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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 534 में से

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पृष्ठ 203

१५६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास पर अधिकार कर लूट-मार की १। वेड़वास की बावड़ी की प्रशस्ति२ से प्रकट है कि महारावत की माता देश की बरबादी देख अपने पौत्र प्रतापसिंह के साथ फ़तहचंद के पास उपस्थित हुई और पांच हज़ार रुपये एवं एक हथिनी देकर उसने उससे संधि कर ली। फिर फ़तहचंद कुंवर प्रतापसिंह को लेकर महाराणा के पास उपस्थित हुआ। राजप्रशस्ति महाकाव्य३ से भी इसकी पुष्टि होती है, परन्तु उसमें बीस हज़ार रुपये दिया जाना लिखा है। महारावत-द्वारा की गई महाराणा की शिकायत का बादशाह पर कुछ भी प्रभाव न पड़ा; क्योंकि बादशाह उन दिनों अपने भाइयों के झगड़े महाराणा राजसिंह के पास मिटाने में संलग्न था। साथ ही सिंहासनारूढ़ होने महारावत का उपस्थित के समय उसको महाराणा से सहायता मिली थी होना इसलिए उसने उससे बिगाड़कर उसको असंतुष्ट करना ठीक नहीं समझा। यदि उस समय वह इस बात पर महाराणा को (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ४३५। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास, जिल्द २, पृ० ५४०-१ । (२) वि० सं० १७२५ की वेड़वास की बावड़ी की प्रशस्ति। यह बावड़ी उदयपुर से देबारी की तरफ़ जानेवाले मार्ग में बनी हुई है । मंत्री फ़तहचंद ने इसको बनवाकर यहां उक्त प्रशस्ति लगवाई थी। (३) श्रीराजसिंहवचनात् फत्तेचंदः स ठक्कुरः ॥ चक्रे देवलियाभंगं हरिसिंहः पलायितः ॥ २१ ॥ हरिसिंहस्य माता तु गृहीत्वा पौत्रमागता ॥ प्रतापसिंहं विदधे प्रसन्नं राणमंत्रिणं ॥ २२ ॥ रूप्यमुद्रासहस्राणि विंशत्याख्यानि हस्तिनी । दंडं प्रकल्प्य स्वल्पं स फत्तेचंदो दयामयः ॥ २३ ॥ राणेंद्रचरणाभ्यर्णे आनयामास तं बलात् । प्रतापसिंहं जातस्तत् फत्तेचंदः प्रभोः प्रियः ॥ २४ ॥ सर्ग आठवां ।