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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 534 में से

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और यदि परमेश्वर ने चाहा तो इस सेवा को पूरी करने के बाद बादशाही कृपा तुम पर होगी और तुम अपने बराबरवालों तथा पासवालों में इज्ज़त हासिल करोगे'” । बराड़ न जाने की अवस्था में अहमदाबाद को खाली कराने की शाही आज्ञा को सुनकर शाहज़ादा मुराद महाराजा जसवंतसिंह के उज्जैन पहुंचने पर एक बड़ी सेना के साथ मुक़ाबले के लिए जा डटा, परंतु फिर अकेले लड़ना उचित न समझ वह शाहजादे औरंगज़ेब से, जो दक्षिण से बादशाह की खुशी पूछने के लिए आगरे जाने के बहाने से आ रहा था, जा मिला। उस समय औरंगज़ेब ने उस (मुराद) को ही बादशाह बनाने का लालच दिया। फिर दोनों शाहज़ादों ने आगे बढ़ना चाहा, पर महाराजा जसवन्तसिंह ने उन्हें रोक दिया। वि० सं० १७१५ वैशाख वदि ८ (ई० स० १६५८ ता० १५ अप्रेल) को उज्जैन से सात कोस दूर धर्मातपुर में (जिसका औरंगज़ेब ने फ़तिहाबाद नाम रक्खा) दोनों शाहजादों का महाराजा जसवन्तसिंह और क़ासिमखां आदि शाही अफ़सरों से मुक़ाबला हुआ । शाहजादों की फौज ने शाही सेना को घेर लिया, जिससे कई बड़े-बड़े अफ़सर और सहस्रों सैनिक मारे गये। कासिमखां पहले ही औरंगजेब से मिल गया था। जब जसवन्तसिंह के पास थोड़ी सेना रह गई तो उसके सरदारों ने उसे उस युद्ध-क्षेत्र से हटने के लिए विवश किया । फिर दोनों शाहज़ादे अपनी सम्मिलित सेना के साथ आगरे की तरफ बढ़े । उधर से शाहज़ादा दाराशिकोह भी बड़ी सेना के साथ मुक़ाबले को पहुंचा । समूग़र (आगरे के पास) में वि० सं० १७१५ ज्येष्ठ सुदि ७ (ई० स० १६५८ ता० २६ मई) को दोनों सेनाओं के बीच घोर युद्ध हुआ, जिसमें दाराशिकोह की हार हुई² ।


(१) शाहज़ादे दाराशिकोह के फ़ारसी निशान का अंग्रेज़ी अनुवाद । (२) मुंशी देवीप्रसाद; शाहजहां नामा, तीसरा हिस्सा, पृ० १७६ । वीरविनोद, द्वितीय भाग, पृ० ३४४-१८ ।