर गया तो वह जल-वायु परिवर्तनार्थ आगरे गया। उन्हीं दिनों गुजरात में रहते हुए शाहज़ादे मुरादबख्श ने, सबसे छोटा शाहजादा होने पर भी अपने को वादशाह घोषित किया। इसकी ख़बर वादशाह को मिलने पर उसने उधर विशेष ध्यान न दिया और पहले शाहज़ादे शुजाअ को सज़ा देना चाहा, जो सिंहासन-प्राप्ति के लोभ से बंगाल से आगे बढ़कर बनारस तक पहुंच गया था। अतएव बड़े शाहज़ादे दाराशिकोह के पुत्र सुलेमानशिकोह को कई बड़े-बड़े अफ़सरों सहित शुजाअ के मुकाबले को रवाना किया। उसके पहुंचने पर शुजाअ ने मुक़ाबला न किया और भाग गया एवं अपने कुसूरों की माफ़ी की अर्ज़ी बादशाह के पास भेज दी, जिसपर वादशाह ने उसके अपराध क्षमा कर सुलेमानशिकोह को अपने पास बुला लिया। वादशाह मुरादबख़्श की कार्यवाही को टाल देना चाहता था, परन्तु दाराशिकोह के दबाव में आकर उसने उसको फरमान भेजा “तुम्हारे पिछले कुसूरों को माफ़कर तुम्हें बराड़ की जागीर दी जाती है, इसलिए वहां चले जाओ”। उसी समय शाहज़ादे औरंगजेब के पास यह आज्ञा पहुंची कि तुम वहां का लश्कर भेज दो। तब औरंगज़ेब के जो बीजापुर की मुहिम पूरी करने को जानेवाला था, बीजापुरवालों से सुलह (१) शाहजादे मुरादबख्श के फ़ारसी निशान का अंग्रेज़ी अनुवाद। (२) मुंशी देवीप्रसाद; शाहजहां नामा, तीसरा हिस्सा, पृ० १६३। (३) वही; पृ० १६४।

कर वापस लौट गया। उसकी सेना में इस आज्ञा से खलबली मच गई और उसके साथ रहनेवाले कितने ही अफ़सर उसका साथ छोड़कर चल दिये१ । शाहज़ादे मुरादबख़्श और औरंगज़ेब ने उपर्युक्त आज्ञाओं की मंसूखी के लिए बादशाह के पास अर्जियां भेज दीं, परन्तु वे दाराशिकोह के दबाव से मंजूर न हुईं और दाराशिकोह के कथनानुसार जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह को वि० सं० १७१४ फाल्गुन वदि ८ (ई० स० १६५८ ता० १५ फरवरी) को मालवे के सूबे पर नियत कर कासिमखां को अहमदाबाद की सूबेदारी देकर उधर रवाना किया तथा ये हिदायतें की गईं कि दोनों सरदार उज्जैन जाकर मिलें और यदि मुरादबख़्श बराड़ न जावे तो उससे अहमद- बाद खाली करवा लें२ । इस अवसर पर दाराशिकोह ने ता० ६ रज्जब (वि० सं० १७१५ चैत्र सुदि १० = ई० स० १६५८ ता० ३ अप्रेल) को महा- रावत हरिसिंह के पास इस आशय का निशान भेजा "मशहूर राजाओं में चुना हुआ, उमरावों में बड़े हौसलेवाला, बड़ी सलतनत का कारकुन और बिहतर, बादशाहत के अमानतदार, बहुत मिहरवानियों के लायक महाराजा जसवन्तसिंह अपने फतहमंद लश्कर के साथ, कमनसीब, हक़ को न पह- चाननेवाले और गुनहगार नामुराद कमबख्त को सज़ा देने के लिए रवाना हो गया है। इसलिए यह शाही फ़रमान तुम्हारे नाम जारी किया जाता है कि तुम भी इस मौके को हाथ से न जाने दो ताकि वह कमनसीब भाग न जाय । ऐसा न हो कि तुम्हारे इलाके से वह बाहर निकल जाय । जो कुछ तुमसे हो सके उसमें कमी न करो एवं जैसा कि उस (मुराद ?) के शिकस्त पाने तथा भागने पर लश्कर और उसके आदमियों की लूटमार को हमने माफ़ कर दिया था, उसी प्रकार तुम भी उस अपराधी कमनसीब की चीज़ों और सामान को मय उसके हमराहियों के समान के क़ब्जा पाने पर माफ किए जाओगे। हम जान बूझकर यह लूट माफ करते हैं (१) मुंशी देवीप्रसाद; शाहजहां नामा, तीसरा हिस्सा, पृ० १७१-७४ । (२) वही; पृ० १७५ ।

और यदि परमेश्वर ने चाहा तो इस सेवा को पूरी करने के बाद बादशाही कृपा तुम पर होगी और तुम अपने बराबरवालों तथा पासवालों में इज्ज़त हासिल करोगे'” । बराड़ न जाने की अवस्था में अहमदाबाद को खाली कराने की शाही आज्ञा को सुनकर शाहज़ादा मुराद महाराजा जसवंतसिंह के उज्जैन पहुंचने पर एक बड़ी सेना के साथ मुक़ाबले के लिए जा डटा, परंतु फिर अकेले लड़ना उचित न समझ वह शाहजादे औरंगज़ेब से, जो दक्षिण से बादशाह की खुशी पूछने के लिए आगरे जाने के बहाने से आ रहा था, जा मिला। उस समय औरंगज़ेब ने उस (मुराद) को ही बादशाह बनाने का लालच दिया। फिर दोनों शाहज़ादों ने आगे बढ़ना चाहा, पर महाराजा जसवन्तसिंह ने उन्हें रोक दिया। वि० सं० १७१५ वैशाख वदि ८ (ई० स० १६५८ ता० १५ अप्रेल) को उज्जैन से सात कोस दूर धर्मातपुर में (जिसका औरंगज़ेब ने फ़तिहाबाद नाम रक्खा) दोनों शाहजादों का महाराजा जसवन्तसिंह और क़ासिमखां आदि शाही अफ़सरों से मुक़ाबला हुआ । शाहजादों की फौज ने शाही सेना को घेर लिया, जिससे कई बड़े-बड़े अफ़सर और सहस्रों सैनिक मारे गये। कासिमखां पहले ही औरंगजेब से मिल गया था। जब जसवन्तसिंह के पास थोड़ी सेना रह गई तो उसके सरदारों ने उसे उस युद्ध-क्षेत्र से हटने के लिए विवश किया । फिर दोनों शाहज़ादे अपनी सम्मिलित सेना के साथ आगरे की तरफ बढ़े । उधर से शाहज़ादा दाराशिकोह भी बड़ी सेना के साथ मुक़ाबले को पहुंचा । समूग़र (आगरे के पास) में वि० सं० १७१५ ज्येष्ठ सुदि ७ (ई० स० १६५८ ता० २६ मई) को दोनों सेनाओं के बीच घोर युद्ध हुआ, जिसमें दाराशिकोह की हार हुई² ।


(१) शाहज़ादे दाराशिकोह के फ़ारसी निशान का अंग्रेज़ी अनुवाद । (२) मुंशी देवीप्रसाद; शाहजहां नामा, तीसरा हिस्सा, पृ० १७६ । वीरविनोद, द्वितीय भाग, पृ० ३४४-१८ ।

महारावत हरिसिंह १५३ : शाहज़ादों के पारस्परिक संघर्ष में महारावत हरिसिंह को अपनी- अपनी तरफ़ मिलाने के लिए दाराशिकोह और मुराद दोनों ने प्रयत्न किये परन्तु उस( हरिसिंह )ने उस विषम परिस्थिति में किसी का साथ देना उचित न समझ शाहज़ादों के उपर्युक्त किसी युद्ध में भाग न लिया और अपनी अनुपस्थिति की उनके पास अर्जियां भेज दीं। समूनगर में विजय प्राप्त करने के तीसरे दिन शाहज़ादे मुराद ने महारावत की जागीर में परगना सुखेरीखेड़ा बढ़ाकर, सिरोपाव के साथ निम्नलिखित आशय का ता० ६ शाबान हि० १०६८ (वैशाख सुदि ११ = ता० ३ मई) को निशान भेजा— "शाही सेवा में उपस्थित होने की उसकी अर्जी हमारे पास पहुंच चुकी है। इस संबंध में यहां से फ़रमान लिखा जा रहा है, इससे उसको पूर्ण संतोष होजायगा। हमने उसके न आने का अपराध माफ़ कर दिया है। मंदसोर के शाही परगने से यह फ़रमान जारी किया जाता है। इसके अनुसार वह (हरिसिंह) ५०० सवारों के साथ शाही सेनाध्यक्ष के शामिल होकर उस ज़िले की रक्षा का भार अपने ऊपर ले। फ़िलहाल उसे मंदसोर का परगना सुखेरी बख्शा जाता है और एक सिरोपाव भी उसके पास भेजा जाता है¹।" उपर्युक्त निशान महारावत के पास पहुंचने के कुछ ही दिनों बाद शाहज़ादे औरंगज़ेब ने अपने वृद्ध पिता शाहजहां बादशाह को आगरे के [हाशिया: 'औरंगज़ेब का बसाइ और गयासपुर के परगने महाराणा को देना] क़िले में नज़रबंद कर दिया। हि० स० १०६८ ता० ४ शव्वाल (वि० सं० १७१५ आषाढ सुदि ५ (ई० स० १६५८ ता० २५ जून) को मथुरा के मुक़ाम पर उसने शाहज़ादे मुराद को भी अपने शिविर में बुलाकर शराब पिलाने के बाद क़ैद कर दिया। फिर वह दाराशिकोह का पीछा करता हुआ दिल्ली पहुंचा, जहां उसने ता० २१ जुलाई (श्रावण सुदि २) को अपने को बादशाह घोषित किया। जब औरंगज़ेब दक्षिण में शाहजहां की बीमारी का समाचार पाकर ( १ ) शाहज़ादे मुरादबख़्श के फ़ारसी निशान के अंग्रेज़ी अनुवाद से। २०

१५४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास बादशाह बनने का मनसूबा बांध रहा था, उस समय उसने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह को अपने पक्ष में कर लिया था, जिसने शाहज़ादों के पारस्परिक युद्धों में उसको सहायता दी। इससे प्रेरित होकर औरंगज़ेब ने बादशाह बनने पर महाराणा के पास पांच लाख रुपये नक़द भेजे और मनसब में एक हज़ार ज़ात और एक हज़ार सवारों की वृद्धि कर उसका मनसब छः हज़ार ज़ात और छः हज़ार सवार कर दिया। साथ ही शाहजहां के समय मेवाड़ से छीने हुए बदनौर और मांडलगढ़ के परगनों के अतिरिक्त डूंगरपुर, बांसवाड़ा, वसाइ, गयासपुर आदि बाहरी इलाक़े भी उसके राज्य में मिलाये जाने का ता० १७ ज़िल्काद हि० स० १०६८ (वि० सं० १७१५ भाद्रपद वदि ४ = ई० स० १६५८ ता० ७ अगस्त) को उसने फ़रमान कर दिया, जिसके अनुसार देवलिया राज्य के दोनों परगने (वसाड़ और गयासपुर) मेवाड़ राज्य के अन्तर्गत हो गये¹ । शाहज़ादा दाराशिकोह सिंध की तरफ़ से कच्छ में होता हुआ अहमदाबाद पहुंचा, जहां उसको कुछ आर्थिक सहायता मिली और उसका सहायता के लिए दारा- सैन्य-बल भी बढ़ गया। जोधपुर के महाराजा शिकोह का महारावत के जसवंतसिंह ने भी उस समय उसको सहायता देना नाम निशान भेजना स्वीकार किया, जिससे वह वहां से रवाना होकर अजमेर की तरफ़ आगे बढ़ा। इस अवसर पर उक्त शाहज़ादे से महारावत हरिसिंह ने भी मिल जाना चाहा। इसपर दाराशिकोह ने ता० १६ जमादि- उल्अव्वल हि० स० १०६६ (वि० सं० १७१५ फाल्गुन बदि २ = ई० स० १६५६ ता० २० जनवरी) को महारावत के नाम नीचे लिखे आशय का निशान भेजा- “......तुम्हारी अर्ज़ी मिल गई है। तुमको आज्ञा दी जाती है कि शीघ्र जितने आदमी एकत्र हो सकें, उन्हें लेकर शाही दरबार में उपस्थित हो। तुम्हारे पहुंचने पर तुम पर शाही कृपाओं की वर्षा की जायगी तथा (१) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ५३८। मूल फ़रमान के लिए देखो वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ४२५-३१।

महारावत हरिसिंह १५५ तुम्हारे शत्रुओं की ज़मींदारी भी तुम्हें हीं सौंप दी जायगी। अतएव तुमको शीघ्रातिशीघ्र आना चाहिये¹।" इसके थोड़े ही दिनों बाद फिर उक्त शाहज़ादे ने जितनी सेना एकत्रित हो सके, उसके साथ शीघ्र पहुंचने का ता० २७ जमादि-उल्-अव्वल हि० स० १०६६ (फाल्गुन वदि १४ = ता० १० फ़रवरी) को महारावत के नाम निम्नलिखित आशय का निशान भेजा— "इन दिनों तुम्हारे हाल हमने अपने मुसाहियों से सुने, इसलिए आज्ञा दी जाती है कि तुम्हारी जागीर के परगने यदि दूसरे की जागीर में न चले गये हों तो उनपर किसी को दख़ल न करने दो और पुराने रिवाज के मुआफ़िक़ उनपर क़ाबिज़ रह कर निहायत इतमीनान के साथ हमारे हुजूर में हाज़िर हो या अपने बेटे को एक बड़ी और अच्छी सेना के साथ हमारे पास भेजो ताकि हमारे हुजूर में हाज़िर होकर वह हमारी कृपाओं को प्राप्त करे। इस बारे में देर न हो²।" गयासपुर और वसाड़ (वसावर) के परगनों का फ़रमान तो शाही दरबार से महाराणा के नाम हो गया, परंतु महारावत हरिसिंह ने उसकी अवहेलना की। इसपर क्रुद्ध होकर महाराणा ने [पार्श्व टिप्पणी: महाराणा राजसिंह का देवलिया पर सेना भेजना] वि० सं० १७१६ (ई० स० १६५६) में अपने प्रधान कायस्थ फ़तहचंद को, जो उन दिनों बांसवाड़े के महारावल समरसिंह को अधीन करने के लिए गया हुआ था, एक बड़ी सेना के साथ देवलिया पर जाने की आज्ञा दी। फ़तहचंद बांसवाड़े का कार्य समाप्त कर वहां के रावल को लेकर उदयपुर गया और वहां से देवलिया पहुंचा। उसके देवलिया की तरफ़ आने का समाचार पाकर महारावत बादशाह के सम्मुख अपने मामले को पेश करने के लिए दिल्ली गया। महारावत की अविद्यमानता का अवसर पाकर फ़तहचंद ने वहां (१) शाहज़ादे दाराशिकोह के फ़ारसी निशान के अंग्रेज़ी अनुवाद से। (२) शाहज़ादे दाराशिकोह के फ़ारसी निशान के अंग्रेज़ी अनुवाद से।

१५६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास पर अधिकार कर लूट-मार की १। वेड़वास की बावड़ी की प्रशस्ति२ से प्रकट है कि महारावत की माता देश की बरबादी देख अपने पौत्र प्रतापसिंह के साथ फ़तहचंद के पास उपस्थित हुई और पांच हज़ार रुपये एवं एक हथिनी देकर उसने उससे संधि कर ली। फिर फ़तहचंद कुंवर प्रतापसिंह को लेकर महाराणा के पास उपस्थित हुआ। राजप्रशस्ति महाकाव्य३ से भी इसकी पुष्टि होती है, परन्तु उसमें बीस हज़ार रुपये दिया जाना लिखा है। महारावत-द्वारा की गई महाराणा की शिकायत का बादशाह पर कुछ भी प्रभाव न पड़ा; क्योंकि बादशाह उन दिनों अपने भाइयों के झगड़े महाराणा राजसिंह के पास मिटाने में संलग्न था। साथ ही सिंहासनारूढ़ होने महारावत का उपस्थित के समय उसको महाराणा से सहायता मिली थी होना इसलिए उसने उससे बिगाड़कर उसको असंतुष्ट करना ठीक नहीं समझा। यदि उस समय वह इस बात पर महाराणा को (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ४३५। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास, जिल्द २, पृ० ५४०-१ । (२) वि० सं० १७२५ की वेड़वास की बावड़ी की प्रशस्ति। यह बावड़ी उदयपुर से देबारी की तरफ़ जानेवाले मार्ग में बनी हुई है । मंत्री फ़तहचंद ने इसको बनवाकर यहां उक्त प्रशस्ति लगवाई थी। (३) श्रीराजसिंहवचनात् फत्तेचंदः स ठक्कुरः ॥ चक्रे देवलियाभंगं हरिसिंहः पलायितः ॥ २१ ॥ हरिसिंहस्य माता तु गृहीत्वा पौत्रमागता ॥ प्रतापसिंहं विदधे प्रसन्नं राणमंत्रिणं ॥ २२ ॥ रूप्यमुद्रासहस्राणि विंशत्याख्यानि हस्तिनी । दंडं प्रकल्प्य स्वल्पं स फत्तेचंदो दयामयः ॥ २३ ॥ राणेंद्रचरणाभ्यर्णे आनयामास तं बलात् । प्रतापसिंहं जातस्तत् फत्तेचंदः प्रभोः प्रियः ॥ २४ ॥ सर्ग आठवां ।

महारावत हरिसिंह १५७ रुष्ट कर लेता तो संभव था कि महाराणा उसके विरुद्ध हो जाता और इस तरह उसके विरोधियों का बल बढ़ जाता। महारावत असफल होकर अपनी राजधानी को लौट गया। उसको अपने देश में आये थोड़ा ही समय हुआ था कि वि० सं० १७१६ के श्रावण (ई० स० १६५६ जुलाई) मास में महाराणा का बसाड़ की तरफ़ दौरा हुआ। महाराणा जगतसिंह- द्वारा उदयपुर में महारावत जसवंतसिंह पर सेना भेज घेरा डाल देने से उस- (हरिसिंह) को महाराणा पर विश्वास न रहा था, इसलिए वह महाराणा के पास उपस्थित होने में संकोच करने लगा। फिर महाराणा के प्रतिष्ठित चार बड़े सरदारों-झाला राज सुलतानसिंह (सादड़ीवालों का पूर्वज), चौहान राव सबलसिंह (बेदलावालों का पूर्वज), चूंड़ावत रावत रघुनाथ- सिंह (सलूंबरवालों का पूर्वज) और शक्तावत महाराज मुहकमसिंह (भींडरवालों का पूर्वज) -के विश्वास दिलाने पर वह महाराणा की सेवा में उपस्थित हो गया और उसने गयासपुर एवं बसावर (बसाड़) के परगनों का दावा छोड़कर¹ महाराणा से मेल कर लिया। इस घटना का राजप्रश- स्ति महाकाव्य में भी वर्णन मिलता है और उसमें महारावत का महाराणा के पास उपस्थित होकर पचास हज़ार रुपये नज़र करने का भी उल्लेख है²। (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ४३५-३६ । (२) शते सप्तदशे पूर्णे वर्षे षोडशनामके ॥ श्रावणे तु बसाडाख्यदेशं दृष्टुं नृपो ययौ ॥ ९ ॥ भटैरुद्भटै रावलाद्यैर्बलाढ्यैः प्रचंडश्च वेतंडवर्यैरुपैता ॥ गृहीत्वा महावाहिनी राजसिंहः प्रतस्थे बसाडप्रदेशद्दणाय ॥ १० ॥ ततो दुंदुभिः प्रोच्चशब्दैर्जिताब्दारवैः पार्श्वदेशस्थितानां जनानां ॥ विदीर्णानि वक्षांसि वक्षो विभिन्नं महारावतस्यापि नश्यद्वलस्य ॥११॥ झालोद्यत्सुलतानाख्यं चौहाणं तं महाबलं ॥ रावं सबलसिंहाख्यं रघुनाथाख्यरावतं ॥ १२ ॥

˙१५८˙ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कृष्णगढ़ (किशनगढ़) और रूपनगर के राजा मानसिंह की बहिन चारुमती अत्यंत सुंदरी थी, जिससे बादशाह औरंगज़ेब स्वयं विवाह करना चाहता था; परंतु वल्लभ-सम्प्रदाय की कट्टर अनु- [हाशिया: महारावत को पुनः गयासपुर और वसाड़ आदि परगने मिलना] यायी होने के कारण उसने मुसलमान बादशाह से विवाह करने की अपेक्षा मर जाना अच्छा समझ महाराणा राजसिंह के पास पत्र भेज अपनी रक्षा की प्रार्थना की। इसपर वि० सं० १७१७ (ई० स० १६६०) में महाराणा ने वहां जाकर उक्त राज- कुमारी से विवाह कर लिया। बसावर (बसाड़) और गयासपुर के परगने मेवाड़ में मिल जाने से महारावत हरिसिंह महाराणा से असंतुष्ट था। अब शाही कृपा प्राप्त करने का यह अच्छा अवसर जान उसने बादशाह के पास जाकर महाराणा के रूपनगर पहुंच विवाह करने तथा उसके देवलिया पर जुल्म करने की शिकायत की, जिसपर बादशाह ने महाराणा पर बिना आज्ञा रूपनगर में विवाह करने आदि का अपराध लगाकर गयासपुर तथा वसाड़ के परगने मेवाड़ से पृथक् कर पुनः महारावत हरिसिंह को प्रदान कर दिये१। इसपर महाराणा ने महारावत पर सेना भेजनी चाही, परंतु मुसाहबों की सलाह से उसने यह विचार स्थगित रख कोठारिया के चोंडावतं हकूम्सिंहं शक्तावत्तोत्तमं तथा ॥ एतान्पुरोगमान् कृत्वा एतेषां बाहुमाश्रयन् ॥ १३ ॥ स रावतो हरीसिंहो ययौ देवलियापुरात् ॥ आगत्य राजसिंहस्य राजेंद्रस्य पदे पतत् ॥ १४ ॥ रूप्यमुद्रा सुपंचाशत्सहस्राणि न्यवेदयत् ॥ मनरावत नामानं करिणं करिणीमपि ॥ १५ ॥ राजप्रशस्ति महाकाव्य; सर्ग आठवां। (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ४३६। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ५४२।

महारावत हरिसिंह १५६ रावत रुक्मांगद के पुत्र उदयकर्ण चौहान के साथ बादशाह के पास निम्न- लिखित आशय की अर्ज़ी भेजी— “मैंने आपकी शाहज़ादगी के शुभ समय से ही विशुद्ध भावनाओं के साथ विशेष कृपाओं के प्राप्त करने की आशाएं रखी हैं। अब यह आदेश प्राप्त होने पर कि हरिसिंह निरपराध था, हमने उसको बसावर और गयासपुर के परगने प्रदान किये हैं। अकबर और जहांगीर के समय से ही देवलिया मेरे पूर्वजों की हुकूमत में था। शाहजहां के समय दूसरी तरह हुआ, वह भी निवेदन हुआ होगा और इन परगनों को प्रदान करने के समय भी भाई अरसी (अरिसिंह महाराणा जगतसिंह प्रथम का दूसरा पुत्र) ने तीन-चार बार निवेदन किया। इसपर आज्ञा हुई कि बादशाहों का हुक्म सिकंदर की दीवार के समान मज़बूत है, वह कदापि नहीं बदलेगा, हृदय में विश्वास रख अधिकार करें। इस संबंध में इसी अभिप्राय की दो- तीन बार प्रार्थनाएं भेजकर निवेदन किया गया उसपर फ़रमान प्राप्त हुआ कि जिस तरह जानो अधिकार करो और काका जयसिंह के साथ भी यही संदेश प्राप्त हुआ। “तदनुसार मैंने अपने कर्मचारियों को कतिपय राजपूतों-सहित उन परगनों में भेजा। उसपर हरिसिंह ने आज्ञा के विरुद्ध बिना सोच-विचार किये बुरे अभिप्राय से परगनों की प्रजा को उभाड़कर शोर मचाया। वह थोड़े दिनों बाद उन परगनों को बिल्कुल उजाड़कर आप भी चला गया और अपने मनुष्यों को वहां छोड़ गया कि उस जगह को कभी आबाद न होने दें। आवश्यकता समझ शाही आज्ञानुसार एक जमीयत भी उस जगह भेजी। हरिसिंह प्रजा को उजाड़कर पहाड़ों में फिरता था। उसने खरीफ़ की फ़सल को तो इस तरह खोया और रबी की फ़सल को भी ख़राब कर प्रजा को दुःखित किया। उसने दोनों साखों को ऐसा खोया कि एक दाम भी उन परगनों का मेरे हाथ नहीं आया। जमीयत के खर्च और झंझट से मुझको बहुत हानि हुई और अब ऐसी आज्ञा हुई है। उस व्यक्ति को जो आज्ञा के विरुद्ध करे ऐसा हुक्म हो और वह व्यक्ति

१६० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास जो राजभक्ति में तत्पर रहा हो, उसे ऐसी आज्ञा हो। इस स्थिति में कुछ इलाज नहीं। न्याय आपके हाथ है । बाक़ी वृत्तांत हरिसिंह को परगनों के प्रदान करने का उदयकर्ण चौहान को रवाना करने के पीछे प्रकट हुआ, इसलिए उस संबंध में वह जो निवेदन करे उसे स्वीकार किया जावे'।” महाराणा की इस प्रार्थना से प्रकट है कि वसावर और गयासपुर के परगनों पर महाराणा को अधिकार करने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था और महारावत हरिसिंह की तरफ़ से बाधाएं उपस्थित की गईं, जिससे महाराणा को हानि उठानी पड़ी। महारावत का वसावर और गयासपुर पर कब अधिकार हुआ यह स्पष्ट नहीं है; किंतु महाराणा के कृष्णगढ़ विवाह करने जाने का समय राजप्रशस्ति में वि० सं० १७१७ ( ई० स० १६६० ) दिया है और चौहान उदयकर्ण वि० सं० १७१८ ( ई० स० १६६१ ) में महाराणा का प्रार्थनापत्र लेकर पहुंचा था, अतएव वि० सं० १७१८ ( ई० स० १६६१ ) के लगभग उसका वसावर और गयासपुर पर अधिकार हो जाना संभव है । शाही दरबार में महाराणा की तरफ़ से यह प्रार्थनापत्र उदयकर्ण ने पेश किया, परंतु वादशाह पर इसका कुछ भी प्रभाव न पड़ा और वसावर तथा गयासपुर पर महारावत का अधिकार स्थिर रहा । वादशाह ने महाराणा की तसल्ली के लिए फ़रमान और ख़ासा खिलअत देकर उदयकर्ण को रुख़सत दी और उसके साथ एक शाही अफ़सर भी भेजा, जिसने महाराणा को इस विषय में बहुत कुछ समझाया², तो भी महाराणा ने सेमलिया गांव से अपना थाना नहीं हटाया । इसपर महारावत ने अपने कुंवर प्रतापसिंह तथा अमरसिंह को बादशाही सेवा में भेजने की इच्छा प्रकट कर वहां से महाराणा का थाना हटा लेने की दरख्वास्त की। ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ४४०-२ । ( २ ) वही; द्वितीय भाग, पृ० ४४२-३ ।

महारावत हरिसिंह १६१ शाही सरदार राजा रघुनाथ ने ता० २ रमज़ान सन् जुलूस ५ हि० स० १०७२ (वि० सं० १७१६ वैशाख सुदि ३ = ई० स० १६६२ ता० १० अप्रेल) को महारावत के नाम निम्नलिखित आशय का उत्तर भेजा- "इन दिनों जो पत्र तुमने अपने बेटे प्रतापसिंह तथा अमरसिंह को रवाना करने और उनको बादशाही सेवकों की सूची में शुमार किये जाने के संबंध में भेजा है, उसमें यह भी प्रकट किया है कि पहले राणा राजसिंह ने अपने मनुष्यों को धसाड़ परगने के गांव सेमलिया में, जो मेरे मुतल्लिक़ है, मुक़र्रर किया था। उन आदमियों ने जुल्म कर रक्खा है और बांसवाड़ा के ज़मींदार समरसी के बेटे' ने भी राणा राजसिंह के इशारे से थाना क़ायम किया था। बादशाह की सेवा में उपस्थित करने पर यह हुक्म सादिर हुआ है कि हमारा फ़रमान पहुंचने पर अपने बेटे प्रतापसिंह तथा अमर- सिंह को बादशाह की सेवा में भेज दो, जिनसे हालात दर्याफ्त करने के बाद बादशाही कृपा हो सकेगी। तुम्हारी इच्छा के मुताबिक हमने राणा (१) महाराणा राजसिंह (प्रथम) ने वि० सं० १७१६ (ई० स० १६५६) में बांसवाड़ा के स्वामी महारावल समरसिंह को अपने अधीन बनाया था, जिसका उसके मंत्री फ़तहचंद की बनवाई हुई बेड़वास की बावड़ी की वि० सं० १७२५ (ई० स० १६६८) की प्रशस्ति और राजप्रशस्ति महाकाव्य में उल्लेख है। संभव है महारावल की तरफ़ से उसका कुंवर कुशलसिंह, जो समरसिंह के पीछे वहां का स्वामी हुआ, कुंवरपदे में महाराणा की सेवा में रहता हो और उसको महाराणा ने उधर नियत किया हो। वि० सं० १७१७ (अमांत) भाद्रपद (पूर्णिमांत आश्विन) वदि १४ (ई० स० १६६० ता० २३ सितंबर) को महारावल समरसिंह का देहांत होने पर कुशलसिंह बांसवाड़े का स्वामी बना। इसके पीछे भी उसने कुछ समय तक महाराणा से संबंध बनाये रखकर वि० सं० १७१८ (ई० स० १६६१) में सेमलिया में महाराणा के संकेत से अपना थाना क़ायम रखा होगा। अनुमान होता है कि जब तक महाराणा राजसिंह पर बादशाह औरंगज़ेब की नाराज़गी नहीं हुई, तब तक महारावल कुशलसिंह महाराणा के प्रतिकूल नहीं हुआ। वि० सं० १७१७ (ई० स० १६६०) में चारुमती से कृष्णगढ़ में महाराणा का विवाह होने के बाद बादशाह उससे अप्रसन्न हो गया और उसकी अप्रसन्नता बढ़ती ही रही। इस अवसर पर महारावल कुशलसिंह भी महाराणा से प्रतिकूल हो गया होगा। २१

१६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास राजसिंह को मौज़े सेमलिया से अपने आदमियों को हटा लेने के लिए हुक्म जारी करा दिया है और इस विषय में सैयद नवाज़िशखां ने भी निवेदन किया है कि फ़रमान के मुताबिक़ राणा राजसिंह को लिख दिया गया था कि अपनी जमीयत और समरसी के बेटे को सेमलिया से हटा ले, जिसकी तामील में उसने अपनी जमीयत और समरसी के बेटे को वहां से हटा दिया है। अब उक्त मौज़े में कोई नहीं है, इसलिए तुम उसको अपने अधिकार में कर लो और उचित प्रबंध कर वहां के निवासियों की तसल्ली का प्रयत्न करो१।” इसके थोड़े ही समय पीछे महारावत के पास बादशाह का इस आशय का फ़रमान पहुंचा—“तुम्हारी भेजी हुई अर्ज़ी क़ुतुबुद्दीनखां की मारफ़त हमारे मुलाहज़े से गुज़री। तुमने जो अपने बेटे को हमारी सेवा में भेजने को लिखा है, उसकी मंजूरी दी जाती है। तुम्हें चाहिये कि अपने बेटे को हमारी सेवा में भेज दो। बाद दर्याफ़्त हाल उसकी तसल्ली की जायगी और शाही कृपा से इज्ज़त दी जाकर खिलअत बख़्शी जायगी२।” इसपर महारावत ने अपने कुंवरों को शाही सेवा में रवाना किया, जिसका परिणाम लाभदायक हुआ और महाराणा की ओर से गयासपुर और वसावर के परगने मिलने के संबंध में बहुत कुछ प्रयत्न होने पर भी बादशाह ने उस ओर ध्यान न दिया। फिर महारावत ने अहमदाबाद के सूबे में अपनी नियुक्ति होने की बादशाही दरबार में प्रार्थना की। इसपर ता० २६ शव्वाल सन् जुलूस ७ हि० स० १०७४ (वि० सं० १७२१ ज्येष्ठ सुदि १ = ई० स० १६६४ ता० १६ मई) को वज़ीर ने महारावत को लिखा—“बसाड़ परगने के बहाल रहने और उसके अहमदाबाद में नियुक्त किये जाने के संबंध में परवाना भेजने के लिए उसने जो अर्ज़ी भेजी, वह मिल गई है। परगना बहाल रक्खा जाता है, पर अहमदाबाद में उसकी नियुक्ति नहीं की जा सकती, क्योंकि वह मालवा सूबे के अन्तर्गत है। उसे उसी सूबे में, (१) बादशाह औरंगज़ेब के फ़ारसी फ़रमान के हिन्दी अनुवाद से। २) बादशाह औरंगज़ेब के फ़ारसी फ़रमान के हिन्दी अनुवाद से।

महारावत हरिसिंह˙ १६३ जिसमें वह है; अच्छी सेवां करनी चाहिये' ।" महारावत हरिसिंह की कर्तव्यनिष्ठा और राजभक्ति की शाही कर्म- चारियों ने समय-समय पर प्रशंसा की थी। ता० २५ रमज़ान सन् जुलूस १५ हि० स० १०८२ (वि० सं० १७२८ माघ वदि १२ = ई० स० १६७२ ता० १६ जनवरी) को शाहज़ादे मुहम्मद मुअज़्ज़म ने महारावत के नाम निशान भेज लिखा— "तुम्हारी उच्च स्वामिभक्ति का परिचय बादशाही कृपापात्र मोहब्बतखां-द्वारा मिल गया है। तुमको चाहिये कि सदा ऐसे ही बने रहो और समय-समय पर अपनी कुशलता का समाचार भेजते रहो२।"" महारावत हरिसिंह का पिछला इतिहास अप्राप्य है। उसका वि० सं० १७३० (ई० स० १६७३) के लगभग परलोकवास हुआ³। उसके महारावत का परलोकवास साथ उसकी दो राणियां राठोड़ आनंदकुंवरी और गौड़ मानकुंवरी (अजबकुंवरी) सती हुईं⁴। कुछ स्थल पर उसका परलोकवास वि० सं० १७३२ (ई० स० १६७५) में होना लिखा है; एवं वि० सं० १७३२ वैशाख सुदि १५ (ई० स० १६७५ ता० २६ अप्रेल) की डोराणा गांव की सनद भी उसके समय की ही बतलाई जाती है; परन्तु इसके विपरीत देवलिया की भोगीदास की बावड़ी की वि० सं० १७३१ फाल्गुन सुदि ७ (ई० स० १६७५ ता० २१ फ़रवरी) रविवार की प्रशस्ति५ (१) वज़ीर...खां के महारावत हरिसिंह के नाम के फ़ारसी पत्र के अंग्रेज़ी अनुवाद से। (२) शाहज़ादे मुअज़्ज़म के फ़ारसी निशान के अंग्रेज़ी अनुवाद से। (३) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ५। प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ८। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६२। (४) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ८। (५) संवत् १७३१ फागुण सुद ७ रविवासरे............

१६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास में उस समय महारावत प्रतापसिंह के राजा होने का उल्लेख है। श्रावणादि वि० सं० १७३१ (चैत्रादि १७३२) ज्येष्ठ सुदि १० (ई० स० १६७५ ता० २४ मई) सोमवार की लिखी हुई 'कुंडप्रदीप' और श्रावणादि वि० सं० १७३१ (चैत्रादि १७३२) आषाढ वदि ७ (ई० स० १६७५ ता० ४ जून) शुक्रवार की लिखी हुई 'शास्त्र-दीपिका' नामक पुस्तकों में उस समय महारावत प्रतापसिंह को वहां का स्वामी बतलाया है। ऐसी स्थिति में महारावत हरिसिंह का देहांत वि० सं० १७३० (ई० स० १६७३) के आस-पास होना मानना पड़ेगा। डोराणा गांव की मूल सनद हमारे देखने में नहीं आई है अतएव उसकी सत्यता के विषय में सन्देह ही है। उसके दस राणियां थीं, जिनसे पांच कुंवर-प्रतापसिंह, अमरसिंह³, ॰॰॰रावतश्रीप्रतापसिंहजीविजयराज्ये शीशोद्यावंशे राजश्रीगोपालजीतत्सुत जोधाजी तस्यात्मजराजश्रीभोगीदासजी.........। मूल प्रशस्ति की छाप से। (१) संवत् १७३१ वर्षे ज्येष्ठमासे शुक्लपक्षे दशम्यां तिथौ सोमवासरे देवदुर्गे रावतश्रीप्रतापसिंहविजयराज्ये आमेदांज्ञातीयभट्टविद्या- धरतत्सुतभट्टमनोहरतत्सुतेन शोमजीभट्टेन लिखितं पुस्तकमिदम्॥ मूल पुस्तक का अंतिम भाग। (,२) संवत् १७३१ वर्षे आषाढमासे कृष्णपक्षे सप्तम्यां तिथौ शुक्रवासरे देवदुर्गे रावतश्रीप्रतापसिंहविजयराज्ये......। मूल पुस्तक का अंतिम भाग। (३) अमरसिंह के वंशधरों के ठिकाने साखथली और बगदावद रहे। फिर साखथली के ठाकुर दलपतसिंह का पुत्र मोहब्बतसिंह उपर्युक्त अमरसिंह के भाई मोहकमसिंह के प्रपौत्र हिम्मतसिंह का उत्तराधिकारी होकर सालिमगढ़ का स्वामी बना, इसलिए कुछ स्थलों पर सालिमगढ़वालों को अमरसिंह का वंशधर भी लिखा है।

मोहकमसिंह१, माधवसिंह२ तथा आनन्दसिंह—एवं तीन कुंवरियां— महारावत की संतति कल्याणकुंवरी, कुशलकुंवरी और सौभाग्यकुंवरी— हुईं३। उनमें से कुशलकुंवरी का विवाह बीकानेर के स्वामी महाराजा अनूपसिंह (राठोड़) से हुआ था, जिसके उदर से कुंवर स्वरूपसिंह का जन्म हुआ, जो वि० सं० १७५५ (ई० स० १६६८) में उक्त महाराजा का परलोकवास होने पर बीकानेर राज्य का स्वामी हुआ४। प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात (पृ० ४-५) में कुंवर प्रतापसिंह का महारावत हरिसिंह की राणी हाड़ी मनभावनदे के उदर से, अमरसिंह का झाली जसकुंवरी के उदर से, मोहकमसिंह का राठोड़ मेड़तणी अनोपकुंवरी से और माधवसिंह का गौड़ अजबकुंवरी से जन्म होना बतलाया है; परंतु प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात (पृ० ८) में महारावत हरिसिंह की केवल नौ राणियों के ही नाम दिये हैं एवं उसमें कुंवर प्रतापसिंह, अमरसिंह, मोहकमसिंह और माधवसिंह के ही नाम होकर आनन्दसिंह का नाम नहीं है तथा उसकी कुंवरियों के नामों में कुशलकुंवरी और सौभाग्यकुंवरी के नाम न होकर अनोपकुंवरी और (१) मोहकमसिंह बड़ा वीर राजपूत था। कृष्णगढ़ के स्वामी महाराजा बहादुरसिंह रचित 'रावत प्रतापसिंह ने मोहोकमसिंह हरिसिंघोत देवगढ़ रा धणीरी वार्ता' नामक पुस्तक में उस (मोहकमसिंह) की वीरता की बड़ी प्रशंसा की है, जिसका आगे उल्लेख किया जायगा। उसके वंशधरों का ठिकाना सालिमगढ़ है। उसका मूल वंश उसके प्रपौत्र हिम्मतसिंह से नष्ट हो गया। तब उस (मोहकमसिंह) के भाई अमरसिंह के वंशधर दलसिंह का पुत्र मोहब्बतसिंह साखथली से आकर सालिमगढ़ का स्वामी हुआ। तब से अब तक उसके वंशधरों का वहां अधिकार है, जो प्रतापगढ़ राज्य के प्रथम वर्ग के सरदारों में हैं। (२) माधवसिंह के वंशधर अचलावदा के ठाकुर और प्रतापगढ़ राज्य के प्रथम वर्ग के सरदारों में है। (३) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ४-५ । (४) दयालदास की ख्यात; जि० २, पत्र ५८ । मेरा राजपूताने का इतिहास; जिल्द ५, प्रथम खण्ड, पृ० २७३ ।

१६६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास पद्मकुंवरी नाम दिये हैं। इसी प्रकार उसमें महारावत हरिसिंह की गौड़ राणी धर्मकुंवरी (विट्ठलदास की पुत्री) से कुंवर प्रतापसिंह का जन्म होना लिखा है। इसके विपरीत महारावत प्रतापसिंह (हरिसिंह का पुत्र) के वि० सं० १७३३ माघ सुदि १५ (ई० स० १६७७ ता० ७ फ़रवरी) के पाटल्या गांव के मेहता जयदेव के नाम के संस्कृत दानपत्र¹ एवं 'प्रताप-प्रशस्ति'² (खंडित काव्य) में उस (प्रतापसिंह) की माता का नाम मनभावती दिया है, जो अधिक विश्वसनीय है। पाटल्या गांव के दानपत्र और 'प्रताप- प्रशस्ति' में उस (मनभावती, प्रतापसिंह की माता) के पितृकुल का परिचय नहीं दिया है, जिससे इस विषय पर अधिक प्रकाश नहीं डाला जा सकता। ख्यातों में प्रतापगढ़ राज्य के पहले के राजाओं की राणियों और उनके पितृकुल का परिचय परस्पर नहीं मिलता। इसी प्रकार महारावत हरिसिंह की राणियों और उनके पितृकुल, संतति आदि के नाम भी परस्पर नहीं मिलते हैं। वंश-भास्कर से ज्ञात होता है कि उस- (हरिसिंह) के भातुलदेवी नामक कुंवरी भी थी, जिसका विवाह बूंदी के स्वामी राव भावसिंह हाड़ा से हुआ था³, पर ख्यातों में भातुलदेवी का नाम (१)······तेन महाराजेनैकदा गङ्गालक्ष्मीसमानस्वमातृमहाराज्ञी- श्रीमन्भावतीजीभासमानायां···········। मूल ताम्रपत्र की प्रतिलिपि से। (२) माताश्रीमन्भावतीविरचितं दिव्यैर्जलैः पूरितं मेघैर्मानसरः पवित्रजनतासेव्यं मनोहारि तत्। यत्राम्राः परितः फलन्ति हि सदा पुण्यप्रभावादिवो दिव्यं मानसरो विहाय नितरामायान्ति देवानिशम्॥ (३) दूजी हरि की सुता प्रतापगढ़ सीसोदनी भातुलादि देवी नाम व्याह्यो अधिके उछाह···॥ १२॥ पृ० २७२५।

महारावत हरिसिंह १६७ नहीं है ! महारावत हरिसिंह ने देवलिया में महल और उसकी माता चंपाकुंवरी ने देवलिया में गोवर्द्धननाथ का मन्दिर, बावड़ी और वाटिका महारावत के बनवाये हुए बनवाई थी। उपर्युक्त मंदिर की वि० सं० १७०५ महल और उसके समय के वैशाख सुदि १५ (ई० स० १६४८ ता० २७ अप्रेल) लोकोपयोगी कार्य गुरुवार को प्रतिष्ठा होकर वहां प्रशस्ति लगवाई गई, जिससे पाया जाता है कि उस अवसर पर राजमाता ने स्वर्ण का तुलादान किया एवं एक गांव, एक हज़ार गायें, दस महादान और एक सहस्र ब्राह्मण दम्पतियों को वस्त्रदान दिया और एक लाख व्यक्तियों को भोजन करवाया था¹ । महारावत ने लगभग ४५ वर्ष तक राज्य किया। उसके समय के (१) संमत १७०५ वर्षे शाके १५७० प्रवर्तमाने उत्तरायणगते श्रीसूर्ये वैशाखमासे शुक्लपक्षे पूर्णमास्यां तिथौ गुरुवासरे मालवखण्डे- श्वरमहाराजाधिराजरावतश्रीहरिसिंहजीविजयराज्ये देवदुर्गराजधान्यां रावत- श्रीजसवन्तजीभार्या चहुआण चांपाजी देवल बावड़ी वांग करी ने प्रतिष्ठा कीधी । तत्समये दान दीधा तुलादान गाम एक । गौ सहस्र । दश महादान । लक्ष भोजन.........ब्राह्मण सहस्र एक दम्पति वस्त्र दीधा... । आरामवापीत्रिदशप्रतिष्ठाम् हेम्नां तुलां षोडशदानयुक्ताम् । हरिर्नृपः सर्वमिदं जनन्या सहस्रगौदानमकारयच्च ॥ २ ॥ श्रीचित्रकूटेश्वरराणखेमासुतोऽभवद्रावतसूर्य्यमल्लः । तस्याष्टमः श्रीहरिसिंहदेवो राजेश्वरो राजति देवदुर्गे ॥ ३ ॥ मूल प्रशस्ति की प्रतिलिपि से ।

१६८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास उपर्युक्त कार्यों को देखते हुए अनुमान होता है कि देवलिया राज्य उस समय महारावत के समय के समृद्धिपूर्ण था। उसके समय के वि० सं० १६६६ से ताम्रपत्र और शिलालेख १७०५ (ई० स० १६४२-१६४८) तक के पांच लेखों की छापें तथा प्रतिलिपियां हमारे पास आई हैं, जिनका सारांश नीचे लिखे अनुसार है - (१) वि० सं० १६६६ पौष सुदि ११ (ई० स० १६४२ ता० २१ दिसंबर) का मचलाना गांव का दानपत्र, जिसमें उपर्युक्त गांव महंत हंसपुरी गोसाईं को पुण्य करने का उल्लेख है। (२) वि० सं० १७०१ चैत्र सुदि ५ (ई० स० १६४४ ता० ३ मार्च) का ठीकरा गांव का दानपत्र, जिसमें आगरे में रहते समय उपर्युक्त गांव दुबे जगन्नाथ और इंद्र को देने का उल्लेख है¹। (३) वि० सं० १७०५ वैशाख सुदि १५ (ई० स० १६४८ ता० २७ अप्रेल) गुरुवार की देवलिया के गोवर्द्धननाथ के मंदिर की प्रशस्ति, जिसका उल्लेख ऊपर हो चुका है²। (४) वि० सं० १७०७ (?) वैशाख सुदि १५ (ई० स० १६५० ता० ५ मई)³ का भट्ट विश्वनाथ के नाम का कीटखेड़ी गांव का दानपत्र, जिसमें राजमाता चौहान के बनवाये हुए गोवर्द्धननाथ के मंदिर की प्रतिष्ठा पर उपर्युक्त गांव दान देने का उल्लेख है। यह ताम्रपत्र शाह वर्षा⁴ के कहने से लिखा गया था (१) देखो, ऊपर पृ० १४६ टिप्पण १। (२) मूल प्रशस्ति के लिए देखो ऊपर पृ० १६७ टिप्पण १। (३) इस ताम्रपत्र में गुरुवार दिया है, पर वि० सं० १७०७ वैशाख सुदि १५ को गुरुवार नहीं आता । वि० सं० १७०५ वैशाख सुदि १२ (ई० स० १६४८ ता० २७ अप्रेल) को गुरुवार था और घटनाक्रम पर विचार करने से भी यही ठीक जान पड़ता है । संभव है ताम्रपत्र की नक़ल करने में १७०५ के स्थान में १७०७ हो गया हो । (४) शाह वर्षा हूंबड़ जाति का वैश्य था और जैनों की दिगंबर शाखा का अनुयायी था। 'हरिभूषण महाकाव्य' में कवि गंगाराम ने उसकी अच्छी प्रशंसा की है।

महारावत हरिसिंह १६६ और उसमें अक्षर खोदनेवाले सुनार का नाम केशव खुदा हुआ है एवं अंत में दो संस्कृत श्लोक हैं, जिनमें से दूसरे में विश्वनाथ को 'दीक्षागुरु' की उपाधि देने का उल्लेख है' । वह महारावत हरिसिंह का मंत्री था। प्रसिद्ध है कि उसने महारावत हरिसिंह की आज्ञानुसार सागवाड़ा (डूंगरपुर राज्य) से एक सहस्र हूंबड़ों को बुलाकर कांठल में आबाद किया था। वर्षा के वंशज वर्पावत कहलाते हैं। ( १ ) महाराज रावत श्रीहरिसिंहजी बचनात् भट विश्वनाथ जोग्य मोटो प्रसाद कीधो । मया कोरने गाम १ मोजे कीटखेड़ी दीधो उदक आघाट तांवापत्र करे दीधो देवल प्रतिष्ठा हुई जदी माताजी चहुआन रे देहरे दीधो आप दत्तेषु परदत्तेषु ये लुम्वन्ति वसुन्धराम ते नरा नरकं यान्ति यावच्चन्द्र दिवाकरौ । अणी गाम री कदी कपीत कर लागत व- राड कोई करवा न पावे। संवत १७०७(१) बरषे मास वैसाख सुदि १५ पुनम दिने गुरू लखतं स्वहस्ते दुवे साह वर्षा । आचंद्राकं यावत् श्री गोविन्द रे पट्टे पीढ़ी री पीढ़ी दीधौ खोदद्यो सोनी केशव । श्रीसिंहरावतसुतो यशवन्तसिंह- स्तत्संभवो विजयते हरिसिंहदेवः । तेन व्यधायि सुरसद्ममहाप्रतिष्ठा श्रीदेवदुर्गपुरिमालवराजधान्याम् ॥ १ ॥ तदा सोऽदात् कीटखेडी ग्रामं ब्रह्मास्पदं च यद् । विश्वनाथाय विदुषे दत्वा दीक्षागुरोः पदम् ॥ २ ॥ मूल ताम्रपत्र की प्रतिलिपि से । विश्वनाथ जाति का तरवाड़ी मेवाड़ा ब्राह्मण था। उपर्युक्त ताम्रपत्र में उसको भट्ट लिखा है, जो उसकी उपाधि हो। 'हरिभूषण महाकाव्य' में कवि गंगाराम ने उसको व्याकरण, न्याय, मीमांसा दर्शन आदि शास्त्रों का ज्ञाता बतलाया है। इसी प्रकार महारावत प्रतापसिंह की प्रशंसा में पंडित कल्याण ने उक्त महारावत के समय प्रशस्ति की रचना की, उसमें भी उसका प्रशंसात्मक उल्लेख किया है। २२