राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत हरिसिंह १५३ : शाहज़ादों के पारस्परिक संघर्ष में महारावत हरिसिंह को अपनी- अपनी तरफ़ मिलाने के लिए दाराशिकोह और मुराद दोनों ने प्रयत्न किये परन्तु उस( हरिसिंह )ने उस विषम परिस्थिति में किसी का साथ देना उचित न समझ शाहज़ादों के उपर्युक्त किसी युद्ध में भाग न लिया और अपनी अनुपस्थिति की उनके पास अर्जियां भेज दीं। समूनगर में विजय प्राप्त करने के तीसरे दिन शाहज़ादे मुराद ने महारावत की जागीर में परगना सुखेरीखेड़ा बढ़ाकर, सिरोपाव के साथ निम्नलिखित आशय का ता० ६ शाबान हि० १०६८ (वैशाख सुदि ११ = ता० ३ मई) को निशान भेजा— "शाही सेवा में उपस्थित होने की उसकी अर्जी हमारे पास पहुंच चुकी है। इस संबंध में यहां से फ़रमान लिखा जा रहा है, इससे उसको पूर्ण संतोष होजायगा। हमने उसके न आने का अपराध माफ़ कर दिया है। मंदसोर के शाही परगने से यह फ़रमान जारी किया जाता है। इसके अनुसार वह (हरिसिंह) ५०० सवारों के साथ शाही सेनाध्यक्ष के शामिल होकर उस ज़िले की रक्षा का भार अपने ऊपर ले। फ़िलहाल उसे मंदसोर का परगना सुखेरी बख्शा जाता है और एक सिरोपाव भी उसके पास भेजा जाता है¹।" उपर्युक्त निशान महारावत के पास पहुंचने के कुछ ही दिनों बाद शाहज़ादे औरंगज़ेब ने अपने वृद्ध पिता शाहजहां बादशाह को आगरे के [हाशिया: 'औरंगज़ेब का बसाइ और गयासपुर के परगने महाराणा को देना] क़िले में नज़रबंद कर दिया। हि० स० १०६८ ता० ४ शव्वाल (वि० सं० १७१५ आषाढ सुदि ५ (ई० स० १६५८ ता० २५ जून) को मथुरा के मुक़ाम पर उसने शाहज़ादे मुराद को भी अपने शिविर में बुलाकर शराब पिलाने के बाद क़ैद कर दिया। फिर वह दाराशिकोह का पीछा करता हुआ दिल्ली पहुंचा, जहां उसने ता० २१ जुलाई (श्रावण सुदि २) को अपने को बादशाह घोषित किया। जब औरंगज़ेब दक्षिण में शाहजहां की बीमारी का समाचार पाकर ( १ ) शाहज़ादे मुरादबख़्श के फ़ारसी निशान के अंग्रेज़ी अनुवाद से। २०