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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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कर वापस लौट गया। उसकी सेना में इस आज्ञा से खलबली मच गई और उसके साथ रहनेवाले कितने ही अफ़सर उसका साथ छोड़कर चल दिये१ । शाहज़ादे मुरादबख़्श और औरंगज़ेब ने उपर्युक्त आज्ञाओं की मंसूखी के लिए बादशाह के पास अर्जियां भेज दीं, परन्तु वे दाराशिकोह के दबाव से मंजूर न हुईं और दाराशिकोह के कथनानुसार जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह को वि० सं० १७१४ फाल्गुन वदि ८ (ई० स० १६५८ ता० १५ फरवरी) को मालवे के सूबे पर नियत कर कासिमखां को अहमदाबाद की सूबेदारी देकर उधर रवाना किया तथा ये हिदायतें की गईं कि दोनों सरदार उज्जैन जाकर मिलें और यदि मुरादबख़्श बराड़ न जावे तो उससे अहमद- बाद खाली करवा लें२ । इस अवसर पर दाराशिकोह ने ता० ६ रज्जब (वि० सं० १७१५ चैत्र सुदि १० = ई० स० १६५८ ता० ३ अप्रेल) को महा- रावत हरिसिंह के पास इस आशय का निशान भेजा "मशहूर राजाओं में चुना हुआ, उमरावों में बड़े हौसलेवाला, बड़ी सलतनत का कारकुन और बिहतर, बादशाहत के अमानतदार, बहुत मिहरवानियों के लायक महाराजा जसवन्तसिंह अपने फतहमंद लश्कर के साथ, कमनसीब, हक़ को न पह- चाननेवाले और गुनहगार नामुराद कमबख्त को सज़ा देने के लिए रवाना हो गया है। इसलिए यह शाही फ़रमान तुम्हारे नाम जारी किया जाता है कि तुम भी इस मौके को हाथ से न जाने दो ताकि वह कमनसीब भाग न जाय । ऐसा न हो कि तुम्हारे इलाके से वह बाहर निकल जाय । जो कुछ तुमसे हो सके उसमें कमी न करो एवं जैसा कि उस (मुराद ?) के शिकस्त पाने तथा भागने पर लश्कर और उसके आदमियों की लूटमार को हमने माफ़ कर दिया था, उसी प्रकार तुम भी उस अपराधी कमनसीब की चीज़ों और सामान को मय उसके हमराहियों के समान के क़ब्जा पाने पर माफ किए जाओगे। हम जान बूझकर यह लूट माफ करते हैं (१) मुंशी देवीप्रसाद; शाहजहां नामा, तीसरा हिस्सा, पृ० १७१-७४ । (२) वही; पृ० १७५ ।