भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 202

महारावत हरिसिंह १५५ तुम्हारे शत्रुओं की ज़मींदारी भी तुम्हें हीं सौंप दी जायगी। अतएव तुमको शीघ्रातिशीघ्र आना चाहिये¹।" इसके थोड़े ही दिनों बाद फिर उक्त शाहज़ादे ने जितनी सेना एकत्रित हो सके, उसके साथ शीघ्र पहुंचने का ता० २७ जमादि-उल्-अव्वल हि० स० १०६६ (फाल्गुन वदि १४ = ता० १० फ़रवरी) को महारावत के नाम निम्नलिखित आशय का निशान भेजा— "इन दिनों तुम्हारे हाल हमने अपने मुसाहियों से सुने, इसलिए आज्ञा दी जाती है कि तुम्हारी जागीर के परगने यदि दूसरे की जागीर में न चले गये हों तो उनपर किसी को दख़ल न करने दो और पुराने रिवाज के मुआफ़िक़ उनपर क़ाबिज़ रह कर निहायत इतमीनान के साथ हमारे हुजूर में हाज़िर हो या अपने बेटे को एक बड़ी और अच्छी सेना के साथ हमारे पास भेजो ताकि हमारे हुजूर में हाज़िर होकर वह हमारी कृपाओं को प्राप्त करे। इस बारे में देर न हो²।" गयासपुर और वसाड़ (वसावर) के परगनों का फ़रमान तो शाही दरबार से महाराणा के नाम हो गया, परंतु महारावत हरिसिंह ने उसकी अवहेलना की। इसपर क्रुद्ध होकर महाराणा ने [पार्श्व टिप्पणी: महाराणा राजसिंह का देवलिया पर सेना भेजना] वि० सं० १७१६ (ई० स० १६५६) में अपने प्रधान कायस्थ फ़तहचंद को, जो उन दिनों बांसवाड़े के महारावल समरसिंह को अधीन करने के लिए गया हुआ था, एक बड़ी सेना के साथ देवलिया पर जाने की आज्ञा दी। फ़तहचंद बांसवाड़े का कार्य समाप्त कर वहां के रावल को लेकर उदयपुर गया और वहां से देवलिया पहुंचा। उसके देवलिया की तरफ़ आने का समाचार पाकर महारावत बादशाह के सम्मुख अपने मामले को पेश करने के लिए दिल्ली गया। महारावत की अविद्यमानता का अवसर पाकर फ़तहचंद ने वहां (१) शाहज़ादे दाराशिकोह के फ़ारसी निशान के अंग्रेज़ी अनुवाद से। (२) शाहज़ादे दाराशिकोह के फ़ारसी निशान के अंग्रेज़ी अनुवाद से।