राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास बादशाह बनने का मनसूबा बांध रहा था, उस समय उसने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह को अपने पक्ष में कर लिया था, जिसने शाहज़ादों के पारस्परिक युद्धों में उसको सहायता दी। इससे प्रेरित होकर औरंगज़ेब ने बादशाह बनने पर महाराणा के पास पांच लाख रुपये नक़द भेजे और मनसब में एक हज़ार ज़ात और एक हज़ार सवारों की वृद्धि कर उसका मनसब छः हज़ार ज़ात और छः हज़ार सवार कर दिया। साथ ही शाहजहां के समय मेवाड़ से छीने हुए बदनौर और मांडलगढ़ के परगनों के अतिरिक्त डूंगरपुर, बांसवाड़ा, वसाइ, गयासपुर आदि बाहरी इलाक़े भी उसके राज्य में मिलाये जाने का ता० १७ ज़िल्काद हि० स० १०६८ (वि० सं० १७१५ भाद्रपद वदि ४ = ई० स० १६५८ ता० ७ अगस्त) को उसने फ़रमान कर दिया, जिसके अनुसार देवलिया राज्य के दोनों परगने (वसाड़ और गयासपुर) मेवाड़ राज्य के अन्तर्गत हो गये¹ । शाहज़ादा दाराशिकोह सिंध की तरफ़ से कच्छ में होता हुआ अहमदाबाद पहुंचा, जहां उसको कुछ आर्थिक सहायता मिली और उसका सहायता के लिए दारा- सैन्य-बल भी बढ़ गया। जोधपुर के महाराजा शिकोह का महारावत के जसवंतसिंह ने भी उस समय उसको सहायता देना नाम निशान भेजना स्वीकार किया, जिससे वह वहां से रवाना होकर अजमेर की तरफ़ आगे बढ़ा। इस अवसर पर उक्त शाहज़ादे से महारावत हरिसिंह ने भी मिल जाना चाहा। इसपर दाराशिकोह ने ता० १६ जमादि- उल्अव्वल हि० स० १०६६ (वि० सं० १७१५ फाल्गुन बदि २ = ई० स० १६५६ ता० २० जनवरी) को महारावत के नाम नीचे लिखे आशय का निशान भेजा- “......तुम्हारी अर्ज़ी मिल गई है। तुमको आज्ञा दी जाती है कि शीघ्र जितने आदमी एकत्र हो सकें, उन्हें लेकर शाही दरबार में उपस्थित हो। तुम्हारे पहुंचने पर तुम पर शाही कृपाओं की वर्षा की जायगी तथा (१) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० २, पृ० ५३८। मूल फ़रमान के लिए देखो वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ४२५-३१।